JY-0003 · खोज
12 ज्योतिर्लिंग, चार धाम और गंगासागर की यात्रा
25 अगस्त 2024 · योगीजी की आत्मकथा — अज्ञान से ज्ञान तक, खोज में कुछ अनुभव की बातें · 24:05 से
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मुख्य बातें
- जितनी सामर्थ्य थी — 12 ज्योतिर्लिंग, चार धाम, गंगासागर की यात्रा की; संशय वाले दो स्थान भी करके 14 किए।
- महात्माओं से कहा — व्यक्तिगत अनुभव सुनाइए, गीता-रामायण तो बचपन से सुनी है।
- पक्का था कि कुछ मिले या न मिले, आत्मज्ञान तक पहुंचना है, चाहे मरना भी पड़े।
“परमात्मा, कहना मत कि मैं आया नहीं”
फिर 12 ज्योतिर्लिंग, चार धाम, गंगासागर की यात्रा की, क्योंकि जिस धर्म से मैं था — हिंदू धर्म में — मेन-मेन यही स्थान हैं। मैंने कहा, परमात्मा, कहना मत कि मैं यहां आया नहीं; जितनी मेरी सामर्थ्य थी। 12 में दो का संशय है — वैद्यनाथ भी दो हैं, नागेश्वर भी दो हैं — तो मैंने 14 किए, कि यह मत बोलना कि दो छोड़ दिए; 14 में 12 तो पक्का होगा ना।
ऐसे करते-करते फिर समझदारों के पास गए, माथा टेके। जहां भी जाओ, वही रामायण की बातें, वही गीता की बातें। मैं बोला, महाराज जी, आप अपना कुछ व्यक्तिगत अनुभव सुनाइए; मैं गीता-रामायण सुनने आपके पास नहीं आया, यह तो मैं बचपन से सुनता आया हूं। अगर वही करनी होती तो बाजार से पुस्तक लेकर पढ़ लेता — मुझे पढ़ना आता है।
पक्का निश्चय
जहां जाओ वही बात — जन्म-जन्म लगते हैं, यह महापुरुषों को होता है। ज्यादातर बातें आत्मविश्वास को डगमगाने वाली थीं। मैंने सोचा, इतिहास में महापुरुष भी होने से पहले वैसे ही भटक रहे थे, साधना कर रहे थे — तो मैं भी तो उसी से हूं। आज मैं उचित भाषा में बोल रहा हूं, पहले मेरे पास ऐसे शब्द नहीं थे।
लेकिन यह पक्का था कि मुझे कुछ मिले या न मिले, मैं आत्मज्ञान तक पहुंचूं — चाहे मेरे लिए कुछ भी करना पड़े, मुझे मरना भी पड़े। तो खोजते-खोजते इस खोज में बहुत सारी बातें हुईं — उतार-चढ़ाव, भटकाव।