भगवान और ईश्वर — योगी गुरु जी के प्रश्नोत्तर
इस पृष्ठ पर “भगवान और ईश्वर” विषय से जुड़े 190 प्रश्न हैं, जो जिज्ञासुओं ने सत्संग में योगी गुरु जी से पूछे। किसी प्रश्न पर क्लिक करके योगी गुरु जी का पूरा उत्तर उनके अपने शब्दों में पढ़ें, वीडियो के साथ।
- गुरुदेव, ईश्वर को याद करके बहुत रोना आता है। (P1-0037)
- गुरु जी, मैं आपका लाइव सत्संग नहीं सुन पाता, इसलिए चिंता होती है। लगता है मुझसे कोई गलती हुई है, इसलिए ईश्वर नाराज है। (P1-0108)
- गुरु जी, भगवान है तो बुरी आत्माएं भी होंगी। इसके बारे में मार्गदर्शन दीजिए। (P2-0025)
- प्रभु, मैं फंस चुका हूं — न अपनों को छोड़ पा रहा हूं, न आसक्ति को। डिप्रेशन आ गया है; लगता है मैं प्रभु तक नहीं पहुंच पाऊंगा। (P2-0028)
- धन्यवाद प्रभु जी, मैं आपकी वाणी को मानूंगा। (P2-0108)
- आपने कहा कि हम कर्ता नहीं हैं, सब करने वाला ईश्वर है। फिर अपराध (और दुख) क्यों? मुझे क्यों महसूस नहीं होता कि कर्ता मैं नहीं हूं? (P2-0113)
- प्रभु, मैं आश्रम तो नहीं आ सकता, पर आपके दर्शन चाहता हूं, जिससे यह जीवन सफल हो जाए। (P2-0116)
- इसका मतलब कर्ता मैं हूं। फिर संत ऐसा क्यों बोलते हैं कि सब वही करा रहा है? मैं आपसे बात कर रहा हूं, कमेंट कर रहा हूं — यह तो मैंने ही किया ना; मैं कैसे बोल दूं कि कमेंट भगवान ने कराया? (P2-0120)
- कई गृहस्थ माताएं-बहनें हैं जिनके बच्चे और पति उन्हें पूरी आजादी देते हैं, काम के लिए नौकर भी रख देते हैं, कि आप पूरी तरह अध्यात्म में रहो; फिर भी वे आधा समय वैराग्य और भगवान की बातें करती हैं और आधा समय घर के हर काम में दखल देती हैं — बहू क्या कर रही है, रसोई में तेल-घी ज्यादा क्यों। घर वाले भी दुखी हो जाते हैं। ऐसा व्यक्ति अगर मेरे परिवार में हो, तो हम उसके लिए क्या कर सकते हैं? (P2-0170)
- असली-नकली जरूरतमंद पहचान मुश्किल; धर्म का डर — दान न करूं तो भगवान नाराज / करूं तो फंसूं। डर कैसे निकाले? (P3-0033)
- साधना में आप ऊपर वाले से कहते थे — मुझ पर कृपा मत करना, खुद खोज लूंगा। हम छोटी चीजों पर भी भगवान कृपा कर कहते भिखारी क्यों हैं? मार्गदर्शन करें। (P3-0061)
- पड़े रहना क्या साधना है? भगवान हमारे कर्म देख रहे? गलतियां कैसे स्वीकारें? (P3-0066)
- (लाइव) अगर काम वासना से मनुष्य इतना परेशान है, तो ईश्वर ने यह दी क्यों है? (P3-0165)
- (कुटिया में, इंदौर से आए 75 वर्षीय साधक) मैं पहले भी अध्यात्म में बहुत चला — साधना करो, यज्ञ-हवन करो, साधना से प्रकाश आएगा, भगवान का दर्शन होगा — पर समझ नहीं आया। 13 दिन से आपके वीडियो दिन-रात सुनकर समझ आया कि प्रत्यक्ष ज्ञान में चार-पांच ही बातें हैं; मैं करूंगा तभी होगा, किसी और के करने से नहीं; मैं ही हूं, कहां जाऊं। इसलिए घर से रोटी बांधकर सीधा चला आया। अंतिम इच्छा यही है कि आप रखो तो यहीं रह जाऊं। गुरुदेव, इससे आगे क्या है? (P3-0174)
- (कुटिया में साधक) जैसे आप हमारे साथ बोलते हो, वैसे प्रभु या भगवान — अगर कोई होगा — तो मुझसे ऐसे ही बोलेगा ना, तभी तो होगा? क्या वह देहधारी बनकर मुझसे बोलेगा? वैसे तो हर प्राणी में, अलग-अलग रूप में वह हमारी मदद करता ही है, किसी ना किसी के रूप में मिल जाता है — जानवर में, गुरु में, मां में। (P3-0180)
- (कुटिया में साधक) आप तो भगवान के पद को प्राप्त हुए; आपने वीडियो में बताया कि उस स्थिति में आने के लिए आपने कितनी मेहनत की। बाकी सबने वेदों के पठन आदि से ज्ञान लिया, पर आपके यहां तो खाली प्रत्यक्ष ज्ञान का मूल — ईमानदारी, सत्कर्म और सत्संग — है। क्या इतने से हो जाएगा, और जीवन में गुरु की कितनी जरूरत है? (P3-0181)
