आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

विचार — योगी गुरु जी के प्रश्नोत्तर

इस पृष्ठ पर “विचार” विषय से जुड़े 109 प्रश्न हैं, जो जिज्ञासुओं ने सत्संग में योगी गुरु जी से पूछे। किसी प्रश्न पर क्लिक करके योगी गुरु जी का पूरा उत्तर उनके अपने शब्दों में पढ़ें, वीडियो के साथ।

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  1. नेगेटिव विचारों से कैसे बचें? (P1-0016)
  2. मैं कुछ दिनों से आपकी बातें सुन रहा हूं और बच्चों व पत्नी को बताता हूं, तो वे मुझे पागल और पुराने विचारों का कहते हैं। (P1-0054)
  3. गुरु जी, मुझे मानसिक कमजोरी, हर बात का डर और अति-विचार (ओवरथिंकिंग) से बहुत तकलीफ होती है; लगता है कुछ हो जाएगा। कोई एक उपाय बता दीजिए। (P1-0062)
  4. योगी जी, मैं कामनाओं और विचारों में लिप्त हूं। कैसे निकलूं? (P1-0065)
  5. ओवरथिंकिंग (अति-विचार) से कैसे बचें? (P1-0070)
  6. आपने बताया था कि गलत विचारों के बारे में सोचो, उससे काफी फर्क आ गया है। लेकिन कभी बाहर कुछ (गलत) दिख जाए और उसके बाद भीतर गलत सोच चलने लगे, तो उस समय क्या करें? (P2-0008)
  7. क्या आपको कोई विचार नहीं आते? (P2-0023)
  8. विचार से मतलब — सिर्फ फालतू विचार चलते रहते हैं। (P2-0027)
  9. मेरा जीवन आपके विचारों से बहुत मिलता है। पूरे जीवन लगता था कि मैं अकेला हूं जो जीवन को इस तरह देखता हूं; आपको सुना तो इतना असर हुआ कि सच में सही दृष्टि से जिया। (P2-0114)
  10. जीवन में मुझे यह होश हमेशा बना रहे कि मुझे (भवसागर से) निकलना है — यह कैसे संभव है? कभी विचार पॉजिटिव आते हैं, कभी मन मलिन रहता है और मैं फिर खो जाता हूं। (P2-0117)
  11. गुरु जी, प्रणाम। राग-द्वेष के विचारों की तह तक कैसे पहुंचा जा सकता है? (P2-0132)
  12. गुरु जी, प्रणाम। आपके सत्संग से ईमानदारी और सत्कर्म ने जीवन बदल दिया, पर मन में विचार बना रहता है कि पहले जो पाप हो गए, उनका क्या? (P2-0158)
  13. तो क्या आपका कहना है कि पहले मैं तय करूं कि जीवन को किधर ले जाना है; जो चीजें और लोग मुझे आकर्षित कर रहे हैं, उनके पीछे न जाकर देखूं कि मेरे अंदर कमी क्या है और उसे पूरा करूं? संसार की चीजों से यह खालीपन भरता नहीं — एक इच्छा पूरी हो तो 70 नई खड़ी हो जाती हैं — फिर भी भीतर पक्का लगता है कि यह कभी न कभी भरेगा, बस दिशा गलत पकड़ ली थी। तो क्या पहले विचारों में उस दुनिया का चित्र बनाऊं जो मुझे बसानी है, और फिर काम करूं? (P2-0164)
  14. अपने आप में होने की यात्रा में अटैचमेंट याद आकर सताने लगा — पहले नहीं सताता था। विचारों में दुख, उपलब्धि के बाद भी विचार रहेंगे क्या? (P3-0021)
