आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

आत्मा और परमात्मा — योगी गुरु जी के प्रश्नोत्तर

इस पृष्ठ पर “आत्मा और परमात्मा” विषय से जुड़े 233 प्रश्न हैं, जो जिज्ञासुओं ने सत्संग में योगी गुरु जी से पूछे। किसी प्रश्न पर क्लिक करके योगी गुरु जी का पूरा उत्तर उनके अपने शब्दों में पढ़ें, वीडियो के साथ।

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  1. आप जैसे संतों की सेवा करें और उससे परमात्मा-प्राप्ति की इच्छा रखें, तो यह स्वार्थ है या निःस्वार्थ? (P1-0033)
  2. गुरु जी, क्या सहजता ही परमात्मा है? (P1-0058)
  3. क्या चेतना ही परमात्मा है? (P1-0073)
  4. गुरु जी, भगवान है तो बुरी आत्माएं भी होंगी। इसके बारे में मार्गदर्शन दीजिए। (P2-0025)
  5. मैं इतना बुरा नहीं हूं, लेकिन मुझे आज तक न परमात्मा की कोई अनुभूति हुई, न किसी नेगेटिव एनर्जी की — कुछ भी अनुभव नहीं हुआ। (P2-0043)
  6. गुरु जी, आत्मा ही सत्य है, शाश्वत है, सनातन है — फिर पिंडदान रूढ़ि है क्या? (P2-0047)
  7. क्या संसार में रहते हुए मुझे परमात्मा को जानने की कोई जरूरत है? (P2-0058)
  8. आत्मा कब से है? (P2-0063)
  9. बचपन से सिखाया जाता है कि होली इसलिए मनाते हैं कि हिरण्यकश्यप खुद को सर्वेश्वर मानता था; उसका बेटा प्रह्लाद परमात्मा को मानता था, तो उसने उसे बहुत यातनाएं दीं, और अंत में बहन होलिका (जिसे आग में न जलने का वरदान था) प्रह्लाद को लेकर आग में बैठी, पर होलिका जल गई और प्रह्लाद बच गया; अगले दिन रंग खेलकर सत्य की जीत मनाते हैं। लेकिन आज होली बस परंपरा, उपले जलाकर चक्कर लगाने, और धुलंडी में रंग-डीजे की मौज-मस्ती बनकर रह गई है; असली मतलब खो गया है। होली मनाने का मूल अर्थ क्या है, और क्या हम आज इसमें कुछ नया कर सकते हैं? (P2-0123)
  10. गुरु जी, ज्ञान, पवित्रता, प्रेम, शांति, सुख, आनंद और शक्ति — क्या ये आत्मा के कवच हैं? विस्तार से बताएं। (P2-0152)
  11. हम परमात्मा से डिस्कनेक्ट कैसे हुए? फिर कनेक्ट कैसे? (P3-0041)
  12. कर्म का राजा आत्मा है या बुद्धि? हम जो भी कर रहे हैं उसके पीछे कौन है? (P3-0115)
  13. (कुटिया में साधक) आप आत्मज्ञान, आत्मचिंतन, आत्मबोध, आत्मा और जीव की बात करते हैं — ये ज्यादा समझ में नहीं आते। आत्मा हम तो हैं, यह समझ में आता है, लेकिन ये आत्मा कहां पर है? इन्हें थोड़ा क्लियर कर दीजिए। क्या मैं ही सब कुछ हूं? और क्या हमें फिर से बच्चे जैसा (सारी जानकारी से खाली) हो जाना है? (P3-0184)
  14. (कुटिया में साधक) गुरु जी, आप परसों बोल रहे थे कि जब ये शरीर छोड़ के जाओगे तो कहां जाओगे, वो सोचो। मान लो मैं समझ लूं कि मैं परमात्मा के पास जाना चाहता हूं? (P3-0192)
