प्रश्नोत्तर P24-0156 · भाग 24
गुरु जी, मेरी घरवाली का रूटीन है कि पड़ोस की एक गाय के लिए रोटी निकालती है, और जब तक वो गाय नहीं आती, शाम तक वो रोटी उसी गाय के लिए रखी रहती है। मैंने उसे कहा यह तो प्लानिंग हो गई, सत्कर्म कहां हुआ? क्या मैं सही समझा?
सत्कर्म आप अगर प्लानिंग से कर रहे हो तो वो सेवा हो गई। सत्कर्म का मतलब — आपने जो भी रोटी बनाई है और बाहर जो चबूतरा है, वहां डाल दीजिए। अब उसे कुत्ता भी खा सकता है, सांड भी, गाय भी; मनुष्य भी उठा के खा सकता है, जिसको जरूरत है — कोई भी खा सकता है। आप ये तय नहीं कर सकते कि ये रोटी मैंने इसी के लिए की; अगर तय किया तो फिर वो सेवा है। दाना डालने के पहले, रोटी डालने के पहले अगर पता है कि कौन खाएगा, इसका मतलब ये सेवा है, सत्कर्म नहीं। और अगर रोटी बना ली और कौन खाएगा पता नहीं — कोई भी आ जाए उसे खिला रहे हो — तो ये सत्कर्म है। सेवा में थोड़ा कर्ता का भाव होता है, सत्कर्म में बिल्कुल नहीं होता; सत्कर्म में बस होता है। सेवा करते हैं, सत्कर्म होता है। जो अनजाने में हो वो सत्कर्म, और जो सोच-समझ के हो वो सेवा। लेकिन फिर भी सेवा दुष्कर्म से तो ठीक ही है।
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वीडियो: साधना में आसन की शुद्धता का क्या महत्व है ? #yogijikasatsang #प्रत्यक्षज्ञान #साधना #आध्यात्म · 2026-09-08