JY-0033 · सेवा
2020 के बाद — रावेरखेड़ी का सत्संग, गांव-गांव, और मां नर्मदा का प्रेम
16 फरवरी 2025 · अब जाऊं कहां · 19:03 से
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मुख्य बातें
- मुंबई के कमरे में फरवरी से 1 जुलाई तक रहे, फिर गुजरात; “कब प्रश्न हट गए, उत्तर हो गए, पता नहीं चला।”
- रावेरखेड़ी पहुंचकर कई दिन सत्संग, प्रश्नोत्तर — “अब मुझे जाने दो, मुझे घूम-घूमकर बांटना है।”
- पितनगर से ओंकारेश्वर, बड़वाह तक गांव-गांव; “मैंने यह जगह नहीं चुनी, इस जगह ने मुझे चुना।”
उपलब्धि से पहले का वादा
फिर मैं वहां से मुंबई गया, मुंबई से गुजरात। उसी समय कब उपलब्धि हुई, कब प्रश्न हट गए, उत्तर हो गए — मुझे पता नहीं चला। पहले जब रावेरखेड़ी गांव में कुछ सत्संग किया था, वहां के लोगों ने पूछा था, क्या आपको विश्वास है कि आपको परमात्मा मिल जाएगा? मैंने कहा, मेरे विश्वास में इतना विश्वास है कि वो नहीं है तो भी उसे होकर आना पड़ेगा — प्रेम मेरा है, उसका नहीं। बोले, हम लोगों को कोई मार्ग बताओ। मैंने कहा, अभी मुझे मार्ग का पता नहीं; अगर मेरी उपलब्धि हुई, तो मैं आप लोगों को मार्ग बता दूंगा।
फिर फरवरी के महीने में मुंबई गया, एक कमरे में फरवरी से था और 1 जुलाई को निकला, आसमान देखा। मुझे गुजरात से लेने आए, फिर गुजरात में कुछ दिन रहा।
गांव-गांव बांटना
जब मेरे प्रश्न हट गए, उत्तर हो गए, तो मैं रावेरखेड़ी पहुंचा, फिर राबड़पुरा गांव पहुंचा, और कई दिन तक लोगों को सत्संग सुनाया, प्रश्नोत्तर चलते रहे। आखिर में मैंने कहा, अब कोई प्रश्न है? बोले, अब प्रश्न नहीं है। मैंने कहा, अब मुझे जाने दो, मेरे पास समय नहीं है — अब लोगों में इसे बांटना है, घूम-घूमकर बांटना है। मैं प्यासे खोजियों तक पहुंचना चाहता हूं, क्योंकि मैं खोजी की प्यास और तड़प को जानता हूं।
फिर उन्होंने मुझे नर्मदा तट पर छोड़ दिया। फिर पितनगर से ओंकारेश्वर, बड़वाह तक मेरा गांव-गांव घूमना हुआ — राबड़खेड़ी, अदलपुरा, भंदा और ऐसे ही अनेक गांव, यह पूरा क्षेत्र। गांव-गांव घूमने लगा, लोगों को बांटने लगा। मैं 2019 से इस क्षेत्र में, नर्मदा तट पर घूम रहा हूं।
मां नर्मदा
यहां क्यों रुका? यहां विश्व भर से लोग आते हैं, यह तपभूमि है। मैंने कभी मां से मिलने का, उनके दर्शन का प्रयास नहीं किया — मेरे पास इतना समय ही नहीं; मैं बस खोजियों से, साधकों से मिलता हूं। लेकिन मैंने यहां जीवंत मां का प्रेम महसूस किया — जैसे एक मां अपने बच्चों का ख्याल रखती है। पहले मैं “नर्मदे हर” बोलता था, बोलते-बोलते कब “मात नर्मदे हर” निकलने लगा, मुझे भी पता नहीं चला।
2011 में “कुछ नहीं चाहिए” का भाव बनाकर निकला था, और 2020 में “कुछ नहीं चाहिए” की स्थिति हुई — मेरी खोज 2020 में ही खत्म हो गई। एक व्यक्ति ने पूछा, आपने यह जगह क्यों चुनी? हमने नहीं चुनी, इस जगह ने मुझे चुन लिया — चुनाव तो वह करता है जिसके पास कुछ देने को हो, हमारे पास तो कुछ है नहीं।
उपलब्धि वाले वर्ष के बारे में HzwEJy_NLk8 और _Zn-O6Hhr8I में भी