- (कुटिया में साधक) भगवान, हम तो आपसे (इतना) ले रहे हैं — हम आपके लायक थोड़ी हैं; क्या यह भी योग्यता से ज्यादा लेना नहीं हुआ? (P4-0018)
- (कुटिया में साधक) कोई तो भगवान रूप लेता है — जैसे दस अवतार बोलते हैं, वे सब यहां अवतरित हुए। तो अवतार क्या है? (P4-0064)
- (कुटिया में, एक शिक्षक साधक) आप (किसी शहर में) तीन दिन — रोज दो घंटा — सत्संग के लिए आ सकते हैं? (गोयल जी ने 6 लाख देकर सत्संग कराया था।) मन तो है कि मैं भी करवाऊं, लेकिन इतनी ताकत नहीं — 1 लाख पगार है, पर साथ में 10 लाख का कर्जा है। और हम (घर-परिवार से) अलग में हैं, इसलिए भगवान का भाग निकालना समझ में आता है। (P4-0067)
- (लाइव) गुरुदेव प्रणाम। (आपने पिछली बार कपड़ा फाड़ने वाले का उदाहरण दिया था —) अगर कोई फाड़ने के भाव से फाड़ रहा है, और फटने वाला 'प्रभु जांच रहे हैं' — इस भाव से स्वीकार कर ले, तो क्या उसकी स्थिति ऊपर उठ रही है? (P4-0087)
- (लाइव) गुरु जी प्रणाम। ईश्वर क्या है? एकांत में विचार गिरने पर अपने सिवा कोई नहीं (दिखता)। (P4-0116)
- (लाइव) कृपया जीव, जगत और जगदीश (ईश्वर) के बारे में उदाहरण देके समझाएं, योगी जी। (P4-0123)
- (कुटिया में साधिका) मुझे द्वंद्व आ रहा है कि भगवान का अपना खुद का कोई अस्तित्व नहीं है — भक्तों ने ही उसे पॉपुलर किया। जैसे मीरा ने पूरी जिंदगी दी, तो हम मीरा को देखकर उस सुप्रीम को देख पाते हैं। अगर बीच में भक्त ना हो, तो भगवान को कौन जानेगा? क्या भगवान भक्त पर निर्भर है? (P4-0184)
- (कुटिया में एक युवक) किताबों में पढ़ते हैं कि दूसरों के अनुभव से सीख लो; गीता में श्री कृष्ण ने बताया कि ये काम करो, ये मत करो — पर सुनकर, ज्ञान और समझ होते हुए भी मन नहीं मानता, कहता है एक बार करके देखते हैं। आपने भी कहा था कि आप हर जगह गए, यह देखने के लिए कि वहां कुछ नहीं है। तो जब कृष्ण ने कह दिया कि भगवान बाहर नहीं है, फिर भी मन मानता नहीं — मन को कैसे मनाऊं? किसकी बात सही मानूं? (P5-0016)
- (हेम शर्मा) बचपन से भगवान में शांति; अब आस्था बाहर लगती है, अनुशासन कमजोर — क्या करूँ? (P5-0045)
- आप कहते हैं भगवान पे यकीन मत करो, और यह भी कि जहां है वहीं से निकाल देंगे। ईश्वर को लेकर आपका विचार क्या है? (P5-0064)
- भगवान और इष्ट के भजन करते हुए क्या आत्मज्ञान संभव है? कैसे? (P5-0074)
- ईश्वर शरणागति से परे कुछ नहीं? क्या सारा विवेक ईश्वर से आता है? (P5-0087)
- भगवान को पाने के लिए क्या करें? (P5-0105)
- ध्यान में ध्यान कैसे? रात को ध्यान? झटके लगते हैं? ईश्वर की परिभाषा? (P5-0130)
- हनुमान चालीसा 40 दिन 100 पाठ किया, पॉजिटिविटी मिली पर प्रभु दर्शन नहीं मिला — मार्गदर्शन चाहिए। (P5-0158)
- प्रभु में पावर न रहे तो क्या? आत्मज्ञानी संसार का नाश भी कर दे तो? (P5-0163)
- ईश्वर कहीं है क्या? (P5-0191)
- जहां कुछ नहीं होता, क्या वहां भगवान ही भगवान होते हैं? (P6-0116)
- कृष्ण गीता में कहते हैं मेरी शरण में आ जाओ। इससे पहले यह भी कहा कि सब में मैं हूँ। अगर मैं कृष्ण की प्रतिमा या चित्र की तरफ जाता हूँ तो भी मैं मेरा में ही जा रहा हूँ। फिर एकं शरणं का क्या अर्थ है? भगवान कोई व्यक्ति है या पद? (P6-0156)
- इस संसार में रहकर ईमानदारी और सत्कर्म करेंगे तो क्या भगवान की प्राप्ति होगी? (P6-0195)
