आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

दुख और सुख — योगी गुरु जी के प्रश्नोत्तर

इस पृष्ठ पर “दुख और सुख” विषय से जुड़े 137 प्रश्न हैं, जो जिज्ञासुओं ने सत्संग में योगी गुरु जी से पूछे। किसी प्रश्न पर क्लिक करके योगी गुरु जी का पूरा उत्तर उनके अपने शब्दों में पढ़ें, वीडियो के साथ।

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  1. गुरु जी, मैं शरीर को सुंदर बनाकर और ज्ञान के द्वारा मान-सम्मान, प्रभाव और नाम पाने की इच्छा में लिप्त हो गया हूं। छोड़ने का संकल्प लेता हूं, फिर वहीं चला जाता हूं, और करने के बाद दुख होता है। (P1-0071)
  2. लेकिन योगी जी, अध्यात्म में भी ‘काउंटर’ बहुत हैं — बहुत आश्रम हैं, बहुत प्रतिस्पर्धा है। कहीं जाओ तो उनके नियम में रहो, उनकी माला रटो, तिलक लगाओ, बड़ की 11-21 परिक्रमा करो — पैर दुखने लगते हैं, पर कुछ अनुभव नहीं होता। बहुत जिंदगी ऐसे ही ट्राई एंड टेस्ट में निकल गई। तो क्या बार-बार ऐसे ही ट्राई एंड टेस्ट करती रहूं? (P1-0090)
  3. गुरु जी, उठते-बैठते, सोते-जागते, काम में, सुख और दुख में — सबसे ऊंची स्थिति क्या है? (P1-0092)
  4. गुरु जी, आपके पैर, कान, हाथ में इतनी तकलीफ है — अब भी आप इतने कष्ट और दुख क्यों सह रहे हैं? (P1-0119)
  5. दुख कैसे दूर होगा? (P1-0136)
  6. गुरु जी, जो लोग (भवसागर से) निकल जाते हैं, उनके लिए प्रेम और सुख भरा कोई और लोक बना हुआ है क्या? (P2-0032)
  7. भगवन, मैं महसूस करना चाहता हूं कि जो आंतरिक सुख, जो परम आनंद आप हर समय जी रहे हैं, वह मुझे बस क्षण भर के लिए हो जाए। उसकी अनुभूति कैसे लूं? (P2-0073)
  8. गुरु जी, रस लेने के लिए नहीं, बल्कि किसी को सुख पहुंचाने के उद्देश्य से बोलना — क्या यह मुक्ति की यात्रा में सहायक है या बाधक? (P2-0075)
  9. गुरु जी, (कुटिया में) वाईफाई लगाने वाले ने जो गलत काम किया, उसे लेकर अगर हम दुखी हो रहे हैं, तो क्या यह द्वेष हुआ? (P2-0102)
  10. महाराज जी, मेरा स्वयं का अनुभव है कि संसार में दुख ही दुख है। (P2-0109)
  11. आपने कहा कि हम कर्ता नहीं हैं, सब करने वाला ईश्वर है। फिर अपराध (और दुख) क्यों? मुझे क्यों महसूस नहीं होता कि कर्ता मैं नहीं हूं? (P2-0113)
  12. मैं पिछले पांच सालों से आध्यात्मिक मार्ग पर चल रहा था, लेकिन कोई प्रगति नहीं हुई; अब मेरे सारे दोस्त इस बारे में नकारात्मक बातें बोलते हैं, और मैं बहुत दुखी हूं। (P2-0135)
  13. गुरु जी, ज्ञान, पवित्रता, प्रेम, शांति, सुख, आनंद और शक्ति — क्या ये आत्मा के कवच हैं? विस्तार से बताएं। (P2-0152)
  14. कई गृहस्थ माताएं-बहनें हैं जिनके बच्चे और पति उन्हें पूरी आजादी देते हैं, काम के लिए नौकर भी रख देते हैं, कि आप पूरी तरह अध्यात्म में रहो; फिर भी वे आधा समय वैराग्य और भगवान की बातें करती हैं और आधा समय घर के हर काम में दखल देती हैं — बहू क्या कर रही है, रसोई में तेल-घी ज्यादा क्यों। घर वाले भी दुखी हो जाते हैं। ऐसा व्यक्ति अगर मेरे परिवार में हो, तो हम उसके लिए क्या कर सकते हैं? (P2-0170)
  15. गृहस्थ मान लेते हैं कि मैं फंस गया — घर वालों ने शादी कर दी, अब बच्चे हो गए, किसके सहारे छोड़कर जाऊं; बच्चे बड़े हो जाएं तो कहते हैं अभी तो इनकी शादी हुई है। बाहर से बहुत दुखी, मजबूर दिखते हैं — मैं बैल बन गया, सबके लिए किया, अपने लिए वक्त ही नहीं निकाला। उनका असली चेहरा कौन सा है? (P2-0177)