  15. एक साधक (एक महीने से आश्रम में): पहले बिजनेस-जॉब की छोटी-छोटी बातों में बहुत व्यस्त रहता, बहुत सोचता था; यहां आकर विचार शांत हो गए, अंदर पवित्रता का एहसास हो रहा है। बेईमानी आदि का खाने-पीने पर कितना असर पड़ता है? आपने तीन गुण बताए — वे कर्म से होते हैं या खाने से? (P3-0105)
  16. (लाइव) अपने आप को बिना किसी विचार के अनुभव करना — क्या इसको आत्मज्ञान कहते हैं, गुरु जी? (P3-0160)
  17. (कुटिया में साधक) मुझे लगता है जीवन की यात्रा अनंत से अनंत है और जीरो उसका सेंटर पॉइंट है (जिसे शांति या समाधि कहते हैं)। अच्छे कर्म करने वाला प्लस साइड — अच्छी जगह, अच्छी विचारधारा के लोगों में — जन्म लेता है; बुरे कर्म वाला माइनस साइड — दूसरी योनियों या वैसी विचारधारा के लोगों में — जाता है; ऐसे ही सर्कल घूमता रहता है। यह सर्कल टूटे कैसे? मुक्त हो गए तो फिर हम कहां होंगे — आत्मा कहीं तो होल्ड करेगी? और धरती पर 9-10 हजार करोड़ लोग जन्म ले चुके, अभी 900 करोड़ जिंदा हैं — बाकी की आत्माएं कहां गईं? (P3-0195)
  18. (लाइव) योगी जी, आपने कहा कि मन में गलत सोच रहे हो तो कोई बात नहीं, बस कर्म में मत लाना। जब से यह अपनाया है, पहले से ज्यादा घृणित और कामी (विचारों वाला) हो गया हूं; मुझे ऐसे विचार आते हैं कि बोल नहीं पा रहा हूं। (P4-0012)
  19. (कुटिया में साधक) किसी को 5 से 10 मिनट के लिए समाधि लगेगी, आत्मज्ञान कब होगा पता नहीं — बीच के उस समय को क्या कहेंगे? क्या वह समय के पार हो गया है? क्या विचार है तो समय है? (P4-0051)
  20. (वही साधक) ये विचार कितने खेल खेलते हैं — अनुभूति को भी हम ‘अनुभूति’ बोलकर खराब कर देते हैं। तो क्या मौन रहें? (P4-0054)
  21. (लाइव) गुरु जी प्रणाम। जानने (की आदत) से कैसे छुटकारा पाया जाए? पता होता है कि यह विचार गलत है, पर उस विचार की पहेली सुलझाने की आदत सी हो गई है। (P4-0058)
  22. (लाइव) प्रणाम योगी जी। जब हम एकांत में बैठते हैं तो विचार आते हैं। तो क्या इन विचारों को देखना है — कहां से आ रहे हैं, क्यों आ रहे हैं? करना क्या है? कृपया समझा दीजिए। (P4-0070)
  23. (लाइव) योगी जी नमन। जब एकांत में बैठते हैं तब विचार, वासना, कामना ही आती है। तो इसी का यूज़ करके हम कैसे निर्विकार हो जाएं — कृपया मार्गदर्शन कीजिए। (P4-0081)
  24. (लाइव) प्रणाम गुरु जी। आपने बोला था कि सब हम सोचते हैं, लेकिन मैं तो डरावना नहीं सोचता — डर के विचार मुझे क्यों आते हैं? इसका मतलब तो यह हुआ कि सोचता मैं हूं, परंतु विचार खुद आते हैं। विचार का स्रोत कौन है? यह कहां से आते हैं? (P4-0089)
  25. (लाइव) योगी जी प्रणाम। आत्मिक चिंतन में विचारों और भाव में न बहना है, न रोकना है। पर यह तटस्थ भाव भी तो हम ही बना रहे हैं। इस तटस्थ भाव से कर्ता भाव बना रहेगा क्या, या धीरे-धीरे विलीन हो जाएगा? (P4-0096)
  26. (लाइव) योगी जी प्रणाम। गुरु जी, अगर गलत विचार आएं तो मैं क्या करूं? (P4-0112)
