आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

इच्छा — योगी गुरु जी के प्रश्नोत्तर

इस पृष्ठ पर “इच्छा” विषय से जुड़े 179 प्रश्न हैं, जो जिज्ञासुओं ने सत्संग में योगी गुरु जी से पूछे। किसी प्रश्न पर क्लिक करके योगी गुरु जी का पूरा उत्तर उनके अपने शब्दों में पढ़ें, वीडियो के साथ।

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  1. आप जैसे संतों की सेवा करें और उससे परमात्मा-प्राप्ति की इच्छा रखें, तो यह स्वार्थ है या निःस्वार्थ? (P1-0033)
  2. (साधक:) मेरी (आत्मिक कल्याण की) इच्छा तो काफी है। लग रहा है कि जो रास्ता चाहिए था, वह अब मिल जाए। (P1-0047)
  3. योगी जी, सभी लोगों से लगाव छूट रहा है; केवल आपका सत्संग सुनने और आपके साथ रहने की इच्छा रहती है। यह क्यों हो रहा है? लेकिन मुझ पर तीन बेटियों की जिम्मेदारी है। क्या करूं? (P1-0050)
  4. योगी जी, मैं कामनाओं और विचारों में लिप्त हूं। कैसे निकलूं? (P1-0065)
  5. गुरु जी, मैं शरीर को सुंदर बनाकर और ज्ञान के द्वारा मान-सम्मान, प्रभाव और नाम पाने की इच्छा में लिप्त हो गया हूं। छोड़ने का संकल्प लेता हूं, फिर वहीं चला जाता हूं, और करने के बाद दुख होता है। (P1-0071)
  6. गुरु जी, आज मेरी 10,500 सैलरी आई; अब जरूरत पूरी हो रही है और मेरी कुछ सहयोग करने की इच्छा है। मार्गदर्शन करें। (P1-0083)
  7. गुरुदेव, मैं जरूरत में जीता हूं। पर पिताजी के पास पैसा है फिर भी वे पैसे के लिए लालायित रहते हैं, और पत्नी की जरूरत तो पूरी कर लेता हूं पर उसकी इच्छाएं पूरी नहीं कर पाता। क्या करूं? (P1-0105)
  8. अध्यात्म में इच्छाएं (इच्छा शक्ति का भटकाव) कैसे जाएंगी? (P1-0106)
  9. मन की इच्छाओं का त्याग करने की कोशिश तो करता हूं, लेकिन बार-बार नाकाम होता हूं। क्या करूं? (P1-0123)
  10. गुरु जी, मन की इच्छाओं का त्याग कैसे करें? बार-बार भूल जाता हूं। (P1-0129)
  11. कामना ही बंधन है। अगर कोई समझकर सारी कामनाएं, सब कुछ छोड़ दे, तो? (P1-0155)
  12. तो क्या आपका कहना है कि पहले मैं तय करूं कि जीवन को किधर ले जाना है; जो चीजें और लोग मुझे आकर्षित कर रहे हैं, उनके पीछे न जाकर देखूं कि मेरे अंदर कमी क्या है और उसे पूरा करूं? संसार की चीजों से यह खालीपन भरता नहीं — एक इच्छा पूरी हो तो 70 नई खड़ी हो जाती हैं — फिर भी भीतर पक्का लगता है कि यह कभी न कभी भरेगा, बस दिशा गलत पकड़ ली थी। तो क्या पहले विचारों में उस दुनिया का चित्र बनाऊं जो मुझे बसानी है, और फिर काम करूं? (P2-0164)
  13. हमें आत्मज्ञान चाहिए पर कामना भी है — बैलेंस कैसे करें? आत्मज्ञान कब होगा जब कुछ चाहिए? (P3-0036)
  14. दूसरे में इच्छाशक्ति/आत्मबल पसंद आता है पर खुद उस मार्ग पर क्यों नहीं चल पाती? असफल होकर पछतावा — आंसू किस अर्थ के? (P3-0057)
  15. (वही प्रश्न दोबारा, क्योंकि बहुत लोगों का ऐसा प्रश्न रहता है) रिश्ते-व्यवहार में सामने वाला मुझसे पैसे की इच्छा रखता है; मैं कह नहीं सकती कि पैसा लौटा देना या मैं मदद नहीं कर सकती — भावनात्मक बात हो जाती है। बदले में वह पैसा तो नहीं लौटाता, पर मेरे लिए गिफ्ट लाता है, ज्यादा केयर करता है, जबकि मुझे उसकी जरूरत नहीं (मेरे पास कपड़े बहुत हैं, फिर भी वह कपड़े लाए जा रहा है)। लगता है यह रिश्ता लेने-देने की बुनियाद पर टिका है। ऐसे में मुझे क्या करना चाहिए? (P3-0087)
  16. (लाइव) आपने कहा प्रकृति आपकी हर बात समझती-सुनती है (जैसे चिड़िया बनने की इच्छा)। तो जो पूरा ईमानदार नहीं है, अभी भी अपने जाल में व्यस्त है और कई इच्छाएं व्यक्त कर रहा है — क्या प्रकृति उसकी इच्छाओं को भी मान्यता देगी? (P3-0131)
  17. गुरुदेव, मां-बाप की करोड़ों की स्टेट बच्चों को मिलती है — उसका क्या? और समझ तो अभी आई है, बदलाव अभी कर रहे हैं, पर परिवार ने पहले के हिसाब से इच्छाएं पाल ली हैं और कहते हैं ऐसा तो हो ही नहीं सकता — तो क्या करें? (P3-0134)
  18. (लाइव) आत्मज्ञान पाने की इच्छा की धारणा — क्या यह मतलबी (स्वार्थ) नहीं है? (P3-0170)