  16. (साधना के कठिन दिनों में) जब आपके कपड़े भी ऐसे (फटे-पुराने) थे, तब आप अपने आप को कैसे संभालते थे, उस समय क्या सोचते थे? दुख तो बहुत होता होगा? (P2-0179)
  17. गृहस्थ जीवन में डर और असुरक्षा सताती रहती है — कल मेरा क्या होगा। जवानी में दौड़कर पैसे, घर, बैंक बैलेंस, जानकारियां और सोशल सर्कल इकट्ठे किए ताकि सुरक्षित महसूस हो, फिर भी एकांत या दुख में लगता है कोई किसी का नहीं। आपकी व्यक्तित्व में जो निश्चितता-स्थिरता आई है, वह मैं अपने अंदर कैसे लाऊं? अपूर्णता से पूर्णता की तरफ जल्दी कैसे बढ़ूं? अध्यात्म में बाहर जैसी प्रगति नहीं दिखती, तो डर लगता है कहीं मैं नई दुनिया तो नहीं बसा ली — मार्गदर्शन करें। (P2-0199)
  18. अपने आप में होने की यात्रा में अटैचमेंट याद आकर सताने लगा — पहले नहीं सताता था। विचारों में दुख, उपलब्धि के बाद भी विचार रहेंगे क्या? (P3-0021)
  19. सुधरने गए पर डांट लगे तो दिल दुखे — अहंकार से कैसे बाहर? आवेश आने पर क्या करें? (P3-0068)
  20. (लाइव) आप तीन-चार घंटों तक कैसे बैठ सकते हो, शरीर कैसे साथ देता है? मेरा शरीर 30-40 मिनट स्थिर बैठने पर ही जवाब देने लगता है, एक-एक अंग दुखने लगता है। कोई उपाय बताइए। (P3-0140)
  21. (लाइव) प्रणाम गुरुदेव, मेरा नाम योगेश कुमार है। बहुत पहले आपसे ऑनलाइन जुड़ा था, आपका पुराना शिष्य हूं। पिछले दो साल से आपके पास आने का सोच रहा हूं, पर कभी पहुंच नहीं पा रहा; बहुत दुखी हूं, अब अपराध (बोध) बहुत लग रहा है। (P4-0016)
  22. (लाइव) प्रणाम योगी जी। क्या वास्तव में कोई ऐसी अवस्था है जहां दुख, बंधन और अज्ञान पूर्णतः समाप्त हो जाते हैं और केवल शांति, ज्ञान और आनंद ही शेष रहता है? (P4-0083)
  23. (लाइव) योगी जी प्रणाम। बहुत से साधक आध्यात्मिक मार्ग में कल्पनाओं में जीते हैं। क्या वास्तव में हमारा कल्याण केवल दुख के नाश से होगा, ना कि किसी चमत्कार से? (P4-0092)
  24. (कुटिया में चार दिन रहे एक साधक-शिक्षक ने अपना अनुभव बताया) यहां इतने कम संसाधनों में भी साधक सुखी रहते हैं, आवश्यकता में जीते हैं; और हम आवश्यकता से अधिक में जीकर भी बेचैन रहते हैं। यहां की व्यवस्था के बारे में आप क्या कहेंगे? (P4-0172)
  25. (वही साधिका) सूरज एक है, मैं उसका ताप अपनी क्षमता के अनुसार सहन कर पा रही हूं। जो मुझे दुख-तकलीफ दे, मुझे उससे पार होना है। पर दुख की तो कोई चाह नहीं करता, आदमी हमेशा सुख की कामना करता है — फिर दुख क्यों आता है? (P4-0196)
  26. (वही साधिका) मैं अब जिस तरीके से बात करती हूं, मेरी मम्मी से बात ही नहीं हो पाती, वो सुनना भी नहीं चाहतीं। तो क्या बात ना करूं? अगर लगता है कि वो दुख में हैं, तो क्या उन्हें निकालने की कोशिश न करूं? (P4-0200)
  27. (वही साधिका) क्या आप एक ही कपड़े में रहते हैं? जब वह फटेगा तब दूसरा पहनेंगे? एक कपड़े को भी तो धोना-सुखाना पड़ता होगा। (P5-0001)
  28. (वही साधिका) कोई गुरु कहते हैं कि मुझे पूरी दुनिया का कल्याण करना है, घर-घर तक पहुंचना है — क्या वाकई वो लोगों के लिए करते हैं या अपने लिए? यह भी तो एक कामना हो गई? और (जैसे) हमने मरते हुए बिल्लों-कुतिया को उठाकर पाला — कहते हैं सब अपने लिए ही करते हैं, उनकी तड़प देखकर दुख तो हमें ही होता है। (P5-0003)