  27. (लाइव) गुरु जी प्रणाम। ईश्वर क्या है? एकांत में विचार गिरने पर अपने सिवा कोई नहीं (दिखता)। (P4-0116)
  28. (कुटिया में साधक) आत्म चिंतन में, ध्यान लगा के बैठते हैं तो अतीत के विचार नहीं आते, लेकिन अभी जो कुछ हो रहा है — जैसे कोई आवाज आ गई, कुछ गिर गया — तो उसका विचार आता है, ध्यान वहां चला जाता है। क्या करें? (P4-0131)
  29. (वही साधक, पेंशनर) मैंने निरंतर नाम जाप भी किया, 18–20 घंटे सीताराम जपता था, फिर भी विचार नहीं बदले। फिर किसी के सत्संग से सांस पर ध्यान करना सीखा — वो कुछ समय के लिए काम करता है, शरीर के विकार भी सुधरते हैं, लेकिन परमानेंट नहीं। और आत्मिक चिंतन में आंख बंद करके क्या करना है? (P4-0134)
  30. (संदर्भ: गुजरात में एक युवक) मन में उल्टे-सीधे गंदे विचार आते हैं; नॉनवेज खाता हूँ — छोड़ दूँ या खाऊँ? हर बात अपनी पर्सनल क्यों? (P5-0025)
  31. आप कहते हैं भगवान पे यकीन मत करो, और यह भी कि जहां है वहीं से निकाल देंगे। ईश्वर को लेकर आपका विचार क्या है? (P5-0064)
  32. मलिन विचार आते हैं, साधना-पूजा में तकलीफ — क्या करें? डर का सामना, क्रोध निवारण, प्रेम कैसे आए? (P5-0098)
  33. जिंदगी जीना किसे कहते हैं? आत्मज्ञान के बाद भी विचार आते हैं? (P5-0119)
  34. बुरे कर्म का दंड मिटाया नहीं जा सकता — अच्छे कर्म से? बुरे विचार क्यों न दबाएं? (P5-0125)
  35. विचार आते हैं — गलत-सही क्या? उनके साथ क्या करें? (P5-0133)
  36. एक्ट नहीं करूं फिर भी याद/विचार आते हैं — क्या करें? (P6-0020)
  37. जब एक मिनट के लिए चुपचाप बैठ जाता हूं और शरीर से कोई कर्म नहीं कर रहा, तब भी विचार अपने आप अतीत में चले जाते हैं या भविष्य की कल्पना में। किसी ने गुस्सा दिलाया या चोट पहुंचाने की कोशिश की, एक मिनट में वह अतीत हो गया, और विचार अपने आप बनते चले जाते हैं। मैं कुछ नहीं कर रहा, मन क्रिया कर रहा है। अगर मैं कहूं कि मैं इसका दृष्टा हूं, तो यह भी धोखा लगता है, क्योंकि प्रश्न भी मन उठा रहा है और उत्तर भी मन दे रहा है। मन निमित्त है, तो प्रश्न कौन उठा रहा है? कई बार साइलेंट में बैठने पर अनुभव सा होने लगता है, फिर लगता है यह भी धोखा है, मन बार बार धोखा देता है। सृष्टि में आने के बाद से हम अपने आप को भूल गए, ऐसा लगता है। बोलने को शब्द नहीं मिलते। क्या शब्दों का सहारा लिया जाए, और बोला क्या जाए? (P6-0040)
  38. समझ बढ़ाने की बात हुई, पर समझ अपने हाथ में है ही नहीं। हाथ में होती तो कब का विकसित कर लिया होता। जिज्ञासा भी भीतर से अपने आप उपजती है, विचार अपने आप उठता है, और किसी समय कोई विचार आता ही नहीं। फिर तो चाहत हो गई, और चाहतों में फंस जाएंगे। एक संकल्प छोड़ने के लिए क्या करना है? (P6-0043)
