आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

संसार और माया — योगी गुरु जी के प्रश्नोत्तर

इस पृष्ठ पर “संसार और माया” विषय से जुड़े 142 प्रश्न हैं, जो जिज्ञासुओं ने सत्संग में योगी गुरु जी से पूछे। किसी प्रश्न पर क्लिक करके योगी गुरु जी का पूरा उत्तर उनके अपने शब्दों में पढ़ें, वीडियो के साथ।

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  1. गुरुदेव, जैसे नाली का कीड़ा बार-बार नाली में ही जाता है, वैसे ही आपका सत्संग सुनते रहने के बाद भी मैं बार-बार संसार के भोगों में फंस जाता हूं। खुद को कैसे सुधारूं, यह कैसे पक्का करूं? (P1-0044)
  2. घर (संसार) छोड़ना पड़ता है, या अपने आप छूट जाता है? (P1-0124)
  3. आंख बंद करके जब ऊर्जा को महसूस करता हूं और मन-बुद्धि शांत हो जाती है, तो सोचता हूं कि वही मैं हूं। लेकिन फिर (उठते ही) वहीं (संसार में) चला जाता हूं। इसका क्या मतलब? (P1-0148)
  4. योगी जी, आपने एक रील में कहा था कि ‘नया भरना बंद कर दीजिए’। उसका मतलब क्या था — व्यवस्थाएं जोड़ना बंद कर दें, या मोह-माया छोड़ दें? अगर वह सब बंद कर दिया तो हमारी समझ कैसे विकसित होगी, हम अर्थव्यवस्था में योगदान कैसे देंगे? (P1-0178)
  5. अगर मेरे लिए कुटिया आना संभव न हो — जैसे इस पेड़ को पेड़ बनने तक डंडी का सहारा चाहिए — तो संसार में रहते हुए ज्ञान का वह सहारा मुझे कैसे मिले? (P1-0186)
  6. (गाड़ी के उदाहरण के संदर्भ में) गृहस्थी में या संसार में रहते हुए मैं कैसे महसूस करूं कि मैं फंसा हूं और मुझे गुरु की मदद चाहिए? (P1-0196)
  7. गाड़ी में तो मुझे आभास हो गया था कि अब पलटेगी और जान का खतरा है। लेकिन संसार में रहते हुए यह कैसे महसूस करूं कि अब बस करो? जीवात्मा का स्वभाव ऐसा है कि हम आखिरी क्षण तक अपना ही नाश करते रहते हैं, छोड़ना जैसे सीखा ही नहीं। (P1-0198)
  8. मैं इतना मूर्ख हूं कि सत्संग से सब कुछ पता चला, अध्यात्म में अच्छा-खासा लग भी गया, लेकिन साल भर से मन वापस संसार में लग गया। अब लगता है संतों की कृपा के बिना मैं अध्यात्म में नहीं चल सकता। (P2-0009)
  9. क्या संसार में रहते हुए मुझे परमात्मा को जानने की कोई जरूरत है? (P2-0058)
  10. गुरु जी, कहीं ऐसा तो नहीं कि हम संसार के काम से हटकर आश्रम के काम में लग गए (और यह भी एक बंधन हो)? (P2-0104)
  11. महाराज जी, मेरा स्वयं का अनुभव है कि संसार में दुख ही दुख है। (P2-0109)
  12. तो क्या आपका कहना है कि पहले मैं तय करूं कि जीवन को किधर ले जाना है; जो चीजें और लोग मुझे आकर्षित कर रहे हैं, उनके पीछे न जाकर देखूं कि मेरे अंदर कमी क्या है और उसे पूरा करूं? संसार की चीजों से यह खालीपन भरता नहीं — एक इच्छा पूरी हो तो 70 नई खड़ी हो जाती हैं — फिर भी भीतर पक्का लगता है कि यह कभी न कभी भरेगा, बस दिशा गलत पकड़ ली थी। तो क्या पहले विचारों में उस दुनिया का चित्र बनाऊं जो मुझे बसानी है, और फिर काम करूं? (P2-0164)
  13. संसार में संघर्ष-कंपटीशन से पहुंचे; अध्यात्म में कंपटीशन नहीं पर कर्मबंधन उलझे यादें ताजा। ज्ञान ने काबिल बनाया देखने को — मटेरियल अभी भी वर्क करता है, रोष आता है। बारीकी से कैसे चलें कि रोष कम हो? (P3-0026)
  14. संसार में जिम्मेवारियां निभाते हुए पूरा जीवन अध्यात्म कैसे बने — अंतिम क्षण तक? (P3-0048)
