प्रश्नोत्तर P7-0098 · भाग 7
आप कहते हो, सुनो, समझो, और समझ कर उन शब्दों में जीना चालू करो। कोशिश कर रहे हैं, पर पूरा लागू नहीं हो पा रहा। राग द्वेष अभी छूट नहीं पा रहा। रुकावट कहां है? हमारे लिए तो यह आसान होना चाहिए।
मान का चक्कर छोड़ दो। आपकी उतनी सामर्थ्य है। आप भी रिटायर हो, आप भी रिटायर हो। अर्थ की कोई ऐसी कमी नहीं है। तो फिर कहीं न कहीं मान का चक्कर होगा। मान के चक्कर में राग द्वेष आ रहा होगा। मान का चक्कर छोड़ो। जहां गए, जैसा उसने दिया, उसमें जी लेना। जैसा जिसने व्यवहार किया, उसमें जी लेना। अपने व्यवहार को न छोड़ना। अपने आचरण को न छोड़ना। कहीं न कहीं मान की इच्छा होगी। परिवार में रहते हो, तो उसको छोड़ो। सुनने के बाद फिर समाज में आ जाते हो। नहीं। उसी समय इस ज्ञान को रखिए। इस ज्ञान को रखिए, अपनी समझ को।
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वीडियो: भाग्य कौन तय करता हैं प्रारब्ध या कर्म ? Aadhyatmik Pratyasth Gyan Yogi · 2025-07-03