- भगवान, देवता और पुनर्जन्म क्या असल में होते हैं? (P7-0029)
- भगवान की इच्छा के बिना पत्ता भी नहीं हिलता, क्या यह बात सही है? (P7-0030)
- आत्मा मृत्यु लोक में भगवान को पाने का प्रण लेकर आती है, पर विषयों को चुनती है। तो क्या यह धोखा ही है? (P7-0037)
- गुरुदेव, भगवान में विश्वास कैसे करें? मुझे जरा सा भी भगवान पर विश्वास नहीं होता। (P7-0117)
- लोग कहते हैं, ईश्वर अगर कल्याण करता तो कल्याण हो ही जाता। क्या ईश्वर या परमात्मा के भरोसे कल्याण हो जाएगा? (P8-0010)
- क्या बुढ़ापे में प्रभु-प्राप्ति होती है? (P8-0036)
- चर्चा सब जगह हो रही है। क्या सच में भगवान अवतरित होंगे? कल्कि अवतार हो तो अपने को क्या करना है? (P8-0037)
- प्रभु जी, आपकी नजर में परमात्मा कौन है? (P8-0041)
- श्री कृष्ण जी ने जब शादी की, तो आपने क्यों नहीं की? भगवान राम की तरह होना चाहिए था? (P8-0048)
- भगवान कहां है? आपने देखा है? (P8-0100)
- क्या हमारी और कृष्ण भगवान की आत्मा एक है? (P8-0140)
- क्या भगवान अपने भक्त द्वारा दिए गए सांप को स्वीकार कर लेते हैं? (P9-0003)
- क्या आत्मा और ईश्वर, सब एक हैं? एक होता तो खोजने की जरूरत ही नहीं होती। (P9-0031)
- गुरु जी, लोग शांति खोजते हैं या ईश्वर? ज्यादातर लोग क्या खोजते हैं? (P9-0038)
- कबीर, भगवान बुद्ध और कृष्णमूर्ति, क्या सबके अनुभव एक ही होते हैं? (P9-0047)
- प्रभु, मैं किस मिट्टी का बना हूं? (P9-0057)
- भगवान और हम एक हैं। अगर एक हैं, तो अलग-अलग कैसे हैं, और एक को कैसे खोजें? (P9-0067)
- आत्म स्वभाव क्या है, ईश्वर स्वभाव क्या है, अस्तित्व स्वभाव क्या है? क्या यह सब एक ही है, और क्या है? (P9-0078)
- प्रभु जी, सच में इस एक जन्म में आत्मज्ञान हो जाएगा? (P9-0191)
- दंडवत। परिणाम स्वीकार करें। भगवान, मुझ अधम को भी स्वीकार करो। (P9-0200)
- ईश्वर को आप किस रूप में देखते हैं? क्या वह शुद्ध चेतन है, परमात्मा? (P10-0031)
- गुरुवर, अगर (वह परम) स्थिति प्राप्त ना हो तो क्या भगवान तक पहुंचा ही नहीं जा सकता? (P10-0074)
- क्या आपके भरण-पोषण का ध्यान भगवान रखते हैं? (P10-0160)
- गुरु जी, जैसे मैं भगवान की तरफ चलना चाहता हूं, क्या वे भी मेरा इंतजार कर रहे होंगे? (P10-0163)
- ईश्वर ने मनुष्य जाति को ही इतनी प्रगति क्यों दी? (P11-0070)
- सही मन से भगवान से मांगने पर हर चीज मिलती है, यह होते देखा है। तो जो मिला है, उसे कैसे बचाकर रखें? (P11-0177)
- आपने कहा था कि भगवान भी आत्मज्ञान नहीं करवा सकता। बाकी सब दे सकता है, पर आत्मज्ञान क्यों नहीं? (P11-0189)
- दो साल से आपको सुनती हूं। जब भी बंधन से छूटना चाहती हूं, बेटा बार-बार बीमार हो जाता है, और मैं मोह में आकर भगवान से मांगने लगती हूं। इससे बाहर निकलने का रास्ता दिखाइए। (P11-0195)
- आपके ज्ञान से मैं समझ सका कि हमारा आना क्यों हुआ और हमें जाना कहां है। पर यह भी समझ रहा हूं कि भगवान और परमात्मा को हमसे कुछ लेना-देना नहीं, उन्हें हमारी कोई परवाह नहीं। फिर आप हमारी परवाह क्यों करते हैं? (P12-0014)
- आप हम आत्माओं को मूल तक भेजना चाहते हैं — आप कौन हैं, यह मैं समझ नहीं पाया। आप भगवान हो, परमात्मा हो या उससे भी ऊंचे? जब मैं इस पर गहरा चिंतन करता हूं तो आंखों से आंसू निकलते हैं। (P12-0047)
- चौबीसों घंटे भगवान से कैसे जुड़े रहें? (P12-0059)
- मां और बाप भगवान स्वरूप हैं — यह कितना सही है? (P12-0085)