  15. संसार में रिजल्ट अपने फैसलों से आए — अध्यात्म में भी क्या हम ही खींचते/आश्वासन देते? (P3-0072)
  16. आप दुकान पर कांटा-तौल नहीं देखते, सामान भी नहीं गिनते। हम संसारियों के लिए प्रश्न — अगर दुकानदार 50-100 ग्राम कम तौल रहा है और हम भी आपकी तरह न देखें, तो क्या हम उसकी बेईमानी को बढ़ावा नहीं दे रहे, उसे गिराने में सहायक नहीं बन रहे? ऑनलाइन सामान में भी हेराफेरी होती है और आम आदमी कोर्ट भी नहीं जा सकता — तो हम किस तरीके से अपने आप को निकालें? (P3-0085)
  17. (उसी प्रसंग में) दूसरे का बालक संन्यासी हो तो कहते हैं सात पीढ़ी तार दी, अपना हो तो कहते हैं बिगड़ गया। गुरु जी, क्या संसार में भी अच्छे और अध्यात्म में भी अच्छे, आध्यात्मिक मां-बाप मिलना बहुत कम है? (P3-0101)
  18. (कुटिया में साधक, उज्जैन से) मैं 2017 में घर से एक साल के लिए निकल गया था। ओशो की विधियां (डायनामिक मेडिटेशन आदि) बहुत ऊर्जा देती थीं, उसमें मैं घबरा गया, एकांत में डर भी लगता था, फिर वापस संसार में लौटा — ना संसार का रहा, ना सन्यास का। बेचैनी, चिंता, तनाव, अनिद्रा, फिर सिगरेट-शराब भी लगी; डॉक्टर की दवाइयों के बाद मेरा दिमाग सुन्न हो गया। बहुत प्रयास किए, कई जगह पूछा। अब दिमाग सुन्न पड़ा है, कोई भावना ही नहीं उठती, शरीर में ताकत भी नहीं बची — अब क्या करूं? (P4-0079)
  19. (लाइव) प्रणाम गुरु जी। संसार में रह के सत्य में स्थिर कैसे रहें? (P4-0105)
  20. (वही साधक) गुरुदेव, एक श्लोक में कहा गया है — 'कोटि नाम संसार में, ताते मुक्ति न होय; आदि नाम जो गुप्त जपे, बूझे बिरला कोय।' इसका मतलब — वो आदि नाम क्या है? (P4-0133)
  21. (लाइव) गुरुदेव नमन। रमण महर्षि जी कहते हैं कि हमें बस भ्रम है अपूर्णता का — यही माया है। कृपया क्लियर करें। (P4-0142)
  22. मैं का मैं से मिलन होने पर लक्षण/अनुभूति कैसे बताएं? बाहर तो माया है। (P5-0072)
  23. ज्ञान/भगवत् प्राप्ति पर आवागमन मिटे, संसार चले — आत्मा कहां? मुक्ति किसकी जब आत्मा स्वतंत्र? माता-पत्नी झगड़कर अलग — क्या करें? (P5-0131)
  24. प्रभु में पावर न रहे तो क्या? आत्मज्ञानी संसार का नाश भी कर दे तो? (P5-0163)
  25. एक संसारी को फिलहाल एक ही कारण नजर आ रहा है कि मैं इसी से दुखी हूं, प्रपंच नजर नहीं आता। जैसे पड़ोसी पसंद नहीं और मन में आता है कि यह मर जाए, आज यह मर जाए, कल वो मर जाए। उस कारण तक चला भी जाऊं तो अपने स्वभाव को कैसे सुधारूं? वह भाव गंदी आदत लगता ही नहीं, मैं यही जानना चाहता हूं। अगर अपनी स्थिति बुरी लगती ही नहीं तो कैसे चेक करूं? परिवार से जानकारी मिली कि उनसे रंजिश है, दुश्मनी है, उन्होंने हमारे किसी को मारा, मैंने खुद नहीं देखा, फिर भी भाव बन गया कि यह मर जाना चाहिए, मैं ही उड़ा दूं, जबकि वो भी योजना बना रहे होंगे। गली में रेड़ी वाले का रेट ना भाए तो बद्दुआ, गाली और अपमान तक निकल आता है। मैं खुद परेशान हूं और वो अड़चन भी डाल रहे हैं। ऐसे में अपनी स्थिति कैसे जानूं, यह भाव क्यों उठ रहा है, और मैं इसमें क्यों लिप्त हो रहा हूं? (P6-0061)
  26. आपने कहा था, संसार में ग्रस्त हो, विश्राम चाहिए। शुरुआत में एक-दो साल अध्यात्म में पड़े रहो, सत्संग सुनो, फिर अपने आप आध्यात्म में जीने लगोगे। यह क्यों कहा था? किससे कहा था? (P6-0117)
