आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

प्रेम और भक्ति — योगी गुरु जी के प्रश्नोत्तर

इस पृष्ठ पर “प्रेम और भक्ति” विषय से जुड़े 106 प्रश्न हैं, जो जिज्ञासुओं ने सत्संग में योगी गुरु जी से पूछे। किसी प्रश्न पर क्लिक करके योगी गुरु जी का पूरा उत्तर उनके अपने शब्दों में पढ़ें, वीडियो के साथ।

← सभी विषय · PDF पुस्तकें

  1. गुरु जी, क्या ज्ञान मार्ग और भक्ति मार्ग दोनों एक साथ संभव हैं? (P1-0017)
  2. अगर कोई कहता है कि मैं किसी से प्रेम करता हूं, तो प्रेम की परिभाषा क्या है? (P1-0102)
  3. गुरु जी, क्या भक्ति मार्ग से नहीं पहुंचा जा सकता? (P1-0122)
  4. क्या भाव मार्ग (भक्ति) से कनेक्ट हो सकते हैं? (P2-0022)
  5. गुरु जी, जो लोग (भवसागर से) निकल जाते हैं, उनके लिए प्रेम और सुख भरा कोई और लोक बना हुआ है क्या? (P2-0032)
  6. गुरु जी, ज्ञान, पवित्रता, प्रेम, शांति, सुख, आनंद और शक्ति — क्या ये आत्मा के कवच हैं? विस्तार से बताएं। (P2-0152)
  7. साधक गुरु के प्रेम-ज्ञान से भरकर कुछ अर्पण करना चाहे — कंबल आदि वस्तु या भाव — तो गुरु को क्या दे कि वह भाव पूजा बन जाए? व्यक्तिगत गुरु को क्या चाहिए? (P3-0035)
  8. वस्तु देकर प्रेम कैसे प्रकट करें? गुरु/सेवा में वस्तु कब माध्यम? (P3-0075)
  9. (लाइव) गुरु जी, आप जहां बैठे हैं, कितनी सुंदर जगह है। अगर हमें इससे प्रेम हो जाता है, तो क्या हम इसमें भी फंस सकते हैं? (P3-0161)
  10. (लाइव) गुरु जी प्रणाम। मेरे घर में चोरी की कमाई और मांस-मदिरा का माहौल है। मैं खुद मेहनत की कमाई खाता हूं और इन सबसे दूर रहता हूं, पर रहना उसी घर में पड़ता है। क्या ऐसे माहौल में मेरी और मेरी पत्नी की भक्ति बच पाएगी? (P3-0198)
  11. (लाइव) योगी जी प्रणाम। भक्ति श्रेष्ठ है या आत्मज्ञान? (P4-0040)
  12. (लाइव) गुरु जी प्रणाम। आप किसी खास पशु से ही प्रेम करते हैं, क्यों? दुनिया में बहुत सारे पशु हैं। (P4-0041)
  13. (वही सन्यासी महाराज जी) भेष से एक बेनिफिट तो मिलता है, लेकिन आज के दौर में संतों से लोग बहुत कम प्रेम करते हैं — ट्रेनों में मां-बहन-बेटी पास नहीं बैठती, क्योंकि भेष इतना बदनाम हो चुका है। इस पर आप क्या कहेंगे? (P4-0075)
  14. (लाइव) गुरु जी प्रणाम। क्या आत्मिक यात्रा में कभी प्रेम भी छूट जाता है, या अनंत काल तक भी प्रेम नहीं छूटता? (P4-0093)
  15. (लाइव) गुरु जी प्रणाम। मेरी पहली पत्नी के साथ 11 वर्ष से कोर्ट में तलाक का केस चल रहा है। आज मैं एक अन्य महिला के साथ प्रेम संबंध में रह रहा हूं — तो क्या यह गलत है? (P4-0137)
  16. (कुटिया में एक और साधिका, जिनका भी बाल विवाह हुआ; पति बहुत परिवार-प्रेमी हैं, अब फिजिकल रिलेशन भी नहीं चाहते, पर कहते हैं कहीं भी जाओ, बस वापस घर आ जाना) — उन्हें क्या कहूं? (P4-0194)