- हम बोलते हैं कि हमारे कर्म निर्धारित होते हैं — जो भगवान ने लिखा है वही होगा, हमारे हाथ में कुछ नहीं, चाहे दुख हो या सुख। तो क्या कर्म पहले से ही निर्धारित होते हैं? (P12-0148)
- (गीता का हवाला देकर) गीता में तो भगवान ने अर्जुन को ध्यान करने की बात कही है — तो? (P12-0157)
- गीता जी में लिखा है कि भगवान को भोग लगाकर ग्रहण करना चाहिए — तो भोग कैसे लगाएं? (P12-0160)
- प्रभु जी, अब आपके पास आ सकते हैं क्या? (P12-0165)
- क्या कृष्ण भगवान हैं? क्योंकि वह तो मानव थे, मानव शरीर में। (P13-0027)
- प्रभु, आप जैसे संतों की इस पूरे विश्व को आवश्यकता है। मैं आपके वीडियो भक्तों को शेयर करता हूं; सब कहते हैं कि आपकी और एक दूसरे स्वामी जी की विचारधारा एक जैसी है। (P13-0048)
- गुरु जी, आपकी वीडियो में आप कहते हैं कोई ईश्वर, परमात्मा, आत्मा कुछ नहीं है; कभी कहते हैं ईश्वर ही सब है, उस तक ही पहुंचना है। तो फिर सत्य क्या है? सारा कंफ्यूजन हो जाता है। (P14-0008)
- बाबा जी, आपको ईश्वर प्राप्ति हो गई? (P14-0012)
- गुरु जी, पूजा क्या है? क्या रोज सुबह उठ के घंटों जाप, भगवान को चंदन लगाना जरूरी है? (P14-0076)
- गुरु जी, 'ईश्वर सर्वव्यापी है' — इसका क्या मतलब है? क्या ईश्वर कण-कण में, हर जगह मौजूद है? (P14-0077)
- गुरु जी, अगर हम जीवन ऐसे जिएं कि किसी जीव की हानि ना हो, मगर भगवान को ना पूजते हों, तो क्या आध्यात्मिक सार्थकता हो सकती है? (P14-0120)
- सब हो रहा है प्रभु, या मान लो वो कर रहा है — इंसान के बस की बात कहाँ है? (P14-0128)
- हम कर कैसे रहे हैं प्रभु, कोई प्रारब्ध था ना मेरा? (P14-0129)
- प्रभु, जो सिखाने वाले हैं वो तो और फँसा रहे हैं? (P14-0130)
- अच्छी या बुरी परिस्थितियों का कितना दोष है प्रभु? (P14-0131)
- ये मज़दूर लोग बड़ी-बड़ी बिल्डिंग बनाते हैं, सबसे ज्यादा मेहनत करते हैं, फिर भी दो वक्त का खाना ढंग से नहीं मिलता — ये भी तो है प्रभु? (P14-0132)
- अपने आप को पाने के लिए स्वतंत्रता जरूरी है प्रभु? (P14-0135)
- प्रभु, कुटिया साधक के लिए है, तो कोई साधना है जो आप यहाँ करने के लिए बताते हो? (P14-0138)
- प्रभु, आपने कहा ऊपर वाला देख रहा है — ये ऊपर वाला कौन है? (P14-0148)
- कर्ता बने रहकर अकर्ता हो सकते हैं प्रभु? कृष्ण और राम ने यही किया है। (P14-0150)
- श्री कृष्ण भगवान महल में रहते थे, रथों पर चलते थे, फिर भी योगेश्वर थे — तो क्या माया का त्याग करने से इंसान योगी होगा? (P14-0164)
- कुछ लोग कहते हैं कि सब भगवान कर रहे हैं — तो क्या बुरा काम भी वही करवा रहे हैं? (P14-0167)
- लोग कहते हैं हमें भगवान पर विश्वास है और जो भी हो रहा है भगवान की मर्जी से हो रहा है, फिर कुछ अनहोनी होती है तो रोते हैं — मीठा-मीठा गप, कड़वा-कड़वा थू, यह कैसी श्रद्धा है? (P14-0173)
- प्रभु, आपको जब पता चला कि सारे प्रश्न खत्म हो गए — वो दिन कैसा था, कोई अनुभूति हुई? (P14-0199)
- ईमानदारी और सत्कर्म से आत्म-शांति तो आ ही जाएगी प्रभु? (P14-0200)
- हमें ईश्वर से क्या माँगना चाहिए? क्या अपनी सारी डिमांड प्रभु के सामने करना उचित है? (P15-0005)
- भगवान से उम्मीद कैसे छोड़ दें गुरु जी? (P15-0008)
- प्रभु जी, जब आप सत्संग नहीं करते, शांत रहते हो, तब आपके मन की स्थिति क्या होती है? (P15-0015)
- आप कहते हैं मन कुछ नहीं है, और गीता में कृष्ण भगवान कहते हैं अर्जुन मन मुझमें लगा — इसका मतलब क्या? (P15-0052)
- क्या भगवान की भक्ति करनी चाहिए? (P15-0070)
