मोह और अहंकार — योगी गुरु जी के प्रश्नोत्तर
इस पृष्ठ पर “मोह और अहंकार” विषय से जुड़े 94 प्रश्न हैं, जो जिज्ञासुओं ने सत्संग में योगी गुरु जी से पूछे। किसी प्रश्न पर क्लिक करके योगी गुरु जी का पूरा उत्तर उनके अपने शब्दों में पढ़ें, वीडियो के साथ।
- जरूरत में रहते हुए भी — मान लीजिए मुझे फॉर्च्यूनर, किसी स्थान या पद की जरूरत है — उसमें रहते हुए अहम भाव को कैसे अलग रखें, कि मैं उससे जुड़ा नहीं हूं, और यह अहंकार न आए कि मैंने इतना इकट्ठा कर लिया तो समाज में मेरा रुतबा बढ़ गया? उन सुविधाओं से अपने आप को डिटैच कैसे रखें? (P1-0164)
- योगी जी, आपने एक रील में कहा था कि ‘नया भरना बंद कर दीजिए’। उसका मतलब क्या था — व्यवस्थाएं जोड़ना बंद कर दें, या मोह-माया छोड़ दें? अगर वह सब बंद कर दिया तो हमारी समझ कैसे विकसित होगी, हम अर्थव्यवस्था में योगदान कैसे देंगे? (P1-0178)
- मद, लोभ, मोह — इनमें ‘मद’ क्या है? (P2-0105)
- गुरु जी, प्रणाम। अपने शरीर का मोह कब खत्म होता है? (P2-0138)
- कल्पना में अध्यात्म शुरू किया हो, पीछे आसक्ति-मोह कैंची से नहीं कटती, सुरक्षित महसूस किया था — तो क्या कल्पना में चलते-चलते भी परम स्थिति पक्की हो सकती है? आपके व्यवहार में करुणा-कृपा देखकर क्या मेरा भी वहां पहुंचना हो सकता है, चाहे शुरुआत कल्पना से हो? (P3-0011)
- सुधरने गए पर डांट लगे तो दिल दुखे — अहंकार से कैसे बाहर? आवेश आने पर क्या करें? (P3-0068)
- सेवा करते अहंकार/प्रतिस्पर्धा — 'मैं सेवा कर रहा' भाव; सुविधा नहीं ज्ञान/समाज निमित्त चाहिए? (P3-0070)
- गुरु जी, दो-तीन महीने साधना से लग रहा है कि मैं काम-क्रोध से दूर जा रहा हूं; अकेले में लगता है मैं कंट्रोल कर सकता हूं, लेकिन जैसे ही उस परिस्थिति के बीच आते हैं, कंट्रोल नहीं रहता, हम उसके वश में चले जाते हैं — अपने आप कुछ घटित हो जाता है। उस समय क्या करें? मन (माइंड) को कैसे कंट्रोल करें, और काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह से कैसे छूटें? (P3-0152)
- (लाइव) गुरु जी प्रणाम। अहंकार नहीं छूटता। किसी भी काम को करते हैं तो ‘मैंने किया’ — यह भाव बना रहता है। कृपया मार्गदर्शन करें। (P3-0200)
- (लाइव) प्रणाम गुरु जी। जब मैं शक्तिशाली होता हूं तो अहंकारी हो जाता हूं। उस समय विनम्रता के लिए क्या करूं? (P4-0098)
- (वही साधिका) मैं बहुत सी चीजों से मुक्त हो गई — ईर्ष्या, समाज, रीति-रिवाज, अंधी पूजा-पाठ, मां-बाप का मोह। लेकिन आर्थिक डर पर आकर अटक जाती हूं — अगर मेरे पास पैसे नहीं हुए तो जिंदगी कैसी होगी? ईमानदारी से (ज्ञान के) वीडियो बनाती हूं तो लोग सुनते नहीं, कमाई घट गई है। इस डर को कैसे खत्म करूं? (P4-0189)