  39. स्वप्न, जागृत और सुषुप्ति ये तीन अवस्थाएं हैं। जो आत्मज्ञानी पुरुष हैं, क्या उन्हें भी वैसे ही स्वप्न आते हैं जैसे हमें दिन भर की क्रियाओं से, या पहले कभी हुई बातों से आते हैं? किसी और के सानिध्य में सुना है कि स्वप्न आते ही नहीं। यहां आने से पहले मैं किसी और से जुड़ा था, अभी भी जुड़ा हूं, और उनका कहना यही है। तुलना करता घूम रहा हूं। ध्यान और साधना का मार्ग वे बताते हैं, विचार जहां फंसे हैं वहां टीवी स्क्रीन की तरह चित्र चलता है। इस प्रश्न का उत्तर चाहिए, नहीं तो भीतर प्रश्नचिह्न बना रहता है। (P6-0045)
  40. प्रश्न पूछते पूछते जब उत्तर मिल चुके तो ध्यान एक पत्ते पर चला गया। हाथ पत्ता छूने लगा। लगा कि प्रकृति ने यह उदाहरण खुद खड़ा कर दिया, नहीं तो यह समझ पैदा ही नहीं होती। उस समय विचार नहीं उठा, आंख ने देखा और हाथ उधर चला गया। प्रतिदिन खाना खाते समय भी हाथ का निवाला अपने आप मुंह तक चला जाता है, शरीर से अपने आप। क्या बिना विचार के यह क्रिया हो जाती है? (P6-0052)
  41. जब साधक आत्मचिंतन के लिए बैठता है, तो क्या चिंतन करे, क्या मनन करे, क्या सोच-विचार करे, जिससे आत्मचिंतन हो, आगे उन्नति हो, आत्मकल्याण हो और तत्व का अनुभव हो जाए? वीडियो बीच में कट जाते हैं, इसलिए जो सोलह बातें बताई जाती हैं, उनका एक छोटा पैंफलेट या पुस्तक हो, जिसे जेब में रखकर बार-बार देख सकूं, तो ज्यादा लाभ हो। मैं झुंझुनू के पास से आया हूं। आज सोलहवां दिन है। ग्रंथों में पढ़ा है कि आत्मा है, पूर्ण है, पर वह ज्ञान अनुभव में कैसे उतरे? घर और संबंधों का चिंतन चलता रहता है। बैठकर ऐसा क्या सोचूं, क्या मनन करूं, कि मूल की ओर बढ़ूं और अनुभव हो जाए? (P6-0062)
  42. बैठते ही अपने आप ज्ञान की बातें उठने लगती हैं। पहले केंद्र पर लोगों के प्रश्नों का जो उत्तर दिया, अब लगता है उससे बेहतर उत्तर देना चाहिए था। ऐसे विचार आते हैं तो क्या करूं? (P6-0107)
  43. विचार, चित्त और चेतना में क्या फर्क है? और साधना में हमें क्या प्रधानता देनी है? (P6-0125)
  44. शिव और शक्ति पर आपके विचार क्या हैं? (P7-0071)
  45. वर्तमान में जो भी कर रहे हैं, उसमें कोई विचार नहीं होता, लेकिन बाद में उस कार्य पर विचार अपने आप होने लगता है। ऐसा क्यों होता है? (P7-0128)
  46. हम दुष्कर्म और अंदर आने वाले विचारों से निकलना चाहते हैं, पर पैर-पैर पर गिरते हैं। ग्रंथों में पढ़ा है कि गुरु हमारे किए हुए सारे कर्म काट देगा और हमें सच्चे मार्ग पर चलाएगा। हमसे बन नहीं पा रहा, इसीलिए गुरु की जरूरत है। हम क्या करें, जब हमसे हो ही नहीं रहा? गुरु किसे मानें, शरीर को या शब्द को? और जब गलत काम होने लगता है, तो क्या वहां गुरु अपनी पावर से हमें हटा लेगा? रस में ऐसे लिप्त हो जाते हैं कि लगता है बुद्धि काम ही नहीं करती। (P7-0142)
  47. बेईमानी एक तरफ की बात है, पर आपका क्या विचार है? हम अपने घर में मूर्तियां रखते हैं। क्या इनका हम पर कोई प्रभाव पड़ता है? (P7-0182)
