आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

प्रश्नोत्तर P24-0120 · भाग 24

गुरु जी, मैं हमेशा यही बोलती हूं कि मुझे अब शरीर नहीं चाहिए, मुझे मुक्ति चाहिए। तो क्या ऐसा कहने से दोबारा शरीर नहीं मिलेगा?

तेरे कहने से क्या होगा? कोई अपराधी कह दे कि मुझे सजा नहीं चाहिए, तो क्या उसे सजा नहीं दी जाएगी? अपराध तो मैंने किया, लेकिन सजा नहीं चाहिए — ऐसा थोड़ी ना होता है। मेरे कर्म के आधार पर मुझे शरीर मिलेगा। और तेरी इच्छा है, तो इच्छा की पूर्ति बिना शरीर के हो ही नहीं सकती — तुझे शरीर दिया ही जाएगा। इच्छा से शरीर मिलता है, तेरे बोलने से नहीं। बोलने से राजगद्दी नहीं मिलती, कर्म से मिलेगी। जिनके प्रति तेरा राग-द्वेष है, जिनके लिए तू जा रही है, जिनके आसपास रह रही है — जब तक उपलब्धि नहीं होगी, उनके साथ ही शरीर मिलेगा। "मुझे शरीर नहीं चाहिए, मुझे मुक्ति चाहिए" — ये बोलने से नहीं होगा। बोलने से होता तो कितने लोग बोल रहे हैं "मैं ब्रह्म हूं"; कितने लोग अपने आप को भगवान समझ के घूम रहे हैं, कि सब में मैं ही हूं। अगर सब में तुम हो, तो तेरे घर में सब आ जाएं तो रखोगे? नहीं अपना सकते — इसका मतलब तुम तुम हो, वो वो है। ये खाली रट्टा है; इससे कुछ नहीं होने वाला। फांसी की सजा वाले से उसकी आखिरी इच्छा पूछी जाती है — भोजन या परिवार से मिलना, वो इच्छा पूरी होगी; पर वो कहे "मेरी फांसी की इच्छा नहीं है", तो फांसी तो पक्का है। ऐसे ही जब तक तेरी कामना है, इच्छा है, तब तक तुझे शरीर मिलना ही मिलना है — और उन लोगों के पास, जिनके प्रति इच्छा है, जिनसे लेनदेन है, उन्हीं के पास तू जन्म लेगी। वही कारण है जन्म का। अगर कोई योग-साधना में है, अपने आप को साध रहा है, तो उसमें से कोई इंसान बन सकता है; अगर कोई भोग में है, तो हो सकता है उसके पास कोई जानवर बन के जाए।

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