- (वही साधक) गीता में कृष्ण ने कहा कि दुख से मुक्ति पानी है तो मोह छोड़ो, लालच, कामना छोड़ो। जैसे इन (साधिका) की मम्मी से बात नहीं हो पाती और इन्हें दुख है — तो यह मोह है ना? उम्मीद और मोह में क्या अंतर है? और आप अपनी बहन का दुख सुनकर भी कह देते हैं 'रह अपने दुख में' — आपको उसके दुख से दुख नहीं होता, आपने यह डिटैचमेंट कैसे किया? (P5-0014)
- (पूजा) कैसे सुनिश्चित करें कि मुझ में आध्यात्मिक अहंकार नहीं आ रहा है? मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है? (P5-0042)
- (मोहन) समाधि अवस्था में क्या अनुभव होता है? कई महीने? (P5-0053)
- मोह और लोभ से मुक्ति कैसे मिले? (P5-0114)
- मोह का नाश कैसे हो? (P5-0162)
- यदि मैंने संकल्प किया और वह पूरा हो जाता है, तो क्या इसमें अहंकार नहीं आ जाता? (P6-0095)
- माता-पिता, पत्नी और पुत्र के प्रति जो भाव है, उसे प्रेम कहें या मोह? प्रेम किसको देखता है? (P7-0017)
- जिस व्यक्ति का त्याग कह रहे हो, उसका क्या हो जाएगा? जिस वजह से उससे मोह हो गया है, उस मोह का त्याग कैसे होगा? अपनापन कैसे पैदा होता है? जब लगता है कि उसे मेरी जरूरत नहीं, मेरे प्यार की औकात नहीं, फिर भी अपनापन के कारण दुख होता है, तो मोह कैसे छूटे? गलत आदमी का साथ देने से तो उसकी जिंदगी और समाज दोनों खराब होते हैं। हमारा काम समाज को साफ करना होना चाहिए। तब क्या करें? (P7-0079)
- अच्छा कर्म करना है, ऐसा कहा गया। कर्म भी अच्छा और बुरा होता है, ये बात समझ में आ रही है। लेकिन धर्म और अधर्म क्या होता है? रास्ते में किसी को खाना दे दिया, तो धर्म लग रहा है। अनदेखा कर दिया, तो अधर्म। अगर उसे अच्छा या बुरा मान लिया, तो अटैचमेंट हो जाएगा, फिर मोह हो जाएगा। क्या उसे अपना कर्तव्य मानकर करना चाहिए, न अच्छा मानें न बुरा, ताकि फंसें नहीं? भाव ये है कि अच्छा-अच्छा कहते हुए मैं भोग में न फंस जाऊं। मुझे मुक्ति का मार्ग चाहिए, बंधन नहीं। मैं मानवता और कर्तव्य से काम करूं, पर अच्छा कहकर वहीं न अटक जाऊं। (P7-0080)
- अहम भाव को पूरी तरह कैसे खत्म करें? आपने कहा था कि दूसरों से अपने हिसाब से काम लेने की उम्मीद छोड़ दो, उससे आधी समस्या हल हुई। पूरी तरह अहम कैसे मिटे? काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह में काम किसे कहते हैं, कामना को या वासना को? मोह और लोभ किस स्थिति में होते हैं? इन्हीं दो पर सबसे ज्यादा संदेह रहता है। (P7-0152)
- संयम का मतलब क्या है? लोग कहते हैं संयम रखो। क्या यह शरीर से संबंधित है, या धैर्य है? संयम मानसिक है, या शरीर और मन दोनों से? एक बार अहंकार आहत हो जाए, तो हम जैसे लोग पीछे हट जाते हैं। उस वक्त संयम कैसे रखें? (P7-0162)
- मोह कैसे छूट जाएगा? (P7-0178)
- अहंकार को कम कैसे करें? (P8-0129)
- अटैचमेंट क्यों है, यह नहीं पता। अपने आप हो रहा है। अहंकार भी हो रहा है। मैं जागरूक हूं, फंसा हूं, पता है, लेकिन निकल नहीं पा रहा हूं। मार्ग दिखाएं। (P8-0149)
