अनुभव — योगी गुरु जी के प्रश्नोत्तर
इस पृष्ठ पर “अनुभव” विषय से जुड़े 80 प्रश्न हैं, जो जिज्ञासुओं ने सत्संग में योगी गुरु जी से पूछे। किसी प्रश्न पर क्लिक करके योगी गुरु जी का पूरा उत्तर उनके अपने शब्दों में पढ़ें, वीडियो के साथ।
- गुरु जी, आत्मज्ञान के बाद आपने जो शाश्वत स्थिति महसूस की, क्या उससे पहले भी जीवन में कभी उसकी झलक या क्षणिक अनुभव हुआ था, या यह पहली बार ही घटा? (P1-0001)
- संत और योगी की साधना एक है या अलग-अलग? क्या दोनों का अनुभव एक ही होता है? (P1-0008)
- लेकिन योगी जी, अध्यात्म में भी ‘काउंटर’ बहुत हैं — बहुत आश्रम हैं, बहुत प्रतिस्पर्धा है। कहीं जाओ तो उनके नियम में रहो, उनकी माला रटो, तिलक लगाओ, बड़ की 11-21 परिक्रमा करो — पैर दुखने लगते हैं, पर कुछ अनुभव नहीं होता। बहुत जिंदगी ऐसे ही ट्राई एंड टेस्ट में निकल गई। तो क्या बार-बार ऐसे ही ट्राई एंड टेस्ट करती रहूं? (P1-0090)
- गुरु जी, कभी अपने आत्मबोध का अनुभव बताइए। (P1-0137)
- मैंने एक संत से सुना कि जो ‘मैं हूं’ का अनुभव है, उसमें स्थित रहो, स्थिर रहो। लेकिन जब मैं कहीं लिप्त हूं, तो स्थिर कैसे रहूंगा? (P1-0147)
- क्या आपने कभी नर्मदा जी की परिक्रमा की है? अपने अनुभव बताइए। (P2-0029)
- क्या आपने गृहस्थ आश्रम का अनुभव किया है? (P2-0035)
- मैं इतना बुरा नहीं हूं, लेकिन मुझे आज तक न परमात्मा की कोई अनुभूति हुई, न किसी नेगेटिव एनर्जी की — कुछ भी अनुभव नहीं हुआ। (P2-0043)
- गुरुदेव, मां (देवी) के अपने कुछ अनुभव बताइए। (P2-0051)
- महाराज जी, मेरा स्वयं का अनुभव है कि संसार में दुख ही दुख है। (P2-0109)
- गुरु जी, मुझे एक अनुभव हुआ कि मैं द्रष्टा हूं और बाकी सब दृश्य है, मेरे अलावा कोई नहीं है। बहुत पीड़ा हो रही थी; मैं अपने शरीर को मरा हुआ महसूस कर रहा था। उस अनुभव ने मेरे भीतर मानवता, दया, करुणा को खत्म कर दिया। मार्गदर्शन कीजिए कि वह क्या था। (P2-0150)
- परमहंस जी और आपने काली मां को इष्ट बनाकर प्रकट अनुभव किया; मेरी मंदिरों में श्रद्धा कम (भीड़), कभी इष्ट नहीं बनाया — हनुमान चालीसा लिखा फिर छूट गया। क्या आत्मज्ञान/अपने घर मुड़ने की यात्रा में इष्ट अनिवार्य है, या बिना इष्ट भी संभव? भाव न आए तो बनाएं कैसे? (P3-0017)
- अटैचमेंट छोड़े बिना अंदर नहीं जा पाते — अनुभव: देखना छोड़ो, चुप रहो, शांति; फिर भी डीप अटैचमेंट। (P3-0025)
- गुरु अनुभव — इतनी बेचैनी कैसे झेली? कैसे पता ठीक हो रहा? हम घबराएं तो? (P3-0046)
- एक साधक ने अनुभव बताया: दीपावली पर पूजा के लिए रखी नए नोटों की गड्डी सत्संग सुनकर निकाली और एक जरूरतमंद को नया नोट दिया, तो देने और लेने दोनों में भाव बहुत पवित्र हुए। फिर प्रश्न — घर या आश्रम में जाकर दान लिखवा आते हैं, तो वह सत्कर्म में आता है या किस कर्म में? (हमारा किराने का बिजनेस है, ज्यादातर ऐसी जगह अनाज भेज देते हैं।) (P3-0107)