  27. क्या मन ऐसा है जैसे पिक्चर हॉल में पर्दा दिखाई देता है? क्या मन द्वारा जीवात्मा इस संसार और शरीर को व्यक्त करती है? अंग सुन्न या पैरालाइज होने पर चेतना रहती है या मन वहां नहीं जाता, और शरीर का भान कैसे होता है? (P6-0126)
  28. आपने कहा है कि संसार क्या है। मैं इसमें ही रहता हूं। मुझे खुद में आना है। संसार से हटकर खुद में कैसे आ जाऊं? (P6-0134)
  29. इस संसार में रहकर ईमानदारी और सत्कर्म करेंगे तो क्या भगवान की प्राप्ति होगी? (P6-0195)
  30. संसार से मुक्ति कैसे हो? (P7-0007)
  31. लक्ष्मण पूछते हैं, गुरु जी, माया से कैसे निकलें? (P7-0106)
  32. मैं आपके सानिध्य में रहकर गया हूँ। मेरा स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता, अतः मुझे बार बार संसार में लौट आना पड़ता है। मेरे लिए क्या आदेश है? (P7-0119)
  33. संसार में चिंतन नहीं होता। मैंने बहुत प्रयास किया। आठ दिन तक लगा रहा, कुछ नहीं हुआ। हार गया। यहां से चार्ज होकर गया था, पर धीमे-धीमे डाउन होता गया। शब्द याद रखकर, साक्षी भाव में, कहीं भी रहें तो क्या गिरना रुकता है? यहां और संसार में फर्क क्यों है? (P7-0187)
  34. एक साधक दो-तीन महीने पहले वीडियो देखकर आया। पहले और लोगों के प्रवचन जंच नहीं रहे थे। आपका वीडियो पहले अटपटा लगा, फटे वस्त्र में बैठे किसी को सवाल पूछते देखा, आगे निकल गया, फिर लौटकर पूरा सुना तो लगा यही आत्मकल्याण का रास्ता है। पत्नी रोकती थी, बच्चों की शादी के बाद साथ चलने की बात हुई। दादी की गति देखकर लगा कि बच्चों के लिए कमाते रहने के बाद भी वही गति हो सकती है। संसार सबको लात मारता है, फिर भी लोग संसार के लिए पागल हैं। वह पूछता है, संसार में रहते हुए कर्म कैसे करें कि जीवन आत्मकल्याण की ओर जाए? (P7-0191)
  35. मेरी स्थिति यह है कि एक तरफ घर-संसार है और एक तरफ यह रास्ता। लेन-देन पूरा करने में लगा हूं। रुकावट खुद से आ रही है। दिमाग चालाकियों में उलझ जाता है, खुद से ही वैकल्पिक रास्ते निकाल लेता हूं। दृढ़ मानसिकता नहीं बना पा रहा। आदतें हैं, और आलस्य की तरफ ले जाता है। पक्का है कि यही फाइनल रास्ता है, फिर भी भटकाव होता है। क्या करूं? (P8-0017)
  36. गुरु जी, हम अपना आत्मकल्याण करना चाहते हैं। तो हम कैसे करें? इस संसार से कैसे बाहर निकलें? जल्द मार्गदर्शन कीजिए। (P9-0119)
  37. महाराज जी, जब से ज्ञान समझा हूं तब से अंदर तकलीफ और दर्द तेज हो रहा है। संसार में जो मदद करता है वह फिर वसूलने लगता है। ऐसा क्यों है? परिवार में भी ऐसा ही होता है? (P9-0171)
  38. मानसिक बंधन से पूरी तरह मुक्ति नहीं मिली है, लेकिन ऐसा लगता है कि 70% हट गया हूं। आपके सत्संग का असर है गुरु जी। बस अब संसार और उसके बंधनों से मुक्त होना है। (P10-0095)
  39. क्या संसार में रहकर अपने कर्तव्यों को करते हुए आत्मज्ञान प्राप्त किया जा सकता है? (P10-0107)
  40. आत्मिक चिंतन कैसे करें? मन में संसार घूमता रहता है। (P10-0115)
  41. गुरुदेव, आपने कहा कि संसार में रस अनंत है, खुद ही छोड़ना होगा। इसे समझाएं। (P10-0182)
  42. गुरुदेव, माया के जगत में रहकर, माया से संयुक्त होकर मुक्ति कैसे संभव है? तीन लोक में जो भी दृश्यमान है, वह सब माया है। तो क्या आत्मसंयम, ईमानदारी — ये सब भी सांसारिक वस्तुएं हैं? (P10-0183)