  17. (वही साधिका) एक ज्ञान मार्ग है, एक भक्ति मार्ग। भक्ति मार्ग के लोग अंधविश्वास में पड़ते हैं, ज्ञान मार्ग में पूजा-पाठ, मंत्र-जप, टीका कुछ नहीं। पर विवेकानंद ज्ञानी थे, रामकृष्ण परमहंस भक्ति मार्ग के — दोनों में भेदभाव नहीं था। हम इसी उलझन में पड़ते हैं कि कौन श्रेष्ठ है; मेरा तो भक्ति मार्ग से भरोसा ही उठ गया है। (P4-0197)
  18. (प्रतीक) वासना बहुत सताती है, भक्ति में बाधा — क्या करूँ? (P5-0048)
  19. मलिन विचार आते हैं, साधना-पूजा में तकलीफ — क्या करें? डर का सामना, क्रोध निवारण, प्रेम कैसे आए? (P5-0098)
  20. माता-पिता, पत्नी और पुत्र के प्रति जो भाव है, उसे प्रेम कहें या मोह? प्रेम किसको देखता है? (P7-0017)
  21. बोध के बाद भाव क्या रहता है? पहले तुम और बाद में मैं, क्या यह बोध का लक्षण है? तब प्रेम कैसे होता है? (P7-0018)
  22. जो मिटने के लिए तैयार है वही आ सकता है और रुक सकता है। गहरे पानी में डूबने, मीरा के पदों और बोध के बाद वाले प्रेम का क्या अर्थ है? (P7-0023)
  23. प्रेम करने के बाद दुख क्यों मिलता है? (P7-0031)
  24. एक कुत्ता मर गया था। उस रात आप चैन से सो नहीं पाए, सुबह भी बेचैन रहे। चेहरे पर थकान के साथ ऐसा दुख था, जो हमारे दुख जैसा नहीं। एक कुत्ते के लिए अंदर से इतना प्रेम और तड़प है, तो यहाँ रहने वालों के लिए अंदर से कितना गहरा प्रेम रहा होगा? हम समझ नहीं पाते। गलतियाँ समझ के साथ और बिना समझे होती रहती हैं। कुछ भी हो, हाथ पकड़कर रखिए। (P7-0112)
  25. गुरु जी, अपने आप से कैसे प्रेम करें? थोड़ा और खोलकर समझाएँ। (P7-0121)
  26. गुरबानी कहती है कि अगर परमात्मा बीच में खड़ा है, तो सेवक का कुछ नहीं होने देगा, चाहे दुनिया कुछ भी करे। तो क्या विरोध की जरूरत नहीं? गुरु अर्जुन देव जी को जहांगीर ने तवे पर बिठा दिया, ऊपर से रेत डाली गई, उन्होंने विरोध नहीं किया। संत को प्रेम से रहना चाहिए, या गलत का विरोध करना चाहिए? और जो मिस्त्री था, वह नशे में भी था। (P7-0147)
  27. कोई भी उस व्यक्ति से प्रेम नहीं करता जिससे वह डरता है। गुरु जी, यह कितना सही है? (P8-0056)
  28. ज्ञान, पवित्रता, प्रेम, शांति, सुख, आनंद और शक्ति, क्या यह आत्मा का स्वभाव है? विस्तार से बोलिए। (P8-0090)
  29. भक्ति मार्ग में भी सत्कर्म और अच्छाई करनी पड़ती है, नाम जप के साथ? (P8-0102)
  30. अटैचमेंट और उम्मीद कैसे जुड़ी है? और प्रेम क्या है? (P8-0171)
  31. प्रेम में और लोभ में क्या अंतर है? (P8-0183)
  32. ध्यान करता हूं, लेकिन ध्यान में जी नहीं लगता। पूजा-भक्ति में भी जी नहीं लगता। अच्छा कर्म करने में जी लगता है। तो इससे क्या आत्मज्ञान हो जाएगा? (P8-0186)
  33. गुरुदेव, आत्मज्ञान में आदमी खुद को परमात्मा से अलग मानता है, फिर वह भक्ति करता है। थोड़ा इसे स्पष्ट करो। (P9-0037)
  34. भक्ति और आत्मज्ञान में क्या फर्क है? (P9-0045)
  35. गुरु जी, मैं दो लोगों को सुन रहा हूं। एक आपको, और एक प्रेमानंद जी को। इनमें क्या फर्क है? (P9-0056)