  48. किसी काम को करता हूं तो अपेक्षा आ जाती है। मैं अपेक्षा ना करूं, फिर भी अपेक्षा वाले विचार आते हैं। क्या करूं? (P8-0007)
  49. बाबूलाल को घर-परिवार की याद आ रही है। विचार तो चलते रहते हैं। कुछ यादें खींचती हैं, प्रभावित करती हैं। जब उन विचारों के साथ होता हूं तो बहुत भारी दुख होता है। क्या करूं? (P8-0018)
  50. अचेतन मन में जो डर के विचार हैं, उनसे कैसे ठीक हों? और यह डर के विचार उसमें कैसे बैठे? (P8-0053)
  51. क्या सजगता परम बुद्धिमत्ता है? ईमानदारी और सजगता में भेद क्या है? विचारशील रहें या सहज रहें? विचार की क्या हद होनी चाहिए? (P9-0081)
  52. विचारशील कर्म सही है। कितनी हद तक विचार करें, और कितनी हद तक कर्म करें? विस्तार से समझाइए। (P9-0086)
  53. महाराज जी, मैंने भांग के नशे में एक बार देखा कि विचार रुक गया, सब कुछ साफ, फुल एचडी में दिख रहा था, और कोई विचार पैदा नहीं हो रहा था। वह अनुभव क्या था? (P9-0141)
  54. महाराज जी, मैं देख पाया कि मैं विचार था ही नहीं। मन में समा गया, खाली, मैं सब अच्छे से देख पा रहा था। वह क्या है? (P9-0143)
  55. नेपाल में मेरा चित्त बहुत जाता है, पर मन इधर ही है, क्योंकि यहां बैठने से आत्मसमझ बढ़ रही है। नेपाल की याद आती है। वहां जाकर मुक्त होकर इधर आकर बैठूं, या वहीं रहकर रोज उसका सामना करूं, कौन अच्छा है? दोनों तरफ खिंचाव है, विचार बहुत आते हैं, तबीयत भी खराब होती है, फिर भी लगता है समझ बढ़ रही है। (P9-0183)
  56. निर्विकार होने के लिए भीतर के काम-विचार कैसे छोड़ें? मेरे भीतर काम-विचार आते हैं। कई बार विचार होते हैं और कई बार खुद सोच रहा होता हूं। (P10-0032)
  57. मैं आपको काफी महीनों से सुनती हूं। आपके मार्ग पर चलती भी हूं। पर छोटी-छोटी बातों में बेईमानी हो जाती है। बातचीत में तब पकड़ नहीं पाते, बाद में विचार आता है कि गलत बोला। यह समझ कैसे बढ़ाएं? (P10-0033)
  58. साधना करते वक्त विचार आएंगे। विचारों को देखना है या जाने देना है? (P10-0040)
  59. कोई बड़ा कार्य करने में डर लगता है कि कहीं फेल ना हो जाएं, लोग क्या कहेंगे। ऐसे विचार से कैसे बचें? (P10-0072)
  60. गुरुदेव, डॉक्टर ने कहा कि हकलाहट कम करने के लिए बोलना शुरू करना होगा। क्या मैं लोगों के विचारों पर तर्क-वितर्क कर सकता हूं, ताकि वे मुझे गुस्से में हकला कहें और धीरे-धीरे मेरी हकलाहट खत्म हो जाए? (P10-0088)
  61. गुरु जी, क्या आप भी अपने विचारों को पिरोने के लिए कोई किताब लिखेंगे? (P10-0144)
  62. (कुटिया में साधक) घर पर जो पुरानी आदत थी, उसके विचार यहां तीन-चार दिन से नहीं आ रहे, बस सपने में आते हैं; घर पर वह विचार खींच लेता था। ऐसा क्यों? और वहां जाकर कैसे बचूं? (P10-0195)