- अगर आत्मा भगवान है तो फिर शरीर क्या है? (P15-0110)
- मेरे भगवान, मैं मन को शरीर रूपी रथ का घोड़ा मानता था, लेकिन आपने बताया कि घोड़ा मन नहीं है, मैं हूं — मिला-जुला के सब कुछ आप ही हो? (P15-0120)
- गुरुदेव भगवान, विचार जो चलते हैं वह अलग है, और जो मन बताता है वह अलग है? (P15-0139)
- गुरु जी, क्या मरते टाइम भगवान का नाम लेने से मुक्ति मिलती है, अगला जन्म नहीं होता — जैसा शास्त्रों में बताया है कि "अंत मति सो गति"? (P15-0157)
- ईश्वर क्या है? हम कौन हैं? (P15-0171)
- भगवान, जब सत्संग सुनते हैं तब अपने आप में रहते हैं; जैसे ही सुनना बंद करते हैं, शरीर भाव में आ जाते हैं। क्या करें कि सदैव अपने आप में बने रहें? और एक तरफ खुशी, फिर रोना क्यों आता है? (P15-0172)
- मेरे भगवान, महाभारत में भी बोले हैं कि किसी तत्वदर्शी संत को ढूंढो। तत्वदर्शी संत का मतलब क्या है? (P15-0173)
- मेरे भगवान, आप बोलते हो "निकल लो" — निकलना कहां से है? जाना तो यहीं है। (P15-0180)
- गुरु जी, ईश्वर को पुकारने के लिए, आराधना के लिए सबसे अच्छा नाम कौन सा लेना चाहिए? (P15-0186)
- गुरुदेव, मेरा लड़का किसी को मानता नहीं — भगवान को, देवी-देवताओं को नहीं मानता। इसका उपाय बताइए। (P16-0023)
- धन्यवाद गुरु जी। मैं इंसानों का तो बहुत आदर करता हूं, लेकिन भगवानों में मेरी कोई आस्था नहीं है। (P16-0042)
- गुरुदेव, क्या ईश्वर की पूजा आदि ना करते हुए सिर्फ निष्काम कर्म से उस तक पहुंचा जा सकता है? (P16-0052)
- भगवान की प्राप्ति करना और आत्मज्ञान करना — दोनों में क्या फर्क है? (P16-0072)
- गुरु जी, आपने कहा कि भगवान को प्राप्त नहीं किया जा सकता — यह आपका अपना निष्कर्ष भी हो सकता है। मीरा ने कृष्ण प्राप्ति में स्वयं को सर्वस्व कर दिया, अतः उनको प्राप्त किया। (P16-0080)
- जब किसी चीज की जरूरत है ही नहीं, तो फिर भगवान की तलाश क्यों? (P16-0094)
- ऋषियों को मंत्र-दृष्टा के रूप में जाना जाता है — जिन्होंने मंत्रों को सीधे भगवान या अलौकिक शक्ति से देखा या प्राप्त किया। हम इसे कैसे कर सकते हैं? (P16-0097)
- गुरु जी, हमने एक पुस्तक पढ़ी थी, उसमें भगवान शिव कह रहे हैं कि जो आंखों से देखा जाए वह ब्रह्म नहीं है, आंख जिससे देखती है वह ब्रह्म है; जो कानों से सुना जाए वह ब्रह्म नहीं, कान भी जिससे सुनते हैं वह ब्रह्म है — इंद्रियां भी जिससे चलती हैं, वह ब्रह्म है। तो वह दिखाई क्यों नहीं देता? (P16-0116)
- (लाइव) गुरुदेव, क्या हम खुद ईश्वर तक पहुंच सकते हैं? क्या उसके लिए गुरु जी का होना आवश्यक है? (एक और प्रश्न: क्या बिना गुरु के भी आत्मज्ञान हो सकता है?) (P16-0160)
- (लाइव) भगवान के नाम जप में मन क्यों नहीं लगता? (P16-0173)
- (लाइव) प्रभु जी, मेरा प्रश्न है — सर्वव्यापक वही परमात्मा है, तो फिर क्या आने-जाने का परिश्रम करना जरूरी है? (P16-0198)
- (लाइव) भगवान की सृष्टि जब तीन गुणों से है, तब लोग माया से छुटकारा कैसे पाएं? (P17-0006)
- गुरु जी, ईमानदारी से जगत-व्यवहार करना, दृष्टा भाव में रहना, कर्तापन से दूर, ईश्वर में श्रद्धा, "कुछ नहीं चाहिए" में रहना — इस साधना पथ पर जीने से कब तक आत्म-सत्य का दर्शन होगा, और तब क्या अनुभव होगा? मार्गदर्शन दें। (P17-0049)
- गुरु जी, भगवान है या नहीं? अगर है तो साबित कैसे करेंगे? (P17-0051)
- गुरु जी, क्या मंत्र साधना से ईश्वर प्राप्ति होती है? (P17-0057)
