आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

सत्य — योगी गुरु जी के प्रश्नोत्तर

इस पृष्ठ पर “सत्य” विषय से जुड़े 61 प्रश्न हैं, जो जिज्ञासुओं ने सत्संग में योगी गुरु जी से पूछे। किसी प्रश्न पर क्लिक करके योगी गुरु जी का पूरा उत्तर उनके अपने शब्दों में पढ़ें, वीडियो के साथ।

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  1. अष्टावक्र ने राजा जनक से कहा — न यह सत्य है, न वह सत्य है; सत्य तुम हो; जो है वह तुम ही हो, बाकी सब बनाया हुआ है। तो उस (सत्य) में निरंतर कैसे रहें? (P1-0138)
  2. सत्य में स्थिर होने का मतलब क्या है? क्या कुछ घटित होगा, या बस ‘तुम रहो’? (P1-0143)
  3. गुरु जी, आत्मा ही सत्य है, शाश्वत है, सनातन है — फिर पिंडदान रूढ़ि है क्या? (P2-0047)
  4. गुरुदेव, क्या यह सत्य है कि तारा रानी की कथा (जो माता के जागरण के अंत में सुनाई जाती है) में तारा रानी ने अपने पुत्र की बलि दी थी, तब मां ने कहा कि आज के बाद केवल नारियल की बलि देना? (P2-0065)
  5. प्रणाम। सत्य क्या है? उस स्थिति का स्वरूप क्या है जो रूप से भिन्न, ‘क्या है’ से भी परे है? (P2-0107)
  6. बचपन से सिखाया जाता है कि होली इसलिए मनाते हैं कि हिरण्यकश्यप खुद को सर्वेश्वर मानता था; उसका बेटा प्रह्लाद परमात्मा को मानता था, तो उसने उसे बहुत यातनाएं दीं, और अंत में बहन होलिका (जिसे आग में न जलने का वरदान था) प्रह्लाद को लेकर आग में बैठी, पर होलिका जल गई और प्रह्लाद बच गया; अगले दिन रंग खेलकर सत्य की जीत मनाते हैं। लेकिन आज होली बस परंपरा, उपले जलाकर चक्कर लगाने, और धुलंडी में रंग-डीजे की मौज-मस्ती बनकर रह गई है; असली मतलब खो गया है। होली मनाने का मूल अर्थ क्या है, और क्या हम आज इसमें कुछ नया कर सकते हैं? (P2-0123)
  7. (लाइव) गुरु जी, यह मार्ग तो बहुत पीड़ादायक है, सबकी हिम्मत नहीं होती इस पर चलने की। मैं भी सत्य को खोजना चाहता हूं, लेकिन जब मैं अध्यात्म की बात करता हूं तो पूरा परिवार और समाज मेरे विरुद्ध खड़ा हो जाता है। (P3-0122)
  8. (लाइव) गुरुदेव, मैंने आत्मज्ञान की स्थिति को आज ऐसे समझा — जैसे कोई व्यक्ति बहुत समय से किसी नशे का आदी हो, और जब वह छोड़ देता है तो फिर उसे कुछ फर्क नहीं पड़ता। क्या यह सत्य है, या इससे भी अधिक कुछ है? (P3-0127)
  9. (लाइव) प्रणाम योगी जी। परम सत्य या निर्वाण की प्रकृति — परम ज्ञान, मोक्ष या निर्वाण के बाद की अवस्था — को शब्दों में बांधना असंभव माना गया है; इसे हमेशा ‘नेति नेति’ (यह नहीं, यह नहीं) कहकर ही समझाया जाता है, क्योंकि हमारा मन केवल सीमित चीजें ही समझ सकता है। क्या यह सत्य है? (P4-0023)
  10. (लाइव) प्रणाम गुरु जी। क्या कोई परम सत्ता है जिससे हम परेशानी में होने पर मदद मांग सकें, या हमारे अलावा कोई नहीं है? (और फिर —) तो क्या केवल मैं ही सत्य हूं, या मेरे साथ जो लोग दिख रहे हैं वह भी सत्य हैं? (P4-0094)
  11. (लाइव) प्रणाम गुरु जी। संसार में रह के सत्य में स्थिर कैसे रहें? (P4-0105)
  12. (लाइव) गुरु जी नमन। बुद्ध जी ने कहा है कि आत्मा का सफर नहीं होता। क्या यह सत्य है कि आत्मा होती ही नहीं, बस ऊर्जा ही ऊर्जा है? (P4-0152)
  13. (वही साधिका) जब हमारे मुख से सत्य वचन निकलने लगते हैं, तो बिना बोले रुका भी नहीं जाता। तो जो निकल रहा है, उसे क्या कहेंगे — सत्य? और सद्गुरु क्या बोलता है? (P4-0199)
  14. अंतिम सत्य तक पहुंचने का मार्ग क्या है? आराध्य द्वारा प्रदत्त आनंद में स्थिर कैसे रहें? (P5-0112)
  15. स्थितप्रज्ञ / सत्यप्रज्ञ पुरुष के बारे में बताइए — एक ही बात है? (P5-0166)