- अहंकार का त्याग कैसे करें? (P8-0161)
- मैं को अहंकार क्यों नहीं कहा जाता? (P8-0198)
- आप कहते हैं कि सामर्थ्यवान बनो, पर क्या सामर्थ्यवान बनने से अहंकार नहीं बढ़ेगा? (P10-0117)
- क्या 100% मोह से मुक्त होने पर ही आत्मज्ञान होता है? (P10-0130)
- लोग बहुत घमंडी हैं। ऊंची आवाज में बात ना करो तो दबाने की कोशिश करते हैं। (P10-0132)
- मेरा समाज से, रिश्तेदारों से मोह कम हो रहा है। क्या यह आत्मज्ञान की तरफ बढ़ने का लक्षण है? (P10-0157)
- आत्मिकता से किसी से लेनदेन करें, और अहंकार से करें — इसका हमारे और सामने वाले के आत्मिक स्तर पर क्या प्रभाव पड़ेगा? (P11-0146)
- दृष्टा को देखने के लिए अहंकार को कैसे खत्म करें? (P11-0157)
- बार-बार मोह घेर लेता है। मोह से बाहर कैसे निकलें? (P11-0179)
- दो साल से आपको सुनती हूं। जब भी बंधन से छूटना चाहती हूं, बेटा बार-बार बीमार हो जाता है, और मैं मोह में आकर भगवान से मांगने लगती हूं। इससे बाहर निकलने का रास्ता दिखाइए। (P11-0195)
- हमें ऊर्जा मिलनी बंद क्यों हो जाती है? क्या यह कोई अपराध करने से, किसी को तकलीफ देने से, अहंकार करने से या किसी दूसरे कारण से होता है? इसका समाधान क्या है? (P12-0031)
- आपकी वाणी से मुझे बहुत ऊर्जा मिलती है। मैं इसी तरह निकल जाना चाहती हूं; ऐसा लगता है कि जगत से कुछ नहीं चाहिए, फिर भी कभी-कभी शरीर का मोह आ जाता है। यह कब खत्म होगा? (P12-0063)
- पुराने संस्कार मुझे खींचते हैं, एक झटके में इतनी तगड़ी याद आती है कि लगता है ज्ञान धरा का धरा रह गया; अहंकार पर चोट लगती है तो लगता है यहां से भाग जाऊं। मैं शरीर से तो नहीं जाऊंगी, लेकिन उस मानसिक पीड़ा के समय मैं कौन सा मंत्र या बात याद रखूं कि मुझे निकलना है? और ये चीजें कितने दिन तक काम करती हैं? (P12-0131)
- आप कहते हो ईमानदारी और सत्कर्म करो, और सत्कर्म का मतलब है जरूरतमंद की सेवा। हम चाहते हैं कि जल्दी आत्मज्ञान को उपलब्ध हो जाएं, पर हम जरूरतमंद को ढूंढ भी नहीं सकेंगे, पता कैसे करेंगे कि जरूरतमंद है या नहीं, और जबरदस्ती ढूंढूं तो अहंकार भी आ जाएगा। तो यह कैसे संभव है कि प्रकृति मेरे सामने ऐसे मौके दे? (P12-0138)
- गुरुदेव, भूख-प्यास, शोक-मोह, जीवन-मृत्यु — इनसे कैसे ऊपर उठें? (P12-0171)
- गुरु जी, पहले नाम जप करते थे, सिमरन-वाणी पढ़ते थे, तो अहंकार आ जाता था; काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार उसके अंदर ही चलते थे। लेकिन आपके ज्ञान को अपनाते हैं तो इनका बल क्षीण होने लगता है — यह मैंने महसूस किया; स्वभाव बदलने की कोई कोशिश भी नहीं करनी पड़ती। (P13-0039)