  19. (कुटिया में, इंदौर से आए 75 वर्षीय साधक) मैं पहले भी अध्यात्म में बहुत चला — साधना करो, यज्ञ-हवन करो, साधना से प्रकाश आएगा, भगवान का दर्शन होगा — पर समझ नहीं आया। 13 दिन से आपके वीडियो दिन-रात सुनकर समझ आया कि प्रत्यक्ष ज्ञान में चार-पांच ही बातें हैं; मैं करूंगा तभी होगा, किसी और के करने से नहीं; मैं ही हूं, कहां जाऊं। इसलिए घर से रोटी बांधकर सीधा चला आया। अंतिम इच्छा यही है कि आप रखो तो यहीं रह जाऊं। गुरुदेव, इससे आगे क्या है? (P3-0174)
  20. (कुटिया में साधिका) आप कहते हैं कि मुझे यहां तक लाने में अनेक लोगों का बल लगा है। पर मुझे लगता है कि मैं अपनी इच्छा-वासनाओं के कारण खुद ही उनमें घुसी हूं — वे लोग तो सिर्फ उपकरण थे, किसी ने मुझे जबरदस्ती नहीं फंसाया। अगर मैं यह कहूं कि इन लोगों ने मुझे फंसाया, तो मेरी लायबिलिटी कम हो जाती है; अगर पूरी लायबिलिटी खुद पर लूं तो मैं अपने ऊपर ज्यादा काम कर पाऊंगी। और घुसने में मैंने अपनी पूरी ताकत लगा दी, अब मैं निष्क्रिय हो गई हूं, मुझमें दमखम नहीं — अब निकलूं कैसे? क्या यह सोच सही नहीं है? (P3-0185)
  21. (वही साधिका) तो आपका कहना है कि मेरी इच्छाएं बाहर की जानकारी से बनी हैं? पर कोई बंदा जंगल में पला-बढ़ा हो, उसके हार्मोन हों, उसे कोई जानकारी नहीं दे रहा — पशुओं को भी कोई जानकारी नहीं देता — तो क्या बिना जानकारी के वह फंसेगा ही नहीं, इच्छा पैदा ही नहीं होगी? और हम आज के युवाओं को ज्यादा से ज्यादा जानकारी के लिए प्रेरित करते हैं — तो हमें कितनी जानकारी लेनी-देनी चाहिए? (P3-0186)
  22. (वही साधिका) क्या इच्छा हमारे लिए हेल्पफुल भी नहीं है — उठने में? हम भी तो एक इच्छा लेकर यहां बैठे हैं; कोई घर से (यहां के लिए) चला, तो वह भी इच्छा लेकर चला ना। इसे क्या कहेंगे? (P3-0187)
  23. (वही साधिका) जातिवाद जैसी जानकारियां समाज के लेवल पर ठीक है, लेकिन मैं इंटरनल जर्नी — अंदरूनी, मानसिक यात्रा — की बात कर रही हूं। मेरी अंदरूनी कामनाएं ही तो बाहरी रूप लेती हैं। जैसे मेरी जीभ का आकर्षण या देखने का आकर्षण — उसकी किसी ने जानकारी नहीं दी, वो अंदरूनी है। एक ही घर में पले बच्चों में भी किसी को घर का स्वाद, घर के लोग पसंद नहीं आते, पड़ोस की चीजें आकर्षित करती हैं — तो वह आकर्षण तो मेरे भीतर ही हुआ ना? क्या बाहर वाली जानकारियां ही मेरी इच्छा पैदा करती हैं? (P3-0188)
  24. (लाइव) नर्मदे हर गुरु जी। क्या अपनी कमाई का 10% अपनों की कुटिया में दे सकते हैं? मेरी प्राइवेट नौकरी है, सैलरी लिमिट में है, लेकिन इच्छा है कि मेरे द्वारा कुछ सत्कर्म हो। (P4-0015)
  25. (लाइव) योगी जी, योग्यता से अधिक पाने की इच्छा कैसे पता चलेगी? हमें योग्यता से अधिक मिल रहा है, यह कैसे पता चलेगा? (P4-0017)
  26. (लाइव) प्रणाम योगी जी। आप हर सांसारिक शब्द (जैसे इच्छा) की नई परिभाषा बता रहे हैं, जिससे संशय होता है कि जब आप सांसारिक शब्द इस्तेमाल करते हो, तो उसे सांसारिक अर्थ के रूप में लेना है या आप उससे भिन्न (अर्थ) बोल रहे हो। कैसे पता करें? (P4-0030)
  27. (लाइव) गुरु जी प्रणाम। सब कुछ जान लेने की इच्छा क्यों रहती है? क्या आत्मज्ञानी सर्वज्ञ हो जाता है? क्या जानने से मुक्त हो जाता है? (P4-0073)
  28. (लाइव) योगी जी नमन। जब एकांत में बैठते हैं तब विचार, वासना, कामना ही आती है। तो इसी का यूज़ करके हम कैसे निर्विकार हो जाएं — कृपया मार्गदर्शन कीजिए। (P4-0081)
  29. (लाइव) गुरु जी प्रणाम। आपने कहा कि जानने से मुक्त होना है, लेकिन खुद को तो समझना है ना — 'मैं' क्या है, कामना, भय, राग-द्वेष, तुलना — यह सब तो समझना पड़ेगा ना, तभी तो इससे छुटकारा होगा। ऐसा ही है क्या? (P4-0126)
  30. (लाइव) गुरु जी नमन। बाहर लोग जो इच्छा-अपेक्षा में हैं, वह भी एक प्रकार का भ्रमण ही है ना? जब भ्रमण पूरा हो जाएगा तो आत्मज्ञान हो जाएगा? (P4-0143)
  31. (लाइव) गुरु जी नमन। क्या अपनी इच्छा-अपेक्षा के कारण ही हम मां-बाप की गोद में आते हैं? (P4-0144)
  32. (वही साधिका) मेरी शादी बचपन में 14-15 साल में हो गई, दो बच्चे हो गए। अध्यात्म में आने के बाद मेरी कोई ख्वाहिश, इच्छा नहीं बची — पति के साथ हूं, पर वो अब भी फिजिकल प्यार चाहते हैं, और मेरा माइंडसेट अध्यात्म में हो गया है, मेरी बॉडी उस चीज को एग्री नहीं करती। तो क्या मेरी जिम्मेदारी बनती है? उनके लिए क्या करूं? (P4-0193)