  43. (कुटिया में साधक) सात दिन बाद मैं अपने संसार में चला जाऊंगा। वहां रहकर साधना करूं, तो मुझे कैसे पता चलेगा कि मेरी स्थिति कहां तक पहुंची है? (P11-0007)
  44. जब हम संसार में रहकर फंसे हैं, तो क्या मां-बाप सबको छोड़कर यहां आ जाना जरूरी है, या वहीं रहकर काम करें? (P11-0050)
  45. अगर कोई 20 साल यहां रहे और (आत्मज्ञान ना हो), तो 60 के बाद वापस संसार में क्या मिलेगा? अपने ही नहीं पहचानेंगे। (P11-0057)
  46. "मन मरा ना माया मरी, मर-मर गया शरीर; आशा तृष्णा ना मरी, कह गए दास कबीर" — आप अपने वक्तव्य में समझाएं। (P11-0078)
  47. किसी ने बताया कि शिवलिंग प्रतीक है — परब्रह्म हम हैं और माया ने उसे चारों तरफ से घेरा है; जब माया को समझ जाता है तो हंसता है कि मैं परब्रह्म में ही था। क्या यह सच है? (P11-0080)
  48. आत्मज्ञानी तो सबसे मुक्त हो गया, उसे कुछ नहीं चाहिए; फिर वह किस आधार पर संसार में रहता है? (P11-0093)
  49. आप कहते हैं प्रेम किया नहीं जा सकता, वह घटित होता है। तो क्या संसार में किसी ने किसी से प्रेम किया ही नहीं? क्या मीरा का मूर्ति के प्रति प्रेम, प्रेम नहीं था? (P11-0096)
  50. क्या यह सही है कि इस संसार में रहने का आधार दूसरों की बद्दुआ है — अगर दूसरों के भीतर से बद्दुआ बंद हो जाए, तो हम इस संसार में रह ही नहीं पाएंगे? (P11-0143)
  51. घर जाऊंगा तो संसार में ब्याह-शादी, किसी के मरण में जाना पड़ेगा — कैसे करें? (P11-0182)
  52. सारे संसारी कर्म अपने आप छूट रहे हैं, एकांत में बैठी रहती हूं, रिश्ते-नाते सब पास नहीं, सारी व्यवस्था अपने आप होती जा रही है। क्या जो घट रहा है, सही है? (P11-0193)
  53. क्या कोई मार्ग है कि संसार की सुविधाएं छोड़े बिना आत्मज्ञान पा सकें? लक्ष्य पक्का है, पर उम्र भी ज्यादा है। (P12-0026)
  54. आपने कुटिया के आश्रमवासियों से कहा कि जो भी आए उसे अच्छे से खिलाओ-पिलाओ, ताकि देने का स्वभाव आए। तो हम संसार में या आपके साथ भी बांटने लग जाते हैं कि योगी जी खुश होंगे, और फिर आप कहते हो कि तुम अपना मान खड़ा कर रहे हो। इसे मैं कहां तक सही मानूं? (P12-0110)
  55. जल्दी कर्म को कैसे काटें, ताकि संसार से जल्दी चले जाएं? (P13-0009)
  56. रस कहां है? संसार में रस नहीं है, तो और कहां रस है? (P13-0032)
  57. इच्छा उठते ही मन उसी को पूरा सत्य और संसार क्यों मान लेता है, जबकि विवेक भीतर मौजूद है? उस क्षण विवेक को जागृत कैसे करें? (P13-0050)
  58. महाराज, आप कह रहे हो कि इसी में ढूंढ लो परमात्मा को, पर हमें तो उसकी जरूरत ही नहीं लगती — हम तो पैसे, गाड़ियां, बंगले ढूंढेंगे। और शरीर व आजीविका चलाने के लिए संसार में दूसरों से व्यवहार भी तो करना है। तो परमात्मा को क्यों ढूंढें? (P13-0163)
  59. गुरु जी, जब हमारे हाथ में कुछ नहीं है तो हम इस संसार में किस लिए आए? क्या वजह है? (P13-0164)
  60. गुरु जी, जन्म से कोई ब्रह्मचर्य का पालन करता है तो कोई संसार के भोग भोगता है — तो किसको आत्मज्ञान होता है? (P13-0167)
  61. गुरु जी, मनुष्य का जन्म सिर्फ मोक्ष पाने के लिए ही हुआ है, या संसार की वस्तुओं को भोगते हुए जीवन जीने के लिए? (P13-0168)
