पैसा और काम-धंधा — योगी गुरु जी के प्रश्नोत्तर
इस पृष्ठ पर “पैसा और काम-धंधा” विषय से जुड़े 127 प्रश्न हैं, जो जिज्ञासुओं ने सत्संग में योगी गुरु जी से पूछे। किसी प्रश्न पर क्लिक करके योगी गुरु जी का पूरा उत्तर उनके अपने शब्दों में पढ़ें, वीडियो के साथ।
- गुरु जी, कभी लगता है कि मैं (साधना के लिए) वहां बैठा हूं और मेरी गाड़ी कोई दूसरा चला रहा है, या मेरी कमाई कम हो जाएगी जो किसी के काम आ सकती थी। क्या करूं? (P1-0011)
- गुरुदेव, मैं जरूरत में जीता हूं। पर पिताजी के पास पैसा है फिर भी वे पैसे के लिए लालायित रहते हैं, और पत्नी की जरूरत तो पूरी कर लेता हूं पर उसकी इच्छाएं पूरी नहीं कर पाता। क्या करूं? (P1-0105)
- गुरु जी, जब से समझना शुरू किया, भविष्य की चिंता थी — सुरक्षा, जीवन चलाने और समाज में चलने के लिए (धन की) जरूरत पड़ेगी। अब कम हो गई है, लेकिन है। (P1-0151)
- जब मैं पैसा, शोहरत, मान बढ़ाना चाहता था तो नहीं बढ़ रहा था और मैं ज्यादा परेशान था। अब मैं मान, पैसा, ऐश नहीं चाहता, लेकिन वह अपने आप बढ़ रहा है। इसमें क्या होता है? (P1-0193)
- महाराज जी, एक तरफ धरती पर पानी और पेड़ खत्म हो रहे हैं, केमिकल वाला अनाज मिल रहा है, फिर भी मनुष्य बिल्डिंग और पैसे में लगा है। यह कैसी दिशा बन रही है? (P2-0020)
- कृपया युवाओं के लिए कुछ बोलिए — उनके विद्यार्थी जीवन और नौकरी के बारे में। (P2-0121)
- महानगरों में रहने वाले लोग, जो आपसे जुड़े हैं, अब समझ रहे हैं कि नौकरी में ईमानदार तो रहे, पर सत्कर्म नहीं किया — मुंह लक्ष्य की ओर रहा, पर कदम नहीं बढ़े। पर महानगरों में पक्षियों-चींटियों को दाना डालने की जगह या सच्चे जरूरतमंद ढूंढना मुश्किल है; भिखारी भी ₹1 दो तो ऐसे देखते हैं जैसे अपमान कर दिया। वहां हम क्या सत्कर्म कर सकते हैं? (P2-0198)
- गृहस्थ जीवन में डर और असुरक्षा सताती रहती है — कल मेरा क्या होगा। जवानी में दौड़कर पैसे, घर, बैंक बैलेंस, जानकारियां और सोशल सर्कल इकट्ठे किए ताकि सुरक्षित महसूस हो, फिर भी एकांत या दुख में लगता है कोई किसी का नहीं। आपकी व्यक्तित्व में जो निश्चितता-स्थिरता आई है, वह मैं अपने अंदर कैसे लाऊं? अपूर्णता से पूर्णता की तरफ जल्दी कैसे बढ़ूं? अध्यात्म में बाहर जैसी प्रगति नहीं दिखती, तो डर लगता है कहीं मैं नई दुनिया तो नहीं बसा ली — मार्गदर्शन करें। (P2-0199)
- गृहस्थ में काम-धंधा भी देखना होता है; आजकल किताबें-पत्रिकाएं-सोशल मीडिया में नकली-असली का भ्रम बहुत है। प्रयाग में नागा साधु पैसे मांगते देखे, आईटीन बाबा आदि — फक्कड़-दिगंबर पहचान नहीं आती। गुरु की खोज और शास्त्र कैसे चुनूं कि वैराग्य धूमिल न हो, कोई बेवकूफ न बना दे, और नब्बे साल घूमते रहकर भी न पहुंचूं जैसी हालत न हो? गृहस्थ में वैराग्य की प्रचंडता कैसे बनी रहे? (P3-0003)
- स्टेशन आदि पर मांगने वालों को पैसे दें? (P3-0056)
- ऑफिस में काम करवाने के लिए थोड़ा झूठ (सीनियर ने कहा urgent) — गलत? नौकरी छूटने का डर? (P3-0060)
- दुकान वाली बात तो ठीक, पर हम गृहस्थ में परिवारजनों के बीच रहते हैं, जहां तन-मन-धन तीनों तरह से लेनदेन चलता ही है। अगर हम उन्हें धन से सपोर्ट करते हैं तो उम्मीद रहती है कि वे लौटाएं, पर मांगते नहीं बनता और घुटन होती है। ऐसे हिसाब-किताब से कैसे निकलें? (P3-0086)