  63. मैं परमात्मा से एक होना चाहता हूं। विचार, अपेक्षा और वासना में क्या अंतर है, और एकांत में साधना करते हुए इनका कैसे उपयोग करूं? (P11-0040)
  64. विचार, वासना और कल्पना में क्या अंतर है, और एकांत में साधना में इनका कैसे सदुपयोग करें? (P11-0077)
  65. मैं अकेले में विचार देख रहा था, तो देखा कि मैं खुद ही गलत विचार कर रहा था। पता चलते ही मैंने नाम जप किया और ध्यान डायवर्ट हो गया। क्या यह नॉर्मल है? (P11-0132)
  66. सब कहते हैं ध्यान में जो विचार आएं उन्हें देखो, दृष्टा बनो — पर दृष्टा बना नहीं जा रहा। 15 साल से एक बात (चोट) है जो जा ही नहीं रही; सात समुंदर पार भागा, फिर भी पीछा नहीं छोड़ा। क्या करूं? (P11-0168)
  67. हम गंदे विचारों में जल्दी चले जाते हैं, फिर पछताते हैं। इससे कैसे बाहर आएं? (P11-0178)
  68. सारे दिन विचार और भाव चलते रहते हैं, और मैं अपने भाव के अनुसार उन्हें बल देती रहती हूं कि मेरी जिंदगी में ऐसा होना चाहिए। फिर जब वो परिणाम रूप में आता है तो मैं डगमगा जाती हूं, कर्म में भी डगमगा जाती हूं। तो मैं भाव में अपने आप को कैसे चेक करूं और उस भाव को कैसे दृढ़ करूं कि फिर वहां न हिलूं? (P12-0120)
  69. गुरु जी, मानसिक राग-द्वेष नहीं छूट रहा। विचार को सोचना भी तो प्रतिक्रिया देना है ना? (P12-0188)
  70. गुरु जी, कई बार विचार आता है कि कोई बात नहीं, धीरे-धीरे पार उतर जाएंगे। पूरी ईमानदारी से जीवन जीने में घर-परिवार का भरण-पोषण भी मुश्किल से होगा, दुनियावी तकलीफें सहनी पड़ेंगी, तो मन पीछे हो जाता है कि एक-दो-चार जन्म और लग जाएंगे; ज्ञान तो आ ही गया, ईमानदारी-सत्कर्म-सत्संग पर चलते रहेंगे, धीरे-धीरे कल्याण हो जाएगा। (P13-0042)
  71. प्रभु, आप जैसे संतों की इस पूरे विश्व को आवश्यकता है। मैं आपके वीडियो भक्तों को शेयर करता हूं; सब कहते हैं कि आपकी और एक दूसरे स्वामी जी की विचारधारा एक जैसी है। (P13-0048)
  72. गुरु जी, क्या मात्र अंतर्मुख होकर अपने विचारों को देखने से आसक्ति, द्वेष, काम, क्रोध, अहंकार समाप्त हो सकते हैं, या साथ में ईमानदारी-सत्कर्म भी हो? (P13-0179)
  73. गुरु जी, ध्यान में निर्विचार होना — क्या ये सही है? कभी बैठते हैं तो कोई विचार नहीं, बड़ा गजब का आनंद होता है, उठने का भी मन नहीं करता। (P14-0042)
  74. गुरु जी, कई बार मैं ऐसे आनंद में बैठा रहता हूं — ना कोई चमक, ना कोई विचार — पता नहीं ये कौन सी स्थिति है? (P14-0043)
  75. मुझे कुछ नहीं चाहिए, लेकिन दूसरों की सेवा का विचार रहता है — क्या ये चाहत गलत है? (P15-0065)
  76. गुरुदेव भगवान, विचार जो चलते हैं वह अलग है, और जो मन बताता है वह अलग है? (P15-0139)