  62. गुरु जी, इस संसार में ईमानदारी इतनी कठिन क्यों है? आपका सत्संग सुनता हूं, अब हर जगह ईमानदारी से काम करता हूं, लेकिन कठिनाई बहुत ज्यादा हो रही है। (P13-0172)
  63. गुरु जी, मेरे जानने में दो-तीन आत्मिक ज्ञान वाले हैं, जिन्होंने आत्मज्ञान पाया और फिर लोगों को ज्ञान देने संसार में लौटे, लेकिन बाद में पछताए कि जिनके आगे सर पीट रहे थे वो कहीं तक पहुंचते नहीं — ऐसा क्यों? (P14-0049)
  64. गुरु जी, राजा जनक राजपाट करते हुए भी, संसार में रहते हुए भी संसार से परे थे, विदेह कहलाए — ये विद्या बड़ी मुश्किल लगती है? (P14-0057)
  65. गुरु जी, पहले अवधारणा थी कि ज्ञान के बाद यह माया समाप्त हो जाएगी, परंतु ज्ञान के पश्चात भी अनुभव हुआ कि माया कार्य करती है — ऐसा क्यों? (P14-0081)
  66. गुरु जी, माया में माया के ही उपाय लगते हैं — क्या यह सही है? (P14-0083)
  67. गुरु जी, मोह-माया ही सभी कर्म-बंधनों की जड़ है; जिस क्षण प्राणी इससे परे हो गया, कोई कर्म उसे बांध नहीं सकता — मोह-माया क्या है? (P14-0090)
  68. गुरु जी, मेरा ज्ञान तो नकारात्मक है — नेति-नेति द्वारा यही ज्ञान होता है कि शरीर, मन, बुद्धि, अहंकार मैं नहीं; कोई आकार, गुण, इच्छा स्थाई नहीं; कर्ता भ्रम है, माया मात्र है। (P14-0104)
  69. गुरु जी, प्रपंच में, संसार-गृहस्थ में रहकर परमार्थ प्राप्ति आसान नहीं लगती। मेरे प्रयास तप-योग द्वारा चालू हैं, लेकिन गलत आदतों से शरीर खराब हुआ है, अब साथ नहीं देता — मजबूत कैसे करें? (P14-0112)
  70. गुरु जी, माता-पिता के प्रति सेवा-भाव सांसारिकता में पकड़े रखता है, उनकी सेवा उनकी मनोकामना की पूर्ति है, संसार का ही हिस्सा बना रहता है। क्या संन्यास का रास्ता कोई अदृश्य सत्ता बनाती है? (P14-0124)
  71. ये सब स्वप्न है, मन में संसार है, कुछ नहीं है — फिर भी हम उसी के जाल में फँसे हैं? (P14-0137)
  72. श्री कृष्ण भगवान महल में रहते थे, रथों पर चलते थे, फिर भी योगेश्वर थे — तो क्या माया का त्याग करने से इंसान योगी होगा? (P14-0164)
  73. जब अक्षर नहीं था तब कौन सा ज्ञान था? प्रकृति माया, योग माया, आत्मज्ञान और परमात्मा क्या है — चारों का विश्लेषण करें। (P15-0034)
  74. क्या संसार और शास्त्रों के सहारे, बिना जीवित गुरु के, आत्मज्ञान नहीं हो सकता? (P15-0060)
  75. संसार को योगी की तरह कैसे भोगें? (P15-0077)
  76. सारे सांसारिक विषयों से अलग होकर भी संसार में कैसे रहें? (P15-0108)
  77. तो गुरुदेव, ये संसार की तरफ, संसार की चीजों की तरफ कौन लेके जाता है? (P15-0121)
  78. आप बोलते हो कि स्वभाव से जो निकलता है, पूर्णता से निकलता है, वह पहुंचता है। पर जैसे हम आए हैं, पहले तो अभाव में ही शुरुआत होती है — संसार में कुछ भी करते हैं तो ठोकरें लगती हैं, कुछ मिलता नहीं, तो अभाव में ही फिर हम इधर की ओर आते हैं? (P16-0113)
  79. (लाइव) भगवान की सृष्टि जब तीन गुणों से है, तब लोग माया से छुटकारा कैसे पाएं? (P17-0006)
  80. गुरु जी, क्या हर व्यक्ति आत्मज्ञान और आत्मदर्शन का अधिकारी है? और संसार में रहते हुए हम अपने आप को क्यों नहीं देख पाते? (P17-0062)
  81. गुरु जी, मुझे संसार का कुछ नहीं चाहिए, बस परमात्मा चाहिए, उसके साथ रहना है — यह भाव कैसा है? (P17-0093)