- (वही प्रश्न दोबारा, क्योंकि बहुत लोगों का ऐसा प्रश्न रहता है) रिश्ते-व्यवहार में सामने वाला मुझसे पैसे की इच्छा रखता है; मैं कह नहीं सकती कि पैसा लौटा देना या मैं मदद नहीं कर सकती — भावनात्मक बात हो जाती है। बदले में वह पैसा तो नहीं लौटाता, पर मेरे लिए गिफ्ट लाता है, ज्यादा केयर करता है, जबकि मुझे उसकी जरूरत नहीं (मेरे पास कपड़े बहुत हैं, फिर भी वह कपड़े लाए जा रहा है)। लगता है यह रिश्ता लेने-देने की बुनियाद पर टिका है। ऐसे में मुझे क्या करना चाहिए? (P3-0087)
- गृहस्थी में बैलेंस कैसे बनाएं — संन्यासी वाली सीधी बात पर हम एकदम नहीं आ सकते। क्या रिश्तों की बुनियाद में मुझे यह देखना पड़ेगा कि वहां मेरी जिम्मेदारी है या वह व्यक्ति मेरा पैसा यूज़ करके कुछ और कर रहा है? अगर जिम्मेदारी बनती है तो क्या पैसा न देखकर, अपने से बचाकर भी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए? (उदाहरण: किसी का टिकट कराया — क्या उससे स्तर उठता है?) (P3-0088)
- (लाइव) अगर ईमानदार और बेईमान के बीच कोई डील होती है, तो क्या उस बेईमान के पैसे का ईमानदारी के पैसों पर कोई गलत प्रभाव तो नहीं पड़ेगा? (P3-0157)
- (लाइव) गुरु जी, कोई भोजन के लिए पैसा मांगता है, तो उसे भोजन कराना है, पैसा देना है या मना करना है? (P3-0159)
- (कुटिया में साधक) आज भ्रष्टाचार शिष्टाचार बन रहा है, (बेईमानों को) पुरस्कार मिल रहे हैं; ईमानदारी से पुलिस की नौकरी करना बहुत तकलीफ में आ रहा है, हम शिक्षकों को भी बहुत तकलीफ हो रही है — हमें दिखाना पड़ता है कि हम ईमानदार हैं। समूह ज्यादा है, बड़े अफसर कहते हैं नीचे से ऊपर तक की व्यवस्था ऐसे ही चलनी चाहिए। ऐसे में क्या करें? (P3-0182)
- (लाइव) गुरु जी प्रणाम। मेरे घर में चोरी की कमाई और मांस-मदिरा का माहौल है। मैं खुद मेहनत की कमाई खाता हूं और इन सबसे दूर रहता हूं, पर रहना उसी घर में पड़ता है। क्या ऐसे माहौल में मेरी और मेरी पत्नी की भक्ति बच पाएगी? (P3-0198)
- (लाइव) गुरु जी, सत्कर्म करने के लिए पैसों की जरूरत पड़ती है। तो मेरा भाव बनता है कि मैं वर्तमान नौकरी छोड़कर ज्यादा पैसे वाली नौकरी की तैयारी करूं, जिससे मुझसे और ज्यादा सत्कर्म होगा। क्या यह सही है? (P4-0010)
- (लाइव) नर्मदे हर गुरु जी। क्या अपनी कमाई का 10% अपनों की कुटिया में दे सकते हैं? मेरी प्राइवेट नौकरी है, सैलरी लिमिट में है, लेकिन इच्छा है कि मेरे द्वारा कुछ सत्कर्म हो। (P4-0015)
- (लाइव) गुरु जी प्रणाम। क्या स्टॉक मार्केट (शेयर बाजार) में काम करना उचित है? क्योंकि इसमें अभी पैसा लगाओ और अभी कमाओ वाला नियम है। मैं पिछले 5 साल से कर रही हूं। क्या यह बेईमानी है? (P4-0024)
- (कुटिया में साधक) जो आपका वीडियो चलता है, अगर हम रोज देखते हैं, तो क्या हमें (चैनल को) कुछ देना चाहिए? क्या कोई सब्सक्रिप्शन/मेंबरशिप है, जिससे लाइव देखने पर आपको पैसे मिलते हैं? एक लड़का (चैनल पर) सुपर थैंक्स लगाता है — क्या वह आपको मिलता है? (P4-0068)
- (कुटिया में साधक, पेंशनर) मैं जहां रहता था वहां धन से सेवा करता था — खाने-पीने के अलावा बाकी पैसे मैं रखता नहीं था, सेवा-सत्संग में लगा देता था। परिवार से विवाद हुआ तो निकल गया, आठ महीने बागेश्वर में रहा, वहीं आपका वीडियो मिला और तुरंत सब समझ में आ गया। अब यहां आ गया तो मेरा पैसा किसी काम में नहीं आ रहा; परिवार वाले उसे खा जाएंगे। मैं चाहता हूं कि वह पैसा यहां सेवा में लगा दूं — किसको, कैसे दूं? (P4-0132)
- (वही साधिका) मैं बहुत सी चीजों से मुक्त हो गई — ईर्ष्या, समाज, रीति-रिवाज, अंधी पूजा-पाठ, मां-बाप का मोह। लेकिन आर्थिक डर पर आकर अटक जाती हूं — अगर मेरे पास पैसे नहीं हुए तो जिंदगी कैसी होगी? ईमानदारी से (ज्ञान के) वीडियो बनाती हूं तो लोग सुनते नहीं, कमाई घट गई है। इस डर को कैसे खत्म करूं? (P4-0189)