  33. (वही साधिका) सूरज एक है, मैं उसका ताप अपनी क्षमता के अनुसार सहन कर पा रही हूं। जो मुझे दुख-तकलीफ दे, मुझे उससे पार होना है। पर दुख की तो कोई चाह नहीं करता, आदमी हमेशा सुख की कामना करता है — फिर दुख क्यों आता है? (P4-0196)
  34. (वही साधिका) कोई गुरु कहते हैं कि मुझे पूरी दुनिया का कल्याण करना है, घर-घर तक पहुंचना है — क्या वाकई वो लोगों के लिए करते हैं या अपने लिए? यह भी तो एक कामना हो गई? और (जैसे) हमने मरते हुए बिल्लों-कुतिया को उठाकर पाला — कहते हैं सब अपने लिए ही करते हैं, उनकी तड़प देखकर दुख तो हमें ही होता है। (P5-0003)
  35. (वही साधक) गीता में कृष्ण ने कहा कि दुख से मुक्ति पानी है तो मोह छोड़ो, लालच, कामना छोड़ो। जैसे इन (साधिका) की मम्मी से बात नहीं हो पाती और इन्हें दुख है — तो यह मोह है ना? उम्मीद और मोह में क्या अंतर है? और आप अपनी बहन का दुख सुनकर भी कह देते हैं 'रह अपने दुख में' — आपको उसके दुख से दुख नहीं होता, आपने यह डिटैचमेंट कैसे किया? (P5-0014)
  36. (वही साधिका) कहते हैं कामना से मुक्त हो जाओ — क्या कामना को पहले प्राप्त कर लो तब मुक्त हो जाएँगे? मैं आर्थिक परेशानी क्लियर करके निडर होकर आना चाहती हूँ; और पीतमपुर का मकान छोड़कर गाँव जाना चाहती हूँ पर डर है कि वहाँ फंस न जाऊँ। (P5-0020)
  37. (कुटिया में साधिका) क्या पहले आत्मज्ञान / आत्मिक कल्याण लेना है, बाद में बाकी काम? प्रबल इच्छा का मतलब क्या? (P5-0023)
  38. क्या हर इच्छा को जाँचना ही ध्यान है? कैसे पता करें हम ध्यान में हैं? (P5-0051)
  39. (वृद्ध साधक) अंतिम सांस यहीं बिताने की इच्छा है; मोक्ष के लिए मार्गदर्शन दें। क्या रुक सकते हैं? (P5-0067)
  40. भोग की इच्छा और अध्यात्म की इच्छा दोनों एक साथ हों तो क्या करें? (P5-0086)
  41. आप कहते हो चल अपने घर — घर कहां है? कामना छोड़कर कैसे जाएं? (P5-0134)
  42. भोग की इच्छा भी है और भोग से मुक्ति की भी — कौन सा रास्ता? शादी करूं या नहीं? (P5-0140)
  43. कामना और इच्छा अलग-अलग हैं या एक ही? (P5-0152)
  44. दुख का कारण ज्यादा कामना / कुछ पाने की इच्छा है? (P5-0182)
  45. अध्यात्म की तरफ इतने कम लोग क्यों हैं? मन की कामना कैसे समाप्त करें? (P5-0183)
  46. बच्चे की हर इच्छा पूरी कर दूं ताकि फ्री हो जाए — सही है? (P5-0197)
  47. जबान का स्वाद / खाने की इच्छा ईमानदारी से — कहां तक? (P6-0001)
  48. इच्छा आएगी ही — सामने नंगा/कपड़े वाले को सेम नजर से देखना चाहिए? (P6-0019)
  49. शरीर की तीन अवस्थाएं बताई जाती हैं, जागृत, स्वप्न और सुषुप्ति। इस समय हम जागृत अवस्था में हैं, ऐसा कहा जाता है। जब स्वप्न में होते हैं तो उसे सच मान लेते हैं, पता ही नहीं रहता कि स्वप्न चल रहा है, जागृत की तरह लगता है। स्वप्न टूटते ही लगता है कि वह कुछ और था और अब कुछ और है। उसको अनुभव करने वाला कौन है? कई जगह जाकर सुना कि आत्मा है। अगर आत्मा का अनुभव एक बार हो गया, उस बिंदु को छू लिया, तो फिर दूसरों के दर जाने की क्या जरूरत? इससे तो लगता है कि आत्मा है ही नहीं। क्या हम रोबोट की तरह हैं, जिसमें मेमोरी फिट कर दी गई है, इनपुट डाल दिया गया है, और टेक्नोलॉजी से ऊपर का अनावश्यक ज्ञान दिया जा रहा है? इसे उदाहरण से स्पष्ट करें, ताकि सरलता से समझ आए और जीवन भर उस पर चला जा सके। स्वप्न तो ऐसे भी आते हैं जो इस जन्म की कामना नहीं लगते, ऐसे दृश्य, लोग और रूप जिनकी कल्पना भी नहीं हो सकती। (P6-0039)
  50. नागपुर से आई मां कहती हैं, धन, गहना और बेटा-बेटी से लगाव छूट गया लगता है। पति की जंजीर थी, उसे छोड़कर आई हूं। मौन मिल गया, काम भी छोड़ दिया। परिवार वापस बुलाता है। इक्कीस दिन का टारगेट है। क्या मैं मुक्त हो गई? जाऊं या यहीं रहूं? आखिरी इच्छा और बेड़ी का क्या संबंध है? गुरु क्यों चाहिए? (P6-0105)
  51. कामनाओं के लिए गुरु के पास धक्के और गाली सहकर क्यों खड़े रहते हैं? गाली को गुरु का आशीर्वाद कह देते हैं, द्वार पर धक्का भी मिलता है। यह आत्मकल्याण के लिए है या माल के लिए? क्या हमने अपने आप को कुत्ते जैसा नहीं बना लिया? (P6-0148)
  52. भगवान की इच्छा के बिना पत्ता भी नहीं हिलता, क्या यह बात सही है? (P7-0030)
  53. इच्छा को कम करने की आवश्यकता है क्या? (P7-0067)
