सेवा — योगी गुरु जी के प्रश्नोत्तर
इस पृष्ठ पर “सेवा” विषय से जुड़े 111 प्रश्न हैं, जो जिज्ञासुओं ने सत्संग में योगी गुरु जी से पूछे। किसी प्रश्न पर क्लिक करके योगी गुरु जी का पूरा उत्तर उनके अपने शब्दों में पढ़ें, वीडियो के साथ।
- (भक्त:) आपको जो देते हैं, वह सहयोग, दान या सेवा नहीं है — वह तो (आपके ज्ञान के) उपयोग की भरपाई है। (P1-0027)
- आप जैसे संतों की सेवा करें और उससे परमात्मा-प्राप्ति की इच्छा रखें, तो यह स्वार्थ है या निःस्वार्थ? (P1-0033)
- गुरु जी, प्रणाम। गुरु की सेवा करते हुए नाम जप नहीं हो पाता; उस स्थिति में दोनों का फल एक ही है या फर्क है? (P2-0148)
- पार्टनर या परिवार वाले अध्यात्म में रुचि नहीं रखते; लालच-कहानी-जबरदस्ती से पढ़ाने का प्रयास करते हैं। सीमा दीदी जैसी भाव से सेवा करती हैं पर अध्यात्म से मतलब नहीं। क्या हमें उन्हें खींचना चाहिए या अपनी ऊर्जा बचाकर अपनी यात्रा पर फोकस करें? (P3-0006)
- सामर्थ्यवान परिचय नहीं बनाता; कमजोर बनाता है। सेवा में उम्मीद? सत्संग निशुल्क बनाम खर्च? (P3-0024)
- सेवा करते अहंकार/प्रतिस्पर्धा — 'मैं सेवा कर रहा' भाव; सुविधा नहीं ज्ञान/समाज निमित्त चाहिए? (P3-0070)
- वस्तु देकर प्रेम कैसे प्रकट करें? गुरु/सेवा में वस्तु कब माध्यम? (P3-0075)
- सत्संग में सुना कि हमसे जो गलत कर्म हुए उनका फल अलग मिलेगा और अच्छे कर्मों का अलग — अच्छा कर्म बुरे को काटता नहीं। तो फिर सेवा से मिला आशीर्वाद श्राप को कैसे काटेगा? और यह पूरी तरह खत्म कब होगा? किसी ने बड़ा अभिशाप दिया हो जो हमें पता भी नहीं, तो क्या करें? (P3-0095)
- जैसे अभी वृद्ध लोग आश्रम में आएंगे, जैसे अपने प्रोफेसर साहब — धीरे-धीरे उम्र और बढ़ेगी और ये यहीं रुकेंगे, तो फिर उनकी सेवा कौन करेगा? (P3-0106)
- जब सब तुम में ही है तो क्या चाहिए? अगर मैं सीधा अपने आप में आ सकता हूं तो इतनी विधियां क्यों? और एक व्यक्ति रोज दो घंटे ध्यान-पूजा-पाठ करता है, दूसरा ईमानदारी से कर्म करते हुए वे दो घंटे जरूरतमंद की सेवा में लगाता है — दोनों ईमानदार हैं, तो पहले कौन पहुंचेगा? (P3-0153)
- (लाइव) प्रणाम योगी जी। हम लोग बेजुबानों का एक ग्रुप पिछले छह साल से चला रहे हैं; अपनी तरफ से पूर्ण (100%) सेवा दे रहे हैं, पर जीवन में शांति नहीं मिलती। गलती कहां हो रही है? (P4-0013)
- (लाइव) योगी जी प्रणाम। आपने होटल का काम छोड़ने को कहा है; लेकिन जब तक मैं उस मांस-मदिरा के बीच हूं, क्या मैं उसे सेवा मानकर कर सकता हूं, या वह हर हाल में मेरा पतन ही करेगा? क्या कर्म को बदलने से पहले भाव को बदलकर उस नरक में काम करता रहूं? या फिर भागना ही एक रास्ता है? (P4-0043)