  36. आपने अभी बताया कि आप अपने इष्ट की भक्ति करते थे, उनसे बात करते थे जैसे प्रिय साथी और दोस्त करते हैं। क्या यह नाम-पाठ करने की बात है? (P9-0109)
  37. भक्ति दिखा-दिखाया नहीं, कहा गया है। परंतु अनमोल वचनों को जब सुनते हैं, तो गुरु या संतों के भाव में आकर कमेंट करते हैं, या गाना गाकर सुना देते हैं, तो उससे बहुत लोग सुन लेते हैं। अब इससे क्या होगा? (P9-0120)
  38. महाराज, जब से भक्ति मार्ग पर पड़ा हूं, तब से मैं अपने परिवार के साथ बैठ नहीं पाता। अंदर से काटने लगता है। क्या यह ऊर्जा का टकराव है? (P9-0162)
  39. आपके व्यक्तित्व के बारे में मैं बोल नहीं सकती। विवेकानंद जी के व्यक्तित्व के लिए मेरे मन में बहुत प्रेम था। इतनी मुसीबतें, चौबीस-अट्ठाईस घंटे की यात्रा, एक सीट पर बैठे रहना, ये बातें लिखी कैसे जाएं? जो बाहर से देखेगा उसे लगेगा एयर कंडीशन कार से आराम से आ गए। (P9-0186)
  40. मेरे पास कुछ नहीं है। बस वह प्रेम और शांति है जो भीतर है। इसे बताकर क्या मिलेगा? (P10-0021)
  41. महाराज जी, प्रेम चाहिए। प्रेम सदा के लिए इस शरीर में नहीं मिलता। शरीर छोड़ने के बाद आदमी कहां जाता है? (P10-0050)
  42. योगी जी, आत्म साक्षात्कार होने के बाद क्या परमात्मा के ज्ञान के लिए और भक्ति करनी होती है? (P10-0089)
  43. आप कहते हो कि जिसकी भी भक्ति करेंगे, वह हमें आत्मज्ञान नहीं करा सकता; तो फिर भक्ति मार्ग का फायदा ही क्या है? (P11-0055)
  44. भक्ति मार्ग में गुरु को रिझाने की बात आती है। शिष्य गुरु को कैसे रिझाए — क्या बस इतना कि उसके बताए नियमों में पूरी तरह उतर जाए? (P11-0064)
  45. आप कहते हैं प्रेम किया नहीं जा सकता, वह घटित होता है। तो क्या संसार में किसी ने किसी से प्रेम किया ही नहीं? क्या मीरा का मूर्ति के प्रति प्रेम, प्रेम नहीं था? (P11-0096)
  46. क्या भक्ति मार्ग से भी आत्मज्ञान मिल सकता है, जैसे मीराबाई को भक्ति करके? (P11-0102)
  47. क्या हम जिस समय प्रेम में होते हैं, उसी समय आनंद में भी होते हैं, या ये अलग-अलग समय की स्थितियां हैं? (P11-0142)
  48. (एक बुजुर्ग माता जी के परिवार ने पूछा) माता जी ने 40 साल से भी ऊपर नाम रटा, माला फेरी, फिर भी कहती हैं मेरी भक्ति पूरी नहीं हुई। क्या नाम लेने से पार उतर जाएंगी? (P13-0033)
  49. क्या आपकी जीवन-मुक्ति भक्ति के द्वारा ही सिद्ध हुई? (P13-0107)
  50. गुरु जी, प्रेम और आनंद में हर पल कैसे जिएं? आजकल प्रेम और आनंद शब्द का बहुत उपयोग होता है, इन्हें बहुत विकृत कर दिया है। सत्संग सुनते-सुनते पता चल गया कि प्रेम और आनंद किसमें होता है, लेकिन हर क्षण उनमें कैसे जी सकते हैं? (P13-0181)
  51. गुरु जी, इंसान कहता है कि प्रेम सोच-समझ के नहीं होता, बस हो जाता है — और किसी एक से हो जाता है। ऐसा क्यों होता है? (P13-0182)
  52. गुरु जी, "कुछ नहीं चाहिए" की स्थिति में अगर हम किसी व्यक्ति पर क्रोध करते हैं, तो क्या वो भी प्रेम कहा जाता है? (P13-0183)
