आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

ज्ञान — योगी गुरु जी के प्रश्नोत्तर

इस पृष्ठ पर “ज्ञान” विषय से जुड़े 228 प्रश्न हैं, जो जिज्ञासुओं ने सत्संग में योगी गुरु जी से पूछे। किसी प्रश्न पर क्लिक करके योगी गुरु जी का पूरा उत्तर उनके अपने शब्दों में पढ़ें, वीडियो के साथ।

← सभी विषय · PDF पुस्तकें

  1. गुरु जी, क्या ज्ञान मार्ग और भक्ति मार्ग दोनों एक साथ संभव हैं? (P1-0017)
  2. (भक्त:) आपको जो देते हैं, वह सहयोग, दान या सेवा नहीं है — वह तो (आपके ज्ञान के) उपयोग की भरपाई है। (P1-0027)
  3. गुरु जी, आपके ज्ञान से यही समझ आता है कि यह समझ का मार्ग है, पर हमारे गुरु जी खेचरी मुद्रा सिखाते हैं और कहते हैं कि इससे आत्मज्ञान, ब्रह्मज्ञान सब हो जाएगा। क्या करूं? (P1-0029)
  4. गुरु जी, मैं शरीर को सुंदर बनाकर और ज्ञान के द्वारा मान-सम्मान, प्रभाव और नाम पाने की इच्छा में लिप्त हो गया हूं। छोड़ने का संकल्प लेता हूं, फिर वहीं चला जाता हूं, और करने के बाद दुख होता है। (P1-0071)
  5. गुरु जी, आपको इतना ज्ञान कैसे प्राप्त हुआ? (P1-0099)
  6. क्या मन के विलुप्त होने पर (मन के न होने पर) ही ज्ञान घटित होगा? (P1-0156)
  7. मैं कैसे कहूं कि महात्मा अमीर है? जब मेरी समझ उस स्तर की होगी — जैसे अष्टावक्र गीता में राजा जनक ने सब कुछ दांव पर लगाकर ज्ञान लिया — तब कहूंगा। अभी तो मैं टपरी पर खाने वाला हूं; होटल दिखता है तो मुंह में पानी आता है। मेरे अनुसार तो वही आदमी अमीर हुआ ना। (P1-0166)
  8. अगर मेरे लिए कुटिया आना संभव न हो — जैसे इस पेड़ को पेड़ बनने तक डंडी का सहारा चाहिए — तो संसार में रहते हुए ज्ञान का वह सहारा मुझे कैसे मिले? (P1-0186)
  9. क्या परम ज्ञान के दौरान पूरे शरीर में संवेदनाएं होती रहती हैं? (P2-0012)
  10. गुरु जी, ज्ञान, पवित्रता, प्रेम, शांति, सुख, आनंद और शक्ति — क्या ये आत्मा के कवच हैं? विस्तार से बताएं। (P2-0152)
  11. योगी जी, आपने जो लक्ष्य बनाया, उस पर इतने अटूट निश्चय से चले; सामने भोजन और पेट में भूख होते हुए भी आपका स्वाभिमान ऐसा कि कभी गिड़गिड़ाए नहीं। आपने इतने कष्ट झेलकर हम जिज्ञासुओं के लिए जगह, भोजन, ज्ञान — सब उपलब्ध कर दिया। फिर हममें वह लगन, वह तड़प क्यों नहीं है? आपकी लगन और भाव क्या रहा होगा? (P2-0180)
  12. ज्ञान होने तक तो ये घाव बार-बार हरे हो जाते हैं; याद आते ही मन घृणा से भर जाता है और न चाहते हुए भी उनके लिए बद्दुआएं निकल जाती हैं। फिर डर लगता है कि इस द्वेष से मैंने फिर कर्म-बंधन बांध लिया। अगर ज्ञान से पहले शरीर छूट गया, तो क्या इस द्वेष के कारण मैं फिर उन्हीं के इर्द-गिर्द, उनके परिवार में पैदा हो जाऊंगा — वही चक्र, जिसे मैं तोड़ना चाहता हूं? (P2-0184)
  13. तो ज्ञान से पहले, जब भी ऐसी यादें सताएं, क्या मुझे यह समझ लेना चाहिए कि यह मेरे ही कर्मों का परिणाम था — उन्होंने जैसा बर्ताव किया, ठीक किया; गलती मेरी थी कि मैंने उनसे उम्मीद रखी? (P2-0185)
  14. तो जब भी मेरी मनोस्थिति ऐसी बने कि वे बातें मुझे घायल करें, मुझे इस ज्ञान का सहारा लेना चाहिए कि छटपटाने से फायदा नहीं; कर्म याद नहीं, पर जो फल मिल रहा है उसका जिम्मेदार मैं ही हूं — क्या यही समझ सही है? (P2-0186)
  15. एक साल साधकों को बहुत समय दिया; अब स्पेस कहां — ज्ञान रूपी बीज कहां बोएं कि दरख्त बने? हम अंदर स्पेस/प्रबल जिज्ञासा कैसे बनाएं? (P3-0013)
  16. संसार में संघर्ष-कंपटीशन से पहुंचे; अध्यात्म में कंपटीशन नहीं पर कर्मबंधन उलझे यादें ताजा। ज्ञान ने काबिल बनाया देखने को — मटेरियल अभी भी वर्क करता है, रोष आता है। बारीकी से कैसे चलें कि रोष कम हो? (P3-0026)
  17. साधक गुरु के प्रेम-ज्ञान से भरकर कुछ अर्पण करना चाहे — कंबल आदि वस्तु या भाव — तो गुरु को क्या दे कि वह भाव पूजा बन जाए? व्यक्तिगत गुरु को क्या चाहिए? (P3-0035)
  18. ज्ञान मार्ग कठिन क्यों? आश्वासन क्यों नहीं? प्रश्न क्यों जरूरी? (P3-0047)
  19. हर कोई गुरु सानिध्य में नहीं रह सकता — जिम्मेवारियां। क्या शब्द/ज्ञान से दूर रहकर चलें? एक महीना? (P3-0064)
  20. सेवा करते अहंकार/प्रतिस्पर्धा — 'मैं सेवा कर रहा' भाव; सुविधा नहीं ज्ञान/समाज निमित्त चाहिए? (P3-0070)
  21. बच्चों/दूसरों पर ज्ञान-फैसला थोपें? अपना-पराया खुलकर? (P3-0084)
  22. अर्जुन के पास तो कृष्ण जैसे सद्गुरु बचपन से थे (बुआ के लड़के, रिश्तेदार) — तब उन्हें उपलब्धि क्यों नहीं हुई? कृष्ण ने गीता का ज्ञान युद्ध के समय ही क्यों दिया, पहले क्यों नहीं? क्या यह पात्रता की बात है? (P3-0111)
  23. संजय को भी तो दिव्य दृष्टि दी गई थी और उसने पूरी गीता धृतराष्ट्र को सुनाई — फिर संजय को ज्ञान क्यों नहीं हुआ, केवल अर्जुन को क्यों? (गीता में एक अध्याय 'संजय उवाच' क्यों?) (P3-0114)
  24. (कुटिया में, इंदौर से आए 75 वर्षीय साधक) मैं पहले भी अध्यात्म में बहुत चला — साधना करो, यज्ञ-हवन करो, साधना से प्रकाश आएगा, भगवान का दर्शन होगा — पर समझ नहीं आया। 13 दिन से आपके वीडियो दिन-रात सुनकर समझ आया कि प्रत्यक्ष ज्ञान में चार-पांच ही बातें हैं; मैं करूंगा तभी होगा, किसी और के करने से नहीं; मैं ही हूं, कहां जाऊं। इसलिए घर से रोटी बांधकर सीधा चला आया। अंतिम इच्छा यही है कि आप रखो तो यहीं रह जाऊं। गुरुदेव, इससे आगे क्या है? (P3-0174)
  25. (कुटिया में साधक) आप तो भगवान के पद को प्राप्त हुए; आपने वीडियो में बताया कि उस स्थिति में आने के लिए आपने कितनी मेहनत की। बाकी सबने वेदों के पठन आदि से ज्ञान लिया, पर आपके यहां तो खाली प्रत्यक्ष ज्ञान का मूल — ईमानदारी, सत्कर्म और सत्संग — है। क्या इतने से हो जाएगा, और जीवन में गुरु की कितनी जरूरत है? (P3-0181)