- (लाइव) प्रणाम गुरु जी। हम लोग पिछले छह साल से बेजुबानों की सेवा का एक ग्रुप चला रहे हैं — स्ट्रीट डॉग, गौ सेवा, पक्षियों की अन्न सेवा की जाती है। तो क्या यह सेवा सत्कर्म के लिए काफी है? (P4-0104)
- (कुटिया में साधक, पेंशनर) मैं जहां रहता था वहां धन से सेवा करता था — खाने-पीने के अलावा बाकी पैसे मैं रखता नहीं था, सेवा-सत्संग में लगा देता था। परिवार से विवाद हुआ तो निकल गया, आठ महीने बागेश्वर में रहा, वहीं आपका वीडियो मिला और तुरंत सब समझ में आ गया। अब यहां आ गया तो मेरा पैसा किसी काम में नहीं आ रहा; परिवार वाले उसे खा जाएंगे। मैं चाहता हूं कि वह पैसा यहां सेवा में लगा दूं — किसको, कैसे दूं? (P4-0132)
- (लाइव) गुरु जी नमन। अपनों की कुटिया में कोई सेवा नहीं है, तो सुबह साधक को अपनी शुरुआत कैसे करनी चाहिए? और वहां सत्कर्म क्या होगा? (P4-0145)
- (वही साधिका) आपने कहा कि नियमों में रहकर शिष्यत्व की पात्रता अपने आप आ जाती है, फिर गुरु परीक्षा लेता है। जैसे बाबूलाल भाई — वे सेवा में इतने लगे रहते हैं कि साधना में बैठ नहीं पाते, और आपने कहा था कि उन पर विशेष कृपा है, वे इसी ढंग से तर जाएंगे। पहले गुरु 12-12 साल रखते थे; अब तो आदमी की उम्र भी उतनी नहीं। तो क्या यह 12 साल का समय जरूरी है? (P4-0162)
- (वही साधिका) मैंने गुरु जी से यह कहलवा लिया कि मेरे शरीर की सेवा की जिम्मेदारी भी वे लेंगे — मुझे तो पता भी नहीं था कि मैं ऐसा कर रही हूं। इससे मेरा कौन सा स्तर पता चलता है? और (बीमारी-मौत में) मेरा कौन करेगा? (P4-0164)
- (वही साधिका) आप (शरीर की सेवा का) सवाल मल-मूत्र और लकवे जैसी बीमारी तक क्यों ले गए? हर बुखार-खांसी में तो ऐसा नहीं होता। (P4-0181)
- शरीर की सेवा-इलाज (धाम पर ठीक होना) आत्मिक मार्ग में कहां फिट बैठता है? तंत्र-मंत्र से इलाज? (P5-0070)
- सेवा में किसी को कुछ बोल दूं तो बुरा लगे — गिल्ट हो जाता है। क्या करें? (P5-0092)
- गुरु आश्रम में रहकर गुरु सेवा कैसे करें? (P5-0128)
- शरीर आराम मांगता है — सेवा में कैसे लगें? (P5-0137)
- सेवा में गुस्सा आ जाए / गलती हो जाए तो क्या? (P5-0138)
- सेवा भाव के साथ चिंतन जरूरी है क्या? आंख बंद आत्मचिंतन या सेवा? (P5-0139)
- आपने एक संकल्प कहा है कि निर्विकार होना है। निर्विकार कैसे होऊंगा, और विकार बन कैसे रहे हैं? बेईमानी छोड़ दूं तो आगे बनना बंद होगा, पर पिछला जो जमा किया है वह कैसे खटेगा? बेईमानी से श्राप मिला, तो सत्कर्म और जरूरतमंद की सेवा से क्या मिलेगा? प्रतिदिन जो विकार हो रहे हैं, उन पर हर क्षण कैसे ध्यान रखूं? प्रश्न पर प्रश्न मन उठाता रहता है, उन्हें ज्यादा नहीं उठने देना है या नहीं? (P6-0048)
- मैं घर से कुछ औषधियां आपके लिए लाई हूं। क्या आप ले लेंगे? सेवा में लगना चाहती हूं। पौधों की सेवा में क्या करूं, थोड़ा मार्ग बता दें। (P6-0073)