  15. (कुटिया में साधक) मुझे लगता है जीवन की यात्रा अनंत से अनंत है और जीरो उसका सेंटर पॉइंट है (जिसे शांति या समाधि कहते हैं)। अच्छे कर्म करने वाला प्लस साइड — अच्छी जगह, अच्छी विचारधारा के लोगों में — जन्म लेता है; बुरे कर्म वाला माइनस साइड — दूसरी योनियों या वैसी विचारधारा के लोगों में — जाता है; ऐसे ही सर्कल घूमता रहता है। यह सर्कल टूटे कैसे? मुक्त हो गए तो फिर हम कहां होंगे — आत्मा कहीं तो होल्ड करेगी? और धरती पर 9-10 हजार करोड़ लोग जन्म ले चुके, अभी 900 करोड़ जिंदा हैं — बाकी की आत्माएं कहां गईं? (P3-0195)
  16. (लाइव) गुरु जी प्रणाम। मुझे हमेशा के लिए अपनी आत्मा में रहना है — इसके लिए कैसे काम करूं? (P4-0005)
  17. (लाइव) गुरु जी प्रणाम। क्या इस समय आत्मा अलग कार्य कर रही है और शरीर अलग कार्य कर रहा है? क्या ये दो चीजें अलग हैं? (P4-0007)
  18. (लाइव) गुरु जी प्रणाम। आत्मज्ञान होने पर क्या इस शरीर को और (अंदर की) आत्मा को अलग-अलग देख सकते हैं? (P4-0028)
  19. (लाइव) प्रणाम योगी जी। आत्मा को महसूस करना एक अलग बात है और आत्मा को देखना एक अलग बात है। क्या आत्मज्ञान होने पर हम आत्मा को अलग देख सकते हैं? (P4-0034)
  20. (लाइव) गुरुदेव प्रणाम। जैसे नाम जप वाले कहते हैं कि पूरे दिन नाम जप करो तो एक दिन परमात्मा से मिलन हो जाएगा — तो गुरु जी, आपका क्या मार्ग है जो पूरे दिन किया जा सके और मुक्ति मिल जाए? (P4-0044)
  21. (कुटिया में साधक) मेरा पहले वाला प्रश्न अधूरा था — जब आदमी निर्विचार-निर्विकार अवस्था में (देह छोड़कर) जाता है, तो आत्मा की बात नहीं, उसकी जो सूक्ष्म बॉडी है, वो फिर कहां होल्ड होती है? कहीं ना कहीं तो जाती होगी; अगर होल्ड नहीं होती तो फिर उसे नया जन्म तो लेना ही पड़ेगा? जैसे कहते हैं कि वह परमात्मा के पास जाती है। (P4-0049)
  22. (कुटिया में साधक) श्री कृष्णा गुरु जी। आपने एक प्रसंग में बोला था कि आत्मज्ञान के बाद फिर परमात्मा की यात्रा शुरू हुई; हम तो अभी तक यही समझते थे कि आत्मज्ञान के बाद सब खत्म हो जाता है। (ओशो ने भी एक सत्संग में यह बोला है।) क्या इसका भी कोई टाइम पीरियड है? (P4-0050)
  23. (लाइव) महात्मा जी प्रणाम। अगर रोग आए, तो चुपचाप अपना कर्म समझकर सह लेना चाहिए, या रोग के इलाज के लिए दूसरों से हाथ जोड़ना चाहिए? (और एक साधक का प्रश्न) परमात्मा के शरणागत होने के बाद क्या रोग परमात्मा पर ही छोड़ देना चाहिए? (P4-0056)
  24. (लाइव) मां नर्मदे हर गुरु जी। आत्मज्ञान ही पूर्ण मोक्ष है, आत्मा-परमात्मा एक ही हैं — आप भी कहते हो 'एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति'; अद्वैत सिद्धांत दोनों को एक ही मानता है। इसके बारे में कुछ बताएं। (P4-0139)
  25. (लाइव) गुरु जी नमन। आत्मा शरीर में रहती है या शरीर आत्मा के अंदर? (P4-0149)
  26. (लाइव) गुरु जी नमन। बुद्ध जी ने कहा है कि आत्मा का सफर नहीं होता। क्या यह सत्य है कि आत्मा होती ही नहीं, बस ऊर्जा ही ऊर्जा है? (P4-0152)