  29. (वही साधक) गीता में कृष्ण ने कहा कि दुख से मुक्ति पानी है तो मोह छोड़ो, लालच, कामना छोड़ो। जैसे इन (साधिका) की मम्मी से बात नहीं हो पाती और इन्हें दुख है — तो यह मोह है ना? उम्मीद और मोह में क्या अंतर है? और आप अपनी बहन का दुख सुनकर भी कह देते हैं 'रह अपने दुख में' — आपको उसके दुख से दुख नहीं होता, आपने यह डिटैचमेंट कैसे किया? (P5-0014)
  30. (साधिका) जीव हत्या / हलाला देखकर दुख होता है — हम क्यों नहीं रोक पाते? क्या गर्दन रखकर बलि रोकें? सोशल वर्क कैसे करें? (P5-0024)
  31. आत्मा और सुख में इतना अंतर क्यों? (P5-0088)
  32. क्या किस्मत में बच्चों का सुख नहीं लिखा? गलत शब्द सुनकर जल्दी आवेश कैसे बचे? (P5-0160)
  33. दुख का कारण ज्यादा कामना / कुछ पाने की इच्छा है? (P5-0182)
  34. एक संसारी को फिलहाल एक ही कारण नजर आ रहा है कि मैं इसी से दुखी हूं, प्रपंच नजर नहीं आता। जैसे पड़ोसी पसंद नहीं और मन में आता है कि यह मर जाए, आज यह मर जाए, कल वो मर जाए। उस कारण तक चला भी जाऊं तो अपने स्वभाव को कैसे सुधारूं? वह भाव गंदी आदत लगता ही नहीं, मैं यही जानना चाहता हूं। अगर अपनी स्थिति बुरी लगती ही नहीं तो कैसे चेक करूं? परिवार से जानकारी मिली कि उनसे रंजिश है, दुश्मनी है, उन्होंने हमारे किसी को मारा, मैंने खुद नहीं देखा, फिर भी भाव बन गया कि यह मर जाना चाहिए, मैं ही उड़ा दूं, जबकि वो भी योजना बना रहे होंगे। गली में रेड़ी वाले का रेट ना भाए तो बद्दुआ, गाली और अपमान तक निकल आता है। मैं खुद परेशान हूं और वो अड़चन भी डाल रहे हैं। ऐसे में अपनी स्थिति कैसे जानूं, यह भाव क्यों उठ रहा है, और मैं इसमें क्यों लिप्त हो रहा हूं? (P6-0061)
  35. दुख को कैसे सुलझाएं? दुख से मुक्ति कब और कैसे होगी? (P6-0110)
  36. मैं जीवन में बहुत दुखी हूं। (P6-0139)
  37. क्या भावनाओं को पूरी तरह दबा देना चाहिए, ताकि वे हमें दुख ना दे सकें? (P6-0142)
  38. बलदेव राम पूछते हैं, मेरे अंदर दुखी कौन है? मैं, मेरा शरीर, या जीव? (P6-0185)
  39. प्रेम करने के बाद दुख क्यों मिलता है? (P7-0031)
  40. अध्यात्म में आकर मुझे दुख और सुख दोनों विचलित क्यों नहीं कर पा रहे हैं? कुछ बताएँ। (P7-0035)
  41. आत्मज्ञान होने पर क्या अनुभव होता है? और दिन-प्रतिदिन जो दुख-सुख का घर्षण है, उसके साथ कैसा तालमेल रहे? (P7-0041)
  42. जीवन में सुख-दुख, लाभ-हानि का अनुभव होता ही है, अपनों की चिंता दिमाग में आती ही है। यह जीव भाव कैसे छूटे? (P7-0050)
  43. समाज और परिवार के लिए व्यक्ति सब कुछ करता है। खाना हो तो पहले परिवार खाए, कपड़ा हो तो पहले परिवार पहने, और फिर भी सहना उसे खुद पड़ता है। उस समय गुस्सा आता है, उसे पीना और कंट्रोल करना पड़ता है। क्या ये गुस्सा हमारा स्वभाव है? गुस्सा क्यों आता है, जब हम कुछ कर रहे होते हैं और परिणाम नहीं आ रहा? परिवार को सौ प्रतिशत देते हैं, हमसे अच्छा खाने और पहनने को देते हैं, पर कहते हैं वो काम मत करना जो बहुत दुखाता है। तब गुस्सा होता है, नाराजगी होती है। कितनी बार कोई ये सहेगा? एक दिन टूट जाएगा, रोते हुए कहेगा, जैसे जीना है जियो। न अलग हो सकता है, न हिला सकता है। अगर समझाने के बाद भी कोई छत से कूदने की बात करता है, जानकर खतरा मोल लेता है, तो उस स्थिति में क्या करना चाहिए? (P7-0078)