- (लाइव) अपने आप को बिना किसी विचार के अनुभव करना — क्या इसको आत्मज्ञान कहते हैं, गुरु जी? (P3-0160)
- (वही साधक) आपने बताया कि धारणा को भी तोड़ना है, ध्यान से भी मुक्त होना है — धारणा, ध्यान, फिर समाधि, फिर तुम, फिर ब्रह्म। तो समाधि वाली स्थिति में कैसे पहुंचा जा सकता है, वो कब आती है? कितने दिन बाद आती है, कितनी देर रहती है? आत्मज्ञान का अनुभव और समाधि का अनुभव — दोनों अलग होते हैं या एक ही? और समाधि में शरीर का भान रहता है या नहीं? (P3-0191)
- (लाइव) गुरु जी, मैं कई दिनों से आपके सत्संग सुन रहा हूं। मैंने अनुभव किया है कि पहले वाले सत्संग सीधे दिल में उतरते थे और अब वाले सत्संग सिर्फ मेरे दिमाग से ही वापस लौट जाते हैं। ऐसा क्यों? (P4-0001)
- (कुटिया में चार दिन रहे एक साधक-शिक्षक ने अपना अनुभव बताया) यहां इतने कम संसाधनों में भी साधक सुखी रहते हैं, आवश्यकता में जीते हैं; और हम आवश्यकता से अधिक में जीकर भी बेचैन रहते हैं। यहां की व्यवस्था के बारे में आप क्या कहेंगे? (P4-0172)
- (कुटिया में एक युवक) किताबों में पढ़ते हैं कि दूसरों के अनुभव से सीख लो; गीता में श्री कृष्ण ने बताया कि ये काम करो, ये मत करो — पर सुनकर, ज्ञान और समझ होते हुए भी मन नहीं मानता, कहता है एक बार करके देखते हैं। आपने भी कहा था कि आप हर जगह गए, यह देखने के लिए कि वहां कुछ नहीं है। तो जब कृष्ण ने कह दिया कि भगवान बाहर नहीं है, फिर भी मन मानता नहीं — मन को कैसे मनाऊं? किसकी बात सही मानूं? (P5-0016)
- समाधि का अनुभव कैसा रहता है? आत्मज्ञान के बाद आदमी गिर सकता है क्या? (P5-0035)
- (मोहन) समाधि अवस्था में क्या अनुभव होता है? कई महीने? (P5-0053)
- शरीर की तीन अवस्थाएं बताई जाती हैं, जागृत, स्वप्न और सुषुप्ति। इस समय हम जागृत अवस्था में हैं, ऐसा कहा जाता है। जब स्वप्न में होते हैं तो उसे सच मान लेते हैं, पता ही नहीं रहता कि स्वप्न चल रहा है, जागृत की तरह लगता है। स्वप्न टूटते ही लगता है कि वह कुछ और था और अब कुछ और है। उसको अनुभव करने वाला कौन है? कई जगह जाकर सुना कि आत्मा है। अगर आत्मा का अनुभव एक बार हो गया, उस बिंदु को छू लिया, तो फिर दूसरों के दर जाने की क्या जरूरत? इससे तो लगता है कि आत्मा है ही नहीं। क्या हम रोबोट की तरह हैं, जिसमें मेमोरी फिट कर दी गई है, इनपुट डाल दिया गया है, और टेक्नोलॉजी से ऊपर का अनावश्यक ज्ञान दिया जा रहा है? इसे उदाहरण से स्पष्ट करें, ताकि सरलता से समझ आए और जीवन भर उस पर चला जा सके। स्वप्न तो ऐसे भी आते हैं जो इस जन्म की कामना नहीं लगते, ऐसे दृश्य, लोग और रूप जिनकी कल्पना भी नहीं हो सकती। (P6-0039)