  54. अहम भाव को पूरी तरह कैसे खत्म करें? आपने कहा था कि दूसरों से अपने हिसाब से काम लेने की उम्मीद छोड़ दो, उससे आधी समस्या हल हुई। पूरी तरह अहम कैसे मिटे? काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह में काम किसे कहते हैं, कामना को या वासना को? मोह और लोभ किस स्थिति में होते हैं? इन्हीं दो पर सबसे ज्यादा संदेह रहता है। (P7-0152)
  55. एक बार गुरु मिल जाए, तो रुक ही जाना चाहिए क्या? श्रीलंका में आपने कहा था कि ईमानदारी, सत्कर्म, सत्संग, और भ्रमण भी जरूरी है। क्या भ्रमण करना जरूरी है? भ्रमण की इच्छा घुटन से होने लगती है, कुछ समझ में नहीं आता। (P7-0163)
  56. दर्शन, दृश्य और दृष्टा में, जब तक दर्शन की इच्छा है तब तक क्या आत्मबोध हो सकता है? (P8-0079)
  57. लगाव से कैसे बाहर आएं? आत्मकल्याण ही जीवन का अंतिम लक्ष्य कैसे बने, ऐसी इच्छा जिसके सामने कुछ और नजर न आए? (P8-0132)
  58. इच्छा से कैसे मुक्त हो जाएं? (P9-0068)
  59. जीने की इच्छा तो खत्म हो गई गुरु जी। जीते-जी कैसे मर जाएं, इसकी कला सिखा दीजिए। (P9-0144)
  60. गुरु जी, ऐसा क्या करें कि आत्मज्ञान जल्दी हो जाए? अब इसके अलावा कोई इच्छा नहीं आ रही। (P9-0174)
  61. गुरु जी, कामना से कैसे मुक्त हुआ जाए? (P10-0017)
  62. गुरु जी, क्या नाम जप करते हुए कर्म करने से अपने आप मान की इच्छा नहीं आएगी? (P10-0080)
  63. गुरु जी, इच्छा तो समझ में आती है, अपेक्षा क्या होती है? (P10-0094)
  64. योगी जी, हम "अचाह" (कुछ ना चाहना) की भी तैयारी कर रहे हैं कि अपने आप में हो जाएं — मतलब यह इच्छा कर रहे हैं कि मैं अपने आप में हो जाऊं। क्या यह सही है? (P10-0178)
  65. मैं सभी लेनदेन और वासनाओं से मुक्त होना चाहता हूं, लेकिन अंदर से भोग और भोजन को भोगने की प्रबल इच्छा बनी हुई है। मेरे लिए क्या आज्ञा है? (P11-0045)
  66. लेनदेन खत्म होते ही भोगने की इच्छा अपने आप खत्म हो जाएगी, या उसके लिए अलग से प्रयास करना पड़ेगा? (P11-0046)
  67. किसी पदार्थ को भोगने की इच्छा उसकी कीमत देने के बाद छूटती है, या उसे समझने के बाद? (P11-0047)
  68. क्या हमारा लेनदेन ही इच्छाओं का रूप लेकर हमारे सामने आता है? और हमारे जीवन का आधार क्या होना चाहिए? (P11-0162)
  69. क्या ऐसा नहीं हो सकता कि इच्छा आए ही ना? हम अपने आसपास के लोगों से प्रभावित कैसे ना हों? (P11-0190)
  70. मान की इच्छा, प्रभावित करने की इच्छा, बड़ा बनने की इच्छा, दिखावा, "मैं कुछ हूं" — यह सब इच्छाएं हमारे अंदर पैदा ही क्यों होती हैं? (P12-0036)
  71. जैसे किसी भोग को भोगने की इच्छा एक वासना है, क्या वैसे ही नींद भी एक वासना है? (P12-0038)
  72. तो क्या मैंने बड़ा घर, बड़ी गाड़ी जैसी अपनी इच्छाओं-वासनाओं में — कि लोग, समाज मेरे बारे में क्या बोलेंगे — अपनी एनर्जी एक तरह से वेस्ट कर दी? (P12-0126)
  73. घर-परिवार में बचपन से मां-बाप डालते हैं कि तूने फर्स्ट आना है, मेरी नाक की लाज रखनी है — अपनी अधूरी इच्छाएं बच्चों से पूरी करवाना चाहते हैं। तो अगर मैं गार्डियन के लिए ये प्रश्न रखूं — क्या वो अपने बच्चों से ऐसी इच्छा ना रखें? फिर वो क्या करें? (P12-0127)
  74. गुरु जी, मैं कृपा की बात नहीं कर रहा, लेकिन इतने समय से मेरे अंदर बहुत तीव्र इच्छा हो रही है कि अब मैंने और जन्म नहीं लेना — मुझे यह यात्रा बहुत तेज करनी है। इसके लिए क्या करूं? (P12-0141)
  75. गुरु जी, अगर इंसान इच्छाएं निकाल भी देगा, तो फिर आगे (जीवन) कैसे चलेगा? (P12-0145)
  76. (निकलने के लिए) क्या भोग की इच्छा को पूरी तरह छोड़ना होगा, या जो भी भोग हो उसे ईमानदारी के साथ भोगना और साथ में ईमानदारी से जीना होगा? (P12-0191)
  77. गुरुदेव, हमारा जन्म भी 1984 का है और हम भी 15-20 सालों से उसकी खोज में हैं; अब आपको देखकर इच्छा पूरी सी लगती है, और अब थोड़ा-थोड़ा समझ आने लगा है कि सत्य क्या है। (P12-0198)
  78. गुरु जी, दिन में कभी-कभी बहुत इच्छा होती है कि कुछ सुनूं या कुछ भी खाऊं। चिंतन करता हूं तो शांत हो जाता है, फिर थोड़ी देर बाद फिर वही। ऐसे में क्या करें? (P13-0003)
  79. इच्छा उठते ही मन उसी को पूरा सत्य और संसार क्यों मान लेता है, जबकि विवेक भीतर मौजूद है? उस क्षण विवेक को जागृत कैसे करें? (P13-0050)