  27. (कुटिया में आई एक साधिका, जो चार साल से इस रास्ते पर है) मैंने पढ़ा कि आत्मा को ना जाना जा सकता, ना देखा-सुना जा सकता, तो उसके बारे में बात करना व्यर्थ है; बात तो इस अहम की करनी है जो 'मैं' और 'मेरा' कहता है। जब तक यह शरीर है, अहम भी साथ है — तो इस अहम से कैसे बाहर निकलें? (P4-0188)
  28. (वही साधिका) मेरे एक मित्र कहते थे कि पत्नी के बिना नहीं रह सकते; पत्नी अचानक मर गई, और शव के पास ही वो पूछ रहे थे कि अब मेरी दूसरी शादी कैसे होगी। (क्या वो आत्मा यह सुनकर मुक्ति की तरफ बढ़ेगी?) और क्या पुनर्जन्म, सूक्ष्म शरीर वगैरह होता है? आचार्य प्रशांत जी कहते हैं कि शरीर मिट्टी से पैदा होकर मिट्टी में मिल जाता है, इसके बाद कुछ नहीं। (P4-0195)
  29. (वही साधिका) बहुत से थॉट्स आते हैं — कुछ बनना है, कुछ करना है — तो फैमिली का थॉट आता है कि इन्हें छोड़कर जाएंगे तो पीछे इनका ध्यान कौन रखेगा; बाहर निकल भी जाते हैं तो लगता है वहां ठीक नहीं चल रहा, और टारगेट रुक-रुक जाता है। मदर का केयर करना मेरी प्रायोरिटी है, पर फिर आवाज आती है कि आत्मा की भूख का क्या हुआ। जिम्मेदारी लेना चाहते हैं पर हैंड-ओवर नहीं की जा रही, और जो (परिवार का) शिप चला रहा है वो अच्छे से नहीं चला रहा — तो क्या किया जाए? (P5-0009)
  30. आत्म साक्षात्कार और आत्मानुभूति — ये दोनों क्या हैं? (P5-0029)
  31. आत्मज्ञान के बाद अगर लगता है कोई नहीं है / सब परमात्मा है, तो ज्ञानी समझाते क्यों? एकांत में क्यों नहीं चले जाते? (P5-0031)
  32. नॉनवेज खाने वाले अच्छे सत्कर्म वाले व्यक्ति को क्या केवल मांस के कारण परमात्मा नहीं मिलेगा? वेज ऑप्शन हो तो क्या? (P5-0034)
  33. मोक्ष क्या है? प्रतिक्रिया देने से राग-द्वेष कैसे? आत्मज्ञान के बाद शरीर-आत्मा? (P5-0043)
  34. कैसे जानें कौन सा सवाल पूछना चाहिए? क्या परमात्मा के बारे में पूछना ठीक है? (P5-0065)
  35. प्रत्यक्ष ज्ञान देखने वाला ही देखता है — क्या यही है प्रत्यक्ष ज्ञान? आत्मा असीम-अमर-अनंत है क्या? (P5-0081)
  36. आत्मा और सुख में इतना अंतर क्यों? (P5-0088)
  37. ज्ञान/भगवत् प्राप्ति पर आवागमन मिटे, संसार चले — आत्मा कहां? मुक्ति किसकी जब आत्मा स्वतंत्र? माता-पत्नी झगड़कर अलग — क्या करें? (P5-0131)
  38. शरीर की तीन अवस्थाएं बताई जाती हैं, जागृत, स्वप्न और सुषुप्ति। इस समय हम जागृत अवस्था में हैं, ऐसा कहा जाता है। जब स्वप्न में होते हैं तो उसे सच मान लेते हैं, पता ही नहीं रहता कि स्वप्न चल रहा है, जागृत की तरह लगता है। स्वप्न टूटते ही लगता है कि वह कुछ और था और अब कुछ और है। उसको अनुभव करने वाला कौन है? कई जगह जाकर सुना कि आत्मा है। अगर आत्मा का अनुभव एक बार हो गया, उस बिंदु को छू लिया, तो फिर दूसरों के दर जाने की क्या जरूरत? इससे तो लगता है कि आत्मा है ही नहीं। क्या हम रोबोट की तरह हैं, जिसमें मेमोरी फिट कर दी गई है, इनपुट डाल दिया गया है, और टेक्नोलॉजी से ऊपर का अनावश्यक ज्ञान दिया जा रहा है? इसे उदाहरण से स्पष्ट करें, ताकि सरलता से समझ आए और जीवन भर उस पर चला जा सके। स्वप्न तो ऐसे भी आते हैं जो इस जन्म की कामना नहीं लगते, ऐसे दृश्य, लोग और रूप जिनकी कल्पना भी नहीं हो सकती। (P6-0039)