  44. जिस व्यक्ति का त्याग कह रहे हो, उसका क्या हो जाएगा? जिस वजह से उससे मोह हो गया है, उस मोह का त्याग कैसे होगा? अपनापन कैसे पैदा होता है? जब लगता है कि उसे मेरी जरूरत नहीं, मेरे प्यार की औकात नहीं, फिर भी अपनापन के कारण दुख होता है, तो मोह कैसे छूटे? गलत आदमी का साथ देने से तो उसकी जिंदगी और समाज दोनों खराब होते हैं। हमारा काम समाज को साफ करना होना चाहिए। तब क्या करें? (P7-0079)
  45. एक कुत्ता मर गया था। उस रात आप चैन से सो नहीं पाए, सुबह भी बेचैन रहे। चेहरे पर थकान के साथ ऐसा दुख था, जो हमारे दुख जैसा नहीं। एक कुत्ते के लिए अंदर से इतना प्रेम और तड़प है, तो यहाँ रहने वालों के लिए अंदर से कितना गहरा प्रेम रहा होगा? हम समझ नहीं पाते। गलतियाँ समझ के साथ और बिना समझे होती रहती हैं। कुछ भी हो, हाथ पकड़कर रखिए। (P7-0112)
  46. उनसे नाराज होकर दुखी होता हूं। समझ नहीं आ रहा। क्या ऐसे आध्यात्मिक मार्ग में नीचे गिर जाएंगे? (P7-0172)
  47. बाबूलाल को घर-परिवार की याद आ रही है। विचार तो चलते रहते हैं। कुछ यादें खींचती हैं, प्रभावित करती हैं। जब उन विचारों के साथ होता हूं तो बहुत भारी दुख होता है। क्या करूं? (P8-0018)
  48. ज्ञान, पवित्रता, प्रेम, शांति, सुख, आनंद और शक्ति, क्या यह आत्मा का स्वभाव है? विस्तार से बोलिए। (P8-0090)
  49. आप बोले, दुख चुनो, नर्क चुनो, सुखी रहोगे। इसके नीचे जाओगे, फिर नहीं जाओगे। फिर दुख से नीचे क्या है? (P9-0110)
  50. वाक् सिद्धि होने पर पूरे जगत में सुख-शांति बनी रहे, ऐसा कोई कह दे, तो जानना चाहिए क्या? फिर कर्म? (P9-0117)
  51. गुरु जी, घर वाले मुझे बहुत चाहते हैं, लेकिन मेरा उनसे कोई लगाव नहीं। बार-बार जिम्मेदारी छोड़कर आत्मज्ञान की खोज में भागने का मन करता है। फिर रुक जाता हूं कि घर वालों को क्यों दुख दूं। सही-गलत समझ में नहीं आता। क्या करूं? (P9-0165)
  52. मुझे खुद को साधने पर दुख क्यों मिल रहा है? (P10-0001)
  53. साधक और जिज्ञासु एक बार में साधना में नहीं बैठते। जब बैठते हैं तो शरीर खुजलाने लगता है, रीढ़ और कमर दुखने लगती है, और कहते हैं कि मैं विचलित हो रहा हूं, घुटन हो रही है, बेचैनी हो रही है, समझ नहीं आ रहा। जब प्रपंच और रसपान में रहते हैं तब कोई दिक्कत नहीं होती। यह क्या हाल है? (P10-0006)
  54. गुरुदेव, अभी कुछ दिन पहले जब आपने कुछ खरीदा था और उसने ज्यादा मूल्य लिया था, तो आपने उस घटना से स्वयं को कैसे निकाला? हमारे जीवन में रोज ऐसे लोग मिलते हैं और मुझे उन पर बहुत दुख होता है। (P10-0075)
  55. गुरु जी, मैं तीन साल से ध्यान करती हूं, परंतु फिर भी दुखी हूं। घर से निकल नहीं पाती। मैं इस दलदल से निकलना चाहती हूं। कृपया मार्गदर्शन करें। (P10-0179)
  56. जब हम नियम तोड़कर यहां से भाग जाते हैं, तो क्या गुरु को दुख होता है? (P11-0063)
  57. (कुटिया में सेवक) मुझे अब कोई घुटन, बेचैनी नहीं; बस तब दुखी होता हूं जब मेरी वजह से आपको चिल्लाना पड़ता है — जैसे कल रात कुत्तों के लिए गेट नहीं खोला। मुझे पहले से लग रहा था कि आप बोलने वाले हैं, फिर भी नहीं उठा। (P11-0118)
  58. सुख तब अच्छा लगता है जब कोई लेने वाला होता है; लेकिन वह लेने वाला पैदा क्यों होता है? (P12-0045)
  59. मेरे समाज में कोई किसी गरीब को परेशान करता है या दुख देता है, तो मेरा मन दुखी क्यों होता है? (P12-0098)