  82. गुरु जी, संसार के लोगों से इतनी मार खा चुका हूं कि अब किसी में रस नहीं रहा। सारी दुनिया बेईमान लगती है — टीवी खोलो तो झगड़े, पॉलिटिक्स, भक्ति चैनलों पर भी कुंडली-पैसे का धंधा। क्या करूं? (P17-0107)
  83. गुरु जी, ईश्वर से कोई शिकायत नहीं, लेकिन संसार से नहीं बनती — ऐसा लगता है दुनिया पीछे पड़ी है। ऐसा क्यों? (P17-0112)
  84. गुरु जी, क्या संसार जैसा है वैसा ही स्वीकार करना है और भगवान को मानना है? (P17-0114)
  85. गुरु जी, क्या घर-संसार का दायित्व निभाते हुए भी इस (आत्मज्ञान की) स्थिति को प्राप्त किया जा सकता है? (P17-0127)
  86. गुरु जी, क्या जिस पल संसार छूट जाता है, तभी हम भगवत प्राप्ति के सुपात्र होते हैं? (P17-0158)
  87. गुरु जी, प्रभु जिस पर कृपा करते हैं, क्या उसका मिथ्या संसार छीन लेते हैं? (P17-0159)
  88. गुरु जी, आत्मज्ञान होने के बाद क्या व्यक्ति दोबारा उस बोध से वंचित हो सकता है, या फिर से इच्छाओं के कारण संसार के बंधन में फंस सकता है — जैसे पहली बार मूल से अलग हुआ था? और अगर फिर फंस सकते हैं तो ऐसी मुक्ति का क्या फायदा? (P17-0168)
  89. गुरु जी, दृष्टा बनें तो माया में रहकर भी माया-ग्रस्त नहीं होते — पर क्या यह तभी संभव है जब भीतर स्व में परिपूर्णता और संतुष्टि हो? माया क्या है? (P17-0175)
  90. गुरु जी, माया का प्रसार समुद्र जैसा है, समाज रुकने नहीं देता, साधना पर चलते ही विघ्न आते हैं और मन बहाने बना देता है। वह कृपा कैसे प्राप्त हो कि व्यक्ति एकनिष्ठ होकर साधन पथ पर चल पाए और पार हो जाए? (P18-0019)
  91. गुरु जी, वह इतना दयावान है, फिर भी मेरी व्याकुलता घट जाती है और मैं किसी में लिप्त हो जाता हूं — माया बड़ी प्रबल है, उठाकर फेंक देती है। ऐसा क्यों? (P18-0021)
  92. गुरु जी, कुटिया में एक महीना रहकर घर लौटे; एक दिन अच्छा लगा, फिर व्यवहार में प्रतिक्रिया न देने से घुटन होने लगी — क्या संसार में रहना ही बेईमानी है? (P18-0085)
  93. गुरु जी, आत्मा जिस घर, कुल, जगह में आई, वहां के दायित्व और संबंध तो प्राकृतिक मिले — फिर कहते हैं संसार हमने बनाया, यह कैसे? (P18-0189)
  94. गुरु जी, आप आत्मज्ञान को उदाहरणों से समझाते हैं, पर उदाहरण भी संसार से, मन की स्मृति से आते हैं, वे तो सिर्फ तर्क और विचार हैं, सत्य नहीं — फिर उनसे आत्मज्ञान कैसे? (P19-0021)
  95. गुरु जी, जब परमात्मा की ओर दृष्टि जाती है कि हमें मुक्त होना है, तो वहां भी तो मन ही लेकर जाता है? और परमात्मा में मन उतनी ही देर लगता है जितनी देर संसार में, फिर हट जाता है — क्यों? (P19-0030)
  96. गुरु जी, कबीर साहब ने कहा "मन मरा ना माया मरी, मर मर गया शरीर; आशा तृष्णा ना मरी" — यानी मन नहीं मरेगा तब तक विकार नहीं जाएंगे। आप कहते हैं मन है — तो क्या ज्ञान के बाद मन कमजोर हो जाता है? (P19-0038)
  97. गुरु जी, ब्रह्म, जीव और माया में क्या भेद है? (P19-0152)
  98. गुरु जी, संसार हमारा पोषण क्यों करता है? (P19-0163)
  99. गुरु जी, संसार रूपी फल की दुकान में हम कहां फंसे हैं — क्या जो मिल रहा है उसे स्वीकार करना चाहिए? (P19-0196)
  100. गुरु जी, रात को स्वप्न में कामवासना आ जाती है, फिर मन खराब होकर संसार में चला जाता है — इसका समाधान क्या है? (P20-0013)
  101. गुरु जी, क्या संसार में सबसे ज्यादा शक्ति शब्दों में ही है? (P20-0056)