  39. जीवात्मा का नाम इसलिए पड़ गया कि आत्मा ने जीव शरीर ग्रहण किया। कोई हृदय चक्र को आत्मा का निवास कहता है, कोई और जगह ध्यान करवाता है, कोई कपाल में बताता है। एक योगी का प्रैक्टिकल यह था कि आत्मा का शरीर में निवास स्थान नहीं है, सूरज की किरण की तरह केवल एक किरण पड़ रही है और शरीर क्रिया कर रहा है, आत्मा शरीर में है ही नहीं। इतनी बातें सुनकर उथल पुथल मचती है। असल में आत्मा कहां है? जब नाम ही नहीं दिया जा सकता तो मान लो क्यों कहा जाता है? मानना और जानना में मैं किस प्रक्रिया में हूं? मानने की अवधि कितनी है, और मांग के हिसाब से समय कितना लगता है? (P6-0041)
  40. किसी के सानिध्य में मानकर जानकारी मिली, फिर कुछ समय बाद लगा कि यह धोखा है, अभी अधूरा है, कहीं और सुनने से लगा कि पूरा होना बाकी है। फूल में खुशबू के साथ रस और ऊर्जा भी है, यह पहले नहीं जाना था। शरीर जल जाए तो ऊर्जा वहीं की वहीं रहती है। पहले भान था कि आत्मा शरीर के अंदर है, मैं आत्मा हूं। विवेक बढ़ने पर लगा कि अपने आप को आत्मा मान लेना भी धोखा है, क्योंकि किसी के कहने से माना है, प्रत्यक्ष नहीं हुआ। बोध कैसे होगा, कोई बताता नहीं। सन् दो हजार पांच से अलग अलग महात्माओं, साधुओं और संतों के पास रहा, गृहस्थ में रहा। उन्हें पूरा ज्ञान नहीं, ऐसा वे नहीं कहते। किसी और का ज्ञान सुनकर भीतर थोड़ा विवेक जागता है, जैसे नर्सरी से एलकेजी या फर्स्ट में आ गए, फिर लगता है अभी और बाकी है। कुछ समय तृप्ति रहती है, खिलौने जैसी, फिर खिलौना लगने लगता है। ऐसे निमित्त और अधूरे लगने वाले ज्ञान को कैसे देखें? (P6-0042)
  41. एक शब्द और समय लेगा। एक बड़े पंथ में सूरत शब्द योग है, सूरत को उन्होंने आत्मा का नाम दिया है। मैंने निर्विकार का चुनाव किया, फिर शब्द योग पकड़ा, क्योंकि शास्त्रों में शब्द की बहुत बात है। अलग अलग स्तर पर अलग शब्द बताते हैं। अनुभव में शब्द और ध्वनि भीतर प्रकट हो गई। एक को बताया तो बोले ध्वनि अभी बदलेगी। बहुत साल हो गए, ध्वनि नहीं बदल रही। शास्त्र में यही था कि हर किसी की अवस्था एक जैसी नहीं होती। अगर ध्वनि नहीं पलट रही तो इसका मतलब यह नहीं कि मूल से जुड़े नहीं हो, चल नहीं रहे। फिर असमंजस हो जाता है कि शब्द योग से वहां तक पहुंचा जा सकता है, या सीधे निर्विकार अवस्था पर कैसे पहुंचा जाए। शब्द, दृश्य, गंध, रस और स्पर्श से परे कहा गया है, पर ध्वनि में भी शब्द है। ध्वनि कहीं से आ रही है, किसी के द्वारा सुन रहा हूं, सूक्ष्म में। बाहर और भीतर अलग लगते हैं। यह स्थिति कब आएगी? (P6-0046)