  80. हम जैसे नवयुवक अभी शुरुआत में हैं; घर वालों की इच्छा है, शादी की बात चल रही है, उसमें टकराव आ जाता है। हम परमात्मा को पाना चाहते हैं — तो शादी करें या न करें? यही कंफ्यूजन है; अगर इसे छोड़ दिया और वो न मिला तो? (P13-0058)
  81. गुरु जी, कहा जाता है 'आत्मा सो परमात्मा' — आत्मा और परमात्मा को एक मान बैठे हैं। मेरी समझ से ये अलग-अलग हैं: परमात्मा स्वयंभू है, उसे आधार की जरूरत नहीं; आत्मा उसी से है, निर्मल है, पर इच्छा आते ही आत्मा जीवात्मा हो जाती है, और जितनी इच्छाएं बढ़ती हैं, उतनी भटकती जाती है। समाज को प्रत्यक्ष ज्ञान के हिसाब से इस पर समझाइए — आत्मा, परमात्मा और जीव। (P13-0072)
  82. गुरु जी, मैं शांत होना चाहती हूं — मन से भी और इच्छाओं से भी। (P13-0134)
  83. गुरु जी, मुझे जानवर पालने की इच्छा थी। मैंने एक बिल्ली पाली; फिर उसने बच्चे दिए, पांच-छह हो गए, सारे खानदान ने मुझ पर थोप दिया कि इनका क्या करेगा। मैं उन्हें फेंक भी नहीं सकता था, खिला भी नहीं पा रहा था, और फिर मैं उन्हीं बिल्लियों से चिढ़ने लगा। (P13-0152)
  84. गुरु जी, मैं कामना और इच्छा में फंसा हूं, कैसे निकलूं? कुछ उपाय बताइए। (P13-0173)
  85. गुरु जी, ध्यान में बैठे हुए क्या परमात्मा की इच्छा भी खत्म करनी है? परमात्मा का ध्यान कैसे करें? (P14-0038)
  86. गुरु जी, आपसे मिलने की ये चाहत, ये इच्छा भी आखिर क्यों जागती है? ये प्यास क्यों जागती है, और मिलने से क्या होगा? (P14-0044)
  87. गुरु जी, आपमें ये इस रास्ते वाली इच्छा कैसे उठी? और आपने किसी की बात सीधे-सीधे स्वीकार क्यों नहीं की? (P14-0055)
  88. गुरु जी, अब तो बस अपने में टिक जाना है, पर इच्छा तो अभी भी आती-जाती दिखती है — आज सुबह आपको ठंडा शर्बत पिलाने की बात मन में आ गई। (P14-0087)
  89. गुरु जी, जो फंसे हैं क्या यह भी अस्तित्व की इच्छा है, या विकास-क्रम चल रहा है? मुक्ति तो निश्चित है, पर मुक्ति के बाद फिर यह चक्र शुरू होगा — फिर यह लीला क्यों? (P14-0093)
  90. गुरु जी, मेरा ज्ञान तो नकारात्मक है — नेति-नेति द्वारा यही ज्ञान होता है कि शरीर, मन, बुद्धि, अहंकार मैं नहीं; कोई आकार, गुण, इच्छा स्थाई नहीं; कर्ता भ्रम है, माया मात्र है। (P14-0104)
  91. जो जगत के भोगों और इच्छाओं से आलसी हो गया, वही आत्मज्ञान का बड़ा काम कर सकता है? (P15-0009)
  92. इच्छा का त्याग करना है — यह भी तो एक इच्छा ही है? (P15-0168)
  93. गुरु जी, अगला जन्म किस आधार पर होता है — प्रवृत्ति, भाव, इच्छा-अपेक्षा, या कोई और कारण है? (P15-0174)
  94. मुझे आत्मज्ञान हो गया है, अब आध्यात्मिक ज्ञान बांटने की इच्छा है, लेकिन मां-पिता सभी खिलाफ हैं। मेरा ना नौकरी में मन है, ना किसी चीज में। (P16-0025)
  95. आत्मज्ञान होने के बाद कौन भोगों की इच्छा करेगा या विवाह का ख्याल करेगा? (P16-0057)
  96. आप 100 कमरे बनाना चाहते हैं — यह सब आपकी इच्छा है। आप कहते हैं कि हमारी कोई इच्छा नहीं है। कृपया बताएं। (P16-0077)
  97. हमें जो घुमा रहा है, वो कामनाएं-इच्छाएं हैं या फिर हमारा हिसाब-किताब — ये कैसे पता चले? कभी-कभी ऐसा भी लगता है कि हिसाब-किताब है। (P16-0119)
  98. अब जैसे हम फिर भी लौट के जा रहे हैं — ये हमारी इच्छा-कामना है या हिसाब-किताब है? इसको हम समता में कैसे लें? (P16-0120)
  99. अंत में थोड़ा यह बताइए कि इच्छा क्या है और अपेक्षा क्या है? (P16-0136)
  100. (लाइव) कुछ इच्छा नहीं है गुरुजी। आत्म-चिंतन कैसे करूं, अपने स्वभाव में कैसे रहूं, बताइए। (P17-0005)
  101. भक्ति मार्ग हो या ज्ञान मार्ग, मैंने अपनी लाइफ में भी देखा है कि लोग रिश्तों वाली आसक्ति उठाकर किसी "गुरु" पर शिफ्ट कर देते हैं, और जिसे गुरु समझा वो उस स्थिति में था ही नहीं — इससे कई जिंदगियों से खिलवाड़ हुआ, जीवन और बखेड़ा हो गया। तो विवेक कैसे रखें कि मैं वहां न फंस जाऊं, कि वो अपनी कामना के लिए मुझे मोहरा तो नहीं बना रहा — गुरु को कैसे पहचानें? (P17-0017)
  102. गुरु जी, जो इस जीव वाली स्टेज से ऊपर उठ जाता है — जो भ्रम में नहीं है, कामनाओं से हट गया — उसको अगर दिक्कत आए, उसका हाथ कट जाए, तो दर्द किसको होगा? (P17-0044)
  103. गुरु जी, अगर आत्मदर्शन की जरा सी भी इच्छा है तो यात्रा की शुरुआत कैसे करें? (P17-0069)
