प्रश्नोत्तर P24-0141 · भाग 24
गुरु जी, कल आपने बोला था कि नसीब से सत्कर्म मिलता है। यहां जो साधक अपने आत्मिक कल्याण के लिए आया है, उसे अपने हाथों से भोजन (प्रसादी) कराना क्या सत्कर्म है? और कोई बार-बार दरवाजे पर खाने आए तो?
हां, ये सत्कर्म है कि तेरे द्वारा ये मिल रहा है, क्योंकि वो जितने क्षण, जितने पल यहां आया है, उसके (परमात्मा के) लिए आया है। तो अभी देखो, यहां जैसे उसे कुछ भी खिलाएंगे तो उस ताकत का उपयोग किसके लिए करेगा? उसके आत्मिक चिंतन में। अब यही संसार में तुम हजारों को खिलाते और वो उस ताकत का उपयोग बेईमानी में करते, तो वो सत्कर्म नहीं होता। जो परमात्मा की सेवा में लगा है, उसके पास तो खुद लोग लेके जाएंगे; वह क्यों तुम्हारे दरवाजे पे आएगा? परमात्मा की सेवा में लगने वाला कभी दरवाजों पर नहीं जाता। परमात्मा के मार्ग पर चलने वाला अगर भिक्षा भी ले रहा है, तो एक बार जाके एक दरवाजे पर मांगेगा, फिर दोबारा उस दरवाजे पे नहीं जाएगा। और वो भी उतना लेगा — अल्पाहार, भोजन — जितने में उसका जीवन चल सके। वो भी एक दरवाजे पे एक बार जाएगा। दुनिया कितनी बड़ी है; अगर पूरी जिंदगी कोई मांगे तो उसका जीवन कम पड़ जाएगा। नहीं तो दूसरे दरवाजे पे क्यों जाएगा? अगर दूसरे दरवाजे पे जा रहा है, इसका मतलब उसके अंदर लालच जगा है — संचित करने का, परिचय बनाने का। ठीक है? नहीं तो एक दरवाजे पे मांगेगा, आगे बढ़ जाएगा। हां, तो बस यही है सत्कर्म। कैसे भी अपने आप को लगा दो।
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