  77. ना चाहते हुए भी विचार में गड़बड़ होती रहती है। जो चीज आज तक सीखी है उसे छोड़ना चाहते हैं, पर बार-बार आदत से वही आ जाती है — जैसे स्वास पर नाम का सुमिरन मिला था, अब ध्यान में बैठता हूं तो वह अपने आप चालू हो जाता है। यह छूटेगा कैसे? (P15-0190)
  78. मन और बुद्धि से परे कैसे जाएं? और गुरु जी, मन सीधे आ जाता है या मन से पहले विचार आता है? विचार से पहले क्या आता है? (P16-0127)
  79. गुरु जी, ध्यान करने पर मैं शून्य में नहीं पहुंच पाता। जागने पर विचार कम आते हैं, मगर ध्यान करने बैठूं तो एक विचार जाता है तो दूसरा आ जाता है — ध्यान में विचारहीन कैसे हों? (P17-0031)
  80. गुरु जी, कहा जाता है कि नाम जप से मन पर ठहराव आता है — क्या नाम जप से विचार रुक जाते हैं और पिछले कर्म कटते हैं? (P18-0047)
  81. गुरु जी, जीवन अनित्य है, जगत अनित्य है, विचार चंचल और अनित्य हैं, जीवात्मा शाश्वत सत्य है — उसे निज स्वरूप में कैसे पहुंचाएं, और व्यवहार में यह कैसे हो? (P18-0061)
  82. गुरु जी, ध्यान करते वक्त मन में परेशानी और घबराहट होती है — मन इतने विचार क्यों देता है, और स्थिरता कैसे बने? (P18-0094)
  83. गुरु जी, मन अशांत है, सिर्फ गलत विचार आते हैं — क्या करें? (P18-0103)
  84. गुरु जी, मैं मन के विचारों से परेशान हूं, मुझे मन से मुक्ति चाहिए। (P18-0107)
  85. गुरु जी, विचार सूक्ष्म हो जाने से क्या होता है? और आत्मज्ञान के बाद शरीर, मन और अंतःकरण में कैसे परिवर्तन आते हैं? (P18-0169)
  86. गुरु जी, चित्त कभी राग में जाता है कभी द्वेष में, और मन बिना हमारे चाहे रेंडम कहीं भी घूमता है, ऑटोमेटिक विचार आते हैं — इसे कैसे संभालें? क्या विचारों को रोकना है? (P18-0171)
  87. गुरु जी, आप आत्मज्ञान को उदाहरणों से समझाते हैं, पर उदाहरण भी संसार से, मन की स्मृति से आते हैं, वे तो सिर्फ तर्क और विचार हैं, सत्य नहीं — फिर उनसे आत्मज्ञान कैसे? (P19-0021)
  88. गुरु जी, मैंने अनुभव किया कि विचारों से परे होकर मैं सिर्फ इंद्रियों से आने वाली जानकारी को देखने वाला हूं। तो क्या मैं इन सबसे अलग हो गया? (P19-0091)
  89. गुरु जी, विचार कैसे रुकें? (P20-0098)
  90. गुरु जी, जब हम बैठते हैं, अपने में होने का प्रयास करते हैं, तो मन में अलग-अलग विचार चलने लगते हैं — क्या करें? (P21-0136)
  91. गुरु जी, अतीत के विचार तो परेशान करते ही हैं; साथ में जैसे कल ट्रेन पकड़नी है या कहीं जाना है, तो उस कारण भी रात को नींद नहीं आती — ऐसा क्यों? (P22-0013)
  92. महात्मा जी, मैं जब भी परमात्मा का नाम जप करता हूं या ध्यान में होता हूं तो मुझे अपने गुरु के प्रति बुरे विचार आते हैं; ऐसा बार-बार होता है। ऐसा क्यों होता है? मैं इससे मुक्त होना चाहता हूं। (P22-0021)
  93. गुरु जी, समझ के स्तर से क्या शरीर का दर्द ओवरलुक हो पाता है? जैसे आज पूरे दो घंटे सत्संग में बैठकर सुनते रहे तो दर्द की उपेक्षा हो गई। मानसिक सहन तो समझ में आता है — विचारों और इच्छाओं की उपेक्षा कर सकते हैं — पर शारीरिक सहन में समस्या है। (P22-0048)
