JY-0013 · सेवा
गांव-गांव सत्संग और अपनों की कुटिया का भाव
25 अगस्त 2024 · योगीजी की आत्मकथा — अज्ञान से ज्ञान तक, खोज में कुछ अनुभव की बातें · 46:01 से
वीडियो में यहीं से देखें (46:01)ऐप में खोलें
मुख्य बातें
- आत्मज्ञान के बाद गांव-गांव घूमकर लोगों को ज्ञान देने लगे।
- 12 साल पूरे हुए तो कुटिया का भाव हुआ — जहां किसी का बैकग्राउंड काम न करे, भोजन-रहना निःशुल्क।
- “यह कार्य परमात्मा का है — जाते-जाते कुछ हो जाए तो ठीक है।”
कुटिया क्यों
उसके बाद यह काम हो रहा है। फिर मेरा भाव हुआ और मैं घूम-घूमकर लोगों को ज्ञान देने लगा — गांव-गांव घूमने लगा, कभी इधर, कभी उधर। फिर मेरे 12 साल पूरे हुए तो भाव हुआ कि अब कुटिया का निर्माण हो — तो अपनों की कुटिया बना दी, और साधक के लिए भोजन और रहने की निःशुल्क व्यवस्था।
क्योंकि मैंने बड़ी दुर्दशा देखी है — आश्रम में दो ही स्थिति में जगह मिलती है: या तो आपके पास बहुत पैसा हो, तो एसी रूम खुल जाएगा; या आप आश्रम की इतनी सेवा करो। शिष्य भगवान ढूंढने गए थे, अब करोड़पतियों के बर्तन मांज रहे हैं — यह शर्म की बात है। गरीब आए तो महाराज जी साधना में हैं, अमीर रात 2 बजे आए तो दरवाजा खुल जाता है। मुझे यह सब पसंद नहीं आया।
मैंने कहा, मैं एक ऐसी कुटिया का निर्माण करूंगा जहां किसी का बैकग्राउंड काम नहीं करेगा — वहां बस साधक ही रह सकते हैं, वहां प्रेम होगा, भोजन-रहने की व्यवस्था निःशुल्क होगी, और भोजन सात्विक, ईमानदारी का होगा। 12 साल तक मेरा कोई पता नहीं था, मुझसे कोई मिल नहीं पाता था; अब उड़ीसा से, कर्नाटक से, हर जगह से लोग आ रहे हैं।
सेवा में समर्पण
मेरा भाव हुआ कि अब ज्ञान से भी सेवा करूंगा, तन से भी सेवा करूंगा, और जितना मुझसे हो सके, अपने आप को सेवा में समर्पित कर दूंगा। मैं इतना समझता हूं कि यह कार्य परमात्मा का है, क्योंकि मेरे पास करने के लिए अब कुछ है नहीं — कोई इच्छा ही नहीं रही। या तो इंतजार करो कि कब शरीर छूटे; इससे अच्छा, जाते-जाते कुछ हो जाए तो ठीक है।