  53. गुरु जी, ऑफिस में सबको अपना-अपना काम दिया जाता है और हमें दिखता है कि कौन अपना काम नहीं कर रहा। अंदर से मानसिक क्रोध आता है, पर कॉर्पोरेट कल्चर में दिखा नहीं सकते। उस स्थिति में हम उस व्यक्ति के साथ प्रेम से कैसे रहें? और शिकायत करें तो इंक्वायरी में भी बहुत पक्षपात होता है। (P13-0184)
  54. गुरु जी, जिससे हमारा कोई संबंध नहीं, उसकी सेवा या मदद करते हैं और उससे कुछ नहीं चाहिए, तो वो भी प्रेम हुआ। लेकिन जो हमारे रिश्तेदार और परिवार हैं, उनसे तो अपेक्षा रहती है। अनजान आदमी के लिए करना निष्काम सेवा है? (P13-0185)
  55. गुरु जी, क्या ये कह सकते हैं कि प्रेम और आनंद एक दूसरे के पूरक हैं — कि प्रेम करो तभी आनंद आएगा? (P13-0186)
  56. गुरु जी, माता-पिता का अपने बच्चों के प्रति जो प्रेम होता है, उसे क्या कहेंगे? और बच्चों के मोह से मुक्त कैसे हों, उनसे भी प्रेम कैसे करें? (P13-0188)
  57. महाराज जी, आध्यात्मिक मार्ग में चलने के लिए भक्ति मार्ग सरल है या ज्ञान मार्ग? (P13-0190)
  58. गुरु जी, क्या प्रेम बिना मतलब के किसी से हो सकता है? (P14-0002)
  59. गुरु जी, आपसे प्रेम हो रहा है या मोह, कैसे पता चलेगा? (P14-0006)
  60. गुरुदेव, प्रेम और भक्ति में क्या अंतर है? क्या ये दोनों एक ही हैं? (P14-0013)
  61. गुरु जी, निर्मल प्रेम क्या है? (P14-0095)
  62. गुरु जी, भक्ति मार्ग और ज्ञान मार्ग, दोनों में आनंद का रस क्यों है? (P14-0098)
  63. हम इतनी पूजा-भक्ति करते हैं, इतने भाव से करते हैं, लेकिन हमें दुख क्यों है? (P15-0018)
  64. मैं बहुत दुखी हूँ, सब कुछ घर-बार छोड़कर दूर पहाड़ों पर जाना चाहता हूँ और वहाँ भक्ति करना चाहता हूँ। (P15-0055)
  65. क्या भगवान की भक्ति करनी चाहिए? (P15-0070)
  66. परमात्मा को प्रेम करने का अधिकारी वही होता है जिसने इंसान को प्रेम किया हो? (P15-0078)
  67. गुरुदेव, भजन और भक्ति में क्या अंतर है? मार्गदर्शन करें। क्या भक्ति द्वारा भी अपने आप में पहुंच सकते हैं? (P16-0019)
  68. गुरु जी, प्रेम-धन के लिए क्या करें? (P16-0038)
  69. गुरु जी, आप हर बात में "मां नर्मदे हर" बोलते हैं, इसका क्या राज है? और क्या आप अभी भी मां काली की भक्ति-पूजा करते हैं? (P16-0054)
  70. क्या खाली पेट भक्ति जरूरी है? भोजन भरपेट करने से भक्ति और आत्मिक जीवन पर असर कैसे होता है? (P16-0084)
  71. आजकल के प्रेमी-प्रेमिका भी यही बोलते हैं कि मुझे तेरे शरीर से कोई मतलब नहीं, मैं बस तुझसे प्यार करता हूं — शब्द वही के वही हैं, भाव एकदम से पकड़ में नहीं आता। यूथ इससे बहुत जूझ रहा है, तो कैसे पहचानें? (P16-0176)
  72. योगी जी, अगर तुलसीदास जी को आत्मीय लगाव था, तो क्या उन्हें यह नहीं सोचना चाहिए था कि मैं जिस जीवात्मा से प्रेम करता हूं उसका अब क्या होगा? वे साथ रहकर भी तो पक्का कर सकते थे कि तुझे भ्रम है, मैं तेरे शरीर के लिए नहीं आया। (P16-0178)