- जब एक मिनट के लिए चुपचाप बैठ जाता हूं और शरीर से कोई कर्म नहीं कर रहा, तब भी विचार अपने आप अतीत में चले जाते हैं या भविष्य की कल्पना में। किसी ने गुस्सा दिलाया या चोट पहुंचाने की कोशिश की, एक मिनट में वह अतीत हो गया, और विचार अपने आप बनते चले जाते हैं। मैं कुछ नहीं कर रहा, मन क्रिया कर रहा है। अगर मैं कहूं कि मैं इसका दृष्टा हूं, तो यह भी धोखा लगता है, क्योंकि प्रश्न भी मन उठा रहा है और उत्तर भी मन दे रहा है। मन निमित्त है, तो प्रश्न कौन उठा रहा है? कई बार साइलेंट में बैठने पर अनुभव सा होने लगता है, फिर लगता है यह भी धोखा है, मन बार बार धोखा देता है। सृष्टि में आने के बाद से हम अपने आप को भूल गए, ऐसा लगता है। बोलने को शब्द नहीं मिलते। क्या शब्दों का सहारा लिया जाए, और बोला क्या जाए? (P6-0040)
- एक शब्द और समय लेगा। एक बड़े पंथ में सूरत शब्द योग है, सूरत को उन्होंने आत्मा का नाम दिया है। मैंने निर्विकार का चुनाव किया, फिर शब्द योग पकड़ा, क्योंकि शास्त्रों में शब्द की बहुत बात है। अलग अलग स्तर पर अलग शब्द बताते हैं। अनुभव में शब्द और ध्वनि भीतर प्रकट हो गई। एक को बताया तो बोले ध्वनि अभी बदलेगी। बहुत साल हो गए, ध्वनि नहीं बदल रही। शास्त्र में यही था कि हर किसी की अवस्था एक जैसी नहीं होती। अगर ध्वनि नहीं पलट रही तो इसका मतलब यह नहीं कि मूल से जुड़े नहीं हो, चल नहीं रहे। फिर असमंजस हो जाता है कि शब्द योग से वहां तक पहुंचा जा सकता है, या सीधे निर्विकार अवस्था पर कैसे पहुंचा जाए। शब्द, दृश्य, गंध, रस और स्पर्श से परे कहा गया है, पर ध्वनि में भी शब्द है। ध्वनि कहीं से आ रही है, किसी के द्वारा सुन रहा हूं, सूक्ष्म में। बाहर और भीतर अलग लगते हैं। यह स्थिति कब आएगी? (P6-0046)
- प्रणाम योगी जी। जीवन के हर अनुभव को व्यक्त किया जा सकता है। तो आत्मज्ञान के अनुभव को व्यक्त क्यों नहीं किया जा सकता? क्या इसके लिए कोई शब्द नहीं बने हैं, या शब्द वहां तक पहुंच नहीं पाते? (P6-0059)
- जब साधक आत्मचिंतन के लिए बैठता है, तो क्या चिंतन करे, क्या मनन करे, क्या सोच-विचार करे, जिससे आत्मचिंतन हो, आगे उन्नति हो, आत्मकल्याण हो और तत्व का अनुभव हो जाए? वीडियो बीच में कट जाते हैं, इसलिए जो सोलह बातें बताई जाती हैं, उनका एक छोटा पैंफलेट या पुस्तक हो, जिसे जेब में रखकर बार-बार देख सकूं, तो ज्यादा लाभ हो। मैं झुंझुनू के पास से आया हूं। आज सोलहवां दिन है। ग्रंथों में पढ़ा है कि आत्मा है, पूर्ण है, पर वह ज्ञान अनुभव में कैसे उतरे? घर और संबंधों का चिंतन चलता रहता है। बैठकर ऐसा क्या सोचूं, क्या मनन करूं, कि मूल की ओर बढ़ूं और अनुभव हो जाए? (P6-0062)
- ना करने में आपका अनुभव कैसे होता है? जब कुछ नहीं चाहिए, तब अनुभव कहाँ है? (P7-0015)
- आत्मज्ञान होने पर क्या अनुभव होता है? और दिन-प्रतिदिन जो दुख-सुख का घर्षण है, उसके साथ कैसा तालमेल रहे? (P7-0041)