  16. गीता कहती है जिससे खतरा हो उसे मारने में पाप नहीं — सत्य है? (P5-0181)
  17. सत्य क्या है? सत्य बोला कैसे जाए? जीवन में बहुत निराशा आती है, तभी यह प्रश्न उठता है कि यह सत्य है क्या। क्या मैं आवरण हटाती रहूं और अपनी धारणा तोड़ती रहूं? (P6-0133)
  18. भ्रम और सत्य में क्या फर्क है? ये दोनों अलग हैं क्या? (P6-0174)
  19. प्रदीप पूछते हैं, क्या यह सत्य है कि जिसने ब्रह्म जान लिया, उसके लिए कोई भी कार्य करना असंभव नहीं है? (P6-0196)
  20. सत्य पूछते हैं, गुरु जी, जड़ और चेतन क्या है? शरीर, मन, बुद्धि, चित्त जड़ हैं या चेतन? (P7-0107)
  21. एक श्रोता लिखता है कि चेतना, जिसके द्वारा हम जागृत अवस्था का अनुभव करते हैं, वह भी मृत्यु के बाद चली जाती है, इसलिए वह भी अस्थायी हुई, असत्य हुई। इस प्रकार सत्य अव्यक्त हुआ। गुरु जी, इस पर क्या कहना है? और अगर आज तक जो किया वह गलत था, तो आगे रहना मुश्किल हो जाएगा? (P8-0013)
  22. जो सत्य पर चलता है, लोग उसे लोभ में झुकाना चाहते हैं। क्या करें? (P8-0177)
  23. सत्य को बाहर खोजा नहीं जा सकता। जहां शब्द खत्म हो जाता है, वहीं सत्य प्रकट हो जाता है। कैसे वहीं प्रकट होगा? वही का मतलब क्या है? अगर शब्द खत्म होने पर सत्य मिल जाता है, तो गूंगे को भी सत्य मिल जाना चाहिए, क्योंकि वह बोलता ही नहीं। भीतर कैसे? (P10-0018)
  24. क्या सत्य की खोज में सोशल मीडिया की मदद लेना जरूरी हो जाता है? (P10-0063)
  25. जब उस परम सत्य का कोई नाम नहीं, फिर यह नाम दान का ढोंग क्यों होता है? यह मेरा अनुभव है। (P10-0112)
  26. मुझे आत्मज्ञान हुआ है। लोगों को कैसे ज्ञान बांटूं? लोगों को सत्य बताने जाओ तो पागल समझते हैं। (P10-0122)
  27. मेरे साथ बहुत शोषण भी हुआ है। मान लो सत्य को बहुत कूट-कूट के पीटा गया। (P11-0009)
  28. ब्रह्म को सत्य, शाश्वत कहा गया है। ऋषियों ने इसको कैसे जाना? (P11-0130)
  29. सत्य कैसे मिले, और मुझे मुक्ति कैसे मिले? (P12-0065)
  30. गुरुदेव, हमारा जन्म भी 1984 का है और हम भी 15-20 सालों से उसकी खोज में हैं; अब आपको देखकर इच्छा पूरी सी लगती है, और अब थोड़ा-थोड़ा समझ आने लगा है कि सत्य क्या है। (P12-0198)
  31. गुरुदेव, एक सत्य बताइए — हम दो दिन के लिए आपकी कुटिया में आए, तो ऐसा अनुभव हुआ कि आपके द्वारा वहां आए साधकों को कुछ आंतरिक ऊर्जा प्रदान की जाती है। (P13-0017)
  32. इच्छा उठते ही मन उसी को पूरा सत्य और संसार क्यों मान लेता है, जबकि विवेक भीतर मौजूद है? उस क्षण विवेक को जागृत कैसे करें? (P13-0050)
  33. क्या सिर्फ ईमानदारी से हम सत्य तक पहुंच जाएंगे? (P13-0083)
  34. सत्य का खोजी अपने को कैसे पहचाने? (P13-0122)
  35. सत्य क्या है और हम उसे कैसे जानें? (P13-0132)
  36. गुरु जी, दुनिया में चारों तरफ चापलूसी, दिखावे और दोहरे चेहरों का खेल चल रहा है। ऐसे माहौल में इंसान अपने भीतर सत्य, पारदर्शिता और होश को बिना टूटे कैसे बनाए रखे? (P13-0144)
  37. गुरु जी, आपकी वीडियो में आप कहते हैं कोई ईश्वर, परमात्मा, आत्मा कुछ नहीं है; कभी कहते हैं ईश्वर ही सब है, उस तक ही पहुंचना है। तो फिर सत्य क्या है? सारा कंफ्यूजन हो जाता है। (P14-0008)
  38. गुरु जी, ईमानदारी से जगत-व्यवहार करना, दृष्टा भाव में रहना, कर्तापन से दूर, ईश्वर में श्रद्धा, "कुछ नहीं चाहिए" में रहना — इस साधना पथ पर जीने से कब तक आत्म-सत्य का दर्शन होगा, और तब क्या अनुभव होगा? मार्गदर्शन दें। (P17-0049)
  39. गुरु जी, लोग कहते हैं "बेईमानी के बिना कैसे चलेगा?" — क्या बेईमानी रखते हुए आत्मदर्शन या सत्य की खोज हो सकती है? (P17-0067)