  104. गुरु जी, जब हम किसी जीव को बिना कामना के भोजन कराते हैं तो अंदर से अच्छा लगता है, सुकून मिलता है — ऐसा क्यों होता है? (P17-0090)
  105. गुरु जी, प्रभु से मिलने की इतनी कामना तो रखनी ही पड़ेगी ना? (P17-0096)
  106. गुरु जी, आत्मज्ञान होने के बाद क्या व्यक्ति दोबारा उस बोध से वंचित हो सकता है, या फिर से इच्छाओं के कारण संसार के बंधन में फंस सकता है — जैसे पहली बार मूल से अलग हुआ था? और अगर फिर फंस सकते हैं तो ऐसी मुक्ति का क्या फायदा? (P17-0168)
  107. गुरु जी, क्या इच्छा के कारण ही जड़ भरत को हिरण की योनि में आना पड़ा? (P17-0178)
  108. गुरु जी, क्या जरूरत में जीने से भोगने की इच्छा समाप्त हो जाएगी — और नया नहीं बनेगा, पुराना छूट जाएगा? क्या ईमानदारी से कर्म करने पर कर्ज चुकता होता रहता है? (P17-0182)
  109. गुरु जी, "अपना तरीका छोड़ दें" — क्या कुछ पाने की इच्छा ही अपना तरीका है? (P17-0187)
  110. गुरु जी, सुगंध-दुर्गंध, सुनने, देखने, स्वाद और स्पर्श में गलती कहां होती है — कोई व्यंजन की खुशबू अच्छी आई और "अच्छी है" कह दिया, तो उसमें अपनी इच्छा कहां है? (P18-0062)
  111. गुरु जी, क्या आत्मज्ञान के बाद राग-द्वेष और कामना मिट जाते हैं? (P18-0075)
  112. गुरु जी, इस युग में जीवन का लक्ष्य कैसे चुनें? क्या अपनी इच्छाओं की पूर्ति करना गलत है? क्या भगवद गीता में कहे नियम में जीने से मोक्ष मिल सकता है? (P18-0108)
  113. गुरु जी, जब आत्मा इच्छा-अपेक्षा में जीव बनी और उसे पता है कि मूल तक पहुंचना है, तो फिर भी वह अपने आप को बचाकर क्यों रखना चाहती है — अपना नाश क्यों नहीं करना चाहती? (P18-0121)
  114. गुरु जी, जागृत अवस्था में इच्छा नहीं होती, लेकिन मन सपने में अपनी इच्छा पूरी करता है, दृश्य बनाता है — इसे नियंत्रण में कैसे लाएं? (P18-0163)
  115. गुरु जी, सत्संगों में सत्कर्म के पीछे मुक्ति या मोक्ष जोड़ दिया जाता है — तो मुक्ति के लिए देना भी तो एक भावना/कामना हुई? (P18-0182)
  116. गुरु जी, पूरी जिंदगी भौतिकवाद में मेहनत करके जो चीजें हासिल कीं, अब उनका उपयोग करना क्या कामना में आएगा? (P18-0184)
  117. गुरु जी, मैं कामनाओं को छोड़ने की कोशिश कर रहा हूं, लेकिन पूरा छोड़ नहीं पा रहा — मार्ग दिखाइए। मन मुझे यहां-वहां ले जाता है। (P19-0028)
  118. गुरु जी, इच्छा और अपेक्षा का सही अर्थ क्या है? (P19-0154)
  119. गुरु जी, जरूरत और इच्छा में फर्क कैसे समझें? (P19-0156)
  120. हमारे अंदर इच्छा, अपेक्षा, चोरी जैसे बीज भरे हैं — उनसे कैसे छूटें? (P20-0166)
  121. प्रभु ने यह जगत स्व के अनुभव के लिए बनाया, फंसाने वाला नहीं — तो स्व में इच्छा जागृत होने का कारण क्या है? (P20-0179)
  122. इच्छा का अंत कैसे होगा — इच्छा तो व्यापक है? (P20-0180)
  123. हमारे लिए सबसे ज्यादा तकलीफदायक और गिराने वाली इच्छा कौन-सी है? (P20-0184)
  124. इच्छा-अपेक्षा छोड़ने को आप कह चुके हैं, पर इच्छा तो व्यापक है — सर्जनहार ने खुद इच्छा से यह पूरा ब्रह्मांड बनाया, जिसके भीतर हम हैं? (P20-0186)
  125. इच्छा की परिभाषा क्या है — स्व से हम हटे कैसे? (P20-0188)
  126. इच्छा-अपेक्षा के बिना हम स्व में आ गए — यह कैसे साबित होगा, किसे यकीन होगा कि मैं आ गया हूं? (P20-0191)
  127. इच्छा-अपेक्षा छोड़कर स्व में आ भी गए, पर अगर वह फिर से इच्छा-अपेक्षा पैदा कर ले तो? (P20-0192)
  128. जरूरत के बाद हम इच्छा पैदा क्यों कर लेते हैं? (P20-0193)
  129. इच्छा और अपेक्षा को एक सरल उदाहरण से समझाइए? (P20-0196)
  130. इच्छा-अपेक्षा से निकलना बहुत मुश्किल है — हर चीज में अपेक्षा होती है, जैसे खाना खाने के बाद पानी की? (P20-0198)
  131. जो संसार में बैठा है और इच्छा-अपेक्षा छोड़कर कुदरती जीवन जीना चाहता है, उसका तो पूरा जीवन निकल जाए — क्या स्व को जानने का यही एक माध्यम है, यह तो बहुत कठिन है? (P20-0199)
  132. इच्छा-अपेक्षा छोड़ना समझ में तो आया, फिर भी यह कठिन क्यों लगता है? (P20-0200)
  133. जब हम सो जाते हैं तो कोई इच्छा-अपेक्षा नहीं बचती — तब तो हम स्व में ही होते हैं? (P21-0002)
  134. अब समझ आया कि इच्छा-अपेक्षा हम पैदा करते हैं, वही बंधन और वही अज्ञान है — क्या यह अज्ञान हम समझ के धारण करते हैं? (P21-0003)