  73. बहुत सी गृहस्थियों में पति कहता है, "मैं तो तुझसे आत्मीय प्रेम करता हूं, देख कितनी महंगी साड़ी ला दी", पर वह अपनी पूरी जिंदगी एक रस के चक्कर में निचोड़ देता है, और पत्नी इसी में लगी रहती है कि किसी तरह इसकी आदत छूटे। वो भी कहेगा मैं तुझसे आत्मीय प्रेम करता हूं। तो वहां मैं कैसे पता करूंगी कि यह आत्मीय प्रेम है या मेरा शोषण है? (P16-0179)
  74. (लाइव) गुरुजी, प्रेम की नगरी तो वृंदावन धाम है ना? (P16-0195)
  75. भक्ति मार्ग हो या ज्ञान मार्ग, मैंने अपनी लाइफ में भी देखा है कि लोग रिश्तों वाली आसक्ति उठाकर किसी "गुरु" पर शिफ्ट कर देते हैं, और जिसे गुरु समझा वो उस स्थिति में था ही नहीं — इससे कई जिंदगियों से खिलवाड़ हुआ, जीवन और बखेड़ा हो गया। तो विवेक कैसे रखें कि मैं वहां न फंस जाऊं, कि वो अपनी कामना के लिए मुझे मोहरा तो नहीं बना रहा — गुरु को कैसे पहचानें? (P17-0017)
  76. गुरु जी, संसार के लोगों से इतनी मार खा चुका हूं कि अब किसी में रस नहीं रहा। सारी दुनिया बेईमान लगती है — टीवी खोलो तो झगड़े, पॉलिटिक्स, भक्ति चैनलों पर भी कुंडली-पैसे का धंधा। क्या करूं? (P17-0107)
  77. गुरु जी, हमारा भी भक्ति करने का बहुत मन होता है, लेकिन परिवार है — क्या करें? (P17-0108)
  78. गुरु जी, योग किसे कहते हैं? ज्ञान, भक्ति, योग, ध्यान — किस मार्ग से जाएं? (P17-0117)
  79. गुरु जी, प्रेम का क्या स्थान है? राधा जी और उद्धव जी के प्रसंग से क्या समझें? (P17-0118)
  80. गुरु जी, प्रेम में स्वाभिमान होना चाहिए या नहीं? अगर प्रेमी अपमान करे और हम कठोरता से प्रतिक्रिया दें तो क्या वह अहंकार होगा? (P17-0165)
  81. गुरु जी, भक्ति, ध्यान, योग और ज्ञान — इनमें से किस मार्ग से जाएं? (P18-0025)
  82. गुरु जी, क्या अगले कर्म और पिछले कर्म होते हैं? और क्या ईमानदारी और नाम जप से प्रेम में रोमांचित होने से पिछले कर्म भस्म हो जाते हैं? (P18-0071)
  83. गुरु जी, जब हम खोजी बनकर आध्यात्मिक मार्ग पर निकल जाते हैं, तो पत्नी-बच्चे जैसे अपने प्रेम वाले लोगों को दर्द होता है — क्या यह स्वार्थ (सेल्फिशनेस) नहीं है? क्या कोई और तरीका है? (P18-0111)
  84. गुरु जी, आपके अंदर प्रेम है तो आप किसी को मना नहीं करते, अपने भोजन का समय भी दे देते हैं — अगर आपको अपने किसी प्रिय साधक को ना कहना हो तो कैसे कहेंगे? (P18-0123)
  85. गुरु जी, अटैचमेंट (लगाव) क्या है? माता-पिता से लगाव तो प्रेम से है, उसमें हमें कुछ नहीं चाहिए — फिर भी लगाव क्यों है, और उसे मिटा भी नहीं सकते? (P18-0131)
  86. गुरु जी, प्रेम और आनंद एक ही हैं, एक सिक्के के दो पहलू हैं, या अलग-अलग स्थितियां हैं? (P19-0130)
  87. गुरु जी, कष्ट के बिना भक्ति कैसे की जाती है? (P20-0086)
  88. गुरु जी, भक्त या प्रेमी पीड़ा में भी आनंद में कैसे रहता है? (P20-0087)
  89. गुरु जी, घुटन तो अभी भी है, क्योंकि रहना उन्हीं के साथ है जो इस मार्ग पर नहीं चल रहे — इसी घुटन की वजह से क्या लोग भक्ति मार्ग की तरफ ज्यादा मुड़ जाते हैं? (P21-0063)