- (वही साधिका) आपने अपनी यात्रा कैसे की — आप पहले क्या करते थे, और फिर एकदम से ऐसा जीवन कैसे बना लिया? पैसे की चिंता कैसे नहीं हुई? (P4-0190)
- (कुटिया में साधिका) मुझे भजन आता है; संतों ने कहा कथा सीखो — क्या कथा सीखूँ? भजन-कथा का पैसा आए तो लेना चाहिए? इस लाइन में जाना है या नहीं? (P5-0021)
- (कुटिया में साधिका) यहाँ व्यवस्था कैसे चलती है जब साधकों से पैसे नहीं लेते? बाहर से डोनेशन? नकली चैनल / नंबर से कैसे पहचानें असली? (P5-0026)
- जहां हूं खुश नहीं, निकलना चाहता हूं पर धन नहीं — पहले धन कमा लूं या सीधे निकल लूं? (P5-0080)
- युवा उम्र में ध्यान जाना चाहिए? पैसे के साथ साधना कैसे? आलस साधना में कैसे रुकावट? (P5-0124)
- बच्चों के भविष्य के लिए पैसा कमाना चाहिए? बच्चों के बारे में सोचना सही? (P5-0126)
- पूर्ण ईमानदारी नौकरी-बोलचाल में कैसे रखें जब शब्दों में घोल हो जाए? (P6-0021)
- भोपाल से इंदौर जनरल टिकट पर आया। बोगी भरी थी और इम्प्लांट की वजह से नीचे नहीं बैठ सकता था, इसलिए स्लीपर में जगह देखकर बैठ गया। क्या यह बेईमानी हुई? दुकान पर तंबाकू बेचता हूं, खुद नहीं खाता, क्योंकि उसे गलत मानता हूं। ग्राहक दूसरी दुकान चले जाएंगे तो क्या करूं? शादी नहीं की, बच्चे नहीं हैं। घर वाले उम्र और गर्मी कहकर रोकते हैं। आध्यात्म में बीस-पच्चीस साल हो गए, स्वामी राम के सत्संग में भी रहा, फिर भी वह जगह नहीं छूटती। दुकान का सामान पिछले साल भी पड़ा था। बात करने से मना है, जरूरत में बोल सकता हूं क्या? दुकान पर मच्छर आते हैं, अहिंसा नहीं रहती। कमाई के लिए दुकान जरूरी लगती है। हैंडीकैप की पेंशन एक हजार मिलती है। दो महीने से ज्यादा बाहर रहूं तो रद्द करने की बात होती है। गायों को खाना देता हूं तो पड़ोसी परेशान होते हैं। मुझे क्या करना चाहिए? (P6-0074)
- जो परिवार छोड़कर केवल ध्यान लगाता है, आकाशवृत्ति से रहता है, धन नहीं जोड़ता, उसे गाली और मार भी मिलती है। उसका क्या होता है? कृष्ण ने अर्जुन को आत्मभाव में टिकने के लिए भी कहा था, तो कर्म का सिद्धांत क्यों बताया? अर्जुन आत्म तत्व में कैसे स्थिर हुए? और क्या मैं शुद्ध आत्मा हूं कहना भी एक विधि है, जिससे कल्याण नहीं होता? (P6-0077)
- साधना काल में ऐसी कौन सी परीक्षाएं आती हैं, जिनका पहले से अनुमान नहीं हो सकता? जगह से निकाल दिया जाए, तौलिया चुराने का इल्जाम लग जाए, या धन और आश्रम का लालच दिया जाए, तब साधक कैसे रहे? (P6-0081)
- क्या हमारे हाथ में सच में पावर है? परिवार में अपने को मालिक कहते हैं, पर बात नहीं मानी जाती और अपने ही पैसे पर गुलाम हो जाते हैं। क्या यही गुलामी है, और फिर क्या करना चाहिए? (P6-0085)
- हरियाणा से आई बहन साधना में लगातार बैठने से पैर और शरीर के दर्द में बहुत परेशान थी। कहा गया था, या तो बैठो या चली जाओ, उसके बाद दर्द चला गया। साधना में दर्द और पीड़ा को कैसे देखें? गुरु कठोर क्यों होता है? शरीर, धन और समझ की ताकत को संचित करें या कहां लगाएं? (P6-0101)
- मजदूरी करती हूं। कपड़ा कंपनी में कभी अच्छा कपड़ा निकल जाता है, पैसे देकर नहीं देते, मुफ्त में ले जाओ कहते हैं। पड़ोस और घर वाले साड़ी, चूड़ी या खाना दे देते हैं। नहीं लूं तो मुंह फुलाते हैं और विरोध करते हैं। दिया हुआ लेना चाहिए या नहीं? (P6-0103)
- नागपुर से आई मां कहती हैं, धन, गहना और बेटा-बेटी से लगाव छूट गया लगता है। पति की जंजीर थी, उसे छोड़कर आई हूं। मौन मिल गया, काम भी छोड़ दिया। परिवार वापस बुलाता है। इक्कीस दिन का टारगेट है। क्या मैं मुक्त हो गई? जाऊं या यहीं रहूं? आखिरी इच्छा और बेड़ी का क्या संबंध है? गुरु क्यों चाहिए? (P6-0105)