  40. गुरु जी, सत्य का मार्ग इतना कठिन क्यों रहता है? (P17-0083)
  41. गुरु जी, अज्ञान मिटाने के लिए ज्ञान की जरूरत होती है, और जब सत्य का बोध हो जाता है तब ज्ञान की गठरी भी त्यागनी पड़ती है — क्या यह सही है? (P17-0128)
  42. गुरु जी, क्या केवल पापी मन वाली बुद्धि को ही डर लगता है, और जिसके मन में राम और सत्य स्थित हैं उसे कोई भय नहीं लगता? (P17-0169)
  43. गुरु जी, क्या लोग असत्य में जीते हैं, इसीलिए सत्य वचन से भयग्रस्त होते हैं? (P17-0171)
  44. गुरु जी, सत्य वचन सुनकर अगर पीड़ा हो, तो क्या समझ लेना चाहिए कि हमारा मन ही पापी है? (P17-0172)
  45. गुरु जी, सत्यता और ईमानदारी पर बात तो सब बहुत करते हैं, पर यह बहुत कठिन डगर लगती है — और आसान भी। ऐसा क्यों? (P18-0041)
  46. गुरु जी, जीवन अनित्य है, जगत अनित्य है, विचार चंचल और अनित्य हैं, जीवात्मा शाश्वत सत्य है — उसे निज स्वरूप में कैसे पहुंचाएं, और व्यवहार में यह कैसे हो? (P18-0061)
  47. गुरु जी, भगवान कृष्ण गीता में जब यज्ञ की बात करते हैं, तो उसका क्या तात्पर्य है — क्या वे कर्मकांड वाले यज्ञ की बात कर रहे हैं? इसका आध्यात्मिक सत्य क्या है? (P18-0090)
  48. गुरु जी, कहते हैं जगत मिथ्या है, दुनिया क्षणभंगुर और चलायमान है — तो सत्य और स्थिर क्या है? (P18-0186)
  49. गुरु जी, आप आत्मज्ञान को उदाहरणों से समझाते हैं, पर उदाहरण भी संसार से, मन की स्मृति से आते हैं, वे तो सिर्फ तर्क और विचार हैं, सत्य नहीं — फिर उनसे आत्मज्ञान कैसे? (P19-0021)
  50. गुरु जी, आप सिखाते हो कि बेईमानी और मक्कारी छोड़ो, पर कुछ बुद्ध पुरुष कहते हैं कि सत्य प्राप्त होने पर बेईमानी-मक्कारी अपने आप छूट जाती है, छोड़नी नहीं पड़ती? (P19-0139)
  51. गुरु जी, क्या चार वेद पूर्ण सत्य हैं? (P19-0188)
  52. गुरु जी, मैं समझा हूं कि बीज में वृक्ष की तरह मेरा कल्याण भी ईमानदारी (100%), सत्कर्म और सत्संग से शुरू होगा, फिर ध्यान और समाधि घटित होंगे — तो धारणा-ध्यान-समाधि कैसे होती है, और सत्य और शिव की स्थिति अलग है या एक? (P21-0108)
  53. गुरु जी, सत्य क्या है और माया क्या है? (P22-0076)
  54. गुरु जी, सांस सत्य है या सांस लेने वाला सत्य है? वीडियो में बताया गया था पर मैं समझ नहीं पाया। (P22-0132)
  55. गुरु जी, सत्य क्या है? (P23-0042)
  56. गुरु जी, आप जो रास्ता दिखा रहे हैं वह तो पहले से हमारे ग्रंथों में लिखा है — अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह; अपरिग्रह का अर्थ है आवश्यकता से अधिक वस्तु का संग्रह ना करें। पहले इतने ईमानदार लोग थे — फिर हमारे देश में लोग इतने भ्रष्ट कैसे हो गए? शिक्षा में हमारी कमी रही, या हमने आवश्यकता से अधिक चाहा? (P23-0077)
  57. गुरु जी, अगर बेईमान आदमी के पास शक्ति और ताकत है, तो ईमानदार और सत्य क्या करेगा? क्या यह आपके जीवन में आजमाई हुई बात है? (P23-0158)
  58. गुरु जी, सत्य हर जगह है, हर समय है — अभी अगर हम उसे नहीं देख पा रहे तो कुछ आवरण है। वह आवरण क्या है? (P24-0165)
  59. गुरु जी, क्या सत्य मार्ग पर चलने से पाप नष्ट होते हैं या फिर भुगतना पड़ता है? (P25-0026)
  60. गुरु जी, आपने बताया था कि एक मैं अहम में होता है और एक परम सत्य में। तो हम परम सत्य में कैसे जाएंगे? (P25-0125)
  61. गुरु जी, मैं सेवा करना चाहता हूं लेकिन बार-बार यह संशय आता है कि मैं जिनकी सेवा कर रहा हूं वो मेरे जैसा जीव या माया है या वह परम सत्य है? मैं जिनकी सेवा कर रहा हूं वह कौन है? (P26-0043)