आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

प्रश्नोत्तर P24-0155 · भाग 24

गुरु जी, आपने बताया कि सत्कर्म का मौका प्रकृति देती है। तो प्रकृति किसको मौका देती है, किसको नहीं — यह भी उसकी इच्छा है? यानी सत्कर्म करना हमारे हाथ में नहीं? चिड़िया के लिए दाना डालना तो हम करते हैं ना?

वो तो उसके ऊपर है; हमारी इच्छा से थोड़ी देगी कि मैं कहूं मुझे सत्कर्म का मौका दे दो। हां, सत्कर्म हम सीधा कर नहीं सकते। चिड़िया के लिए आप दाना डाल देते हो — खाना या ना खाना उसके हाथ में है। अब चिड़िया भेजेगी तो प्रकृति भेजेगी; अगर वो ना भेजेगी तो दाना पड़ा ही रहेगा। हमने भोजन रखा — हमें नहीं पता कौन खाएगा, चिड़िया, कबूतर, चूहा या कोई और जानवर। वो प्रकृति की व्यवस्था है कि वो किसे खिलाएगी; ये हम तय नहीं कर सकते। और अगर हमने चिड़िया के लिए डाला और कुत्ता आ रहा है तो उसे भगा रहे हैं, चूहा आ रहा है तो भगा रहे हैं — तो वो हमारी प्लानिंग हो गई कि चिड़िया ही इसे खाएगी। ये सत्कर्म नहीं; आप प्लानिंग में फंस गए, सेटिंग कर ली। डालने के बाद देखो आपकी स्थिति क्या है — अगर रखवाली कर रहे हो तो सत्कर्म नहीं है। आप डाल के चले जाते, जिसको खाना है खाए। आपके हाथ में बस आप हो, और कुछ नहीं।

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वीडियो: साधना में आसन की शुद्धता का क्या महत्व है ? #yogijikasatsang #प्रत्यक्षज्ञान #साधना #आध्यात्म · 2026-09-08