- प्रशांत गुप्ता कहते हैं, मैं कर्म तो करता हूँ पर अपने को करता मान लेता हूँ। ऑफिस का काम करता हूँ, पैसा नहीं मिलता या कम मिलता है, तो नाखुश रहता हूँ। इससे बाहर कैसे आऊँ? (P6-0186)
- राजेश की समझ को लेकर ये घटनाएं सामने हैं। एक बार रिचार्ज कहा, तो पैसे दूसरे नंबर के अकाउंट में चले गए, और कहा कि आप देख रहे थे, जबकि कर रहा खुद था। एक बार बड़वानी से आए, सामने हजार रुपये दे दिए गए, फिर भी रास्ते में पेट्रोल के पैसे नहीं हैं, ऐसा नहीं बताया। पेट्रोल खत्म हुआ, खेत की तरफ जाना पड़ा, फिर गांव से व्यवस्था करनी पड़ी। जब कोई सिखाने को मिला है, तो कब तक सिखाएं? और ईमानदार, सच्चा इंसान आवेश, जज्बात और अकड़ की वजह से बार-बार क्यों लुटता और भटकता रहता है? (P7-0076)
- हम सरकारी नौकरी से अभी रिटायर हुए हैं। अब उस पैसे का क्या करना चाहिए? मैं उसे सत्कर्म में लगाना चाहती हूं, पर घर के दूसरे प्राणी सहमत न हों तो क्या करें? उस पैसे पर मेरा हक है या उनका? जरूरतमंद पात्र है या नहीं, यह कैसे पता चले? कई संस्थाएं सेवार्थ में लगी रहती हैं, क्या उनके माध्यम से भी यह कार्य हो सकता है? वृद्धाश्रम में जो गलत देखा, उसे बताना चाहिए या नहीं? (P7-0092)
- शरीर को कैसे स्वस्थ रखें, ताकि जहां धन नहीं, शारीरिक बल चाहिए, वहां सेवा कर सकें? दिनचर्या और खानपान कैसा हो? जोड़ों का दर्द उम्र के साथ हो रहा है। और कहीं सहयोग दें तो क्या देखें? पारदर्शिता कहां हो? (P7-0093)
- ईमानदारी की बात तब कठिन हो जाती है, जब स्थिति आती है। मान लो एक सरकारी विभाग है। सिस्टम चलाने के लिए कहीं ना कहीं बेईमानी में शामिल होना पड़ जाता है। परिवार भी चलाना है, आदमी उसी नौकरी पर निर्भर है। सरकार तो तय तनख्वाह दे रही है, पर आदमी सिस्टम के बीच में पिस जाता है। तब क्या करे? (P7-0148)
- एक साधक पूछता है, पिछले सत्संग सुनकर लगता है कहीं मैं भगोड़ा तो नहीं हूं। माता-पिता अस्सी के ऊपर हैं, पैतृक संपत्ति अभी अपने जिम्मे रखी है, हमें कुछ नहीं दिया। चार भाई हैं, दो बड़े भाइयों को कुछ नहीं दिया, छोटे भाइयों को दिया है। मेरे दो बेटे और एक बेटी हैं, सबसे छोटा पच्चीस पार कर गया, पढ़े-लिखे हैं, बड़े बेटे की नौकरी और शादी हो गई, दो की शादी बाकी है। पत्नी, छोटा बेटा और बेटी कहते हैं जब तक शादी ना हो जाए तब तक मत जाओ। नौ साल कमाई मां को दी। क्या मैं भगोड़ा हूं? (P8-0014)
- मेरा मुंबई में छोटा व्यापार है। कभी सामान कम दाम में लेकर ज्यादा दाम में बेचता हूं। आप कहते हैं ईमानदारी से कर्म करो। तो क्या कम में खरीदकर ज्यादा में बेचना बेईमानी है? (P8-0015)
- मैं पैसों का योगदान नहीं कर सकती। क्या मैं आपका चैनल बनाकर आपके ज्ञान को लोगों तक पहुंचाकर अपने गुरु का साथ दे सकती हूं? क्या यह मेरा सत्कर्म होगा? (P8-0139)
- यहां साधना के लिए आना है। क्या पैसे लगेंगे? (P8-0174)
- एक परिवार में पिता बेईमान है। वह सिर्फ पैसों से प्यार करता है, और पावर से घर वालों को अपने तरीके से चलाता है। घर में सब कुछ उसकी मर्जी से होना चाहिए। ऐसे पिता के सामने क्या करें? (P9-0026)
- ईमानदारी और सत्कर्म, यह मूल मंत्र बताया, बहुत अच्छा लगता है। लेकिन यह सदा टिकता क्यों नहीं? विस्तार से समझाएं। अगर सड़क पर पैसा पड़ा दिखता है, तो लालच आ जाता है। (P9-0042)
- दुनिया की भागदौड़ में लोग अपने आप को ही सही बोलते हैं। सरकारी नौकरी के लिए नाम मात्र के पद होते हैं और नौकरी की चाहत वाले लाखों में हैं। अब क्या करना चाहिए? (P10-0013)