  42. जब साधक आत्मचिंतन के लिए बैठता है, तो क्या चिंतन करे, क्या मनन करे, क्या सोच-विचार करे, जिससे आत्मचिंतन हो, आगे उन्नति हो, आत्मकल्याण हो और तत्व का अनुभव हो जाए? वीडियो बीच में कट जाते हैं, इसलिए जो सोलह बातें बताई जाती हैं, उनका एक छोटा पैंफलेट या पुस्तक हो, जिसे जेब में रखकर बार-बार देख सकूं, तो ज्यादा लाभ हो। मैं झुंझुनू के पास से आया हूं। आज सोलहवां दिन है। ग्रंथों में पढ़ा है कि आत्मा है, पूर्ण है, पर वह ज्ञान अनुभव में कैसे उतरे? घर और संबंधों का चिंतन चलता रहता है। बैठकर ऐसा क्या सोचूं, क्या मनन करूं, कि मूल की ओर बढ़ूं और अनुभव हो जाए? (P6-0062)
  43. माता जी ने बताया कि लगभग डेढ़ साल तक वे ऐसी स्थिति में रहीं, जिसमें अपने आप को सब में और सबको अपने आप में देखती थीं, और उसी को आत्मसाक्षात्कार मानती थीं। उसके बाद फिर बहिर्मुख दुनिया में लौट आईं। क्या एक बार आत्मा का साक्षात्कार हो जाने के बाद मनुष्य दोबारा लौट आता है, या हम अपने बनाए हुए भाव से उस साक्षात्कार को खड़ा कर लेते हैं? और क्या यह बात ठीक है कि मैं सब में हूं और सब मुझमें हैं? (P6-0075)
  44. आज्ञा चक्र पर अंतरचक्षु से अपने को देखकर यह भाव बनाया जाता है कि मैं एक आत्मा हूं, और उसी भाव में टिके रहने की कोशिश की जाती है, ताकि आत्मदर्शन हो। क्या यह तरीका ठीक है? क्या विराट रूप आत्मा के अंदर समा सकता है? और क्या मैं शुद्ध आत्मा हूं, मैं पवित्र आत्मा हूं, ऐसा कहते रहने से मनुष्य पवित्र हो जाता है? (P6-0076)
  45. जो परिवार छोड़कर केवल ध्यान लगाता है, आकाशवृत्ति से रहता है, धन नहीं जोड़ता, उसे गाली और मार भी मिलती है। उसका क्या होता है? कृष्ण ने अर्जुन को आत्मभाव में टिकने के लिए भी कहा था, तो कर्म का सिद्धांत क्यों बताया? अर्जुन आत्म तत्व में कैसे स्थिर हुए? और क्या मैं शुद्ध आत्मा हूं कहना भी एक विधि है, जिससे कल्याण नहीं होता? (P6-0077)
  46. मन संदेशवाहक है और अंग मेरे सहायक हैं, तो मैं कौन हूं? मैं इस मैं के रोले में कई रूपों में शिफ्ट हो गया हूं। आत्मा को कैसे फील करूं? क्या आत्मज्ञान में आत्मा अलग दिखेगी, तीसरा नेत्र खुलेगा, या मैं वही रहूंगा? आत्मज्ञान के बाद बाहर के झगड़ों में उलझना चाहिए या नहीं? (P6-0127)
  47. हम कुछ नया बोल भी नहीं सकते, नया कर भी नहीं सकते। सारी चीजें बोली जा चुकी हैं। बस हम समझ सकते हैं। क्या यहां कुछ नया है? आत्मज्ञान, बंधन, परमात्मा के पास जाना, क्या यह हमारे लिए नया है? फिर वहां से लौटकर आना क्यों चाहते हैं? (P6-0145)
  48. प्रियंका गुप्ता पूछती हैं, जब आपने ज्ञान पाया तो क्या ध्यान और साधना की थी? कारोबार में सौ प्रतिशत झूठ बोलना पड़ता है, सत्कर्म नहीं हो पाता। क्या ध्यान परमात्मा को पाने का मार्ग नहीं है? (P6-0188)
  49. गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वरा, साक्षात परब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नमः। इसमें गुरु को परमात्मा क्यों कहा गया है? परमात्मा किसे कहते हैं? (P6-0189)