  135. जमीन के अंदर लोहे को जंग नहीं लगता, जमीन से अलग करते ही हवा लगती है और जंग लग जाता है — तो स्व भी कहीं से तो अलग हुआ होगा, तभी इच्छा-अपेक्षा हुई? (P21-0004)
  136. इच्छा-अपेक्षा को समझकर छोड़ देना बहुत भगीरथ काम है — पर अगर स्व को जान लिया तो इच्छा-अपेक्षा वहां आ ही नहीं सकती, तो पहले स्व को क्यों न जानें? (P21-0005)
  137. इच्छा-अपेक्षा जड़ है और स्व चेतन है — तो क्यों न सीधे चैतन्य को जानने का प्रयत्न किया जाए? (P21-0007)
  138. इच्छा-अपेक्षा से अलग होकर स्व में आ गए, पर वही स्व वापस इच्छा-अपेक्षा खड़ी करेगा? (P21-0008)
  139. अहम वृत्ति से स्व खुद को कर्ता मानता है, उसी से इच्छा-अपेक्षा जुड़ी है — स्व कर्ता कब मानता है? (P21-0009)
  140. प्रभु ने तो सबके लिए कुछ सोचा होगा कि इच्छा-अपेक्षा में फंसे मेरे बच्चे वापस मेरे पास कब आएंगे? (P21-0010)
  141. स्व के कर्ता को जाने बिना इच्छा-अपेक्षा का अंत नहीं आ सकता — जैसे गेहूं पर छिलका रहे तो वह उगता रहता है, छिलका हटा दो तो नहीं उगता; तो क्या स्व को जाने बिना इच्छा-अपेक्षा उगती नहीं रहेगी? (P21-0011)
  142. आत्म तत्व में स्थिर हुए बहुत-से साधु-संत भी वापस इच्छा-अपेक्षा में आ गए, इसका प्रमाण वेद में है — फिर? (P21-0012)
  143. जब तक मूल को नहीं जानेंगे, इच्छा-अपेक्षा का अंत नहीं हो सकता — तो मूल को जानने का रास्ता क्या है? (P21-0013)
  144. जब मैं अपने मूल आनंद में था, तो मुझे ऐसी क्या इच्छा हो गई कि इस बंधन में फंस गया? (P21-0036)
  145. यह स्वाद की इच्छा पड़ कहां से गई — इन चीजों में आखिर क्या स्वाद आता है? (P21-0041)
  146. गुरु जी, मेरे अंदर एकांत का भाव रहता है — कहीं जाना हो तो मैं अकेला जाता हूं, ऐसी इच्छा नहीं रखता कि कोई साथ हो। क्या यह ठीक है? (P21-0057)
  147. गुरु जी, कहते हैं गुरु को मनाना मुश्किल है और भगवान को मनाना आसान — क्या गुरु को मान की इच्छा ज्यादा होती है? (P21-0091)
  148. योगी जी, आप इच्छा छोड़ने की बात करते हैं — अगर सबने इच्छा छोड़ दी तो दुनिया में डेवलपमेंट कैसे होगा? (P21-0120)
  149. गुरु जी, आपने कहा था वस्तुएं बंधन का कारण हैं, फिर आपने अपनी माता जी के लिए सोने की चैन बनवाई — तो क्या हमें भी अपने माता-पिता की इच्छा पूरी करनी चाहिए? (P21-0142)
  150. गुरु जी, क्या इच्छा ही दुख का मूल कारण है? (P21-0156)
  151. गुरु जी, और इच्छा, अपेक्षा और मेरा — इनका मतलब क्या है? (P21-0185)
  152. गुरु जी, इच्छाएं भी कई स्तर पर आती हैं — जैसे शरीर से जनित इच्छा, शरीर में कहीं दर्द है तो उसकी दवा चाहिए — इसे कैसे समझें? (P22-0029)
  153. गुरु जी, मेरी बेटी ने भगवा कपड़े पहन लिए; मैं उसे समझाकर घर ले आई, पर उसके अंदर कथा-वाचक बनने की इच्छा है, शादी नहीं करनी कहती है। फिर कुंभ में जाकर अखाड़े में उसने फिर कपड़े पहन लिए और अब बनारस चली गई है, घर नहीं आ रही — अब हम क्या करें? (P22-0045)
  154. गुरु जी, कहते हैं वैराग्य में दमन की प्रधानता है और गृहस्थ लोग विवेक की प्रधानता पर चलते हैं; शंकराचार्य जी कहते हैं इसके बाद भी तितिक्षा चाहिए — प्रकृति द्वारा दिए सुख-दुख को ना चाहते हुए भी सहने का सामर्थ्य। हम अभी दमन पर ज्यादा फोकस कर रहे हैं — जैसे दर्द हो रहा है तो उसे महत्व नहीं देना, इच्छा को मार देना — यह दमन है? (P22-0047)
  155. गुरु जी, समझ के स्तर से क्या शरीर का दर्द ओवरलुक हो पाता है? जैसे आज पूरे दो घंटे सत्संग में बैठकर सुनते रहे तो दर्द की उपेक्षा हो गई। मानसिक सहन तो समझ में आता है — विचारों और इच्छाओं की उपेक्षा कर सकते हैं — पर शारीरिक सहन में समस्या है। (P22-0048)
  156. गुरु जी, मैं कामनाओं से मुक्त होना चाहता हूं, उसके लिए क्या करना है? (P23-0020)
  157. गुरुदेव, आपका कथन सही है कि व्यक्ति कामनाओं, मोह और उनके बंधनों में फंसा हुआ है। तो जो व्यक्ति दिन भर ईमानदारी से मजदूरी करके अपने परिवार का पेट भरता है, क्या वह मुक्त है, या कुछ और मार्गदर्शन करें? (P23-0028)
  158. गुरु जी, अहम को हटाना, मान की इच्छा का त्याग करना इतना कठिन है — अगर किसी परिस्थिति में वह भाव इंसान में आ भी जाता है तो क्या करें? (P23-0065)