- गुरु जी, क्या हम बोल सकते हैं कि आर्मी वालों की कमाई ईमानदारी की होती है? (P10-0056)
- गुरुवर, जो पैसे वाली घटना आपने बताई थी, वह मेरे साथ परसों हुई। मुझे लगा कि कम पैसे करने वाली बात गलत है और मैंने पूरे पैसे उसको दे दिए। (P10-0079)
- गुरु जी, मैंने जिनका फायदा उठाया है, वे लोग मुझसे यह अपेक्षा रखते हैं कि पैसे कमाओ, चाहे बेईमानी करके। तो मैं जरूरत में कैसे जिऊं? (P10-0124)
- मैंने कभी जरूरत में किसी के पैसे धोखे से छीन लिए थे; आज समझ आया कि गलत था। अब उस भाव में जाकर उसे कैसे ठीक करूं? क्या उसके बदले कई गुना सत्कर्म में लगा दूं तो वह कट जाएगा? (P11-0081)
- कुछ गुरु धन, विद्या, मंत्र देते हैं, कथा-स्तोत्र से मोक्ष की बात करते हैं; क्या सिर्फ सत्कर्म से ही आत्मज्ञान हो जाएगा? (P11-0121)
- (एक साधक) धन की कमी नहीं, पर पत्नी नहीं रही, बच्चे विदेश में हैं, घर भूत बंगला लगता है। अध्यात्म में भी भ्रम ही भ्रम दिखता है; जिसके पास गया, उसने लूट लिया। और बच्चे कहते हैं धन भी मत खर्च करो। जीने का आधार ही नहीं है, क्या करूं? (P11-0139)
- (वही साधक) आज धन-वैभव खूब है, फिर भी घुटन क्यों है? और मेरे बच्चे मेरी इज्जत क्यों नहीं करते? (P11-0152)
- क्या आर्थिक दान के बिना आपके यहां रहना संभव है? क्या श्रमदान करके भी रह सकते हैं? मैं सरकारी नौकरी में हूं, पर नौकरी में मन नहीं लगता। (P12-0022)
- अगर जेब में पैसा है तो ही लोग अपना मानते हैं; बिना पैसे दुनिया में कोई भी अपना नहीं है। क्या यह सच्चाई है? (P12-0024)
- अगर हम सिर्फ सच्चाई और ईमानदारी को अपना लें और कोई भी काम करें — चाहे नौकरी हो या बिजनेस — और सच्चाई-ईमानदारी का साथ न छोड़ें, तो क्या आत्मज्ञान प्राप्त हो जाएगा? (P12-0069)
- जो पैसे हम कमाते हैं, क्या उसमें "मेरा" का भाव नहीं आना चाहिए? वह मैं कैसे दूर करूं? (P12-0077)
- सांसारिक चीजों में तो समझ आता है — छोटी नौकरी छोड़ी, ज्यादा पैसा मिला तो वहां शिफ्ट हो गए और पुरानी याद ही नहीं आती। लेकिन अध्यात्म में आपका ज्ञान कहता है कि तुझे यहां से निकल जाना है, अपने घर जाना है — वो मुझे कंटीन्यूसली याद नहीं रहता, फिर मैं वहीं धुनने चला जाता हूं। तो वो सतत कैसे याद रखूं? (P12-0130)
- (लाइव में) मैं तो बहुत ईमानदार था, पर लोगों की नजरों में मुझसे अच्छे वे निकले जो (पैसे के लेन-देन में) कुख्यात थे। ईमानदारी बड़ी जिम्मेदारी है — एक ईमानदार से बड़ा कोई तपस्वी नहीं। (P12-0178)
- गुरु जी, किसी का पैसा ना देना बेईमानी है। यदि वह पैसा लेना भूल जाए, तो क्या यह बेईमानी है? (P13-0110)
- कड़ी मेहनत के बाद पैसा कमाते हैं पर अपने लिए या किसी अच्छे कार्य में खर्च नहीं कर पाते। ऐसा क्यों होता है और अपने मन को कैसे बदलें? (P13-0116)
- ऐसा ही कुछ कुत्तों के साथ भी हुआ। मैं बाहर के कुत्तों को खिलाता था; फिर उनकी आबादी बढ़ी, पैसा कम पड़ा, तो मैं उन्हें इग्नोर करने लगा। जानवरों को खिलाते हैं तो आनंद की प्राप्ति होती है। (P13-0153)
- महाराज, आप कह रहे हो कि इसी में ढूंढ लो परमात्मा को, पर हमें तो उसकी जरूरत ही नहीं लगती — हम तो पैसे, गाड़ियां, बंगले ढूंढेंगे। और शरीर व आजीविका चलाने के लिए संसार में दूसरों से व्यवहार भी तो करना है। तो परमात्मा को क्यों ढूंढें? (P13-0163)
- गुरु जी, एक व्यापारी कोई मोबाइल या शर्ट असली दाम से ज्यादा बताकर बेचता है — क्या ये बेईमानी है? (P14-0062)
- गुरु जी, वेद, उपनिषद, गीता आदि के नाम पर जो लोगों से पैसा उगाह रहे हैं, उनको कैसे रोकें? (P14-0089)
- क्या आत्मज्ञानी भी नौकरी-पेशा करता है? (P14-0154)