- गुरु जी, सारे ग्रंथों में राम, कृष्ण और देवता किसी न किसी से लड़ते ही रहे — लड़ाई से मुझे घबराहट होती है। भगवान क्यों लड़ते हैं, और लड़ाई कब रुकेगी? (P17-0074)
- गुरु जी, कृष्ण भगवान कहते हैं "जब मैं प्रसन्न होता हूं तो बुद्धियोग देता हूं" — यह कौन सा बुद्धियोग है? इस लोक का या किसी और का? (P17-0082)
- गुरु जी, प्रभु से मिलने की इतनी कामना तो रखनी ही पड़ेगी ना? (P17-0096)
- गुरु जी, सबको प्रभु ही चाहिए — किसी को माल के लिए, किसी को मोक्ष के लिए। तो प्रभु सबको मोक्ष क्यों नहीं दे देता? प्रभु है क्या? (P17-0097)
- गुरु जी, हम प्रभु को खोज-खोजकर थक गए हैं, वह मिलता क्यों नहीं? (P17-0098)
- गुरु जी, भगवान को पाना इतना सीधा-सरल है, तो हमने इसे इतना जटिल क्यों बना दिया? (P17-0103)
- गुरु जी, पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश — ये पांच स्थूल तत्व, और मन, बुद्धि, अहंकार — कोई कहता है ये आठों निकृष्ट हैं। क्या भगवान ने निकृष्ट चीजें बनाईं? (P17-0109)
- गुरु जी, ईश्वर से कोई शिकायत नहीं, लेकिन संसार से नहीं बनती — ऐसा लगता है दुनिया पीछे पड़ी है। ऐसा क्यों? (P17-0112)
- गुरु जी, भगवान हमारे जीवन में काम करते हैं या हम भगवान की योजना में काम करते हैं? (P17-0113)
- गुरु जी, क्या संसार जैसा है वैसा ही स्वीकार करना है और भगवान को मानना है? (P17-0114)
- गुरु जी, क्या संत भगवान किसी भी प्रकार का नाम या दीक्षा नहीं देते? (P17-0125)
- गुरु जी, प्रभु जिस पर कृपा करते हैं, क्या उसका मिथ्या संसार छीन लेते हैं? (P17-0159)
- गुरु जी, क्या भगवान और देवी-देवता हमारे आत्मिक कल्याण में सहायक हैं? अगर हैं तो कैसी पूजा करें और क्या मांगें? (P18-0082)
- गुरु जी, भगवान कृष्ण गीता में जब यज्ञ की बात करते हैं, तो उसका क्या तात्पर्य है — क्या वे कर्मकांड वाले यज्ञ की बात कर रहे हैं? इसका आध्यात्मिक सत्य क्या है? (P18-0090)
- गुरु जी, आत्मज्ञानी गुरु को हम भगवान की पदवी दे देते हैं — उस स्टेज पर भी माइंडफुलनेस में रहना है क्या? भगवान से क्या गलती होगी? (P19-0059)
- गुरु जी, भगवान और परमात्मा में क्या अंतर है? (P19-0084)
- गुरु जी, जो राग-द्वेष से मुक्त हैं क्या वे सभी भगवान हैं? और हम कृष्ण-राम को ही क्यों पकड़ लेते हैं? (P19-0087)
- गुरु जी, भक्त और भगवान के बीच गुरु की क्या आवश्यकता है? (P19-0092)
- गुरु जी, कहते हैं भगवान किसी भी रूप में आ जाते हैं। हमारे सामने भगवान आते हैं तो हम उन्हें पकड़ क्यों नहीं पाते? (P19-0103)
- गुरु जी, मेरी पत्नी ने छत के गमलों से भगवान को चढ़ाने के लिए फूल तोड़े, मैंने कहा खिले हुए ज्यादा अच्छे लगते हैं, तो उसे बहुत दुख हुआ। क्या फूल तोड़ने देना चाहिए? (P19-0143)
- गुरु जी, ध्यान में मन प्रभु की तरफ नहीं लगता, दैनिक कार्यों की तरफ चला जाता है; घर-परिवार में रहते हुए गहरा ध्यान कैसे करें? (P19-0178)
- गुरु जी, क्या भगवान को पाने के लिए वेद-पुराण-शास्त्र पढ़ना जरूरी है? पढ़ने में मन नहीं लगता, सत्संग सुनने में आनंद आता है। (P20-0038)
- गुरु जी, क्या केवल भजन करने से या ईश्वर के भरोसे बैठे रहने से मैं अपने परिवार का पेट भर सकता हूं? (P20-0052)
- गुरु जी, प्रह्लाद के लिए भगवान खंभे से साकार रूप में आए — क्या साकार रूप सच है? (P20-0091)
- प्रभु ने यह जगत स्व के अनुभव के लिए बनाया, फंसाने वाला नहीं — तो स्व में इच्छा जागृत होने का कारण क्या है? (P20-0179)