  26. (लाइव) प्रणाम योगी जी। परम सत्य या निर्वाण की प्रकृति — परम ज्ञान, मोक्ष या निर्वाण के बाद की अवस्था — को शब्दों में बांधना असंभव माना गया है; इसे हमेशा ‘नेति नेति’ (यह नहीं, यह नहीं) कहकर ही समझाया जाता है, क्योंकि हमारा मन केवल सीमित चीजें ही समझ सकता है। क्या यह सत्य है? (P4-0023)
  27. (लाइव) प्रणाम योगी जी। क्या आत्मज्ञान होने पर दिव्य दृष्टि खुल जाती है, जिससे भूत-भविष्य का ज्ञान पहले से ही हो जाता है? (P4-0031)
  28. (लाइव) प्रणाम योगी जी। मैं नवंबर 2024 से आपका सत्संग सुन रहा हूं और आपके ज्ञान पर चल रहा हूं; बहुत कुछ समझ में भी आ रहा है। पर अब घर पर मन नहीं लग रहा, सारा दिन उदासी में बीतता है। मार्गदर्शन दीजिए। (P4-0033)
  29. (लाइव) योगी जी प्रणाम। आप प्रत्यक्ष ज्ञान में ईमानदारी और सत्कर्म अपनाने को कहते हो। सत्कर्म तो समझ में आ गया; कृपा करके ईमानदारी को समझा दीजिए। (P4-0035)
  30. (लाइव) प्रणाम गुरु जी। मुझे अपना (पुराना) सॉफ्टवेयर डिलीट करना है और आपके ज्ञान का सॉफ्टवेयर अपने अंदर इंस्टॉल करना है। कैसे करूं? (P4-0039)
  31. (लाइव) प्रणाम योगी जी। क्या वास्तव में कोई ऐसी अवस्था है जहां दुख, बंधन और अज्ञान पूर्णतः समाप्त हो जाते हैं और केवल शांति, ज्ञान और आनंद ही शेष रहता है? (P4-0083)
  32. (कुटिया में साधक) जब मैं खोज रहा था तो किसी ने कहा एक फकीर बाबा से मिलो। उन्होंने कहा कि कुरान पढ़ो, वही आखिरी किताब है, उससे ज्ञान की प्राप्ति हो जाएगी। मैंने पूछा कि हमारी किताबों में पुनर्जन्म का कांसेप्ट है, कुरान में नहीं — तो उन्होंने कहा कि हम सिर्फ एक ही बार आए हैं, रूहें एक जगह रहती हैं, कयामत के दिन सब जागेंगे। मैं यह जानना चाहता था कि जिस ज्ञान की आप बार-बार बात करते हैं, क्या अलग-अलग धर्मों में अलग-अलग तरह का ज्ञान मिलता है, या सबको एक ही तरह का ज्ञान मिलता है? (P4-0091)
  33. (लाइव) प्रणाम गुरु जी। क्या खुद को समझने के लिए सारा ज्ञान त्यागना जरूरी हो जाएगा? कृपा करें। (P4-0100)
  34. (लाइव) गुरु जी प्रणाम। प्रत्यक्ष ज्ञान के अनुसार पूर्व जन्म और पुनर्जन्म होता है, तो शोषणकर्ता को इससे यह सांत्वना मिल जाती है कि अभी तो मजे कर लेता हूं, अगले जन्म में जो होगा देख लेंगे। स्पष्ट करें। (P4-0153)
  35. (वही साधिका) मैं आपकी बात स्वीकार करती हूं — 'आई एक्सेप्ट इट'। (इस पर) प्रत्यक्ष ज्ञान को 'स्वीकार करना' क्या है? (P4-0165)
  36. (वही साधिका) मार्केट में नकली ज्यादा पॉलिश करके बिकता है, चाहे अध्यात्म ही क्यों ना हो; असली थोड़ा डर्टी भी दिख सकता है। असली और नकली (गुरु/ज्ञान) की पहचान कैसे की जाए? (P4-0186)
  37. (वही साधिका) मैं बहुत सी चीजों से मुक्त हो गई — ईर्ष्या, समाज, रीति-रिवाज, अंधी पूजा-पाठ, मां-बाप का मोह। लेकिन आर्थिक डर पर आकर अटक जाती हूं — अगर मेरे पास पैसे नहीं हुए तो जिंदगी कैसी होगी? ईमानदारी से (ज्ञान के) वीडियो बनाती हूं तो लोग सुनते नहीं, कमाई घट गई है। इस डर को कैसे खत्म करूं? (P4-0189)
  38. (वही साधिका) एक ज्ञान मार्ग है, एक भक्ति मार्ग। भक्ति मार्ग के लोग अंधविश्वास में पड़ते हैं, ज्ञान मार्ग में पूजा-पाठ, मंत्र-जप, टीका कुछ नहीं। पर विवेकानंद ज्ञानी थे, रामकृष्ण परमहंस भक्ति मार्ग के — दोनों में भेदभाव नहीं था। हम इसी उलझन में पड़ते हैं कि कौन श्रेष्ठ है; मेरा तो भक्ति मार्ग से भरोसा ही उठ गया है। (P4-0197)
  39. (वही साधिका) जो हमारे साथ चल रहा है, उसके ज्ञान पर भरोसा हो कि वो पक्का है — पर हम तो अभी कच्चे हैं। आपने कहा कच्चा टिक नहीं पाएगा — तो पक्का होने के लिए क्या करें? टिकने का मतलब यहां टिकना या अपनी लाइफ में? और क्या कोई ऐसा भी सवाल है जिसका जवाब ना हो — जैसे लोग कहते हैं पहले मुर्गी आई या अंडा? (P5-0008)
  40. (कुटिया में एक युवक) किताबों में पढ़ते हैं कि दूसरों के अनुभव से सीख लो; गीता में श्री कृष्ण ने बताया कि ये काम करो, ये मत करो — पर सुनकर, ज्ञान और समझ होते हुए भी मन नहीं मानता, कहता है एक बार करके देखते हैं। आपने भी कहा था कि आप हर जगह गए, यह देखने के लिए कि वहां कुछ नहीं है। तो जब कृष्ण ने कह दिया कि भगवान बाहर नहीं है, फिर भी मन मानता नहीं — मन को कैसे मनाऊं? किसकी बात सही मानूं? (P5-0016)
  41. आत्मज्ञान के बाद अगर लगता है कोई नहीं है / सब परमात्मा है, तो ज्ञानी समझाते क्यों? एकांत में क्यों नहीं चले जाते? (P5-0031)
  42. बहुत किताबें-सत्संग सुने, लगता ज्ञान इकट्ठा हो गया पर दिल नहीं बदला। कैसे जानूं आत्मिक कल्याण हो रहा है? (P5-0076)
  43. ज्ञान की आयु होती है क्या? छोटा आयु का बड़े से ज्ञान में अधिक हो सकता है? (P5-0077)
  44. प्रत्यक्ष ज्ञान देखने वाला ही देखता है — क्या यही है प्रत्यक्ष ज्ञान? आत्मा असीम-अमर-अनंत है क्या? (P5-0081)
  45. ज्ञान का ज्ञान ही आत्मज्ञान है — क्या मतलब? (P5-0089)
  46. प्रत्यक्ष ज्ञान समझने लगी हूं — क्या मूर्तियों के आगे सिर झुकाना/हाथ जोड़ना चाहिए? (P5-0090)
  47. ज्ञान/भगवत् प्राप्ति पर आवागमन मिटे, संसार चले — आत्मा कहां? मुक्ति किसकी जब आत्मा स्वतंत्र? माता-पत्नी झगड़कर अलग — क्या करें? (P5-0131)
  48. ज्ञान/समझ दिन में बदलती रहती है — ईमानदारी स्थिर कैसे रहे? (P5-0135)
  49. जगह बदलने से स्थिति नहीं बदलती कहते हो — पर घर छोड़कर ही ज्ञान हुआ? कुटिया नियम हर कोई नहीं पाल सकता? (P5-0142)
  50. प्रपंच में रहकर प्रत्यक्ष ज्ञान/आत्मज्ञान कैसे? पुस्तक है? नाम-दम लिया पर आपका सत्संग अच्छा — रास्ता? सांस/मंत्र ही ध्यान? (P5-0143)