- आपका भी बहुत जल्दी बड़ा आश्रम बनने वाला है; प्रत्यक्ष ज्ञान लेने वाले ही आपको अप्रत्यक्ष रूप में धन प्रदान करेंगे — ऐसा मेरा मानना है। (P15-0028)
- गुरु जी, क्या मंदिर में पैसा चढ़ाने पर पाप तो नहीं लगता? (P15-0165)
- मुझे आत्मज्ञान हो गया है, अब आध्यात्मिक ज्ञान बांटने की इच्छा है, लेकिन मां-पिता सभी खिलाफ हैं। मेरा ना नौकरी में मन है, ना किसी चीज में। (P16-0025)
- महाराज जी, रोज नौकरी पे जाके ऐसा लगता है जैसे गुलामी की जिंदगी जी रहा हूं, ऊब गया हूं। जीवन में नयापन कैसे लाया जाए? (P16-0037)
- गुरु जी, प्रेम-धन के लिए क्या करें? (P16-0038)
- गुरु जी, एक जगह सत्संग में सुना था — भक्त ने पूछा कि ज्यादा से ज्यादा धन कैसे आकर्षित करूं, अमीर कैसे बनूं। महात्मा जी ने कहा कि दरिद्र की ऊर्जा अलग है और पैसे वाले की अलग; अमीर बनना है तो अमीर की संगत करो, उसकी मदद करो, तो वह ऊर्जा आपकी तरफ आकर्षित होगी; और गरीब की मदद करोगे तो दरिद्र की ऊर्जा आकर्षित होगी। क्या यह बात सही है? (P16-0147)
- आपने बताया कि कुटिया से पहले लोग आपको लाखों देना चाहते थे पर आपने नहीं लिया। मैंने तो पैसे को इतनी वैल्यू दी क्योंकि वो शरीर को सुख-सुविधा देता है और मेरा मान बढ़ाता है — पेट भर जाए तो बचे में मान खड़ा कर लूं। और आप 15-16 साल की उम्र में घर से निकले, एक कपड़े में फक्कड़ संन्यासी की तरह रहे, आपका कोई गुरु भी नहीं रहा। तो मैं ये बात अपने स्वभाव में लाना चाहूं तो शुरुआत कैसे करूं — क्या मैं भी सब कुछ छोड़ के एक कपड़े में रहूं? (P17-0022)
- गुरु जी, आप बहुत सारे आश्रम गए हो। मैं आर्ट ऑफ लिविंग गया, वहां सब पैसों से ही होता है — क्या यह सही है? मैं वहां जाऊं? क्या वहां जाकर भी हम अटक जाते हैं? मुझे कहां जाना चाहिए? (P17-0046)
- गुरु जी, सबको अलग-अलग धन, शरीर, रूप और बुद्धि का स्तर क्यों मिला है? (P17-0066)
- गुरु जी, अगर अज्ञानता में ही कोई शक्ति, ऊर्जा या पैसा मिल जाए तो क्या होता है? (P17-0068)
- गुरु जी, संसार के लोगों से इतनी मार खा चुका हूं कि अब किसी में रस नहीं रहा। सारी दुनिया बेईमान लगती है — टीवी खोलो तो झगड़े, पॉलिटिक्स, भक्ति चैनलों पर भी कुंडली-पैसे का धंधा। क्या करूं? (P17-0107)
- गुरु जी, कहते हैं आमदनी का 10% दान दो तो हजार गुना लौटकर आएगा — इस 10% के चक्कर में पैसा बेकार कामों में चला जाता है। सही दान कैसे करें? (P17-0119)
- गुरु जी, सब सामान तो पैसे से मिलता है — तो खाली कैसे करें? (P17-0162)
- गुरु जी, मैं अपने घर में काम करने वाले या कर्मचारी को तय पैसे देकर पूरी सच्चाई से व्यवहार करता हूं, लेकिन मुझे पता है कि उसकी क्षमता इससे ज्यादा है; उसे आगे बढ़ाऊं तो वह मेरे पास काम नहीं करेगा। क्या उसे वहीं तक सीमित रखना ईमानदारी है? (P18-0134)
- गुरु जी, जो शरीर से, बुद्धि से या पैसे से बलवान है, उससे हमें भय क्यों लगता है? (P18-0158)
- गुरु जी, नौकरी/पोस्ट छोड़कर साधना करूं? जरूरत कभी पूरी नहीं होती। (P19-0075)
- गुरु जी, मेरे पास ना शरीर की ताकत ना पैसा — निकलना चाहूं कैसे? (P19-0079)
- गुरु जी, कोई तीसरा नेत्र खुलवाकर गड़ा हुआ धन देखना चाहे तो? (P20-0024)
- गुरु जी, सरकारी नीलामी और शराब से आया पैसा ईमानदारी का कहलाता है या बेईमानी का? (P20-0036)
- गुरु जी, शराब से कमाया पैसा किसी आध्यात्मिक संस्थान में लगाया जाए तो क्या संस्थान पर नेगेटिव असर होगा? (P20-0050)
- नौकरी में लोग चापलूसी और टांग खींचकर गिराने की कोशिश करते हैं, मुझे चापलूसी पसंद नहीं, पर नौकरी जाने का खतरा रहता है — क्या करूं? (P20-0111)