- प्रभु ने आम में मीठा और मिर्ची में तीखा स्वाद रखा है — अगर स्वाद न लें तो क्या प्रभु की रचना में हस्तक्षेप नहीं होगा? (P20-0182)
- प्रभु ने तो सबके लिए कुछ सोचा होगा कि इच्छा-अपेक्षा में फंसे मेरे बच्चे वापस मेरे पास कब आएंगे? (P21-0010)
- गुरु जी, डॉक्टर होने के नाते मरीज से तो मैं कह देता हूं कि अपनी तरफ से पूरा प्रयास करूंगा, बाकी ईश्वर कृपा। पर घर में बच्चों का आत्मविश्वास न गिरे इसलिए कहना पड़ता है "सब ठीक होगा, हम संभाल लेंगे" — क्या यह भी धोखा देना है? (P21-0058)
- गुरु जी, जब ईश्वर एक है तो सभी महापुरुषों का ज्ञान भिन्न क्यों है — जैसे नाम दान, ब्रह्म ज्ञान, आत्म ज्ञान और सांसों का ध्यान? (P21-0073)
- गुरु जी, कहते हैं गुरु को मनाना मुश्किल है और भगवान को मनाना आसान — क्या गुरु को मान की इच्छा ज्यादा होती है? (P21-0091)
- गुरु जी, एक प्रोफेसर बहुत सत्कर्म करते थे, 30 साल तक बिस्तर पर पड़े अपने परिवार-जन की सेवा भी की, लेकिन उन्होंने 30 साल तक इतने कष्ट झेले और उनका देहांत हो गया। इससे मुझे लग रहा है कि भगवान है या नहीं? क्या सत्कर्म करने वालों की ये परीक्षा है? मैं बहुत कंफ्यूज हूं। (P21-0164)
- गुरु जी, मुझे भवानी पर बहुत श्रद्धा थी। जब मेरे जीवन में, मेरी बेटी और मेरी नानी के साथ इतना उतार-चढ़ाव हुआ, तो मैंने भगवान को दोषी माना। बाद में लगा कि शायद मेरे कर्मों का फल है, शायद उसके भविष्य में कुछ अच्छा लिखा होगा — ऐसे अपने आप को समाधान दे रही हूं, लेकिन वो पहले जैसी भक्ति नहीं आ रही। क्या भगवान पर मेरा दोष देना ठीक है, और पहले जैसी भक्ति फिर कैसे उत्पन्न करूं? (P21-0178)
- गुरु जी, शरीर को मरने के बाद जला देते हैं, आत्मा तो निरंतर है। बचपन से हमें डराया गया कि यमराज ले जाएगा — तो यमराज किसको ले जाता है? मुझे लगा कि वो हमारे कर्मों को ले जाता है, भगवान के सामने बताता है, और उसी से अगला जन्म होता है — क्या ये सही है? (P22-0005)
- महाराज जी, उम्मीद नहीं करनी चाहिए, देने का भाव होना चाहिए — जिस परिवार की जरूरत की पूर्ति भगवान मुझे निमित्त बनाकर मेरे द्वारा करवा रहा है… क्या सच में भगवान मुझे निमित्त बनाकर करवा रहा है? (P22-0063)
- गुरु जी, हमें कैसे पता चलेगा कि भगवान ने हमें एक्सेप्ट किया है या नहीं? (P22-0065)
- प्रभु जी, सत्कर्म और सेवा में क्या अंतर है? (P22-0066)
- महाराज जी, जो जिस रूप के दर्शन करना चाहते हैं, क्या उसी रूप में उन्हें भगवान के दर्शन होंगे? (P22-0068)
- प्रभु जी, किसी इंसान को आत्मज्ञान हो गया है, उसकी क्या पहचान है? उसका व्यवहार कैसा होगा? (P22-0071)
- प्रभु जी, अब आपको आत्मज्ञान हो गया है — क्या आपका जन्म-मरण आपके हाथ में है, या अब आपका जन्म कभी नहीं होगा? (P22-0072)
- प्रभु जी, क्या आत्मज्ञान के बाद भी अभी और स्टेप्स होते हैं? (P22-0073)
- गुरु जी, रावण भी आत्मज्ञानी था, फिर उसमें अहंकार कैसे आया और वह भगवान राम को क्यों नहीं जान पाया? क्या इसका मतलब हम लोग भी आत्मज्ञान के बाद दोबारा रावण जैसी हरकत करने लगेंगे? (P22-0121)
- गुरु जी, भाव बहुत ज्यादा हो तो क्या भगवान ऐसे शरीर में, साकार रूप में आ जाते हैं? (P22-0138)
- गुरु जी, भगवान तक तो समझ में आया — पर "भगवान परमात्मा की यात्रा करता है" इसका क्या अर्थ है? (P22-0139)
- गुरु जी, अक्सर लोग कहते हैं कि भगवान की कृपा से, या दर्शन करने की वजह से मेरा ये काम हो गया — सच में ईश्वर की कृपा से होता है या अपने कर्म से? (P22-0156)