  94. गुरु जी, कभी दिमाग में कोई विचार चलता है तो मन उसके साथ एक हो जाता है, फिर उस विचार पर डिसीजन लेने में कन्फ्यूजन आता है — हम सिलेक्शन नहीं कर पाते कि सही क्या है, गलत क्या है। (P22-0067)
  95. गुरु जी, कभी जीवन में किसी को जीवन खत्म करने का विचार आ जाए, तो क्या करे? (P22-0098)
  96. गुरु जी, मैं रोज ब्लैक कॉफी पीती थी, पर यहां चाय-कॉफी छूट गई, उसका विचार भी नहीं आया — यह मुझे चमत्कार लग रहा है। (P22-0102)
  97. गुरु जी, ध्यान के बारे में मेरा प्रश्न है — जैसे गौतम बुद्ध ने ध्यान की विधि की और उस विधि से तर गए; और बैठते हैं तो विचार ही चलते रहते हैं। (P22-0165)
  98. गुरु जी, उपलब्धि के बाद भी लोगों ने भोजन मांगा — भूख लगी, भूख का विचार आया, तभी भोजन मांगा। तो विचार से मुक्त कैसे होते हैं? (P23-0022)
  99. गुरु जी, जो अपने आप में रह पाते होंगे, उनको विचार नहीं आते होंगे? क्या विचार पूर्ण रूप से रोके जा सकते हैं? (P23-0116)
  100. गुरु जी, क्या हमारा अतीत और भविष्य अभी के समय में मौजूद है, या यह सब हमारे दिमाग का बनाया हुआ एक काल्पनिक विचार है? क्या समय एक भ्रांति है या एक सीधी रेखा की प्रक्रिया? (P23-0179)
  101. गुरु जी, मन विचारों में चला जाता है। इससे निकलने का प्रयास कैसे करें? (P25-0065)
  102. गुरु जी, मन के नेगेटिव विचारों से मुक्ति कैसे पाऊं? (P25-0066)
  103. गुरु जी, दूसरों के विचारों में मेरी ऊर्जा लग जाती है, टाइम वेस्ट होता है। क्या करूं? (P25-0075)
  104. गुरु जी, आत्मिक चिंतन में क्या करना है, किन विचारों पर चिंतन करें? (P25-0091)
  105. गुरु जी, गुरु और शिष्य की बातचीत में कोई बात हमें समझ में न भी आए, फिर भी क्या गुरु-शिष्य के बीच शब्दों के अलावा भी कुछ होता है, जिससे विचार बदलते हैं? (P25-0104)
  106. गुरु जी, जो चीजें मेरी इंद्रियों ने देखीं, चखीं, सुनीं, वो मेरे अंदर संग्रहित हो गईं, और वो जरूरत में काम करती हैं। तो जो मन है, क्या वही हमारे विचारों को चलाता है? (P25-0116)
  107. गुरु जी, जब हम साधना में बैठते हैं तो जो विचार आते हैं, हम फिर उनकी जड़ में जाते हैं कि उसके पीछे राग है या द्वेष है या और कोई दोष है — क्या उसका ऐसे पता लगाना पड़ता है? (P25-0123)
  108. आत्मचिंतन के दौरान विचारों के प्रति प्रतिक्रिया ना देने पर अंदर से खालीपन का एहसास होता है, डर भी लगता है और घबराहट भी होती है — तो क्या करें? (P26-0010)
  109. गुरु जी, कई बार हम एक तरफा डिसीजन लेकर आगे बढ़ जाते हैं, फिर सफलता नहीं मिलती तो विचार आता है कि वह राह पकड़ी होती तो ज्यादा अच्छा रहता। क्या यह अपने प्रारब्ध के हिसाब से होता है? (P26-0072)