  60. बुद्ध और आप — बाहर से तो हमसे कम ही दिखते हो, फिर आप कहां स्थित हो कि इतने आनंदित हो? मैं तो अपना दुख मिटाने आई थी, आप दुख की जड़ पर ही वार कर देते हो। मुझे तो यह भी नहीं पता कि मैं रियल में चाह क्या रही हूं। (P12-0109)
  61. हम बोलते हैं कि हमारे कर्म निर्धारित होते हैं — जो भगवान ने लिखा है वही होगा, हमारे हाथ में कुछ नहीं, चाहे दुख हो या सुख। तो क्या कर्म पहले से ही निर्धारित होते हैं? (P12-0148)
  62. मैं (इस दुख से) कैसे निकलूं? (P12-0184)
  63. गुरु जी, लोग टेंशन भी देते हैं, बातें मारते हैं, मन को दुखी करते हैं। मैं अकेली रहती हूं, तो सामाजिक नहीं बन सकती। (P13-0005)
  64. क्या आप यहां अपने घरेलू दुखों के कारण हैं? (P13-0030)
  65. गुरु जी, क्या गुरु के आशीर्वाद से किसी के दुख-तकलीफ ठीक हो जाते हैं? (P13-0031)
  66. गुरु जी, यह दुख का भवसागर है, दुखदायक है, लेकिन कहीं न कहीं यह अच्छा भी लग रहा है; इसमें रस भी आ रहा है। (P13-0038)
  67. गुरु जी, आपकी माताजी जब बीमार थीं, अंतिम समय में आप उनके पास क्यों नहीं थे? क्या उनको आपको याद करके दुख होगा? (P13-0136)
  68. गुरु जी, आजकल हर एक के पास मोबाइल है; रील देखना, टीवी-फिल्म देखना — इसमें मन बहुत सुख महसूस करता है। मगर अगर आत्मा में परमानंद है, तो मन उसे क्यों नहीं महसूस कर पाता? (P14-0009)
  69. गुरु जी, जैसे युद्ध अर्जुन ने नहीं किया पर हुआ, वैसे बेईमानी भी हम नहीं कर रहे, हो रही है — उसका पता कैसे चले? जैसे किसी दुखी को देख के भी मैं अनदेखा करके सत्संग सुनके चला गया। (P14-0053)
  70. गुरु जी, इंसान को जो भी अवस्था, सुख-दुख, जैसा घर मिलता है, वह सब पिछले कर्मों से होता है — क्या उसे बदला जा सकता है? कोई हर समय मानसिक पीड़ा में रहता हो तो? (P14-0068)
  71. गुरु जी, ज्ञानी का दुख यह क्यों है कि उसकी बात सब सुनते हैं, पर समझते क्यों नहीं? (P14-0085)
  72. जगत में सब भोग हम लेकर आते हैं, फिर दुख क्यों? (P15-0012)
  73. हम इतनी पूजा-भक्ति करते हैं, इतने भाव से करते हैं, लेकिन हमें दुख क्यों है? (P15-0018)
  74. मैं बहुत दुखी हूँ, सब कुछ घर-बार छोड़कर दूर पहाड़ों पर जाना चाहता हूँ और वहाँ भक्ति करना चाहता हूँ। (P15-0055)
  75. गुरु जी, कुछ ऐसा ज्ञान दीजिए कि (दुख) कभी सुनने-देखने को ना मिले। (P15-0076)
  76. आत्मा परमात्मा में मिल जाए तब सुख है, या आत्मा परमात्मा की सेवा करे? (P15-0082)
  77. क्या आत्मा को सुख और दुख होते हैं? (P15-0112)
  78. शरीर के सुख-दुख से ऊपर जाने की क्रिया क्या है? (P15-0194)
  79. गुरु जी, "दुख में सुमिरन सब करें, सुख में करे ना कोय; जो सुख में सुमिरन करे, दुख काहे को होय" — वह सुख, वह सुमिरन क्या है? (P16-0009)
  80. गुरु जी, क्या सब दुखों की एक दवा सत्कर्म और ईमानदारी है? (P16-0013)
  81. गुरु जी, किसी जरूरतमंद को देखकर मन दुखी हो जाता है, पर किसी की खुशियों में मन कोई प्रतिक्रिया नहीं देता। क्या मुझ में कोई दोष तो नहीं है? (P16-0067)
  82. जो व्यक्ति दुष्कर्म करता है, क्या वह प्रकृति के गुण होते हैं या मनुष्य का चुनाव होता है? अगर चुनाव मनुष्य का नहीं, तो मनुष्य दुख क्यों भोगता है? (P16-0130)