  51. शरीर की तीन अवस्थाएं बताई जाती हैं, जागृत, स्वप्न और सुषुप्ति। इस समय हम जागृत अवस्था में हैं, ऐसा कहा जाता है। जब स्वप्न में होते हैं तो उसे सच मान लेते हैं, पता ही नहीं रहता कि स्वप्न चल रहा है, जागृत की तरह लगता है। स्वप्न टूटते ही लगता है कि वह कुछ और था और अब कुछ और है। उसको अनुभव करने वाला कौन है? कई जगह जाकर सुना कि आत्मा है। अगर आत्मा का अनुभव एक बार हो गया, उस बिंदु को छू लिया, तो फिर दूसरों के दर जाने की क्या जरूरत? इससे तो लगता है कि आत्मा है ही नहीं। क्या हम रोबोट की तरह हैं, जिसमें मेमोरी फिट कर दी गई है, इनपुट डाल दिया गया है, और टेक्नोलॉजी से ऊपर का अनावश्यक ज्ञान दिया जा रहा है? इसे उदाहरण से स्पष्ट करें, ताकि सरलता से समझ आए और जीवन भर उस पर चला जा सके। स्वप्न तो ऐसे भी आते हैं जो इस जन्म की कामना नहीं लगते, ऐसे दृश्य, लोग और रूप जिनकी कल्पना भी नहीं हो सकती। (P6-0039)
  52. किसी के सानिध्य में मानकर जानकारी मिली, फिर कुछ समय बाद लगा कि यह धोखा है, अभी अधूरा है, कहीं और सुनने से लगा कि पूरा होना बाकी है। फूल में खुशबू के साथ रस और ऊर्जा भी है, यह पहले नहीं जाना था। शरीर जल जाए तो ऊर्जा वहीं की वहीं रहती है। पहले भान था कि आत्मा शरीर के अंदर है, मैं आत्मा हूं। विवेक बढ़ने पर लगा कि अपने आप को आत्मा मान लेना भी धोखा है, क्योंकि किसी के कहने से माना है, प्रत्यक्ष नहीं हुआ। बोध कैसे होगा, कोई बताता नहीं। सन् दो हजार पांच से अलग अलग महात्माओं, साधुओं और संतों के पास रहा, गृहस्थ में रहा। उन्हें पूरा ज्ञान नहीं, ऐसा वे नहीं कहते। किसी और का ज्ञान सुनकर भीतर थोड़ा विवेक जागता है, जैसे नर्सरी से एलकेजी या फर्स्ट में आ गए, फिर लगता है अभी और बाकी है। कुछ समय तृप्ति रहती है, खिलौने जैसी, फिर खिलौना लगने लगता है। ऐसे निमित्त और अधूरे लगने वाले ज्ञान को कैसे देखें? (P6-0042)
  53. निर्विकार बहुत ऊंची अवस्था है। विकार है, तो कभी निर्विकार भी रहे होंगे, तभी विकार हटाने का प्रयास है। स्वप्न की बात हो चुकी। उसके बाद कारण अवस्था आती है, जिसमें शरीर को विश्राम मिलता है और मन को विश्राम मिलता है। वह अवस्था क्या है? उसमें जाकर इंसान सब कुछ भूल जाता है, ऐसा लगता है। हम भी उतनी ही जानकारी तक जाकर खड़े हो जाते हैं, जैसे रोबोट मेमोरी के बिंदु तक छूकर लौट आता है। कहने को जागृत है, पर जागृत भी धोखा लगता है। मैं प्रकृति का ही हिस्सा हूं, फिर अपने को और प्रकृति को अलग क्यों समझें? फूल का एक पत्ता समझ में आ जाए तो फूल समझ में आ जाए, पर इसी को समझ नहीं पा रहे। समझ शरीर के माध्यम से ही हुई, जहां जहां गए ज्ञान होता गया, अपनाते गए, सानिध्य में काम किया, समझ भीतर विकसित होती गई। फिर भी कारण अवस्था का उत्तर नहीं मिला, जब ऐसा हो जाता है कि कुछ रहा ही नहीं। क्या कारण से मुक्त होना निर्विकार है? (P6-0044)
  54. योगी जी नमन। पंजाब से एक बहन है, छह महीने पहले शादी हुई। डेढ़ साल पहले भाई को वीडियो मिली, उनकी रुचि थी, बहन का यह मार्ग नहीं था। कुटिया आने से पहले बहन कहती थी कि मैं बहुत बातें करती हूं, मैं यहां रह नहीं पाऊंगी। फिर भी नियम ऐसे सहज स्वीकार हो गए कि नियम लगे ही नहीं। बैठने का कोई काम नहीं, फिर भी पूरे समय सहज बैठी रहती है, किसी को देखती नहीं। भाई की ओवरथिंकिंग छूट गई, बहन वीडियो कम सुनती है, और दोनों निरंतर नियम में हैं। जिज्ञासा यह है कि एक जीवात्मा अपनी यात्रा के लिए इतनी उत्सुक कैसे हो जाती है? किस मोड़ से अपने आप को निकालना चाहती है? प्रत्यक्ष ज्ञान निमित्त बना, शादी हुई, और ऐसी जगह आना जैसे यह बहुत आवश्यक हो। यह संभव कैसे हो पाया? क्या वह कोरे कागज की तरह समझ रही है? और जो पहले कुछ पढ़कर या कोई प्रक्रिया करके आता है, उसका मन तुलना में लग जाता है, यहां ऐसा क्यों नहीं, वैसा क्यों नहीं, कुछ हो नहीं रहा, इतने दिन हो गए, तो क्या पिछला छोड़कर यहीं समझना चाहिए? (P6-0054)
  55. जब साधक आत्मचिंतन के लिए बैठता है, तो क्या चिंतन करे, क्या मनन करे, क्या सोच-विचार करे, जिससे आत्मचिंतन हो, आगे उन्नति हो, आत्मकल्याण हो और तत्व का अनुभव हो जाए? वीडियो बीच में कट जाते हैं, इसलिए जो सोलह बातें बताई जाती हैं, उनका एक छोटा पैंफलेट या पुस्तक हो, जिसे जेब में रखकर बार-बार देख सकूं, तो ज्यादा लाभ हो। मैं झुंझुनू के पास से आया हूं। आज सोलहवां दिन है। ग्रंथों में पढ़ा है कि आत्मा है, पूर्ण है, पर वह ज्ञान अनुभव में कैसे उतरे? घर और संबंधों का चिंतन चलता रहता है। बैठकर ऐसा क्या सोचूं, क्या मनन करूं, कि मूल की ओर बढ़ूं और अनुभव हो जाए? (P6-0062)
  56. प्रत्यक्ष ज्ञान क्या है? यह किस प्रकार सबके लिए सरल है? क्या इसे अपनाने के बाद किसी गुरु मंत्र, नाम, जप या योग की जरूरत नहीं रहती? (P6-0071)
  57. बैठते ही अपने आप ज्ञान की बातें उठने लगती हैं। पहले केंद्र पर लोगों के प्रश्नों का जो उत्तर दिया, अब लगता है उससे बेहतर उत्तर देना चाहिए था। ऐसे विचार आते हैं तो क्या करूं? (P6-0107)
  58. कृपा से बहुत कुछ हुआ है। आगे मार्गदर्शन और आशीर्वाद दें। जो मिला है उसे औरों में बांटूं। साक्षात्कार हुआ है, तो क्या ज्ञान बांटूं? (P6-0113)
  59. गीता में निष्काम कर्म की शिक्षा है, शास्त्रों में लिखा तो ठीक है, पर हम अपने तरीके से ग्रहण कर रहे हैं। शास्त्र पढ़ें या क्या करें? गुरु के पास अपना पढ़ा हुआ ज्ञान लेकर जाएँ तो क्या होता है? (P6-0155)
  60. प्रियंका गुप्ता पूछती हैं, जब आपने ज्ञान पाया तो क्या ध्यान और साधना की थी? कारोबार में सौ प्रतिशत झूठ बोलना पड़ता है, सत्कर्म नहीं हो पाता। क्या ध्यान परमात्मा को पाने का मार्ग नहीं है? (P6-0188)