- जीवन में सुख-दुख, लाभ-हानि का अनुभव होता ही है, अपनों की चिंता दिमाग में आती ही है। यह जीव भाव कैसे छूटे? (P7-0050)
- गुरु जी, प्रोफेसर जी के लालच के विषय में क्या अनुभव हुआ? कृपा करके हम साधकों को बताएँ। (P7-0123)
- नाम जप साधक के लिए क्या काम करता है? मैंने पढ़ा है, अनुभव नहीं है। क्या नाम जप गलत कामों से बचाता है? संतों ने कहा है कि आत्मा नीचे धंसी पड़ी है, ऊपर आकर तीसरे तिल, आज्ञा चक्र पर आती है, और वहां परमात्मा में लीन हो जाते हैं। गुरु नानक देव जी बार-बार नाम जपने को कहते हैं। नाम, शब्द क्या है? (P7-0144)
- आपका सत्संग सुनता हूं, तो आत्मज्ञान का अनुभव होने लगा है। आपके बताए अनुसार ध्यान में कुछ समय बैठने के बाद अलग-अलग क्रियाएं धीरे-धीरे खुलने लगती हैं। तब क्या करें? अगर बर्दाश्त नहीं हो रहा, तो? (P7-0188)
- एक श्रोता लिखता है कि चेतना, जिसके द्वारा हम जागृत अवस्था का अनुभव करते हैं, वह भी मृत्यु के बाद चली जाती है, इसलिए वह भी अस्थायी हुई, असत्य हुई। इस प्रकार सत्य अव्यक्त हुआ। गुरु जी, इस पर क्या कहना है? और अगर आज तक जो किया वह गलत था, तो आगे रहना मुश्किल हो जाएगा? (P8-0013)
- एक जगह कैसे स्थिर बैठ सकते हैं? अपने अनुभव के साथ बताइए। (P8-0169)
- कबीर, भगवान बुद्ध और कृष्णमूर्ति, क्या सबके अनुभव एक ही होते हैं? (P9-0047)
- महाराज जी, मैंने भांग के नशे में एक बार देखा कि विचार रुक गया, सब कुछ साफ, फुल एचडी में दिख रहा था, और कोई विचार पैदा नहीं हो रहा था। वह अनुभव क्या था? (P9-0141)
- परमात्मा दृश्य, शब्द, रस, गंध और स्पर्श से परे है। जिन्हें उसका अनुभव हुआ, वह कैसे हुआ? (P9-0164)
- जब उस परम सत्य का कोई नाम नहीं, फिर यह नाम दान का ढोंग क्यों होता है? यह मेरा अनुभव है। (P10-0112)
- गुरुदेव, मैं एक महीने से नियमित साधना और ध्यान कर रहा हूं। इस दौरान मेरी रीढ़ की हड्डी में बिजली जैसी गर्माहट और शरीर में चींटियां चलने का निरंतर अनुभव हो रहा है। कृपया मार्गदर्शन करें। (P10-0190)
- मैं 30 साल से गुरु के आश्रम में हूं, फिर भी अंदर से अनुभव होता है कि गुरु कभी खुश हैं, कभी नाराज। शिष्य को सबसे बड़ी क्या साधना करनी चाहिए? (P11-0176)
- ध्यान में क्या अनुभव हुआ, वह याद नहीं रहता। (P12-0046)
- जो अनुभव समाधि में होता है, क्या आत्मज्ञान में भी वैसा ही अनुभव होता है? (P12-0062)
- मैं ओशो की वीडियो सुनते-सुनते ध्यान मार्ग पर चल पड़ा और ध्यान करते-करते मुझे बहुत गहरा आनंद अनुभव हुआ। अब सबसे बड़ा कष्ट यह है कि वह आनंद मैं सबको बताना चाहता हूं, पर बता नहीं पा रहा — ताकि लोग जो आनंद नशे में खोज रहे हैं, वह योग में खोजें। मार्गदर्शन करें। (P12-0100)
- मुझे कैसे पता चले कि मैं सही रास्ते पर चल रहा हूं? स्वयं की खोज में ऐसे क्या अनुभव होते हैं जिनसे पता चल जाए कि मैं सही रास्ते पर हूं? (P12-0105)