- संसारी चाहता है परिवार, नौकरी, सुविधाएं सब वैसे ही रहें और आनंद भी मिल जाए — क्या दोनों का तालमेल हो सकता है? (P20-0112)
- क्या आप हर दिन संकल्प करके निकलते थे कि आज खाना या पैसा नहीं लेना? साधना में आपने कौन से नियम बनाए? (P20-0113)
- मेरी ईमानदारी की कमाई 10 लाख है, उसमें से 5 लाख ज्ञान प्रसारण में लगाना चाहूं तो मन डरता है — कल अस्पताल की जरूरत पड़ी तो? इस डर से कैसे निकलें? (P20-0114)
- लालच को कैसे मारें — आपने जरूरत होते हुए भी पैसा क्यों नहीं लिया? (P20-0116)
- आपने कहा था कि ज्ञान प्रचार की गाड़ी डोनेशन के पैसे से नहीं लेंगे — क्यों? (P20-0136)
- पैसे के लिए जिंदगी लगाना या जिंदगी के लिए पैसा — आप क्या मानते हैं? (P20-0150)
- मैं ईमानदारी से काम करती हूं, पर बॉस बुलाते थे तो डर लगता था कि निकाल न दें — नौकरी में डर कैसे जाए? (P20-0152)
- गुरु जी, पहले मैं नौकरी करता था पर वहां हर समय बेईमानी करनी पड़ती थी, तो मैंने छोड़ दी। अब बूढ़ी मां और छोटे भाई की जिम्मेदारी है, कोई काम सेट नहीं हो रहा — जिम्मेदारियों को तो नहीं छोड़ सकते ना? (P21-0067)
- गुरु जी, मेरे प्रभाव में आकर एक व्यक्ति ने दूसरे व्यक्ति को पैसा दिया। उस वक्त लगा कि मैंने अच्छा किया, लेकिन बाद में उसने पैसा कभी वापस नहीं किया, और मैं बीच में थी, इसलिए मुझे बहुत धक्का लगा। पहले तो मैं सहायता करने के लिए बीच में गई, अब उल्टा हो गया — अब मेरा आखरी भाव क्या रहना चाहिए? (P21-0152)
- गुरु जी, आपने कहा कि हमारी योग्यता के अनुसार हमें मिलता है — तो हम पहचानें कैसे कि हमारी योग्यता क्या है? पैसे के लेन-देन की योग्यता नहीं, आत्म साक्षात्कार के लिए अंदर की योग्यता — वो कैसे समझें? (P21-0169)
- गुरु जी, आपने जीवन जीने के मूल सिद्धांत बताए — ईमानदारी और सत्कर्म, और सत्कर्म में जरूरतमंद की सेवा। लेकिन जरूरतमंद की पहचान कैसे करें? हैदराबाद में एक परिवार ने कहा मालिक ने निकाल दिया, घर जाना है, भूख लगी है — खाना मत खिलाओ, पैसे दे दो। तभी दो लोग आकर बोले इनका रोज का यही काम है, तो हम आगे निकल गए। एक बच्ची ने 5 किलो आटा मांगा तो दुकान वाला बोला यह इसे यहीं बेच आएगी। ऐसे में विश्वास कैसे करें? (P22-0083)
- गुरु जी, मैं दो-तीन ऑथेंटिक एनजीओ से जुड़ी हूं और हर महीने योगदान देती हूं, लेकिन पता नहीं कैसे मेरा नंबर दूसरे एनजीओ के पास चला गया — वहां से कॉल आती हैं कि बच्चे की हालत बहुत खराब है, जो हो सके दे दो। मुंबई, नासिक, उत्तराखंड से कॉल आती हैं, हम हैदराबाद से वहां जा नहीं पाते। अगर पैसे दान कर दिए और वे दुरुपयोग करें तो क्या उसका दोष हमें भी लगेगा? (P22-0085)
- गुरु जी, अगर कोई 9 महीने यहां आकर रहे, तो जिसके पास पैसा है, उसे खाने-पीने का खर्च तो देना चाहिए? (P22-0105)
- गुरु जी, अगर कोई जरूरतमंद की सेवा ना करके मानवतावश करता है — जैसे डॉक्टर ने माता जी का इलाज किया, माता जी पैसे तो दे सकती थीं, फिर भी उन्होंने नहीं लिया? (P22-0131)
- गुरु जी, अधिकारी पैसों के बिना काम नहीं करता और नहीं दूंगा तो काम बिगाड़ देगा — तो पैसा देकर काम करवा लूं तो क्या बेईमानी होगी? (P22-0175)
- गुरु जी, आपने एस्ट्रोलॉजी में करियर शुरू किया था, उसमें नाम और पैसा था — उसका भ्रम आपने कैसे छोड़ा? क्या ग्रह-नक्षत्र के प्रभाव बदले नहीं जा सकते? (P22-0181)
- गुरुदेव, ट्रेन की बोगियों में विकलांग लोग आते हैं, पैर से दिखते भी हैं कि विकलांग हैं, लेकिन बाहर जाने के बाद मद का सेवन जैसे अनर्गल काम करते हैं — तो उन्हें पैसा देना क्या सही होता है? (P23-0064)
