प्रश्नोत्तर P24-0122 · भाग 24
गुरु जी, मैं घर वालों को प्रेम से मना के निकलना चाहती हूं, ताकि मेरे द्वारा किसी को द्वेष ना लगे। क्या वो प्रेम समझ पाएंगे? और अगर बिना माने निकली तो क्या मैं राग-द्वेष लेकर आऊंगी?
प्रेम उपलब्धि के बाद ही समझ में आएगा। प्रेम की जितनी परिभाषा लोग देते हैं — प्रेम तो जब उपलब्धि होगी, तब समझ में आएगा कि प्रेम क्या है। राग-द्वेष तब होगा जब तू उनका अपमान करके आएगी। अपमान करके कहां आ रहे हो? जब आपने अपनी जिम्मेदारी निभा दी, तो अपमान क्या है? अपमान तो तब होता जब आप अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाए होते और भाग रहे होते। तो हम जा रहे हैं, वो ना मानें तो भी अपमान नहीं। उन्हें पता दे दो कि भाई, कभी भी तुम मिलने आ जाना; मेरी प्रबल इच्छा है, मुझे निकलना है, मैं ऐसे ही निकल पाऊंगी। अगर हम बिना पता बताए जाते तो बात अलग थी। लोग अपना करियर बनाने अमेरिका-इंग्लैंड चले जाते हैं, मां-बाप को छोड़ के। और ये शरीर धीरे-धीरे जर्जर हो रहा है — हर सांस जा रही है, शरीर कमजोर हो रहा है। जब हम मना ही लेंगे, तो अभी क्यों नहीं? उन्हें दुखी मत कर, और सुखी भी मत कर — बोल दे, भाई मुझे निकलना है, तो निकलना है। बात खत्म।
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