- हमारा निजी अनुभव है कि जब हम किसी जरूरतमंद की हेल्प करते हैं तो अच्छा भी लगता है, पर उस अनुभव को हम पकड़ नहीं पाते; ज्यादातर स्वार्थी भाव में ही रहते हैं। तो इस समेटने वाले, स्वार्थ वाले नेचर का क्या करें? ये कहां से आ गया? (P12-0125)
- कभी-कभी ऐसा अनुभव होता है कि अंदर से ऊर्जा का प्रभाव कई गुना ज्यादा होता है, और कभी इतना निम्न स्तर पर चला जाता है — इसका क्या करें? (P12-0154)
- पहले मैं ध्यान यहां-वहां सब लगाता था। अब बस बैठा रहता हूं, तो पैर पूरा सुन्न हो जाता है, कान में गुंजन सुनाई देता है — ये अनुभव मैं देखता नहीं, पर होते हैं। इनका क्या? (P12-0159)
- गुरुदेव, एक सत्य बताइए — हम दो दिन के लिए आपकी कुटिया में आए, तो ऐसा अनुभव हुआ कि आपके द्वारा वहां आए साधकों को कुछ आंतरिक ऊर्जा प्रदान की जाती है। (P13-0017)
- गुरु जी, अभी कैसे अनुभव हो स्थाई आनंद का? (P14-0021)
- गुरु जी, पहले अवधारणा थी कि ज्ञान के बाद यह माया समाप्त हो जाएगी, परंतु ज्ञान के पश्चात भी अनुभव हुआ कि माया कार्य करती है — ऐसा क्यों? (P14-0081)
- अध्यात्म में अपने अनुभव बताने से लाभ है या नुकसान? (P14-0183)
- अध्यात्म के क्षेत्र में जो बीज (अनुभव) मिलते जाएँ, उन्हें दबाना जरूरी है या ऊपर डाल दिया जाए? (P14-0188)
- बाबा, समाधि अवस्था का क्या अनुभव है? (P15-0156)
- गुरु जी, आपके जीवन का वह पॉइंट बताइए जहां से आप आध्यात्म से जुड़े; आध्यात्म से पहले और बाद आपकी क्या स्थिति रही, और आपके आत्मज्ञान का अनुभव क्या है? (P16-0055)
- गुरु जी, ईमानदारी से जगत-व्यवहार करना, दृष्टा भाव में रहना, कर्तापन से दूर, ईश्वर में श्रद्धा, "कुछ नहीं चाहिए" में रहना — इस साधना पथ पर जीने से कब तक आत्म-सत्य का दर्शन होगा, और तब क्या अनुभव होगा? मार्गदर्शन दें। (P17-0049)
- गुरु जी, जो हमारी इंद्रियों के जरिए अनुभव अंदर जा रहा है, वो चित्त में स्टोर होता है — अचेतन मन — और सोते समय या कुछ भी करते समय वहां से चीजें निकल-निकलकर सामने आती हैं, दिमाग में घूमती रहती हैं। इसका क्या करें? (P17-0054)
- गुरु जी, आप कहते हैं दर्शन से कुछ मतलब नहीं — तो साधना में जो दर्शन और अनुभव होते हैं, वे कौन देता है? क्या वे हमारी कल्पना हैं, या रास्ते से भटकाने के लिए होते हैं? (P17-0150)
- गुरु जी, आत्मज्ञान होने के बाद क्या परिवर्तन और अनुभव आता है? (P18-0011)
- गुरु जी, जैसे मुंबई जाते हुए रास्ते में माइलस्टोन आते हैं, वैसे साधन पथ में जो माइलस्टोन (अनुभव) आते हैं, वे क्या हैं और उनसे क्या होता है? (P18-0013)
- गुरु जी, आप अपना अनुभव क्यों नहीं बताते? (P18-0054)
- गुरु जी, क्या आत्मज्ञान होने के बाद शरीर के कष्ट का अनुभव होता है? (P18-0076)