  102. गुरु जी, मुझे संसार से मुक्त होना है — सबको दुखी छोड़कर आनंद कैसे करूं? (P20-0058)
  103. एक संसारी डेली रूटीन में अपने को देख भी नहीं पाता — उसे कर्म करते हुए "हर वक्त परीक्षा है" कैसे समझना चाहिए? (P20-0110)
  104. संसारी चाहता है परिवार, नौकरी, सुविधाएं सब वैसे ही रहें और आनंद भी मिल जाए — क्या दोनों का तालमेल हो सकता है? (P20-0112)
  105. अध्यात्म में बेईमानी की सजा संसार से ज्यादा क्यों है? (P20-0167)
  106. गुरु जी, आपको संसार की असलियत कब और कैसे समझ में आई? (P20-0169)
  107. जो संसार में बैठा है और इच्छा-अपेक्षा छोड़कर कुदरती जीवन जीना चाहता है, उसका तो पूरा जीवन निकल जाए — क्या स्व को जानने का यही एक माध्यम है, यह तो बहुत कठिन है? (P20-0199)
  108. हम सब माया के इस संसार के भीतर बैठे हैं, और बाहर निकलने का रास्ता भी माया के भीतर बैठकर बताया जा रहा है? (P21-0006)
  109. स्व को जाने बिना यह दुनिया नहीं छोड़नी चाहिए — पर क्या स्व को जानने के लिए संसार या कोई कार्य छोड़ना जरूरी है? (P21-0024)
  110. गुरु जी, कई बार लगता है बस अपने मन की बात करने के लिए कोई चाहिए जो मुझे समझ ले — किसी से जम ही नहीं रही, लोग कहते हैं सारे संसार में तुझे ही कोई नहीं समझ रहा तो शायद तेरे में ही प्रॉब्लम है। क्या करूं? (P21-0060)
  111. गुरु जी, बुद्ध ने कहा कुछ चीजें बिना भोगे बोध से भी समझ आती हैं। अगर इस मार्ग में सबके साथ यही हो रहा है, तो इससे अच्छा क्या यह नहीं कि संसार की जिम्मेदारी छोड़कर गुरु से ही जूते खा लें? (P21-0062)
  112. गुरु जी, जैसे शराबी को शराब की और जुआरी को जुए की ऐसी तड़प होती है कि वो परिवार-संसार किसी की तरफ नहीं देखता — वैसी तड़प हमारे अंदर आत्म-कल्याण के लिए क्यों नहीं बन पाती, जबकि आप इतना अच्छा समझाते हो? (P21-0070)
  113. गुरु जी, आप कहते हैं साल में कम से कम एक महीना एकांत में जाओ, पर वापस इसी संसार में आना पड़ता है और अभिमन्यु के चक्रव्यूह की तरह फिर फंस जाते हैं — इससे कैसे बचें? (P21-0071)
  114. गुरु जी, आपने कहा था कमल कीचड़ में खिलता है और यह संसार कीचड़ है — यह मुझे समझ नहीं आया। (P21-0095)
  115. गुरु जी, संसार में किसी पद पर रहते हुए कर्मचारियों से काम लेना पड़ता है, समझाना-कहना पड़ता है — इसमें राग-द्वेष बनता है और वहां से बददुआ भी आती है; इसके लिए मार्गदर्शन करें। (P21-0112)
  116. गुरु जी, फैमिली और संसार में ईमानदारी से कैसे डील करें? क्या किसी संदर्भ में अच्छे काम के लिए झूठ बोलना चाहिए? (P21-0175)
  117. गुरु जी, संसार में रहते हुए बहुत सारे बंधन हैं — तो आत्म साक्षात्कार के लिए मुझे संसार फिजिकली छोड़ के कहीं जाना है, या मेंटली यहीं रह के छोड़ सकता हूं? (P21-0195)
  118. गुरु जी, ब्रह्मानंद जब मिलता है तो माया सस्ती क्यों हो जाती है? जिन महापुरुषों ने ब्रह्म की मस्ती पाई, उनके लिए माया के सारे आकर्षण फीके क्यों हो जाते हैं? पहले यह समझना है कि माया क्या है। (P22-0028)
  119. गुरु जी, वेदांत कहता है कि महत्ता देकर हमने माया का निर्माण किया और महत्ता खोकर ही हम "हम" हो पाते हैं। तो महत्व छोड़ने में क्या प्रयास की आवश्यकता होती है, और इसमें समय और अवधि का क्या महत्व है? (P22-0036)