- समाज की सेवा भी बोझ और गुलामी लगती है। ऐसा क्यों हो रहा है? (P6-0111)
- हम सरकारी नौकरी से अभी रिटायर हुए हैं। अब उस पैसे का क्या करना चाहिए? मैं उसे सत्कर्म में लगाना चाहती हूं, पर घर के दूसरे प्राणी सहमत न हों तो क्या करें? उस पैसे पर मेरा हक है या उनका? जरूरतमंद पात्र है या नहीं, यह कैसे पता चले? कई संस्थाएं सेवार्थ में लगी रहती हैं, क्या उनके माध्यम से भी यह कार्य हो सकता है? वृद्धाश्रम में जो गलत देखा, उसे बताना चाहिए या नहीं? (P7-0092)
- शरीर को कैसे स्वस्थ रखें, ताकि जहां धन नहीं, शारीरिक बल चाहिए, वहां सेवा कर सकें? दिनचर्या और खानपान कैसा हो? जोड़ों का दर्द उम्र के साथ हो रहा है। और कहीं सहयोग दें तो क्या देखें? पारदर्शिता कहां हो? (P7-0093)
- रोज पांच-छह बार चक्कर आ रहा है। आत्मचिंतन नहीं होता, बस खाली सेवा ही लगती है, खाली-खाली लगता है। जो सूझता है, वही करते रहते हैं। तब क्या करें? (P7-0159)
- सेवा देने की हैसियत नहीं है, तो क्या हम आपका सत्संग नहीं सुन सकते? (P7-0169)
- चंडीगढ़ से एक साधक चार-पाँच महीने से ईमानदारी और सत्कर्म सुनकर प्रभावित होकर आया। कहता है कि सभी बताते हैं, पर आप इस पर अलग से जोर देते हैं, इसलिए हृदय में बैठ गया कि इसे अपनाना ही चाहिए। अभी से शुरू किया है। सुबह की सैर में रोज़ दस-बीस रुपये के कुत्तों को खिलाता है। सैर के बाद घर से बाहर नहीं निकलता, इसलिए मनुष्य कम मिलता है, मिल जाए तो उसकी भी सेवा करता है। ईमानदारी कैसे पूरी तरह अपनाएँ, और सत्कर्म किसे-किसे करें? (P7-0190)
- फिर सेवा कैसे करें? (P8-0002)
- क्या घर के सदस्यों की सेवा भी सत्कर्म है? (P8-0148)
- क्या दूसरे की सेवा करने में आत्मज्ञान होगा? (P9-0129)
- गुरु जी, सेवा करते-करते गिरने से कैसे बचें? (P9-0135)
- गुरु जी, क्या जरूरत में जीना और जरूरतमंद की सेवा करना ही साधना है? (P9-0146)
- सर, यह समझिए कि मैंने अपने मां-बाप की सेवा बिना स्वार्थ के की है। (P10-0022)
- मैं जब अपनी समझ से कुछ भी सेवा, दया आदि करता हूं तो बार-बार गिर जाता हूं। फिर वापस ईमानदारी को पकड़ लेता हूं और पीड़ा के बाद उठने लगता हूं। कब तक (गुरु की) समझ से चलना चाहिए और कब अपनी समझ से भी चल सकते हैं? (P10-0067)
- गुरु जी, किसी का आत्मिक भला करने में हम गिर जाते हैं। तो क्या ऐसी सेवा छोड़ देनी चाहिए, और अच्छे से सीखकर फिर करनी चाहिए? (P10-0078)
- गुरु जी, मैं जब किसी की सेवा करने जाता हूं तो ज्यादातर थक जाता हूं। असल में जरूरतमंद कौन है, यह कैसे पहचानें? (P10-0108)
- क्या समाज सेवा ही मोक्ष है? (P10-0118)
- मैं विकलांग हूं, मेरी माताजी मेरी सेवा करती हैं। मेरा कर्मबंधन कैसे मिटेगा? (P11-0147)