  90. गुरु जी, हमारे गुरु नित्यानंद जी महाराज की वाणी है "निभाओ तो प्रेम की घाटी निभाओ तो गुजारे" — उन्होंने गुरु पर छोड़ दिया कि आप निभाओ तो गुजारा है, मेरे बस की बात नहीं। उस प्रेम के बारे में बताइए। (P21-0068)
  91. गुरु जी, भक्ति, ज्ञान और ध्यान — इन तीनों में किसे महत्व देना चाहिए? इनमें क्या डिफरेंस है? (P21-0128)
  92. गुरु जी, मुझे भवानी पर बहुत श्रद्धा थी। जब मेरे जीवन में, मेरी बेटी और मेरी नानी के साथ इतना उतार-चढ़ाव हुआ, तो मैंने भगवान को दोषी माना। बाद में लगा कि शायद मेरे कर्मों का फल है, शायद उसके भविष्य में कुछ अच्छा लिखा होगा — ऐसे अपने आप को समाधान दे रही हूं, लेकिन वो पहले जैसी भक्ति नहीं आ रही। क्या भगवान पर मेरा दोष देना ठीक है, और पहले जैसी भक्ति फिर कैसे उत्पन्न करूं? (P21-0178)
  93. गुरु जी, कथा और भजन में पहले बहुत आनंद आता था, प्रेम से भजन गाते-सुनते थे, कितना सुंदर रस आता था — अब नहीं आता, सब फीका लगता है; यह क्या है? (P22-0053)
  94. गुरु जी, भगवान के चरणों में भक्ति कैसे करें? (P22-0185)
  95. गुरु जी, मैंने एक हिंदू लड़के से प्रेम किया था; उसने मेरा धर्म परिवर्तन करके मुझे छोड़ दिया और चला गया। अब मैं क्या करूं? मेरा मार्गदर्शन करें। (P23-0043)
  96. गुरु जी, मैं तो नाम जाप करता हूं ताकि प्रेम मिले, क्योंकि सुना है नाम जाप से प्रेम मिलता है — पर अभी तक तो कुछ मिला नहीं। (P23-0121)
  97. गुरु जी, जब माता-पिता के भीतर संतान के लिए प्रेम न होकर केवल धन का लालच और क्रोध रह जाए, तो अपनी मानसिक शांति के लिए उनसे दूरी बनाना सही है या गलत? (P23-0138)
  98. गुरु जी, प्रेम और वासना में क्या भेद है? (P23-0191)
  99. गुरु जी, क्या प्रारब्ध को पूरा भोगना पड़ता है, या कर्मफल भोगे बिना नष्ट भी हो जाते हैं? क्या ईश्वर भक्ति, नाम जप से प्रारब्ध के बुरे कर्मफल को बदला या नष्ट किया जा सकता है? (P24-0034)
  100. गुरु जी, मैं घर वालों को प्रेम से मना के निकलना चाहती हूं, ताकि मेरे द्वारा किसी को द्वेष ना लगे। क्या वो प्रेम समझ पाएंगे? और अगर बिना माने निकली तो क्या मैं राग-द्वेष लेकर आऊंगी? (P24-0122)
  101. महाराज जी, यदि अपने ही माता-पिता या परिवार के लोग अज्ञान और अहंकार के वश केवल अपना नियंत्रण चलाना चाहें और हमारे सच्चे प्रेम व दर्द को ना समझें, तो क्या मन में बिना किसी द्वेष के उनसे दूरी बनाकर रहना सही है? (P25-0022)
  102. गुरु जी, भक्ति और ज्ञान में क्या अंतर है? (P25-0023)
  103. गुरु जी, प्रेम और मोह में क्या अंतर है? (P25-0030)
  104. गुरु जी, काम ऊर्जा को प्रेम में तब्दील कैसे करें? (P25-0087)
  105. गुरु जी, ज्ञान मार्ग से उपलब्धि प्राप्त करने वाले गुरु और भक्ति मार्ग से उपलब्धि प्राप्त करने वाले गुरु की बातें क्या अलग-अलग होती हैं? (P25-0128)
  106. गुरु जी, ज्ञान, कर्म, भक्ति योग में बेस्ट कौन सा है? (P26-0066)