- गुरु जी, मुझे पहले आत्मज्ञान जैसा अनुभव होता था — प्रश्न उठते ही अंदर से उत्तर मिल जाता था — लेकिन यहां (कुटिया) आने के बाद वह अनुभव खत्म हो गया; ध्यान में भी नहीं मिलता। वह कहां चला गया? (P18-0120)
- गुरु जी, राजसी-तामसी लोग जो खुशी अनुभव करते हैं (गाड़ी, मोबाइल, बंगला लेकर), वह किसे होती है — आत्मा को या जीव को? जीव और आत्मा दो हैं या एक? (P18-0194)
- गुरु जी, प्रत्यक्ष ज्ञान में सब प्रत्यक्ष है, पर परमानंद का अनुभव वहां पहुंचे बिना नहीं — ये अप्रत्यक्ष संशय कैसे टूटे? (P19-0065)
- गुरु जी, मैंने अनुभव किया कि विचारों से परे होकर मैं सिर्फ इंद्रियों से आने वाली जानकारी को देखने वाला हूं। तो क्या मैं इन सबसे अलग हो गया? (P19-0091)
- तो क्या कोई ऐसा अनुभव भी चाहिए जहां स्व प्रकट हो जाए? (P20-0178)
- प्रभु ने यह जगत स्व के अनुभव के लिए बनाया, फंसाने वाला नहीं — तो स्व में इच्छा जागृत होने का कारण क्या है? (P20-0179)
- गुरु जी, आत्मा से कैसे मिलें, अंदरूनी स्थिति को कैसे बदलें, बाहरी भौतिक चीजों से कैसे मुक्त हों और आत्मा का अनुभव कैसे करें? (P21-0144)
- गुरु जी, अनुभव यह भी है कि कुछ लोग जबरदस्ती गरीब दिखना चाहते हैं — हमने किसी को कंबल दिया, तो दूसरे दिन फिर वह उसी हालत में था, उसने बेच दिया। ऐसे में क्या करें? (P22-0084)
- गुरु जी, भृकुटी के बीच में खिंचाव रहता है और अलग-अलग अनुभव होते हैं — यह क्या है? (P22-0118)
- गुरु जी, मेरा अनुभव है कि परमात्मा, परम शक्ति — कोई भी नाम दें — किसी की प्रार्थना या विश को इंकार नहीं करता, जो मांगो दे देता है। तो हम उससे क्या मांगें? (P22-0142)
- गुरु जी, वह अनुभव टुकड़ों में आता है और फिर लगता है और चाहिए, और चाहिए — वह रिपीट नहीं होता क्योंकि हम फिर कुछ एक्सपेक्ट कर रहे होते हैं। बैठते हैं तो देखते हैं कि वे क्षण क्यों नहीं आ रहे, वह एहसास क्यों नहीं हो रहा। आंखें बंद करके देर तक बैठती हूं तो कुछ कॉन्स्टेंट होता है, फिर निकल जाता है। (P22-0148)
- गुरु जी, किताबों और अनुभव से मैंने यह समझा कि जो वह सर्वशक्तिमान सत्ता है वही मैं हूं — मैं उसका अंश नहीं, खुद ही वह हूं; उसके टुकड़े नहीं हो सकते। क्या यह सही है? (P24-0001)
- गुरु जी, क्या आपका कोई पूर्व जन्म का अनुभव है जिससे आप बचपन से ही माया की तरफ नहीं गए और रिश्तों को मतलब का समझते रहे? (P24-0020)
- गुरु जी, समाधि के अनुभव के बारे में कुछ बताइए। (P24-0038)
- गुरु जी, मेरा अपना अनुभव है कि जब तक अंदर से अच्छा नहीं है, तब तक बाहर से अच्छा नहीं हो सकता — क्या यह सही है? (P24-0134)
- गुरु जी, अभी कुछ अनुभव तो है नहीं और आपने बोला कि ईमानदारी और सत्कर्म के रास्ते से चलो — तो उसमें प्रभु या परमात्मा को बीच में लाने की जरूरत है क्या? (P25-0032)
- कोई भी अनुभव और आत्मानुभूति — क्या दोनों से परे उठना है? (P25-0192)
- गुरु जी, क्या आपने समाधि का अनुभव किया है? (P26-0121)