- पहले गुरु ज्ञान देने से पहले शिष्य से 12 साल सेवा करवाते थे; आज गुरुओं ने लंगर लगा रखा है, कहते हैं पहले ज्ञान ले लो, सेवा बाद में कर लेना। इसमें क्या अंतर है? (P11-0150)
- आश्रम में रहने वालों की तो आप सेवा कराकर समझ खोल देते हैं; पर गृहस्थ तो निरंतर उसी दलदल और माहौल में रहते हैं, जल्दी आ भी नहीं पाते। वे बहुत ईमानदार रहने की कोशिश करते हैं, फिर भी गिर जाते हैं। लोग गुरु की फोटो टांग लेते हैं, पूजा-पाठ करते हैं कि गुरु जी पास हैं — तो वे कैसे समझें कि गिर रहे हैं या उनसे कमी हो रही है, और कैसे सुलझें? (P12-0008)
- अपनों की कुटिया में किसी भी साधक से कोई सेवा नहीं ली जाती; तो क्या यहां रहकर व्यक्ति आलसी तो नहीं बन जाएगा? (P12-0020)
- सेवा से समय मिलने पर अपने स्वरूप में ध्यान करना हो, तो शरीर में किस स्थान पर ध्यान करना चाहिए — हृदय, आज्ञा चक्र, सहस्रार आदि? (P12-0087)
- आप कहते हो ईमानदारी और सत्कर्म करो, और सत्कर्म का मतलब है जरूरतमंद की सेवा। हम चाहते हैं कि जल्दी आत्मज्ञान को उपलब्ध हो जाएं, पर हम जरूरतमंद को ढूंढ भी नहीं सकेंगे, पता कैसे करेंगे कि जरूरतमंद है या नहीं, और जबरदस्ती ढूंढूं तो अहंकार भी आ जाएगा। तो यह कैसे संभव है कि प्रकृति मेरे सामने ऐसे मौके दे? (P12-0138)
- (लाइव में) मैं ज्ञान के लिए श्रम सेवा कर सकता हूं। (P12-0166)
- जब हम ईमानदारी या सेवा करते हैं तो हर बार संशय आता है कि इस कर्म को करना चाहिए या नहीं, यह मेरे अधिकार में है या नहीं। कौन से कर्म छोड़ने हैं और कौन से कर्म करने हैं? (P13-0115)
- गुरु जी, जब हम दिल से किसी की सेवा करें और वो हमें बद्दुआ दे, तो क्या वो बद्दुआ लगती है? (P13-0147)
- महाराज जी, मैं सबके प्रति पॉजिटिव रहती हूं, परंतु परिवार में कुछ लोग मेरे प्रति नेगेटिव क्यों हैं, जबकि मैं निष्काम भाव से सेवा करती हूं? (P13-0165)
- गुरु जी, जिससे हमारा कोई संबंध नहीं, उसकी सेवा या मदद करते हैं और उससे कुछ नहीं चाहिए, तो वो भी प्रेम हुआ। लेकिन जो हमारे रिश्तेदार और परिवार हैं, उनसे तो अपेक्षा रहती है। अनजान आदमी के लिए करना निष्काम सेवा है? (P13-0185)
- गुरु जी, गीता क्या है? और मैं समाज सेवा कैसे करूं? (P14-0003)
- गुरु जी, कुटिया में केवल तप होगा तो सेवा नहीं हो पाएगी? (P14-0037)
- गुरु जी, क्या हमें बेसहारा लोगों की सेवा करनी चाहिए? अगर हां, तो क्यों — क्या यह हमारा दायित्व है? (P14-0105)
- गुरु जी, माता-पिता के प्रति सेवा-भाव सांसारिकता में पकड़े रखता है, उनकी सेवा उनकी मनोकामना की पूर्ति है, संसार का ही हिस्सा बना रहता है। क्या संन्यास का रास्ता कोई अदृश्य सत्ता बनाती है? (P14-0124)
- मुझे कुछ नहीं चाहिए, लेकिन दूसरों की सेवा का विचार रहता है — क्या ये चाहत गलत है? (P15-0065)