  83. गुरु जी, मानव इसलिए तो नहीं बनना चाहते कि मानव में दुख और सुख दोनों आते हैं? राक्षस बनेगा तो उसे सुख ही सुख भोगने को मिलेगा? (P16-0149)
  84. आप कहते हैं कि अगर समझ विकसित कर लो तो दुखी होने की कोई आवश्यकता ही नहीं है। तो ये समझ कैसे विकसित करें? (P17-0010)
  85. कोई आज ये वीडियो सुनकर सोचे कि चलो आत्म-कल्याण करेंगे — तो आत्म-कल्याण क्यों जरूरी है, ये उसे कैसे समझ में आए? कहीं ऐसा तो नहीं कि अशांति और दुख हो रहे हैं, इसलिए दूसरे ऑप्शन पे जंप मार रहे हैं? (P17-0012)
  86. आपने बताया कि कुटिया से पहले लोग आपको लाखों देना चाहते थे पर आपने नहीं लिया। मैंने तो पैसे को इतनी वैल्यू दी क्योंकि वो शरीर को सुख-सुविधा देता है और मेरा मान बढ़ाता है — पेट भर जाए तो बचे में मान खड़ा कर लूं। और आप 15-16 साल की उम्र में घर से निकले, एक कपड़े में फक्कड़ संन्यासी की तरह रहे, आपका कोई गुरु भी नहीं रहा। तो मैं ये बात अपने स्वभाव में लाना चाहूं तो शुरुआत कैसे करूं — क्या मैं भी सब कुछ छोड़ के एक कपड़े में रहूं? (P17-0022)
  87. गुरु जी, जो कुछ प्राप्त है उसे छोड़ना है — तो छोड़ते समय दुख हो तो? और जिसके पास पहले से अभाव है, उसका क्या? (P17-0132)
  88. गुरु जी, क्या सभी तरह की सुख-सुविधाओं और भोगों में रहते हुए भी विरक्त रहा जा सकता है? कैसे? (P17-0173)
  89. गुरु जी, जब सुख और दुख दोनों नकली हैं, तो जीवन किसके सहारे जिएं — कोई ठोस आधार तो चाहिए? और कभी-कभी उस स्थिति में पहुंचते हैं, हमेशा के लिए स्थिर कैसे हों? (P17-0186)
  90. गुरु जी, अगर किसी को ना कहना हो और उसकी भावनाओं को ठेस पहुंचाने का दुख हो (क्योंकि हम उससे प्यार करते हैं), तो ईमानदारी से जीते हुए ना कैसे कहें? (P18-0122)
  91. गुरु जी, किसी से मिलने पर कभी पॉजिटिव वाइब और खुशी, तो कभी अंदर से दुख का भाव क्यों होता है? (P18-0185)
  92. गुरु जी, अगर परमात्मा ने दुनिया बनाई तो सुख की दुनिया क्यों नहीं बनाई? यहां इतना दुख क्यों है? (P18-0187)
  93. गुरु जी, ऋषि-मुनि और सत्संग कहते हैं कि यह जग मिथ्या है, दुखालय है, मृत्युलोक है, यहां से जल्दी निकलो — तो क्या यह सही है? (P18-0188)
  94. गुरु जी, किए हुए बुरे कर्मों को भुगतते हुए दुख कैसे भोगें? (P19-0040)
  95. गुरु जी, योग्यता से अधिक पाने की लालसा, पाप, दुख और गलत कैसे है? 90% लोग योग्यता से ज्यादा पाकर ही मजे में रहते हैं। (P19-0052)
  96. गुरु जी, आप कहते हो आपने जीवन में दुख को ही चुना है। ऐसा क्यों? (P19-0119)
  97. गुरु जी, मेरी पत्नी ने छत के गमलों से भगवान को चढ़ाने के लिए फूल तोड़े, मैंने कहा खिले हुए ज्यादा अच्छे लगते हैं, तो उसे बहुत दुख हुआ। क्या फूल तोड़ने देना चाहिए? (P19-0143)
  98. गुरु जी, ध्यान करने के बाद मैं पहले जैसा ही हो जाता हूं और न करूं तो दुख होता है — क्या करूं? (P19-0189)
  99. गुरु जी, क्या आत्मज्ञान से पहले जीवन में सिर्फ दुख ही लिखा होता है? (P20-0034)
  100. गुरु जी, मुझे संसार से मुक्त होना है — सबको दुखी छोड़कर आनंद कैसे करूं? (P20-0058)
  101. गुरु जी, सिखाई बातें बार-बार भूल जाता हूं और दुख लौट आता है — भूलने पर अपने लिए क्या संकल्प या दंड रखूं? (P20-0063)
  102. सुख और दुख कहां से आते हैं? (P20-0197)
  103. गुरु जी, मेरा दुख बहुत कम है — अपनी बेटी, नाती और दूसरे लोगों को देखकर रियलाइज हुआ कि बहुत लोग मुझसे ज्यादा कष्ट में हैं। (P21-0119)