  61. किस साधना से आत्मसाक्षात्कार हुआ? क्या ध्यान किया है? बताइए। गुरु से ज्ञान लो और आगे बढ़ो, इसका मतलब क्या है? (P7-0003)
  62. दीप पूछते हैं, ज्ञान के लिए चक्रों को एक्टिव करना जरूरी है क्या? (P7-0012)
  63. जितने संत-सन्यासी को ज्ञान प्राप्त हुआ, उन सबने पूजा-पाठ और आडंबर का विरोध किया। क्या यह सही है? (P7-0042)
  64. गुरु जी, क्या आत्मज्ञान के बाद व्यक्ति को अपने पूर्व जन्म का ज्ञान भी हो जाता है? क्या आप अपने पूर्व जन्म को देख पाते हो? (P7-0118)
  65. एक श्रोता कहता है, आपके द्वारा प्रत्यक्ष ज्ञान की लहरें उठ रही हैं, जिसके भी बंधन होंगे वे अपने आप टूट जाएंगे, और आत्मिक कल्याण सौ प्रतिशत होना ही है। इस पर क्या कहना है? (P8-0049)
  66. प्रत्यक्ष ज्ञान पर थोड़ा प्रकाश डालें। आपकी कृपा। (P8-0051)
  67. एक साल तक आपसे ज्ञान लिया और आपकी आलोचना करता है। यह किस योग्य है? विस्तार से बोलिए। (P8-0064)
  68. आपने कहा था कि जिसे ज्ञान हुआ है वह छल नहीं कर सकता। क्या यह सच है? (P8-0077)
  69. आत्मबोध शुद्ध अद्वैत है। निर्गुण ब्रह्म सगुण साकार होता है, उसे द्वैत कहा जाएगा। कौन सा मार्ग ज्यादा सही है, ज्ञान मार्ग? (P8-0089)
  70. ज्ञान, पवित्रता, प्रेम, शांति, सुख, आनंद और शक्ति, क्या यह आत्मा का स्वभाव है? विस्तार से बोलिए। (P8-0090)
  71. ज्ञान और समझ में क्या अंतर है? (P8-0101)
  72. हम अपने आप को इतना निकृष्ट कर लिए हैं कि ज्ञान पूरी तरह ग्रहण नहीं कर पा रहे। और अवधूत स्थिति या समाधि के लिए अगर कोई यज्ञ-हवन करे, तो क्या यह अंधविश्वास है? (P8-0136)
  73. मैं पैसों का योगदान नहीं कर सकती। क्या मैं आपका चैनल बनाकर आपके ज्ञान को लोगों तक पहुंचाकर अपने गुरु का साथ दे सकती हूं? क्या यह मेरा सत्कर्म होगा? (P8-0139)
  74. मैं आपसे मिलना चाहता हूं, आपके पास कुछ दिन रहना चाहता हूं, ज्ञान सीखने के लिए। क्या आ सकता हूं? (P8-0146)
  75. जब काम का आवेग आता है, तब ज्ञान ढक जाता है, और यह चक्र चलता रहता है। इससे ऊपर उठने के लिए क्या करें? जरूरत का मतलब क्या है? (P8-0199)
  76. आप जो ज्ञान देते हो, वह सही है, या और भी ज्ञान है जिसके बारे में अभी तक पता नहीं? (P9-0020)
  77. आपने प्रत्यक्ष ज्ञान पर पुस्तक लिखी। अहिंसा कब लिखेंगे, सहनता कब लिखेंगे? (P9-0046)
  78. आत्मा को ज्ञान पहले से है, तो हम प्रयास क्यों करें? (P9-0048)
  79. गुरु जी, आप संकल्प में बंधे हुए हैं, इसलिए ब्रह्म ज्ञान आपसे दूर है, और हम विकल्प में फंसे हुए हैं, इसलिए आत्मज्ञान से दूर हैं। (P9-0075)
  80. हमें ब्रह्म ज्ञान हो गया है, हम कुटिया में आना चाहते हैं। क्या ब्रह्मज्ञानी को कुटिया में जगह है? (P9-0092)
  81. अभी ब्रह्म ज्ञान का विरोध किया। कल बताएं कि अवधूत और आत्मज्ञान के आगे भी कुछ होता है। वह ब्रह्म ज्ञान है। क्या समझें, फिर बताइए। (P9-0103)
  82. मैंने देखा है कि बुद्धि, ज्ञान और चालाकी हमेशा फंसाती ही है। उसके परे जो है, वह अनिर्वचनीय है। आप क्या कहते हैं इस पर? (P9-0113)
  83. जब हम आपको सुनते हैं तब लगता है कि मैंने समझा, लेकिन बाद में वह उड़ जाता है। क्या करूं कि वह ज्ञान स्थिर स्थिति से आए और जीवन में उतरे? (P9-0166)
  84. महाराज जी, जब से ज्ञान समझा हूं तब से अंदर तकलीफ और दर्द तेज हो रहा है। संसार में जो मदद करता है वह फिर वसूलने लगता है। ऐसा क्यों है? परिवार में भी ऐसा ही होता है? (P9-0171)
  85. आपका ज्ञान समझ में आता है, फिर एक समझ आती है, फिर दूसरी। एक ही समझ क्यों नहीं टिकती? क्या जब तक आत्मज्ञान नहीं होगा, उथल-पुथल और नए-नए समझ आते ही रहेंगे? (P9-0182)
  86. आपका वीडियो देखता हूं, सत्संग सुनता हूं, और ज्ञानियों की वाणी, संतों के वचन, इन सबसे मन अच्छा हो जाता है, शांत हो जाता है। (P10-0042)
  87. बाबा जब बनते हैं तब लंबी दाढ़ी और भगवा वस्त्र धारण करते हैं। लेकिन आपका अलग है। मुझे समझ में आ गया कि गुरु ज्ञान का प्रतीक है। मैंने भी धारण किया था। (P10-0058)
  88. हम हर बार गिर जाते हैं। क्या ऐसी कोई स्थिति है या ऐसा ज्ञान होता है जिसके बाद हम चाहकर भी ना गिर सकें? (P10-0069)
  89. क्या प्रत्यक्ष ज्ञान विपश्यना जैसा ही है? (P10-0082)
  90. योगी जी, आत्म साक्षात्कार होने के बाद क्या परमात्मा के ज्ञान के लिए और भक्ति करनी होती है? (P10-0089)
  91. योगी जी, मैंने संत रामपाल जी महाराज से दीक्षा ली है। वे कहते हैं कि आत्म साक्षात्कार से बात नहीं बनती, परमात्मा का ज्ञान भी होना चाहिए। (P10-0099)
  92. मुझे आत्मज्ञान हुआ है। लोगों को कैसे ज्ञान बांटूं? लोगों को सत्य बताने जाओ तो पागल समझते हैं। (P10-0122)
  93. योगी जी, आपका ज्ञान समझती हूं और उस पर चलने की कोशिश भी करती हूं, पर जो संकल्प करती हूं उस पर टिके रहना मुश्किल होता है। कभी-कभी परिस्थिति ऐसी बनती है कि गृहस्थी के हिसाब से रहना पड़ता है। ऐसे में क्या करें? (P10-0181)
  94. आपने ज्ञान कहां से लिया, कौन-सी मेथड है? आपका कोई गुरु भी नहीं दिखता। (P11-0107)
  95. क्या परम ज्ञान के मार्ग पर भाग्य पर भरोसा कर सकते हैं? (P11-0113)
  96. आपका ज्ञान, भाव, स्थिति देखकर आंखों में आंसू आ जाते हैं — जैसे नर्मदा तट पर आपने कहा था "मुझे घर वापस जाना है"। क्या इसे अंतःकरण शुद्ध होने का लक्षण समझ सकते हैं? (P11-0123)
  97. आपका ज्ञान गीता, भागवत, ज्ञानेश्वरी जैसा ही है? (P11-0128)
  98. पहले गुरु ज्ञान देने से पहले शिष्य से 12 साल सेवा करवाते थे; आज गुरुओं ने लंगर लगा रखा है, कहते हैं पहले ज्ञान ले लो, सेवा बाद में कर लेना। इसमें क्या अंतर है? (P11-0150)