  120. गुरु जी, सत्य क्या है और माया क्या है? (P22-0076)
  121. गुरु जी, माया किसे कहते हैं? (P23-0018)
  122. गुरु जी, मुझे यह जानना है कि जीव, माया और ब्रह्म — तीनों में अंतर क्या है, तीनों का आपस में संबंध क्या है, और हम ब्रह्म तक कैसे पहुंच सकते हैं? (P23-0092)
  123. गुरु जी, माया हटी मतलब अपना जो भी बनाया हुआ अस्तित्व है वह पूरा हट जाए, तो सीधा ब्रह्म से कनेक्ट हो गए? (P23-0095)
  124. गुरु जी, संसार में संग का क्या महत्व है? साधु-संग क्या है? और सत मार्ग और परमार्थ में क्या अंतर है? (P23-0110)
  125. गुरु जी, साधक क्यों बार-बार फिसलकर माया-नरक में गिर जाता है? (P23-0143)
  126. गुरु जी, क्या संसार और अध्यात्म अलग हैं? (P23-0154)
  127. गुरु जी, मोह-माया प्राचीन काल में क्या थी? उस समय तो कोई मोह-माया नहीं थी, तब भी लोग उसमें कैसे फंस जाते थे? (P23-0192)
  128. गुरु जी, ऐसा लगता है कि कुछ न कुछ करना है, जो पीछे संसार में कर लिया वह नहीं — पर यह पता नहीं लग रहा कि वास्तव में करना क्या है? (P23-0197)
  129. गुरु जी, क्या आपका कोई पूर्व जन्म का अनुभव है जिससे आप बचपन से ही माया की तरफ नहीं गए और रिश्तों को मतलब का समझते रहे? (P24-0020)
  130. गुरु जी, ईश्वर तो तीन गुण और 25 प्रकृति से परे है; तब माया नहीं बनी थी — तब ईश्वर कहां था? (P24-0042)
  131. गुरुदेव, किसी भी तरह ये संसार छूट जाए — मुझे नहीं चाहिए संसार, पर मुझे खींचता है। पता नहीं हम ही नहीं छोड़ पा रहे या वो हमें नहीं छोड़ रहा? कैसे छूटूं, यह उपाय दे दीजिए। (P24-0092)
  132. गुरु जी, एक भोग की इच्छा बाकी है और एक जिम्मेदारी है, उसके अलावा संसार नहीं चाहिए। तो क्या भोग और भोग से मुक्ति — ये दोनों यात्राएं एक साथ चल सकती हैं? कृपया मार्गदर्शन कीजिए। (P24-0097)
  133. गुरु जी, आप बताते हैं कि 'चाहिए' से निकलो, पर संसार में आवश्यकता तो रहती है — इस 'चाहिए' से कैसे निकलें? (P24-0136)
  134. बाबा, मैंने बहुत बेईमानी कर ली है और संसारी लक्ष्य के साथ मैं अभी फंसा हुआ हूं। क्या करूं? (P25-0004)
  135. गुरु जी, मेरे घर वाले कह रहे हैं कि शादी कर लो, अब उम्र हो गई। माता-पिता की उम्र भी 60 के पार हो गई है, घर में खाना बनाने के लिए कोई नहीं है, और मैं इस संसार में सांसारिक जीवन जीना नहीं चाहता। मैं क्या करूं? (P25-0048)
  136. गुरु जी, दुनिया को माया कहते हैं, फिर हमें यह सही क्यों दिखती है? माया क्यों नहीं लगती? (P25-0110)
  137. गुरु जी, मुझे इस संसार से हमेशा के लिए मुक्त होना है, खुद में रहना है। सबसे जल्दी वाला रास्ता बताओ। (P25-0127)
  138. गुरु जी, इस संसार में जन्म लेकर संसार से विरक्त रहना सही है? (P26-0040)
  139. गुरु जी, मैं सेवा करना चाहता हूं लेकिन बार-बार यह संशय आता है कि मैं जिनकी सेवा कर रहा हूं वो मेरे जैसा जीव या माया है या वह परम सत्य है? मैं जिनकी सेवा कर रहा हूं वह कौन है? (P26-0043)
  140. गुरु जी, आजकल लोग ईमानदार को दबाते हैं और संसार साथ नहीं देता, क्या करें? (P26-0096)
  141. गुरु जी, आत्मज्ञान या ब्रह्मज्ञान या अपने स्वरूप को जानना भी क्या माया का ही जाल है? (P26-0105)
  142. गुरु जी, आत्मा संसार में क्यों आई? क्या बिना परमात्मा की इच्छा से ऐसा हुआ है? (P26-0114)