- आत्मा परमात्मा में मिल जाए तब सुख है, या आत्मा परमात्मा की सेवा करे? (P15-0082)
- गुरु जी, सेवा और सत्कर्म में क्या अंतर है? सत्कर्म का मौका कैसे मिलता है? (P17-0080)
- गुरु जी, सेवा कितने तरह की होती है? और आत्मदर्शन के बाद व्यक्ति की व्यवस्था कौन करता है? (P17-0081)
- गुरु जी, आपने कहा सत्कर्म का मौका प्रकृति देती है — तो क्या उस मौके पर किए सत्कर्म से भी हमारे बंधन कटेंगे, या वह सेवा ही रहेगी? (P17-0086)
- गुरु जी, आप कहते हो मतलबी बनो, पर मतलबी बनेंगे तो निस्वार्थ सेवा कैसे करेंगे? (P19-0137)
- सेवा करते हुए "मैं ही यह कर रहा हूं, मेरे बिना नहीं होगा" — यह अहंकार न पकड़े, इसके लिए क्या समझें? (P20-0118)
- मुझे जो भी सेवा मिले, गुरु दर न छूटे, यह भाव कम न हो और अहंकार मुझ पर काम न करे — इसके लिए क्या करूं? (P20-0119)
- सेवा में कौन किसके लिए कर रहा है — गुरु और सेवक का संबंध कैसे समझें? (P20-0123)
- क्या आप सेवा करने वाले को पुण्य या मुक्ति का आश्वासन देते हैं? (P20-0124)
- सेवा में अहम भाव खड़ा ही न हो, इसके लिए क्या करें? (P20-0126)
- लोग सेवा छोड़कर क्यों चले जाते हैं? क्या आप किसी को हटाते हैं? (P20-0127)
- आप किसी को सेवा के लिए बुलाते या रोकते क्यों नहीं, और क्या आप पर्सनल सेवा लेते हैं? (P20-0129)
- आप सेवा करने वालों से बार-बार क्यों कहते हैं कि "अभी भी जा सकते हो"? (P20-0132)
- "ऐसा क्या करूं जो तेरी सेवा हो पाए?" — परमात्मा की सेवा कैसे होती है? (P20-0137)
- कुटिया के सेवा नंबर पर नाम पूछना, गुड मॉर्निंग या निजी बातें करना क्यों मना है? (P20-0140)
- गुरु जी, हम इंदौर में सत्संग, लंगर और गुरुद्वारे में सेवा करते हैं — हमें आपका आशीर्वाद चाहिए। (P21-0050)
- गुरु जी, मैं सोचती हूं यह घर छोड़कर कुटिया चली जाऊं और वहां सत्संग-सेवा करूं; पर वहां अपनी मेहनत का नहीं, दूसरों के दिए अन्न का खाऊंगी और पैरों तले जीव भी मरते हैं — क्या इससे मेरा बंधन बनेगा? आत्म-कल्याण के लिए घर पर रहूं या कुटिया जाऊं? (P21-0099)
- गुरु जी, आप कहते हो सत्कर्म करो — तो किसका सत्कर्म करें, किसकी सेवा करें, किसको दें, किसको न दें? (P21-0102)
- गुरु जी, पहले हम मानते थे कि ज्ञान की सेवा सबसे बड़ी है; फिर आपसे सुना "बिना दया के ज्ञान कसाई", तो सेवा-भंडारा करने लगे; भंडारे के बारे में लिखा तो आपने कहा ज्ञान का भंडारा करो — अब मैं कंफ्यूज हूं, क्या करूं? (P21-0105)
- गुरु जी, एक प्रोफेसर बहुत सत्कर्म करते थे, 30 साल तक बिस्तर पर पड़े अपने परिवार-जन की सेवा भी की, लेकिन उन्होंने 30 साल तक इतने कष्ट झेले और उनका देहांत हो गया। इससे मुझे लग रहा है कि भगवान है या नहीं? क्या सत्कर्म करने वालों की ये परीक्षा है? मैं बहुत कंफ्यूज हूं। (P21-0164)