  99. कोई एक अक्षर का ज्ञान दे रहा है, कोई दो का, कोई पांच का; कोई राम कहता है, कोई अल्लाह, कोई वाहेगुरु — असल में कहना क्या है? (P11-0151)
  100. जिंदगी में हमें जो भी मिलता है — इंसान से लेकर कोई भी जीव — क्या वह लेनदेन के कारण है? और क्या आध्यात्मिक ज्ञान के बाद मनुष्य अपनी मर्जी से शरीर त्याग सकता है? (P11-0164)
  101. ज्ञान होने के बाद याचना करना उचित है क्या? (P12-0004)
  102. आपके ज्ञान से मैं समझ सका कि हमारा आना क्यों हुआ और हमें जाना कहां है। पर यह भी समझ रहा हूं कि भगवान और परमात्मा को हमसे कुछ लेना-देना नहीं, उन्हें हमारी कोई परवाह नहीं। फिर आप हमारी परवाह क्यों करते हैं? (P12-0014)
  103. क्या ज्ञान मार्ग में किसी प्रकार का मनोरंजन, जैसे संगीत या भजन सुनना-गाना, ठीक नहीं है? (P12-0039)
  104. पुराने जमाने में संतों ने मेहनत-मजदूरी करके ज्ञान का प्रचार किया था; आज लोग उन्हीं के वचनों का सहारा लेकर, ऐशो-आराम की जिंदगी जीकर लोगों को ठग रहे हैं। क्या ऐसे लोगों से आत्मज्ञान संभव है? (P12-0053)
  105. मैं गृहस्थ हूं; बरसों से सत्संग सुनता हूं — रोज चार-पांच घंटे रामकृष्ण परमहंस जी को और एक घंटा आपको — इतना ज्ञान भर गया है, पर भीतर की अनुभूति के लिए एकांत चाहिए, जो घर-गृहस्थी में हो ही नहीं पाता। एकांत के लिए जाना चाहता हूं तो पत्नी और परिवार रोक लेते हैं, उन्हें डर रहता है कि कहीं गृहस्थी ना छोड़ दूं। क्या करूं? (P12-0104)
  106. आज हम पांच-छह लोग यहां बैठकर आपके मुखारविंद से ज्ञान ले रहे हैं — ये भी कभी ना कभी हमने ही डिमांड किया होगा कि ऐसी जगह हो, ऐसा वातावरण हो। अब इसका लाभ उठाऊं या ना उठाऊं, ये मेरा सौभाग्य या दुर्भाग्य है। तो इस माहौल के साथ मुझे कैसे ईमानदार रहना है? (P12-0119)
  107. सांसारिक चीजों में तो समझ आता है — छोटी नौकरी छोड़ी, ज्यादा पैसा मिला तो वहां शिफ्ट हो गए और पुरानी याद ही नहीं आती। लेकिन अध्यात्म में आपका ज्ञान कहता है कि तुझे यहां से निकल जाना है, अपने घर जाना है — वो मुझे कंटीन्यूसली याद नहीं रहता, फिर मैं वहीं धुनने चला जाता हूं। तो वो सतत कैसे याद रखूं? (P12-0130)
  108. पुराने संस्कार मुझे खींचते हैं, एक झटके में इतनी तगड़ी याद आती है कि लगता है ज्ञान धरा का धरा रह गया; अहंकार पर चोट लगती है तो लगता है यहां से भाग जाऊं। मैं शरीर से तो नहीं जाऊंगी, लेकिन उस मानसिक पीड़ा के समय मैं कौन सा मंत्र या बात याद रखूं कि मुझे निकलना है? और ये चीजें कितने दिन तक काम करती हैं? (P12-0131)
  109. जन्मों-जन्मों के संस्कार ही मेरा बेसिक नेचर बन गए हैं, लोग कहते हैं ये नहीं बदलने वाला। अध्यात्म की यात्रा में भी मैं उसी संस्कार को बार-बार पोषण दे रहा हूं — वही लोभ-लालच, मान का चक्कर, छल-कपट — उसी लूप में घूम रहा हूं। तो क्या प्रत्यक्ष ज्ञान यह कहता है कि उस पुरानी जड़ता को मिटाने के लिए मैं उसे पोषण ही ना दूं और नई आदत बनाता रहूं — और इसी का नाम साधना है? (P12-0135)
  110. अभी तक हम YouTube पर बहुत वीडियो देखते हैं — पर कहते हैं गुरु बिना ज्ञान नहीं होता? (P12-0158)
  111. (लाइव में) मैं ज्ञान के लिए श्रम सेवा कर सकता हूं। (P12-0166)
  112. गुरु जी, आप जो ज्ञान देते हैं वह हमारे कानों तक पहुंच जाता है, पर कानों से दिमाग में नहीं जाता। (P12-0168)
  113. गुरु जी, आपको इतना ज्ञान है — क्या यह आपके पिछले जन्म की यात्रा है? (P13-0029)
  114. गुरु जी, आपके ज्ञान से समझ लगी है कि अध्यात्म का मार्ग क्या है, कैसे अपने आप को तारना है, कैसे बंधनों से आजाद होंगे। तो आप ऐसी कृपा भी करें कि हम इन बंधनों से छूट जाएं। (P13-0035)
  115. गुरु जी, पहले नाम जप करते थे, सिमरन-वाणी पढ़ते थे, तो अहंकार आ जाता था; काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार उसके अंदर ही चलते थे। लेकिन आपके ज्ञान को अपनाते हैं तो इनका बल क्षीण होने लगता है — यह मैंने महसूस किया; स्वभाव बदलने की कोई कोशिश भी नहीं करनी पड़ती। (P13-0039)
  116. गुरु जी, आपने कहा कि गुरु शरीर नहीं है, गुरु ज्ञान है। मेरे जीवन में कई संत-महापुरुष आए; आपसे पहले संत हरपाल सिंह जी को भी सुनता हूं, वे भी बिल्कुल आप जैसा बोलते हैं। तो मैं यह समझता हूं कि मेरा गुरु दो शरीरों में मुझे ज्ञान दे रहा है — कभी भटकता हूं तो आप पकड़ लेते हो, कभी वे। (P13-0041)
  117. गुरु जी, कई बार विचार आता है कि कोई बात नहीं, धीरे-धीरे पार उतर जाएंगे। पूरी ईमानदारी से जीवन जीने में घर-परिवार का भरण-पोषण भी मुश्किल से होगा, दुनियावी तकलीफें सहनी पड़ेंगी, तो मन पीछे हो जाता है कि एक-दो-चार जन्म और लग जाएंगे; ज्ञान तो आ ही गया, ईमानदारी-सत्कर्म-सत्संग पर चलते रहेंगे, धीरे-धीरे कल्याण हो जाएगा। (P13-0042)
  118. स्वामी जी, आपका ज्ञान एकदम आसान है — इंसान अगर समझ ले, तो उसके लिए जीते-जी मोक्ष है। (P13-0045)
  119. योगी जी, आपके प्रत्यक्ष ज्ञान में कोई माला, जाप, शास्त्र या बाहरी कर्मकांड नहीं है; आत्मचिंतन ही अहम है — देखो कि तुम राग में फंसे हो या द्वेष में। जब लगातार आत्मचिंतन करते हैं, तो कुछ समय के लिए एक भाव आता है कि अब मुझे कुछ नहीं चाहिए, न किसी से राग है, न द्वेष। यह भाव निरंतर या ज्यादा समय तक कैसे ठहरे, उस भाव में पूरा कैसे जिऊं? यह भाव बहुत थोड़ी देर के लिए आता है, इसकी अवधि कैसे बढ़ाऊं? (P13-0070)
  120. गुरु जी, कहा जाता है 'आत्मा सो परमात्मा' — आत्मा और परमात्मा को एक मान बैठे हैं। मेरी समझ से ये अलग-अलग हैं: परमात्मा स्वयंभू है, उसे आधार की जरूरत नहीं; आत्मा उसी से है, निर्मल है, पर इच्छा आते ही आत्मा जीवात्मा हो जाती है, और जितनी इच्छाएं बढ़ती हैं, उतनी भटकती जाती है। समाज को प्रत्यक्ष ज्ञान के हिसाब से इस पर समझाइए — आत्मा, परमात्मा और जीव। (P13-0072)