- गुरु जी, लोग बहुत लालची हो गए हैं, पैसों के लिए मानवता भी बेच देते हैं। जीवन है तो रोजाना कई लोगों से लेनदेन भी होता है। ऐसे लालची लोगों से स्वयं को कैसे निकालें, इस राग-द्वेष से कैसे मुक्त हों? (P23-0132)
- गुरु जी, जब माता-पिता के भीतर संतान के लिए प्रेम न होकर केवल धन का लालच और क्रोध रह जाए, तो अपनी मानसिक शांति के लिए उनसे दूरी बनाना सही है या गलत? (P23-0138)
- गुरु जी, शारीरिक, आर्थिक और मानसिक — तीनों पीड़ा हमारे पास रहती हैं। शरीर ठीक हो तो पैसे से पीड़ित होते हैं, शरीर और पैसा दोनों सही हों तो भी मानसिक पीड़ा तो रहती है। इन तीनों के बारे में बताइए। (P23-0168)
- गुरुदेव, अगर कोई पुलिस वाला पैसे ले रहा है और आम पब्लिक दे रही है, तो क्या लेने वाला और देने वाला दोनों बेईमान हुए? (P24-0064)
- गुरु जी, पैसे हैं नहीं — सेवा कैसे करें और आत्मज्ञान कैसे प्राप्त करें? (P24-0082)
- गुरु जी, वेश्यावृत्ति सही है या गलत? अगर कोई पैसों के लिए करे तो? (P24-0145)
- गुरु जी, पैसे वाले के आगे पुलिस भी बिकती है, न्यायालय भी बिकता है, रिपोर्ट गलत लिखी जाती है — तो सही होकर भी अपने आप को सही सिद्ध करना कहां हो पाता है? (P24-0148)
- गुरु जी, क्या गुरु की पहचान इस भाव से होती है कि जिसे मिट्टी का ढेला और सोना-धन एक समान नजर आता है? (P24-0161)
- गुरु जी, विश्लेषण में बैठता हूं तो एक चीज खटकती है — किसी से मुझे पैसे लेने थे, बहुत बार फोन किया पर उसने दिए नहीं, एक प्रकार से धोखा हो गया। उसका बिजनेस में लॉस हुआ था, बहुत लोगों का कर्ज उस पर है। उससे निकलने के लिए मैं क्या करूं — उम्मीद छोड़ दूं या कानूनी कार्रवाई करूं? (P24-0181)
- गुरु जी, अब उस व्यक्ति की नजर से देखें — जिसने पैसा लिया और स्थिति-परिस्थिति के कारण दे नहीं पा रहा, और देने वाला क्रोध में है कि सब काम कर रहे हो, हमारा ही देने के लिए नहीं है। इस सिचुएशन में क्या लेने वाला गलत है? (P24-0184)
- गुरु जी, पहले मैं पैसे के लिए जा रहा था, अभी ज्ञान के लिए जा रहा हूं — क्या वो भी एक कामना नहीं है? (P24-0197)
- गुरु जी, क्या यह बात सही है कि "भूखे भजन ना होय गोपाला" — यानी पहले अपने आप को धन से मजबूत करें, उसके बाद ज्ञान के लिए निकलें, ताकि किसी से मांगना ना पड़े? (P25-0035)
- गुरुदेव, हमें धन का बल और शरीर का बल नहीं चाहिए। हम बस आपके साथ अपनी समझ का बल बढ़ाना चाहते हैं, क्योंकि यही सर्वश्रेष्ठ है। (P25-0077)
- गुरु जी, मैं समझ से पैसे और बिजनेस से मुक्त हो गया हूं, अब उसमें मेरा कोई अटैचमेंट नहीं रहा। उससे जो भी पैसा आ रहा है, मुझे वह नहीं चाहिए। क्या फिर भी कोई भरपाई बाकी है? (P25-0095)
- गुरु जी, समझ से मैं पैसे और बिजनेस से मुक्त हो गया — ना कोई अटैचमेंट है, ना कोई जरूरत। पर शारीरिक संबंधों में, काम वासना में या बच्चों के मोह में यह चीज सिर्फ समझ से पूरी नहीं हो रही। क्या करूं? (P25-0096)
- गुरु जी, अगर बेईमानी का पैसा बच्चों के पास जाएगा, तो वो तो सत्कर्म कर ही नहीं पाएंगे, क्योंकि पैसा बेईमानी का है? (P25-0144)
- गुरु जी, आप बेईमानी का पैसा लेने से क्यों मना करते हो? आपको बहुत से लोग पैसे देने आते हैं, फिर भी आप पूछते हैं कि यह पैसा बेईमानी का तो नहीं है। (P25-0162)
- गुरु जी, दुकानदार जो सामान बेचकर कमाता है, वो पैसा बेईमानी का तो नहीं? (P25-0167)
- गुरु जी, पैसे उतने नहीं हैं — तो आश्रम में खाकर रहने से कर्ज तो नहीं चढ़ेगा? इसलिए मैं चाहता हूं कि हर एक काम मुझे ही दें, दिन भर काम करवाएं, रात को आत्मचिंतन करूंगा। (P26-0050)