- गुरु जी, आत्मज्ञानी क्यों चाहते हैं कि सभी सुधर जाएं, जबकि भगवान नहीं चाहते कि सभी सुधरें — क्योंकि फिर उनके कर्मों का दंड कैसे मिलेगा? (P22-0183)
- गुरु जी, भगवान के चरणों में भक्ति कैसे करें? (P22-0185)
- महाराज जी, प्रह्लाद के लिए खंभे में भगवान आए — ये तो अलंकारिक भाषा है, ऐसा होता तो नहीं? (P23-0007)
- प्रणाम प्रभु जी, मैं और मेरी पत्नी आपके यहां आने के लिए मुंबई से निकलेंगे। मेरी पत्नी का सवाल है — पीरियड के समय अपनों की कुटिया में क्या नियम से रहना होगा? (P23-0026)
- प्रभु जी, मानव शरीर तीन प्रकार का होता है — स्थूल, सूक्ष्म और कारण। इसको कैसे समझें? कृपा करके समझाइए। (P23-0106)
- गुरु जी, क्या सत्कर्म करने पर ईश्वर खुद अपनी शरण में ले लेते हैं? क्या हमें ईश्वर प्राप्ति की चिंता छोड़कर सिर्फ सत्कर्म करना चाहिए? (P23-0181)
- गुरु जी, क्या प्रारब्ध को पूरा भोगना पड़ता है, या कर्मफल भोगे बिना नष्ट भी हो जाते हैं? क्या ईश्वर भक्ति, नाम जप से प्रारब्ध के बुरे कर्मफल को बदला या नष्ट किया जा सकता है? (P24-0034)
- गुरु जी, ईश्वर तो तीन गुण और 25 प्रकृति से परे है; तब माया नहीं बनी थी — तब ईश्वर कहां था? (P24-0042)
- गुरु महाराज, परमात्मा-भगवान, जिससे हमारा मिलना होगा — वह रूप है? (P24-0116)
- गुरु जी, मैं शाकाहारी हूं। ईश्वर ना करे, पर अगर कभी ऐसी स्थिति आ जाए कि भूख के कारण मैं मृत्यु के निकट हो जाऊं और सामने केवल मांस हो, तो क्या करूं? (P24-0164)
- गुरु जी, आपको रास्ता किसने बताया — ईश्वर ने या किसी गुरु ने? (P24-0174)
- गुरु जी, जब आप निकले थे तब आपको आत्मज्ञान पाना था या भगवान पाना था? आत्मज्ञान की समझ बाद में आई? (P24-0178)
- गुरु जी, आपके कहने का मतलब है कि हम कभी भगवान के पीछे गए ही नहीं? (P25-0025)
- प्रभु, मैंने आपसे जो भी प्रश्न किए, उनमें मुझसे जो भी गलती हुई हो, आप और सुनने वाले सभी साधक मुझे माफ करने की कृपा करें। (P25-0027)
- गुरु जी, अभी कुछ अनुभव तो है नहीं और आपने बोला कि ईमानदारी और सत्कर्म के रास्ते से चलो — तो उसमें प्रभु या परमात्मा को बीच में लाने की जरूरत है क्या? (P25-0032)
- महाराज, क्या आपकी भगवान की तरफ यात्रा शुरू हुई है या खत्म हो गई है? (P25-0040)
- प्रभु, पुनर्जन्म के बारे में विस्तार से समझाने की कृपा करें — क्या पुनर्जन्म होता है? (P25-0045)
- प्रभु जी, आपको ज्ञान अभी हुआ, पहले क्यों नहीं? यह आपकी मेहनत है या प्रभु ही सब कुछ करने वाले हैं और हम सिर्फ कठपुतली हैं, सब उसकी मर्जी से हो रहा है? (P25-0049)
- गुरु जी, ईश्वर तो एक है ना, फिर लोगों ने धर्म के नाम पर उनका विभाजन क्यों कर दिया? (P25-0136)
- ईश्वर का सतत स्मरण कैसे करें? (P25-0174)
- महाराज जी, भगवान का एक चित ध्यान का अभ्यास कैसे करें? कृपया मार्गदर्शन करें। (P26-0002)
- गुरु जी, बचपन से सुनते चले आ रहे हैं कि प्रभु या परमात्मा की इच्छा के बिना पत्ता भी नहीं हिलता, अर्थात जो हो रहा है सब भगवान की इच्छा से हो रहा है। क्या यह सही है? (P26-0070)
- गुरु जी, पहले मैं मांगता था कि भगवान सभी को सुखी करे, सभी को सद्बुद्धि दे। फिर एक दिन बैठे-बैठे सोच आया कि यह तो घूम-फिरकर मैं अपने ही बारे में भला मांग रहा हूं — सब अच्छा हो गया तो घूमकर मेरे घर तक और मुझ तक आएगा। क्या यह सही समझ है? (P26-0095)
- गुरु जी, नए साल पर भगवान से क्या मांगें और भगवान को क्या समर्पित करें? (P26-0122)