  121. गुरुदेव, गौतम बुद्ध को यही ज्ञान प्राप्त हुआ था जो आपको हुआ है? (P13-0129)
  122. गुरुदेव, ज्ञान नहीं हो रहा है, क्या करें? कब होगा? (P13-0140)
  123. गुरुदेव, ज्ञान के लिए कुछ अलग से करना पड़ेगा? राग-द्वेष छोड़ने के बाद क्या करना है? (P13-0143)
  124. गुरुदेव, हमें ज्ञान का तो पता नहीं, लेकिन आपके ज्ञान का प्रचार जरूर करते रहते हैं। आपका ज्ञान संपूर्ण भारत में फैले और लोग समझें। (P13-0146)
  125. गुरु जी, परमात्मा का ज्ञान कैसे प्राप्त करें? (P13-0178)
  126. महाराज जी, आध्यात्मिक मार्ग में चलने के लिए भक्ति मार्ग सरल है या ज्ञान मार्ग? (P13-0190)
  127. गुरु जी, आप जो ज्ञान मार्ग बता रहे हो वह बिल्कुल सच्चा है, फिर हमसे छूट क्यों नहीं रहा? (P14-0039)
  128. गुरु जी, मेरे जानने में दो-तीन आत्मिक ज्ञान वाले हैं, जिन्होंने आत्मज्ञान पाया और फिर लोगों को ज्ञान देने संसार में लौटे, लेकिन बाद में पछताए कि जिनके आगे सर पीट रहे थे वो कहीं तक पहुंचते नहीं — ऐसा क्यों? (P14-0049)
  129. गुरु जी, अर्जुन ने ज्ञान के पहले युद्ध नहीं किया, ज्ञान के बाद किया; राजा जनक ने ज्ञान के बाद भी राज्य चलाया — तो क्या ज्ञानी भी करता है? (P14-0051)
  130. गुरु जी, ये ज्ञान लेने के लिए गुरु के पास जाना चाहिए या अपने आप सत्संग सुनते रहें? (P14-0072)
  131. गुरु जी, पहले अवधारणा थी कि ज्ञान के बाद यह माया समाप्त हो जाएगी, परंतु ज्ञान के पश्चात भी अनुभव हुआ कि माया कार्य करती है — ऐसा क्यों? (P14-0081)
  132. गुरु जी, ज्ञानी का दुख यह क्यों है कि उसकी बात सब सुनते हैं, पर समझते क्यों नहीं? (P14-0085)
  133. गुरु जी, भक्ति मार्ग और ज्ञान मार्ग, दोनों में आनंद का रस क्यों है? (P14-0098)
  134. गुरु जी, मेरा ज्ञान तो नकारात्मक है — नेति-नेति द्वारा यही ज्ञान होता है कि शरीर, मन, बुद्धि, अहंकार मैं नहीं; कोई आकार, गुण, इच्छा स्थाई नहीं; कर्ता भ्रम है, माया मात्र है। (P14-0104)
  135. गुरु जी, शाब्दिक ज्ञान को जीवन में धारण कैसे करें? (P14-0109)
  136. गुरु जी, आपने जो ज्ञान दिया वो अनमोल है, बदले में हम आपको कुछ देना चाहते हैं तो आप क्यों मना करते हैं? (P14-0122)
  137. गुरु जी, परमात्मा की याद तो हर वक्त बनी रहती है पर नाम जप नहीं कर पा रहा — ज्ञान मार्ग बताएँ। (P14-0185)
  138. पहले मैंने गुरुओं से नाम-दीक्षा ली, वो ज्ञान भी देते थे, पर पूरा नहीं लगा, इसलिए आपके पास आया हूँ। (P15-0019)
  139. ज्ञान क्या है? (P15-0023)
  140. प्रत्यक्ष ज्ञान होने पर क्या सभी कर्म समाप्त हो जाते हैं? (P15-0024)
  141. विदेह ज्ञान या विदेह गुरु क्या होता है, इसकी परिभाषा क्या है? (P15-0027)
  142. आपका भी बहुत जल्दी बड़ा आश्रम बनने वाला है; प्रत्यक्ष ज्ञान लेने वाले ही आपको अप्रत्यक्ष रूप में धन प्रदान करेंगे — ऐसा मेरा मानना है। (P15-0028)
  143. जब अक्षर नहीं था तब कौन सा ज्ञान था? प्रकृति माया, योग माया, आत्मज्ञान और परमात्मा क्या है — चारों का विश्लेषण करें। (P15-0034)
  144. गुरु जी, कुछ ऐसा ज्ञान दीजिए कि (दुख) कभी सुनने-देखने को ना मिले। (P15-0076)
  145. जब कोई उम्र में मुझसे छोटा मुझे ज्ञान देता है या तर्क-वितर्क करता है, तो मुझे अंदर से बहुत गुस्सा आता है — कैसे कंट्रोल करें? (P15-0085)
  146. ज्ञान अच्छा है या अज्ञान अच्छा है? (P15-0086)
  147. क्या ज्ञान पाने के बाद भी ध्यान मार्ग जरूरी है? (P15-0105)
  148. आप कहते हैं ज्ञान होने के बाद कोई ध्यान करने की जरूरत नहीं, पर शिव जी तो हमेशा ध्यान में ही रहते हैं? (P15-0111)
  149. मुझे आत्मज्ञान हो गया है, अब आध्यात्मिक ज्ञान बांटने की इच्छा है, लेकिन मां-पिता सभी खिलाफ हैं। मेरा ना नौकरी में मन है, ना किसी चीज में। (P16-0025)
  150. ज्ञान मिलने पर क्या गुरु भी छूट जाता है? (P16-0059)
  151. गुरुदेव, जब कोई आत्मज्ञानी हो जाता है तो क्या वह सिर्फ ज्ञान ही देता है? (P16-0061)
  152. आत्मज्ञानी क्या है और ज्ञानी क्या है? मेरा बेटा पूछ रहा है। (P16-0069)
  153. योगी जी, प्रोफेसर साहब ने विवेकानंद जी और निवेदिता की कहानी सुनाई — वह सब कुछ छोड़कर आई, अपमान सहा, फिर भी टिकी रही और आखिर में विवेकानंद जी ने अपना पूरा ज्ञान उसे दे दिया। जैसे गोयल साहब 82 साल की उम्र में सब कुछ छोड़कर आपके सानिध्य में आए हैं। तो क्या ये चीजें आखिरी क्षणों में हमारी पात्रता पर निर्भर करती हैं या गुरु की कृपा पर? (P16-0100)
  154. (साधिका ने महात्मा बुद्ध के उस भिक्षु की कहानी सुनाई जो गाली, थप्पड़, डंडे, यहां तक कि मृत्यु सहने को भी तैयार था, ताकि ज्ञान फैला सके।) अगर हम उसकी जगह होते तो मैं भी यही करती, क्योंकि मैं खुद आई हूं, किसी ने बुलाया नहीं। फिर निवेदिता अपमान से क्यों टूट गई? (P16-0101)
  155. आरुणि की कहानी में गुरु ने उसे बांध लगाने भेजा, वह पूरी रात खुद को पानी के आगे रखकर पड़ा रहा, शरीर नीला पड़ गया, और उसके बाद उसे आत्मज्ञान हुआ। उसे आत्मज्ञान नहीं था, लेकिन गुरु वाक्य ने उसकी पात्रता को जगाया। तो उसे ज्ञान क्यों हुआ? (P16-0102)
  156. इस दुनिया में इस ज्ञान के साथ जीना बहुत मुश्किल हो रहा है। (P16-0111)
  157. तो फिर ज्ञान किसे होता है? और सही-गलत का निर्णय कौन करता है — क्या बुद्धि नहीं करती? (P16-0126)
  158. ज्ञान के बाद भी क्या वह बुद्धि का उपयोग करता है? और क्या वह आंतरिक यात्रा करता है? (P16-0129)
