आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

प्रश्नोत्तर P24-0121 · भाग 24

गुरु जी, मुझे नहीं पता कि मैंने किसी का कर्ज लेना है या देना है — शायद दोनों हैं, इसलिए रुकी हूं। ऐसे में कैसे निकलूं?

देख, तूने अगर दिया तो कहीं से लिया; ऐसे तो दिया नहीं। तेरे पास क्या है? जीरो, कुछ भी नहीं। तो कहीं से लिया, तब दिया। ज्यादा के चक्कर में उधर दिया, तो जब उधर से ज्यादा मिलेगा तब इधर देगी और उसमें से कुछ खाएगी — यही हो रहा है। देने में अगर ज्यादा मिला तो इधर भी दे दोगे; और पता चला देने में वो मिला नहीं, तो इधर भी तुम्हें जवाब देना पड़ेगा और तुम्हारी मेहनत का भी नहीं मिला। ऐसे ही चल रहा है। इसीलिए मेरा कहना होता है कि अपने परिवार की देखरेख करने के बाद सत्कर्म में लगाओ — चाहे वो धन हो, चाहे तन हो, चाहे समझ हो। जब इच्छा में, पुण्य के चक्कर में कोई काम करते हैं, तो वो बीज की तरह होते हैं — कुछ एक ही बार फल देते हैं, जैसे केला, गाजर; अरहर वगैरह एक-दो साल देते हैं। बीज या तो खा सकते हो या लगा सकते हो, दोनों नहीं — गेहूं या तो खा सकते हो या लगा सकते हो। लेकिन सत्कर्म फल की तरह है — आम खा भी लिया और लगा भी दिया; और फल का पेड़ हजारों साल फल देता है, जब तक वो रहेगा, सत्कर्म मिलता रहेगा। तो निकलने के लिए क्या करो? सत्कर्म ज्यादा से ज्यादा करो, निकलने के भाव से करो, आत्मिक चिंतन करो। इतना सत्कर्म कर दो कि सत्कर्म ही तुम्हें निकाल दे — क्योंकि तुम चाहे जिस शरीर में रहो, तुम्हें ये मिलता रहेगा। और बिना मेहनत का सत्कर्म तो होगा नहीं — मेरे पास चाहे धन का बल हो, तन का बल हो, समझ का बल हो, वो मेरी साधना से ही तो आया है। देखो, एक जानवर को पेट भर रोटी नहीं मिलती, इलाज नहीं मिलता, सड़ रहा है; और एक जानवर ऐसा है कि हेलीकॉप्टर में घूम रहा है, जरा सा बुखार आ जाए तो तुरंत डॉक्टर के यहां — क्योंकि उसका सत्कर्म इतना भारी है कि भले उसे पशु का शरीर मिल गया, आज भी राजाओं की तरह जी रहा है; आगे शरीर बदलेगा तो उसका सत्कर्म उसे निकलने में सहायता करेगा। आर्मी के जानवर पशु शरीर पाने के बाद भी देश के लिए जिए, उन्हें कितने सम्मान के साथ विदा किया जाता है — और मानव शरीर में लोग अपराध, कुकर्म, दुष्कर्म कर रहे हैं। और जो पाप करता है, उसकी समझ कम हो जाती है, मंदबुद्धि होने लगता है, शरीर का बल कम हो जाता है, धीरे-धीरे धन कम हो जाता है और वो सड़ता है। इसीलिए मैं जोर देता हूं — निकलना है तो ज्यादा से ज्यादा सत्कर्म करो। सत्कर्म का परिणाम तुम्हें किसी भी शरीर में मिलेगा, और सत्कर्म तुम्हें निकाल देगा। चाहे धन हो, चाहे तन हो, चाहे समझ हो — सब लगा दो।

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