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प्रश्नोत्तर P7-0097 · भाग 7

हम दोनों सेंट्रल गवर्नमेंट से रिटायर हैं, दोनों सक्षम हैं। अब क्या करें? परिवार के लिए कितना ईंट पत्थर जोड़ें? पति कहते हैं कहीं अच्छा कार्य में लगा न दूं, सब लुटा दूंगी। कोई भी गेरुआ वस्त्र पहन के आ जाए तो देने का डर है। गेरुआ वाले को कैसे समझें, जरूरत कैसे देखें?

दोनों रिटायर हो, दोनों सक्षम हो। फिर क्या, सेवा में लगा दो अपने आप को। कितना ईंट पत्थर जोड़ोगे? ईंट पत्थर जोड़ने से अच्छा है किसी की भूख मिटाओ, किसी की प्यास मिटाओ। कहीं ईंट पत्थर की भी जरूरत हो तो सार्वजनिक जगह पर बनाओ। परिवार के लिए कितना बंगला, कितना घर बनाओगे? एक से दो बहुत है। उतना तो होगा ही। ज्यादा जोड़ने की जरूरत नहीं है। अब सत्कर्म में लगो। जरूरत देखिए, आवश्यकता देखिए। गेरुआ रंग को जिसने सच में समझा होगा, वह पेट से ज्यादा कभी मांग ही नहीं सकता। बहुत गेरुआ वाले पेट के लिए भी नहीं मांगते। जितने में जी सके, उतने से ज्यादा वह ले ही नहीं सकता। इससे ज्यादा लिया तो वह भिखारी है। आजकल गेरुआ पहन के जो घूम रहे हैं, उन्हें देखकर पता चल जाता है। गेरुआ रंग में कोई निकला, तो उसका मतलब है कि वह उसके लिए निकला। बस जितने में जी सके उतने में। भोजन के अलावा उसे क्या चाहिए? पैसे की मांग करे, कपड़े की मांग करे, तो मेरी समझ से उसने गेरुआ रंग को समझा नहीं। भीख मांगने के लिए, अपनी इच्छा पूरी करने के लिए, उस कपड़े को जरिया बना लिया। आज गेरुआ रंग में लोग भिखारी बन गए। मुझे शर्म आती है। देखता हूं तो कभी हंसी आती है, कभी आंखों में आंसू आ जाते हैं, कभी शर्म आती है। जिस कपड़े को देखने के बाद, चाहे जैसा भी हो, परमात्मा की याद आती है। उसको हमने देखा भी नहीं, पर उस कपड़े को देखने के बाद कहीं न कहीं जुड़ाव हो जाता है। उस कपड़े में कितनी ताकत है। उसके लिए लोगों ने कितनी मेहनत की होगी। शादी विवाह में, किसी भी प्रोग्राम में, व्यक्ति हर रंग पहनता है। गेरुआ रंग नहीं पहनता। कुछ तो है उसमें। उस रंग को इस समाज में जागृत करने के लिए लोगों ने कितना त्याग किया, कितना बलिदान दिया। और ये लोग एक क्वार्टर के लिए उसका उपयोग कर रहे हैं। यह शर्म की बात है। मैं गंगासागर गया था। देख रहा था, लोग नंगे होकर भभूत लगा के, बुला बुला के आशीर्वाद दे रहे हैं। आंसू भी थे, शर्म भी आ रही थी कि ये क्या कर रहे हैं। बस पैसे के लिए बुला बुला के आशीर्वाद दे रहे हैं। लाइन से बैठे रहते हैं। कोई कहता है इधर आओ, कोई कहता है उधर आओ। देख के हंसी भी आ रही थी, शर्म भी आ रही थी। और कहते हैं कि हम सनातन को जिंदा रखे हैं। क्या जिंदा रखोगे? जरूरत देखिए। आवश्यकता देखिए। क्या सच में उस व्यक्ति को जरूरत है? आप एक ताकत दे रहे हो। जांच आपकी होनी ही चाहिए।

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वीडियो: भाग्य कौन तय करता हैं प्रारब्ध या कर्म ? Aadhyatmik Pratyasth Gyan Yogi · 2025-07-03