  159. योगी जी, मेरा प्रश्न है कि यह जीवन क्या है? केवल मनुष्य ही नहीं, हर कीट-पतंग, जीव-जंतु — एक चींटी को भी मारने की कोशिश करें तो वह भी अपने प्राण बचाती है। और कहते हैं कि मनुष्य योनि सबसे सर्वश्रेष्ठ है — यह तो मनुष्य ने खुद ही घोषित कर लिया, जबकि जितना मनुष्य गर्त में जा सकता है उतना शायद कोई और योनि नहीं जाती। बाकी योनियों को भोग योनि कहकर नीचा दिखा दिया। प्रत्यक्ष ज्ञान इसके बारे में क्या कहता है? (P16-0133)
  160. गुरु जी, ज्ञान प्राप्त होने के बाद इंसान को कैसा महसूस होता है? (P16-0157)
  161. (लाइव) गुरु जी, पंच तत्व ज्ञान में संगीत का क्या योगदान है? क्या संगीत से भी पहुंचा जा सकता है? (P16-0170)
  162. आपका प्रत्यक्ष ज्ञान क्या कहता है — अभी मेरे सारे उपकरण हेल्दी हैं, पर जब तक मैं अतृप्त हूं, आसक्त हूं, प्यासा हूं, तब तक यह बात समझ में भी नहीं आएगी; और जब तक रस नहीं निचोड़ा, कोई ताकत मुझे रस लेने से रोक नहीं पाएगी। मेरी इतनी जिंदगी बर्बाद हो गई, ऊर्जा खत्म हो गई — तो अब मैं यह बात कैसे समझूं? (P16-0183)
  163. (लाइव) गुरुजी, मैं बहुत कंफ्यूज हूं कि अपना जीवन कैसे जिऊं — साधारण जिऊं, सब कुछ छोड़-छाड़ के साधु बन जाऊं, या एकदम बुलंद जीवन जिऊं, नाम कमाऊं, पूरी दुनिया को सही मार्ग से, ज्ञान से जोड़ पाऊं? (P16-0184)
  164. भक्ति मार्ग हो या ज्ञान मार्ग, मैंने अपनी लाइफ में भी देखा है कि लोग रिश्तों वाली आसक्ति उठाकर किसी "गुरु" पर शिफ्ट कर देते हैं, और जिसे गुरु समझा वो उस स्थिति में था ही नहीं — इससे कई जिंदगियों से खिलवाड़ हुआ, जीवन और बखेड़ा हो गया। तो विवेक कैसे रखें कि मैं वहां न फंस जाऊं, कि वो अपनी कामना के लिए मुझे मोहरा तो नहीं बना रहा — गुरु को कैसे पहचानें? (P17-0017)
  165. गुरु जी, परमहंस किसको कहते हैं? जैसे हंस उसे कहते हैं जो पानी और दूध को अलग कर दे, तो क्या परमहंस वो है जो ज्ञान और अज्ञान को अलग कर दे? (P17-0056)
  166. गुरु जी, योग किसे कहते हैं? ज्ञान, भक्ति, योग, ध्यान — किस मार्ग से जाएं? (P17-0117)
  167. गुरु जी, अज्ञान मिटाने के लिए ज्ञान की जरूरत होती है, और जब सत्य का बोध हो जाता है तब ज्ञान की गठरी भी त्यागनी पड़ती है — क्या यह सही है? (P17-0128)
  168. गुरु जी, सच्चे ज्ञान-पिपासु के लिए इस मंडी में यह पहचानना बड़ा कठिन है कि सच्चा कौन है और झूठा कौन — वह क्या करे? (P18-0006)
  169. गुरु जी, भक्ति, ध्यान, योग और ज्ञान — इनमें से किस मार्ग से जाएं? (P18-0025)
  170. गुरु जी, ज्ञान कैसे प्राप्त होता है, मुक्ति कैसे होती है और वैराग्य कैसे जगता है? (P18-0068)
  171. गुरु जी, कभी सामने वाले के मन में यह होता है कि "मुझसे छोटा मुझे ज्ञान दे?" — और अगर हमारे आसपास सब अपने ही ऐसे हों, तो क्या करें? (P18-0119)
  172. गुरु जी, आपने यह ज्ञान कैसे पाया? क्या ज्ञान बिना गुरु के पाया जा सकता है, और जो गुरु ज्ञान देता है उस पर यकीन कैसे करें? (P18-0140)
  173. गुरु जी, प्रत्यक्ष ज्ञान और अप्रत्यक्ष ज्ञान में क्या अंतर है? (P18-0148)
  174. गुरु जी, पशु सीख नहीं सकता, हम सीख सकते हैं — क्या गुरु से ज्ञान लेकर बुराई छोड़ सकते हैं? हमारे बिगड़ने का कारण क्या है? (P18-0153)
  175. गुरु जी, आध्यात्म की यात्रा कैसे शुरू करें? और क्या प्रत्यक्ष ज्ञान व्यवहारिक जगत में भी उपयोगी है? (P18-0165)
  176. गुरु जी, आपने ज्ञान बांटने का यह प्रण कब और क्यों लिया कि हर जगह, हर किसी को ज्ञान देंगे? (P18-0196)
  177. गुरु जी, जब आपके पास लोग कम आते थे तो क्या आपने सोचा कि ज्ञान देने के लिए आवरण (वेश-भूषा) का सहारा लेना पड़ेगा? आपको इसका जवाब कैसे मिला? (P18-0197)
  178. गुरु जी, कुछ सत्संगों में कहा जाता है कि अर्जुन को ज्ञान/विराट दर्शन तो हुआ पर मोक्ष नहीं हुआ — क्या यह सही है? (P19-0010)
  179. गुरु जी, कबीर साहब ने कहा "मन मरा ना माया मरी, मर मर गया शरीर; आशा तृष्णा ना मरी" — यानी मन नहीं मरेगा तब तक विकार नहीं जाएंगे। आप कहते हैं मन है — तो क्या ज्ञान के बाद मन कमजोर हो जाता है? (P19-0038)
  180. गुरु जी, तोतापुरी जी ने अद्वैत के लिए रामकृष्ण परमहंस से काली को "कटवाया", फिर भी परमहंस ज्ञान के बाद भी काली की पूजा करते रहे — यह कन्फ्यूजन कैसा? (P19-0039)
  181. गुरु जी, प्रत्यक्ष ज्ञान में सब प्रत्यक्ष है, पर परमानंद का अनुभव वहां पहुंचे बिना नहीं — ये अप्रत्यक्ष संशय कैसे टूटे? (P19-0065)
  182. गुरु जी, क्या आत्मज्ञानी पुरुष को क्रोध आता है? और क्या ज्ञानी अपने क्रोध को जांचता रहता है कि वह लिमिट से बाहर ना जाए? (P19-0140)
  183. गुरु जी, ईमानदारी से, ज्ञान में जीने वाले लोग समाज में अज्ञान और बेईमानी से जीने वालों से कैसे बचें? उनसे राग-द्वेष हो ही जाता है। (P19-0142)
  184. गुरु जी, आपको इतनी मेहनत और पीड़ा के बाद ज्ञान मिला और हमें सहज में मिल रहा है — क्या आपके कर्म हमसे बुरे थे? (P19-0165)
  185. गुरु जी, ज्ञान बताने के लिए लोगों को पकड़-पकड़ कर बताना ठीक है क्या? (P20-0022)
  186. मेरी ईमानदारी की कमाई 10 लाख है, उसमें से 5 लाख ज्ञान प्रसारण में लगाना चाहूं तो मन डरता है — कल अस्पताल की जरूरत पड़ी तो? इस डर से कैसे निकलें? (P20-0114)
  187. गुरु जी, आप ज्ञान फैलाने के लिए साधन (जमीन, गाड़ी आदि) कैसे जुटाते हैं — किसको निमित्त बनाना है, यह कौन तय करता है? (P20-0122)
  188. अगर गुरु ही कह दें कि मैं ज्ञान नहीं दूंगा, तो क्या किसी को ज्ञान नहीं मिलेगा? (P20-0128)
  189. आप लोगों से साधन (जैसे ज्ञान प्रचार की गाड़ी) क्यों करवाते हैं — इसमें आपका क्या है? (P20-0133)
  190. आपने कहा था कि ज्ञान प्रचार की गाड़ी डोनेशन के पैसे से नहीं लेंगे — क्यों? (P20-0136)