  104. गुरु जी, हमारी बीमारी, डिप्रेशन — क्या ये हमारे किसी दुख या कर्म के कारण होते हैं? (P21-0140)
  105. गुरु जी, क्या इच्छा ही दुख का मूल कारण है? (P21-0156)
  106. गुरु जी, जीवन में दुख है तो जीना क्यों है? (P22-0007)
  107. गुरु जी, कभी-कभी अपने तरीके से होने के बावजूद भी दुख होने लगता है — ऐसा क्यों? (P22-0011)
  108. गुरु जी, जो हम चाहते हैं वह नहीं मिलता; पर जो चाहा वह मिल भी जाता है तो दुख और बढ़ जाता है, बोरियत और ज्यादा होने लगती है — ऐसा क्यों? (P22-0015)
  109. गुरु जी, किसी को जीवन भर का दर्द हो तो वह क्या करे? क्या साधना से शरीर-जनित दुख का अंत हो सकता है? (P22-0030)
  110. गुरु जी, संतों ने नरक, स्वर्ग, अपवर्ग का जैसा वर्णन किया है, वह सुख की श्रेणी में आता है, लेकिन सत्संग आनंद में ले जाता है — तो क्या सुख के त्याग के बाद ही आनंद प्रकट हो सकता है? क्या सत्संग के अलावा भी कोई आनंद है? (P22-0033)
  111. गुरु जी, कहते हैं वैराग्य में दमन की प्रधानता है और गृहस्थ लोग विवेक की प्रधानता पर चलते हैं; शंकराचार्य जी कहते हैं इसके बाद भी तितिक्षा चाहिए — प्रकृति द्वारा दिए सुख-दुख को ना चाहते हुए भी सहने का सामर्थ्य। हम अभी दमन पर ज्यादा फोकस कर रहे हैं — जैसे दर्द हो रहा है तो उसे महत्व नहीं देना, इच्छा को मार देना — यह दमन है? (P22-0047)
  112. महाराज, सच्चा सुख क्या है? (P22-0055)
  113. गुरु जी, दुनिया में कई चतुर लोग हमें मूर्ख बनाकर लूट लेते हैं, जैसे सीता माता के साथ रावण ने किया, और उसका भुगतान हमें दुख और अशांति से करना पड़ता है। इसे कैसे समझें — क्या यह दया भाव का नुकसान है? (P22-0092)
  114. गुरु जी, परिवार में जो बड़ा होता है, वह पत्नी, बच्चे, पोते-पोतियों से प्राणिक रिश्ते से जुड़ा रहता है। बेटा हजार किलोमीटर दूर है, उसकी कोई परेशानी का फोन आता है — मैं जानता हूं मैं वहां कुछ नहीं कर सकता, जो करना है वहां उसी को करना है — फिर भी वह दुख क्यों होता है? (P22-0097)
  115. गुरु जी, माता-पिता शादी करके खुद परेशान रहते हैं, और बाद में बच्चों की शादी करके उन्हें भी परेशान करते हैं — पता है कि शादी के बाद दुख है, फिर भी जानबूझकर ऐसा क्यों? (P22-0107)
  116. गुरु जी, क्या स्वर्ग-नरक होता है? कहते हैं नरक कुछ होता ही नहीं, सुख विशेष में स्वर्ग और दुख विशेष में नरक है — क्या यह ठीक है? लोग स्वर्ग-नरक की बातें करते हैं, शायद यह भ्रम है? (P22-0111)
  117. गुरु जी, ससुराल वाले हमसे सेवा नहीं करवाते, साथ भी नहीं रखते, अलग कर दिया है, फिर भी कलह खत्म नहीं होता — रिश्तेदार आते हैं और बुराई करते हैं; दुख कैसे खत्म करें? (P22-0189)
  118. गुरु जी, किसी की बातों से और व्यवहार से दुख पहुंचता है, और वह पद में मुझसे बड़े हैं और रोज उनके साथ काम भी करना है — ऐसी स्थिति में क्या करना चाहिए? (P23-0053)
  119. गुरु जी, आप कहते हैं कुछ नहीं चाहिए में आ जाएं — तो जीवन कैसे कटेगा? आम तौर पर तो शरीर और मन की जरूरत पूरी करते-करते जीवन कट जाता है, बड़े दुख मिलते हैं। (P23-0118)
  120. गुरु जी, जीवात्मा जब बहुत दुखी होती है, जैसे लू में जल रही हो, तो इस तरफ भागती है; लेकिन जैसे ही थोड़ी छाया, थोड़ी राहत मिल जाती है, उसकी दबी हुई इच्छाएं निकल आती हैं और वह फिर उन इच्छाओं में भाग जाती है — लू में जो तपा रही थी, वह भूल जाती है। यह क्या माजरा है? (P23-0124)
