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प्रश्नोत्तर P7-0099 · भाग 7

घर पर थोड़ा बोलो तो गुस्सा आ जाता है। बाहर कोई बोल दे तो टाल देते हैं। ऑफिस में अफसर डांटते थे तो हंसते हुए निकल आता था। घर पर इधर उधर घूमकर समय बरबाद करते हैं, इससे अच्छा कोई बुनियादी काम करो, यह कहने पर बुरा लग जाता है। मैं समय का पक्का हूं। बाहर खा पीकर आते हैं। आप कहते हो खिलाने वाले बनो, तो कोई कह देता है हम क्यों खाएं। इस गुस्से और इस समय को कैसे देखें?

ऐसा नहीं होना चाहिए। आप लोगों को तो कोई गाली नहीं देता। मैं गाली पर भी हंसा हूं, नहीं तो मैं यहां खड़ा नहीं होता। इतना तो आपके साथ नहीं होता होगा। खिलाने वाले बनो। खाने वाले क्यों बनो? उनकी भी इतनी समझ होगी कि अगर कहीं खाते होंगे तो कुछ समझ के खाते होंगे। मैं जहां तक देख रहा हूं, ऐसा नहीं है। समझ सकते हैं। खिलाते भी हैं। बस साथ में बैठ के खाते हैं, इकट्ठे खाते हैं, तो खिला दिया। खाते खिलाते भी होता है जीवन में। एक दिन, दो दिन। रोज रोज खिलाने के लिए जीवन नहीं मिला हमें। खाने पीने के लिए जीवन नहीं मिला। अपना लक्ष्य और होना चाहिए। आप आगे बढ़िए। फिर आपको देख के वह भी आगे बढ़ेंगे। आपसे प्रेरणा लेंगे। आप पूरी तरह लग जाइए। कभी कभी खाना भी बनता है। ऐसा नहीं है। खाना भी, और खिलाना भी।

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वीडियो: भाग्य कौन तय करता हैं प्रारब्ध या कर्म ? Aadhyatmik Pratyasth Gyan Yogi · 2025-07-03