  191. मैंने गुरु के मन को कितना दर्द दिया होगा — क्या ज्ञानी को हमारी गलती से दर्द होता है? (P20-0142)
  192. स्व का मतलब जो मैंने ज्ञान प्राप्त किया — चैतनता, गति और कॉन्शियसनेस, क्या यही है? (P20-0187)
  193. आप कहते हैं ज्ञान आत्मा के अंदर ही है, जैसे जमीन के अंदर पानी — तो वह ज्ञान अपने आप कैसे प्रकट होता है? (P21-0032)
  194. गुरु जी, जब ईश्वर एक है तो सभी महापुरुषों का ज्ञान भिन्न क्यों है — जैसे नाम दान, ब्रह्म ज्ञान, आत्म ज्ञान और सांसों का ध्यान? (P21-0073)
  195. गुरु जी, कुछ संतों का कहना है कि आत्म ज्ञान या ब्रह्म ज्ञान 12 साल में प्राप्त हो जाता है — ऐसा क्या है? (P21-0075)
  196. गुरु जी, हमारे पहले गुरु जी कहते थे कि गुरु के पास पूरी ताकत है, वो बड़ी से बड़ी बला (सूली को सूई पर) टाल देते हैं; पर आपका ज्ञान कहता है कि आपके सत्कर्म ही बला टालेंगे, गुरु नहीं — इसमें सच क्या है? (P21-0103)
  197. गुरु जी, पहले हम मानते थे कि ज्ञान की सेवा सबसे बड़ी है; फिर आपसे सुना "बिना दया के ज्ञान कसाई", तो सेवा-भंडारा करने लगे; भंडारे के बारे में लिखा तो आपने कहा ज्ञान का भंडारा करो — अब मैं कंफ्यूज हूं, क्या करूं? (P21-0105)
  198. गुरु जी, भक्ति, ज्ञान और ध्यान — इन तीनों में किसे महत्व देना चाहिए? इनमें क्या डिफरेंस है? (P21-0128)
  199. गुरु जी, ब्रह्म ज्ञान पाने के लिए क्या करें, कौन सी दीक्षा चाहिए? (P21-0161)
  200. गुरु जी, कर्म सिद्धांत और ज्ञान मार्ग — ये दोनों कैसे जुड़ते हैं, और कैसे हम आत्मज्ञान की तरफ चलें? (P21-0181)
  201. गुरु जी, शरीर धारण करने से तो हम लोगों का अच्छा-भला भी कर सकते हैं ना — जैसे आप जो ज्ञान बांट रहे हैं, उससे सबका भला होगा? (P22-0006)
  202. गुरु जी, अभी माता जी की बात पर आपने कहा कि जब हम कभी पहली बार आए होंगे तो उस समय हमको ज्ञान था, और फिर अज्ञान उत्पन्न हो गया और हम फिर से आ गए — क्या ये आपने सिर्फ समझाने के लिए कहा है? (P23-0009)
  203. गुरु जी प्रणाम, मिट्टी का घड़ा जब तक अग्नि में नहीं तपता, तब तक पक्का नहीं होता। क्या मनुष्य बिना त्याग-तपस्या किए ज्ञान प्राप्त कर लेगा? (P23-0031)
  204. गुरु जी, 'कुछ नहीं चाहिए' में कैसे आएं? अपने आप में कैसे रहें, ज्ञान कैसे हो? और पार कैसे होंगे? (P23-0032)
  205. गुरु जी, क्या आत्मज्ञान ही सही ज्ञान है? (P23-0059)
  206. गुरु जी, मैं अध्यात्म में लगा हूं और मेरी पत्नी सोशल मीडिया में लगी रहती है, और वो हमसे नाराज रहती है क्योंकि हम गुरु-ज्ञान में लगे हैं। ऐसा क्यों होता है? (P23-0146)
  207. गुरु जी, उपार्जित ज्ञान और आत्मज्ञान में क्या अंतर है? (P23-0172)
  208. गुरु जी, कल 12 मार्च आपका जन्म दिवस है — क्या इसे 'प्रत्यक्ष ज्ञान दिवस' के रूप में मना सकते हैं? (P23-0196)
  209. गुरु जी, मेरी सोच में तो यह है कि मंदिर जाने वालों को, गुरु-चेला बनाने वालों को ज्ञान नहीं है, तो वे क्या करें? (P24-0016)
  210. गुरु जी, कोई कहे कि आप बस मुझे स्नान करा दो तो मुझे ज्ञान हो जाएगा — क्या ऐसे आत्मज्ञान हो सकता है? (P24-0028)
  211. गुरु जी, जब ज्ञान होता है तो कैसे पता चलता है कि ज्ञान हो गया? (P24-0085)
  212. गुरु जी, आपको दूसरों का भी पता चल जाता होगा कि किसको ज्ञान उपलब्ध होना है? (P24-0086)
  213. गुरु जी, मैं 2003 से इस लाइन में हूं, दीक्षा ली, गुरु मंत्र लिया, अब ज्ञान का मार्ग पकड़ा है। लेकिन अभी भी हम एक पैर उस नाव में और एक पैर इस नाव में रख रहे हैं, तो गिरना ही संभव लगता है। आपके जैसी स्थिति कब और कैसे आएगी? (P24-0105)
  214. गुरु जी, पहले मैं पैसे के लिए जा रहा था, अभी ज्ञान के लिए जा रहा हूं — क्या वो भी एक कामना नहीं है? (P24-0197)
  215. गुरु जी, साधारण व्यक्ति के लिए कोई ऐसा ज्ञान बताइए जिससे जिंदगी में धीरे-धीरे गति करके आगे निकले। (P24-0200)
  216. गुरु जी, भक्ति और ज्ञान में क्या अंतर है? (P25-0023)
  217. गुरु जी, क्या यह बात सही है कि "भूखे भजन ना होय गोपाला" — यानी पहले अपने आप को धन से मजबूत करें, उसके बाद ज्ञान के लिए निकलें, ताकि किसी से मांगना ना पड़े? (P25-0035)
  218. प्रभु जी, आपको ज्ञान अभी हुआ, पहले क्यों नहीं? यह आपकी मेहनत है या प्रभु ही सब कुछ करने वाले हैं और हम सिर्फ कठपुतली हैं, सब उसकी मर्जी से हो रहा है? (P25-0049)
  219. गुरु जी, कहते हैं ज्ञान होने के बाद अज्ञानी की तरह जीना होता है। इसे समझा दीजिए। (P25-0069)
  220. गुरु जी, आध्यात्मिक ऊंचाई व्यक्ति को बाहर जाने से मिलती है या घर पर रहने से? क्या घर पर रहकर भी आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है? (P25-0100)
  221. गुरु जी, ज्ञान मार्ग से उपलब्धि प्राप्त करने वाले गुरु और भक्ति मार्ग से उपलब्धि प्राप्त करने वाले गुरु की बातें क्या अलग-अलग होती हैं? (P25-0128)
  222. गुरु जी, क्या विधि से ज्ञान का कोई कनेक्ट आता है — कोई विधि पहुंचा सकती है? (P25-0154)
  223. कब तक ज्ञान प्राप्त हो जाएगा गुरु जी? (P26-0033)
  224. गुरुदेव, ब्रह्म ज्ञान के बाद आप हमें भूल तो नहीं जाएंगे? हम भी आपके पीछे-पीछे हैं। (P26-0038)
  225. गुरुदेव, आत्मज्ञान और ब्रह्म ज्ञान (परम ज्ञान) अलग हैं? इनका अंतर स्पष्ट करें। (P26-0039)
  226. गुरु जी, विरक्ति और वैराग्य से ही आत्मिक ज्ञान संभव है — तो प्रयास किस दिशा में करें? (P26-0052)
  227. गुरु जी, ज्ञान, कर्म, भक्ति योग में बेस्ट कौन सा है? (P26-0066)
  228. गुरु जी, बात समझ में तो आ गई, फिर भी मुझे लगता है कि आप इससे भी बेहतर तरीके से, और डिटेल में समझा सकते हैं — ज्ञान तो ऐसी चीज है कि जितना मिले ग्रहण कर लो? (P26-0088)