JY-0011 · उपलब्धि
आखिरी समय — “परमात्मा, मैं आखिर करूं क्या?”
25 अगस्त 2024 · योगीजी की आत्मकथा — अज्ञान से ज्ञान तक, खोज में कुछ अनुभव की बातें · 36:01 से
वीडियो में यहीं से देखें (36:01)ऐप में खोलें
मुख्य बातें
- “मुझे कुछ नहीं चाहिए” — यह फैसला 2011 में ही कर लिया था।
- महात्माओं, पागलों, मंदिर के भिखारियों — सबसे एक ही प्रश्न: आत्मज्ञान कैसे होगा?
- 2019 में सारे बंधन छूट चुके थे; ओंकारेश्वर में नर्मदा तट पर चिल्ला-चिल्लाकर रोते थे।
2011 का फैसला
सच में मुझे कुछ नहीं चाहिए था — यह फैसला मैंने 2011 में ही कर लिया था। अब मुझे कुछ नहीं चाहिए, मुझे कुछ करना है। और अब तो करना भी नहीं, अब तो हो रहा है। यहां तक पहुंचना आखिरी में 2019 में हुआ — खोज करते-करते थक गया। महात्माओं के पास गया, साष्टांग प्रणाम किया, फिर देखा वहां कुछ भी नहीं। रोते-रोते जाऊं तो जाऊं कहां, समझ में ही नहीं आता था।
सब छूट गया था
फिर ओंकारेश्वर में नर्मदा तट पर ऐसे ही घूम रहा था, रो रहा था कि अब मैं कहां जाऊं, क्योंकि सारे बंधन छूट गए थे। यह मैं समझ चुका था कि इस पृथ्वी पर न कोई मुझे मानने वाला है, न मैं किसी को मानने वाला — चाहे घर वाले हों, चाहे बाहर वाले, जो भी आकर्षण था, सब टूट गया था।
पागलों के साथ भी बैठकर बात की। मंदिर के सामने भिखारी बैठे होते तो वहीं बैठ जाता — सुना था भगवान पता नहीं किस रूप में मिल जाए। उनसे घंटों बात करता, मेरा एक ही प्रश्न था — आत्मज्ञान क्या है, बता दो; आत्मज्ञान कैसे होगा? वे भी कहते, जा-जा। मैं बोलता, जाऊं कहां? यही तो समझ में नहीं आ रहा।
तो 2019 में स्थिति यह हो गई थी कि चिल्ला-चिल्लाकर रोता था — परमात्मा, तूने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा; न गृहस्थ में जीने दिया, न नशे में फंसाया, न आश्रम में, न चेलों में फंसाया; न तू पागल कर रहा है, न मार रहा है — मैं आखिर करूं क्या, इतना तो बता दे। यह आखिरी स्थिति थी — जीने के सारे ऑप्शन खत्म हो गए थे।