- गुरु जी, मैं अपने गुरु जी के पास रहती हूं, साधना करती हूं; अचानक आपका सत्संग सुना। मुझे कुछ नहीं चाहिए, पर आपकी सेवा में — आपके भ्रमण के लिए — कुछ देना चाहती हूं। (P22-0018)
- गुरुदेव, मैं हरियाणा से हूं, श्मशान में सेवा करता हूं और सेवा करते हुए आपका सत्संग सुनता हूं — क्या यह सत्कर्म है? (P22-0019)
- प्रभु जी, सत्कर्म और सेवा में क्या अंतर है? (P22-0066)
- गुरु जी, पेड़-पौधे लगाना सेवा है या सत्कर्म? (P22-0078)
- गुरु जी, आपने जीवन जीने के मूल सिद्धांत बताए — ईमानदारी और सत्कर्म, और सत्कर्म में जरूरतमंद की सेवा। लेकिन जरूरतमंद की पहचान कैसे करें? हैदराबाद में एक परिवार ने कहा मालिक ने निकाल दिया, घर जाना है, भूख लगी है — खाना मत खिलाओ, पैसे दे दो। तभी दो लोग आकर बोले इनका रोज का यही काम है, तो हम आगे निकल गए। एक बच्ची ने 5 किलो आटा मांगा तो दुकान वाला बोला यह इसे यहीं बेच आएगी। ऐसे में विश्वास कैसे करें? (P22-0083)
- गुरु जी, अगर ऑनलाइन किसी की कॉल आई, सेवा भाव भी है, लेकिन मन में शंका है और जांच-परख नहीं पा रहे — तो क्या मना कर दें? मना कर दिया और वह सच में जरूरतमंद हुआ तो भी पछतावा होगा। (P22-0086)
- गुरु जी, रावण ने तपस्या करके ब्रह्मा जी और शिव जी से अपनी जरूरत की चीजें ले लीं, बाद में बहुत ताकतवर होकर बहुत पाप किए — पर ब्रह्मा जी और शिव जी को कोई दोष नहीं लगा। उन्होंने तो सेवा कर दी, उपयोग रावण ने गलत किया — तो क्या देने वाले पूरी तरह छूट गए? (P22-0088)
- गुरु जी, बुरा मत मानिए, बस प्रश्न है — क्या आपको कभी सेवा करवाने की जरूरत पड़ती है? अगर कोई कहे कि मैं गुरु हूं, मेरी सेवा करो, तो क्या यह बात सही है? (P22-0113)
- गुरु जी, आत्मिक सेवा क्या होती है, जरा समझाइए — क्या वह की जा सकती है या अपने आप होती है? (P22-0114)
- गुरु जी, आपने भोजन का पहला कौर उठाते ही याद आने पर हाथ धोकर पहले पिल्लों को खिचड़ी दी — वह कर्म था या सेवा? और लोग यह भी सिखाते हैं कि खाते समय उठना नहीं चाहिए। (P22-0115)
- गुरु जी, क्या हमें दूध पीना चाहिए, जब उसी दूध के लिए गायों और भैंसों को जंजीरों में बांधकर उनका शोषण किया जाता है, और दूध निकालने के बाद जब वही पशु अर्थहीन हो जाते हैं तो कसाईखानों में भेज दिए जाते हैं? भारत गौ-सेवा के लिए जाना जाता था और आज बड़ा बीफ निर्यातक बन चुका है — यह हमारी प्रगति है या पाप? (P22-0116)
- गुरु जी, अगर कोई जरूरतमंद की सेवा ना करके मानवतावश करता है — जैसे डॉक्टर ने माता जी का इलाज किया, माता जी पैसे तो दे सकती थीं, फिर भी उन्होंने नहीं लिया? (P22-0131)
