प्रश्नोत्तर P31-0141 · भाग 31
संत महाराज जी, अवधूत की स्थिति क्या होती है? इस पर विस्तार से समझाने की कृपा करें।
साधक जब आत्मिक कल्याण के लिए, खोज के लिए निकलता है, तो खोजते-खोजते खोजने के लिए कुछ नहीं बचता। उसे कुछ नहीं चाहिए, और वो अपने आप के बहुत करीब रहता है, सारे बंधन से छूट जाता है। उस समय ना वह ज्ञानी रहता है, ना अज्ञानी; उसे ना कुछ चाहिए, ना उसके पास कुछ रहता है, मानसिक सब छूट जाता है — वो अवधूत की स्थिति है। दस दिशाओं में भोगी जाते हैं — चार दिशा, चार कोण, एक ऊपर, एक नीचे। ग्यारहवीं दिशा में खोजी जाता है, और ग्यारहवीं दिशा से परे की यात्रा अवधूत करता है। जब खोज करते-करते, अनुभव करते-करते अनुभव करने के लिए कुछ नहीं बचता, तब जाकर अवधूत की स्थिति होती है। अवधूत की स्थिति बहुत भयानक होती है — शब्दों में क्या कहें — उसे पता नहीं वह कहां जाए, पृथ्वी पर किस जगह जाए; ना उसे कुछ चाहिए, ना उसके पास कुछ है। उसके बाद उसे ज्ञान हो जाता है, अगर वो भटका नहीं।
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वीडियो: भगवान के दर्शन कैसे करें / #योगीजी_का_सत्संग #भगवान #दर्शन #satsang · 2024-07-12