- गुरु जी, आपने एक बार श्रीलंका का बताया था कि वहां लोग हॉर्न नहीं बजाते, और कहा था कि यह भी अहंकार है। मुझे गाड़ी चलाते हुए हॉर्न बजाने की बहुत आदत थी; वह बात समझकर अब नहीं बजाता। और यह भी समझा कि जल्दी पहुंचना चाहते हैं, वह भी अहंकार है। (P13-0040)
- गुरु जी, क्या मात्र अंतर्मुख होकर अपने विचारों को देखने से आसक्ति, द्वेष, काम, क्रोध, अहंकार समाप्त हो सकते हैं, या साथ में ईमानदारी-सत्कर्म भी हो? (P13-0179)
- गुरु जी, माता-पिता का अपने बच्चों के प्रति जो प्रेम होता है, उसे क्या कहेंगे? और बच्चों के मोह से मुक्त कैसे हों, उनसे भी प्रेम कैसे करें? (P13-0188)
- गुरु जी, आपसे प्रेम हो रहा है या मोह, कैसे पता चलेगा? (P14-0006)
- गुरु जी, "निर्मल मन जन सो मोहि पावा, मोहि कपट छल छिद्र न भावा" — इसका थोड़ा विश्लेषण कीजिए। (P14-0078)
- गुरु जी, मोह-माया ही सभी कर्म-बंधनों की जड़ है; जिस क्षण प्राणी इससे परे हो गया, कोई कर्म उसे बांध नहीं सकता — मोह-माया क्या है? (P14-0090)
- गुरु जी, मेरा ज्ञान तो नकारात्मक है — नेति-नेति द्वारा यही ज्ञान होता है कि शरीर, मन, बुद्धि, अहंकार मैं नहीं; कोई आकार, गुण, इच्छा स्थाई नहीं; कर्ता भ्रम है, माया मात्र है। (P14-0104)
- गुरु जी, अभिमान और अहम को थोड़ा विस्तार से समझाइए। (P14-0121)
- गुरु जी, काम, क्रोध, मोह, लोभ — ये सब आत्मज्ञान के बाद खत्म होते हैं या फिर ब्रह्मज्ञान के बाद? (P15-0137)
- मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार — ये अंतःकरण में, शरीर में कहां रहते हैं? कोई कहता है यह शरीर ही मन है — क्या यह सही है? (P15-0150)
- गुरु जी, मद और अभिमान में क्या अंतर है? (P15-0163)
- काम, क्रोध, मद, मोह, लोभ की व्याख्या क्या है? (P15-0164)
- अहंकार को त्यागने का सबसे आसान तरीका क्या है? (P16-0085)
- जो लोग बाद में ये वीडियो सुनेंगे वो पूछेंगे — मोह से निकलें कैसे? (P17-0014)
- मोह कैसे हटे — मुझे समझ आया कि मैं फंसी ऐसे कि उस व्यक्ति से मुझे अपने तरीके से कुछ मिला (मां से दूध, भाई-बहनों से लाड-दुलार); मेरी कोई कमजोरी थी जिसे उसने पोषण दिया। तो अब जो जरूरत मैं दूसरों से पूरी कर रही हूं, वो खुद से पूरी करूं, दूसरों का कंधा छोड़कर अपने आप को मजबूत करूं — तो आसक्ति की जड़ छूट जाएगी और मैं मूल में आ जाऊंगी। क्या यह सही है? (P17-0016)
- भक्ति मार्ग हो या ज्ञान मार्ग, मैंने अपनी लाइफ में भी देखा है कि लोग रिश्तों वाली आसक्ति उठाकर किसी "गुरु" पर शिफ्ट कर देते हैं, और जिसे गुरु समझा वो उस स्थिति में था ही नहीं — इससे कई जिंदगियों से खिलवाड़ हुआ, जीवन और बखेड़ा हो गया। तो विवेक कैसे रखें कि मैं वहां न फंस जाऊं, कि वो अपनी कामना के लिए मुझे मोहरा तो नहीं बना रहा — गुरु को कैसे पहचानें? (P17-0017)
- गुरु जी, अंतःकरण — जिसे मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार कहते हैं — ये किस तरीके से काम करते हैं? और "मन को मार गगन चढ़ जाई, मानसरोवर पैठ नहाई" — तो क्या मन को मारना पड़ता है? (P17-0041)