  159. गुरु जी, जैसे आपने कहा कि अपनी इच्छा के अनुसार कोई चीज नहीं मिलती तो हमें गुस्सा आता है। अब एक परिवार में जैसे पांच लोग हैं, उसका जो मुखिया होगा वह तो चाहेगा ही कि मेरे हिसाब से काम हो — जरूरी भी है, क्योंकि कुछ काम उसके हिसाब से ही सही होते हैं। नहीं होगा तो उसे गुस्सा आएगा। इस परिस्थिति में क्या करें? (P23-0067)
  160. गुरु जी, जीवात्मा जब बहुत दुखी होती है, जैसे लू में जल रही हो, तो इस तरफ भागती है; लेकिन जैसे ही थोड़ी छाया, थोड़ी राहत मिल जाती है, उसकी दबी हुई इच्छाएं निकल आती हैं और वह फिर उन इच्छाओं में भाग जाती है — लू में जो तपा रही थी, वह भूल जाती है। यह क्या माजरा है? (P23-0124)
  161. गुरु जी, मुझे उनसे कोई उम्मीद नहीं, कोई कामना नहीं, कोई इच्छा नहीं; मुझे तो लगता है मैं अपनी स्थिति में हूं — यह कैसे पता चले? (P23-0199)
  162. गुरु जी, अब बस यही कामना बन रही है कि जो कुछ मुझे मिला है वह मैं लोगों में बांटूं — जो इसका पता पूछेगा उसको बांटूंगा। (P23-0200)
  163. गुरु जी, इस शब्दों के जाल से आदमी निकलेगा कैसे? और क्या किसी को समझाना भी कामना है? (P24-0002)
  164. गुरु जी, मन की इच्छा फलीभूत नहीं होती तो दुख होता है। (P24-0046)
  165. गुरुजी, आपने एक सत्संग में कहा कि इच्छा का त्याग करना चाहिए, तो क्या आत्मज्ञान की इच्छा का भी त्याग करें? (P24-0066)
  166. गुरुजी, आत्मज्ञान मतलब क्या? क्या सारी इच्छाओं का अंत ही आत्मज्ञान है — मतलब बीवी-बच्चे सब छोड़ दिए जाएं? (P24-0070)
  167. योगी जी, अगर साधना से आदमी के अंदर सामर्थ्य भी आ रहा है, बल भी आ गया, और उसकी दबी हुई इच्छाएं भी उजागर हो रही हैं — तो अगर वो साधना भी करता रहे और अपनी इच्छाओं की पूर्ति भी करता रहे, तो इससे क्या होगा? (P24-0089)
  168. योगी जी, मुझे कैसे पता चले — मैंने तो जाने-अनजाने पता नहीं क्या-क्या इच्छाएं बना रखी होंगी, बना-बना के भूल गई कि कितनी इच्छाएं बन गईं। और अगर अब माहौल चेंज हो गया, अब वो चीज नहीं चाहिए, तो फिर क्या करें? (P24-0090)
  169. गुरु जी, एक भोग की इच्छा बाकी है और एक जिम्मेदारी है, उसके अलावा संसार नहीं चाहिए। तो क्या भोग और भोग से मुक्ति — ये दोनों यात्राएं एक साथ चल सकती हैं? कृपया मार्गदर्शन कीजिए। (P24-0097)
  170. गुरु जी, आपने बताया कि सत्कर्म का मौका प्रकृति देती है। तो प्रकृति किसको मौका देती है, किसको नहीं — यह भी उसकी इच्छा है? यानी सत्कर्म करना हमारे हाथ में नहीं? चिड़िया के लिए दाना डालना तो हम करते हैं ना? (P24-0155)
  171. गुरु जी, पहले जानकारी के अभाव में मैंने इच्छा-पूर्ति के लिए पूरी कोशिश से नाम जप किया, धुनों का रसपान किया। अब जब मैं खुद को गहराई से देख रहा हूं, तो वही पुराना प्रयास और वो धुनें बीच-बीच में आकर मुझे भटका रही हैं। इसे कैसे काटूं? (P24-0167)
  172. गुरु जी, एक आदमी ईमानदारी, सत्कर्म और काबिलियत से ज्यादा पाने की इच्छा का त्याग करके, काम करते हुए अंतर्मुखी यात्रा कर रहा है, और एक पड़े-पड़े कर रहा है — किसकी यात्रा जल्दी होगी? (P24-0195)
  173. गुरु जी, पहले मैं पैसे के लिए जा रहा था, अभी ज्ञान के लिए जा रहा हूं — क्या वो भी एक कामना नहीं है? (P24-0197)
  174. गुरु जी, मुझे कुछ नहीं चाहिए — पर क्या मुक्ति की कामना करना भी गलत है? क्या मुक्ति की चाहना भी कामना में आती है? (P25-0033)
  175. गुरु जी, बात समझ में तो आ गई, पर व्यवहार में एकदम नहीं आती। मान लो मैंने सोच लिया कि मुझे कुछ नहीं चाहिए, लेकिन शरीर को भूख लगेगी, भोग की और काम की भी इच्छा होगी — तो क्या करें? (P25-0054)
  176. गुरु जी, मैं ईमानदारी से काम करके कमा रहा हूं, बेईमानी नहीं कर रहा। पर वासना तो फिर भी रह सकती है — जैसे आज 500 कमाए, तो इच्छा है कि 1000 कमाऊं। क्या यह वासना है? (P25-0064)
  177. जरूरत से ज्यादा पाने की इच्छा को बहुत से उदाहरणों से बताने की कृपा कीजिए। (P25-0170)
  178. गुरु जी, बचपन से सुनते चले आ रहे हैं कि प्रभु या परमात्मा की इच्छा के बिना पत्ता भी नहीं हिलता, अर्थात जो हो रहा है सब भगवान की इच्छा से हो रहा है। क्या यह सही है? (P26-0070)
  179. गुरु जी, आत्मा संसार में क्यों आई? क्या बिना परमात्मा की इच्छा से ऐसा हुआ है? (P26-0114)