  121. गुरु जी, कोई दुखी हमें पुकारे और जब हम उसकी मदद करें तो खुद तकलीफ में आ जाते हैं। आगे से दूसरों की मदद कैसे करूं, ताकि उनकी तकलीफ भी मिटा सकूं और खुद भी तकलीफ में न फंसूं? (P23-0141)
  122. गुरु जी, इतने बंधन और अज्ञान बनाया ही क्यों गया कि पूरी दुनिया दुख पा रही है? (P23-0162)
  123. गुरु जी, मन की इच्छा फलीभूत नहीं होती तो दुख होता है। (P24-0046)
  124. योगी जी, 25 साल में तो मैंने गुड़गांव में अपना घर बना दिया था। हमारे नौजवान ऐसे होने चाहिए — शरीर से स्वस्थ लगते हैं, लेकिन अपना दिमाग नहीं खोलते, समझते भी नहीं। तो दुख होता है, क्या करें? क्या फिर इनको समझाना ही छोड़ दें? (P24-0103)
  125. गुरु जी, कहा जाता है कि जो तीनों गुणों — सत, रज, तम — से विचलित नहीं होता और दुख-सुख में समान भाव रखता है, वह आत्मज्ञानी के लक्षण हैं। क्या यह सही है? (P24-0160)
  126. गुरु जी, कई बार ऐसा होता है कि जब कोई आध्यात्मिक जीवन में जाने की कोशिश करता है, तो उसके प्रियजनों को ऐतराज रहता है या उन्हें लगता है कि उन्हें दुख दिया जा रहा है। उस स्थिति में क्या करना चाहिए? (P24-0196)
  127. योगी जी, जब जीवन में अथाह दुख हो तो संयम कैसे बनाए रखें? (P25-0019)
  128. गुरु जी, जो कर्म हम करते हैं उसका उसी समय भी तो प्रभाव होता है? जैसे मैं झूठ बोल रहा हूं तो उस समय भी अंदर जो ग्लानि है, दुख है, उसे भोग ही रहा हूं। (P25-0061)
  129. गुरु जी, जब शारीरिक संबंधों में या मोह में सुख मिले, तो उस समय हमें क्या करना चाहिए? (P25-0098)
  130. गुरु जी, बौद्धिक तौर पे तो यह चीज समझ में आ जाती है, लेकिन जहां सुख होता है वहां आदमी चाहता है कि जो आज सुख मिला है, वह कल भी मिले। (P25-0099)
  131. गुरु जी, गलत काम करना तो दूर, सोचने से ही आत्मा तुरंत मना करती है और दुखी भी होती है, लेकिन हम लोभ-मोह के कारण आत्मा को इग्नोर कर देते हैं और गलत कर्म कर देते हैं। तो क्या उसका शारीरिक फल बाद में मिलता है? (P25-0103)
  132. गुरु जी, मैं बहुत दुखी हूं। एक के बाद एक कष्ट आ रहे हैं, बहुत प्रॉब्लम चल रही है। कुछ रास्ता बताएं। (P25-0108)
  133. गुरु जी, क्या काम वासना ही सबसे बड़ा सुख है? (P25-0135)
  134. गुरु जी, दुष्कर्म का फल कभी तुरंत मिलता है, कभी बाद में। अगर हम किसी को दुख दे रहे हैं, सता रहे हैं या उसके साथ बेईमानी कर रहे हैं, तो क्या अपना कर्म तो बना ही रहे हैं, साथ में उसका पाप कर्म भी अपने सिर पर ले रहे हैं? (P25-0155)
  135. गुरु जी, जब साधक सत्संग में बैठते हैं तो अपने शरीर पर कैसे नियंत्रण रखें? सत्संग चलते समय शरीर में हलचल होती है — कहीं पैर दुखता है, कहीं खुजलाहट होती है — जिससे बाजू वाले भी डिस्टर्ब होते हैं। (P26-0028)
  136. गुरु जी, ईमानदारी से चलने वाले व्यक्ति को दुख और विपत्ति का सामना करना पड़ता है, ऐसा क्यों? (P26-0093)
  137. गुरु जी, पहले मैं मांगता था कि भगवान सभी को सुखी करे, सभी को सद्बुद्धि दे। फिर एक दिन बैठे-बैठे सोच आया कि यह तो घूम-फिरकर मैं अपने ही बारे में भला मांग रहा हूं — सब अच्छा हो गया तो घूमकर मेरे घर तक और मुझ तक आएगा। क्या यह सही समझ है? (P26-0095)