- गुरु जी, पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश — ये पांच स्थूल तत्व, और मन, बुद्धि, अहंकार — कोई कहता है ये आठों निकृष्ट हैं। क्या भगवान ने निकृष्ट चीजें बनाईं? (P17-0109)
- गुरु जी, प्रेम में स्वाभिमान होना चाहिए या नहीं? अगर प्रेमी अपमान करे और हम कठोरता से प्रतिक्रिया दें तो क्या वह अहंकार होगा? (P17-0165)
- गुरु जी, मोह, आसक्ति, राग-द्वेष, उम्मीद — ये आएं ही नहीं, इसके लिए क्या करें? (P17-0170)
- गुरु जी, मोह का त्याग कैसे करें? (P18-0164)
- गुरु जी, अज्ञानता क्या है? और मोह-मूढ़ता क्या है? (P18-0170)
- गुरु जी, बच्चों/भाई के बच्चों से मोह है — लक्ष्य दिखे वही निकालेगा या और रास्ता है? मोह से कैसे निकलूं? (P19-0071)
- गुरु जी, आप कहते हो कि आपने कभी किसी के दरवाजे जाकर भोजन तक नहीं मांगा। क्या यह अहंकार की बात नहीं हुई? (P19-0113)
- गुरु जी, मैं किसी के प्रति मोह नहीं छोड़ पा रहा — क्या करूं? (P20-0037)
- सेवा करते हुए "मैं ही यह कर रहा हूं, मेरे बिना नहीं होगा" — यह अहंकार न पकड़े, इसके लिए क्या समझें? (P20-0118)
- मुझे जो भी सेवा मिले, गुरु दर न छूटे, यह भाव कम न हो और अहंकार मुझ पर काम न करे — इसके लिए क्या करूं? (P20-0119)
- अगर कभी सूक्ष्म अहंकार आ जाए तो क्या करें — गुरु के दर पर कैसे टिके रहें? (P20-0131)
- ऑफिस में मैं जिम्मेदारी से काम करती हूं और कभी लोगों को कह देती हूं "मैं काम छोड़ूंगी तब पता चलेगा" — क्या ईमानदारी के साथ अहंकार भी आता है? (P20-0153)
- गुरु जी, कुछ लोग कहते हैं कि जिस चीज का मोह हो उसे इतना कर लो कि मोह अपने आप खत्म हो जाए — क्या यह सही है? (P21-0053)
- गुरु जी, लोभ-मोह कहीं-कहीं बहुत भारी हो जाता है, परिवार में फंसे हैं — यह कैसे छूटेगा? (P21-0082)
- गुरु जी, ममता को कैसे रोकें — मोह से कैसे बाहर निकलें? (P21-0086)
- गुरु जी, राग, द्वेष, मोह, आसक्ति — इनके बारे में भी उदाहरण के साथ बताइए। (P21-0183)
- गुरु जी, ईमानदारी के साथ इन शब्दों को जोड़ें तो — राग, मोह और आसक्ति के बीच ईमानदारी और बेईमानी क्या है? (P21-0184)
- गुरु जी, मेरे दो प्रश्न हैं — पहला, अहंकार और शरीर ही मेरी पहचान है, तो अपनी असली पहचान समझने का मकसद क्या है? दूसरा, यहां जितने लोग जमा हैं ज्यादातर बुजुर्ग हैं; सबने आज तक घर-परिवार चलाया, पर परिवार के सदस्य अपनी मनमानी करके चले गए — तो ऐसे लोगों को पालने का क्या मतलब? (P21-0190)
- गुरु जी, रावण भी आत्मज्ञानी था, फिर उसमें अहंकार कैसे आया और वह भगवान राम को क्यों नहीं जान पाया? क्या इसका मतलब हम लोग भी आत्मज्ञान के बाद दोबारा रावण जैसी हरकत करने लगेंगे? (P22-0121)