- गुरु जी, आपने बोला कि हम अभी तक निकलने की, छुड़ाने की प्लानिंग कर रहे हैं, यात्रा अभी शुरू नहीं हुई — तो यात्रा शुरू कब होगी? क्या जब हम जरूरतमंद की सेवा करेंगे और सत्कर्म-ईमानदारी अपनाएंगे, तब मानेंगे कि यात्रा शुरू हुई? (P22-0144)
- गुरु जी, ससुराल वाले हमसे सेवा नहीं करवाते, साथ भी नहीं रखते, अलग कर दिया है, फिर भी कलह खत्म नहीं होता — रिश्तेदार आते हैं और बुराई करते हैं; दुख कैसे खत्म करें? (P22-0189)
- गुरु जी, हम यहां कुछ सेवा कर ही नहीं पाते — ना बर्तन साफ किए, ना कुछ काम कर पाए। (P23-0084)
- गुरु जी, किसी असमर्थ की निस्वार्थ सेवा करना और बदले में उससे कुछ न चाहकर, किसी सामर्थ्यवान से मदद की उम्मीद करना — गलत है या सही? (P23-0150)
- गुरु जी, जनता की सेवा के लिए तो मैं आधी रात को भी एक पांव पर खड़ा हूं — सेवा करते हुए किस बात का ध्यान रखूं? (P24-0019)
- गुरु जी, पैसे हैं नहीं — सेवा कैसे करें और आत्मज्ञान कैसे प्राप्त करें? (P24-0082)
- योगी जी, तो फिर जो सामर्थ्य वापस आए, क्या मैं उसको भी उसी में — सत्कर्म और सेवा में — लगाती रहूं? (P24-0091)
- गुरु जी, सेवा करके हमें मुक्त होना है, या मुक्त होकर सेवा करनी है? (P24-0100)
- गुरु जी, जो सेवा कर रहा है, क्या उसे साधना की जरूरत है? (P24-0109)
- गुरु जी, सेवा में तो दिखता है कि हम कुछ कर रहे हैं — खुद को भी लगता है और गुरु की नजरों में भी रहता है। साधना में तो दिखता ही नहीं, और साधना में अहम नहीं आ जाएगा? (P24-0110)
- गुरु जी, सेवा करते हुए साधना नहीं हो सकती क्या? (P24-0111)
- गुरु जी, हम रोज बच्चों को बिस्किट देते हैं — यह सत्कर्म है या सेवा? और रास्ते में किसी का एक्सीडेंट हो जाए और हम उसे अस्पताल पहुंचा दें, तो? (P24-0153)
- गुरु जी, सेवा, सत्कर्म और कर्तव्य में क्या अंतर है? (P24-0171)
- गुरु जी, क्या सेवा और साधना ही मार्ग है? 12 साल वही करना है? (P25-0005)
- गुरु जी, सेवा और सत्कर्म के बीच अभी भी क्लैरिटी नहीं समझ पा रहा हूं, कहीं द्वंद है। (P25-0021)
- गुरु जी, मैं खाना बनाकर माता-पिता को खिला रहा हूं, उनकी सेवा भी कर रहा हूं, पर वे कहते हैं कि वंश आगे बढ़ाना है, यह तुम्हारी जिम्मेदारी है, शादी करो। (P25-0052)
- गुरु जी, जरूरतमंद की सेवा की तो वे पूरी तरह हमारे पर निर्भर हो जाते हैं। (P25-0092)
- गुरु जी, सेवा और साधना से क्या धुलेगा? (P25-0094)
- गुरु जी, कुछ नहीं चाहिए — क्या गुरु को अर्पण, सेवा के उद्देश्य से जाप कर सकते हैं? (P26-0009)
- गुरु जी के प्रति पूर्ण शरणागति कैसे लें? सेवा भाव कैसे जागे? सेवा कब मिलेगी? (P26-0018)
- गुरु जी, मैं सेवा करना चाहता हूं लेकिन बार-बार यह संशय आता है कि मैं जिनकी सेवा कर रहा हूं वो मेरे जैसा जीव या माया है या वह परम सत्य है? मैं जिनकी सेवा कर रहा हूं वह कौन है? (P26-0043)