- गुरुदेव, आपका कथन सही है कि व्यक्ति कामनाओं, मोह और उनके बंधनों में फंसा हुआ है। तो जो व्यक्ति दिन भर ईमानदारी से मजदूरी करके अपने परिवार का पेट भरता है, क्या वह मुक्त है, या कुछ और मार्गदर्शन करें? (P23-0028)
- गुरु जी, जीवन को कैसे जिएं जिससे कि अंत में राग-मोह ना हो? (P23-0069)
- गुरु जी, मोह क्या है? और लोग जो पशु-पक्षी पाल लेते हैं, उसके सहारे जीने लगते हैं — क्या पालना चाहिए? (P23-0089)
- गुरु जी, एक भाषा में कहा जाए तो मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, काम, क्रोध, लोभ — ये सब शरीर में हैं? कुछ लोग अंतःकरण चतुष्टय बताते हैं — मन, बुद्धि, चित्त और आखिर में अहंकार — कि अहंकार नष्ट किए बिना सर्वेश्वर तक नहीं पहुंचोगे। (P23-0103)
- गुरु जी, अहंकार को पूर्ण रूप से कैसे खत्म करें? (P23-0188)
- गुरु जी, मोह-माया प्राचीन काल में क्या थी? उस समय तो कोई मोह-माया नहीं थी, तब भी लोग उसमें कैसे फंस जाते थे? (P23-0192)
- गुरु जी, सत्कर्म करने में भी तो अहंकार आ सकता है — कि मैंने किसी का अच्छा किया? (P24-0150)
- गुरु जी, मुझे करोड़ों मिल भी जाएं, तो मैं उतना ही खाऊंगी, उतना ही पहनूंगी। मान-इज्जत मिलेगी, अहंकार पोषित होगा, और साथ में भय भी — चोर, इनकम टैक्स, दुश्मन। ये दोनों चीजें मुझे दिख रही हैं, वहां मैं रह भी नहीं पा रही। फिर भी जन्मों-जन्मों का अभ्यास है — उसका क्या करूं? (P24-0193)
- गुरु जी, अगर समझ है, तो फिर मोह तो नुकसानदेह ही हुआ ना? वो ठीक कहां रहा? (P24-0199)
- महाराज जी, यदि अपने ही माता-पिता या परिवार के लोग अज्ञान और अहंकार के वश केवल अपना नियंत्रण चलाना चाहें और हमारे सच्चे प्रेम व दर्द को ना समझें, तो क्या मन में बिना किसी द्वेष के उनसे दूरी बनाकर रहना सही है? (P25-0022)
- गुरु जी, प्रेम और मोह में क्या अंतर है? (P25-0030)
- गुरुदेव, पति और बच्चों का मोह कैसे छोड़ें? (P25-0068)
- गुरुदेव, सांसारिक मोह कैसे छोड़ें? (P25-0070)
- गुरु जी, समझ से मैं पैसे और बिजनेस से मुक्त हो गया — ना कोई अटैचमेंट है, ना कोई जरूरत। पर शारीरिक संबंधों में, काम वासना में या बच्चों के मोह में यह चीज सिर्फ समझ से पूरी नहीं हो रही। क्या करूं? (P25-0096)
- गुरु जी, जब शारीरिक संबंधों में या मोह में सुख मिले, तो उस समय हमें क्या करना चाहिए? (P25-0098)
- गुरु जी, गलत काम करना तो दूर, सोचने से ही आत्मा तुरंत मना करती है और दुखी भी होती है, लेकिन हम लोभ-मोह के कारण आत्मा को इग्नोर कर देते हैं और गलत कर्म कर देते हैं। तो क्या उसका शारीरिक फल बाद में मिलता है? (P25-0103)
- अगर गुरु मात्र सहारा है, तो यदि शिष्य गुरु की बातों को बिना तर्क के स्वीकार करता है, तो क्या वह अहंकार का नाश कर रहा है या केवल अपने विवेक को गुरु के हवाले कर रहा है? (P26-0025)