  50. विनायक पूछते हैं, आत्मज्ञान किसे होता है? मन को, वृत्ति को, चित्त को, या बुद्धि को? समझ की जरूरत किसको है, बुद्धि को या आत्मा को? (P7-0004)
  51. प्रशांत गुप्ता पूछते हैं, चेतना, मन, बुद्धि और आत्मा में क्या अंतर है? क्या चित्त ही आत्मा है? (P7-0009)
  52. आत्मा क्या है? (P7-0024)
  53. आत्मा मृत्यु लोक में भगवान को पाने का प्रण लेकर आती है, पर विषयों को चुनती है। तो क्या यह धोखा ही है? (P7-0037)
  54. नाम जप साधक के लिए क्या काम करता है? मैंने पढ़ा है, अनुभव नहीं है। क्या नाम जप गलत कामों से बचाता है? संतों ने कहा है कि आत्मा नीचे धंसी पड़ी है, ऊपर आकर तीसरे तिल, आज्ञा चक्र पर आती है, और वहां परमात्मा में लीन हो जाते हैं। गुरु नानक देव जी बार-बार नाम जपने को कहते हैं। नाम, शब्द क्या है? (P7-0144)
  55. गुरबानी कहती है कि अगर परमात्मा बीच में खड़ा है, तो सेवक का कुछ नहीं होने देगा, चाहे दुनिया कुछ भी करे। तो क्या विरोध की जरूरत नहीं? गुरु अर्जुन देव जी को जहांगीर ने तवे पर बिठा दिया, ऊपर से रेत डाली गई, उन्होंने विरोध नहीं किया। संत को प्रेम से रहना चाहिए, या गलत का विरोध करना चाहिए? और जो मिस्त्री था, वह नशे में भी था। (P7-0147)
  56. लोग कहते हैं, ईश्वर अगर कल्याण करता तो कल्याण हो ही जाता। क्या ईश्वर या परमात्मा के भरोसे कल्याण हो जाएगा? (P8-0010)
  57. क्या कबीर दास जी पूर्व परमात्मा हैं? लोग कहते हैं वो परमात्मा थे, वो संत हुए। इस पर क्या कहना है? (P8-0027)
  58. क्या परमात्मा सर्वव्यापी है? क्या परमात्मा हर जगह, हर चीज में है? (P8-0032)
  59. प्रभु जी, आपकी नजर में परमात्मा कौन है? (P8-0041)
  60. आत्मा को जानना बहुत मुश्किल है। क्या सच में इतना मुश्किल है? (P8-0057)
  61. ज्ञान, पवित्रता, प्रेम, शांति, सुख, आनंद और शक्ति, क्या यह आत्मा का स्वभाव है? विस्तार से बोलिए। (P8-0090)
  62. परमात्मा सबको आसानी से नहीं मिलता, जैसे हम अपने माता-पिता से आसानी से मिल जाते हैं। ऐसा क्यों? (P8-0118)
  63. क्या बिना साधना के परमात्मा नहीं मिलते? साधना की जरूरत किसलिए है? (P8-0120)
  64. लोग गुरु जी के बारे में गलत बोल रहे हैं। क्या परमात्मा उन्हें सजा देगी? ऐसे लोगों का क्या करें? (P8-0121)
  65. क्या हमारी और कृष्ण भगवान की आत्मा एक है? (P8-0140)
  66. बुद्धि से तो आत्मा सोचती है। मन सोचने में कैसे लिप्त होता है? इसे प्रत्यक्ष समझाइए। (P8-0172)
  67. मेरा एक प्रश्न है। मैं और आत्मा का संबंध क्या है? जो कुछ मैं करता हूं, वह मैं भोगता हूं या आत्मा? (P9-0019)
  68. क्या आत्मा और ईश्वर, सब एक हैं? एक होता तो खोजने की जरूरत ही नहीं होती। (P9-0031)
  69. गुरुदेव, आत्मज्ञान में आदमी खुद को परमात्मा से अलग मानता है, फिर वह भक्ति करता है। थोड़ा इसे स्पष्ट करो। (P9-0037)
  70. आत्मा को ज्ञान पहले से है, तो हम प्रयास क्यों करें? (P9-0048)
  71. मेरे मन में हमेशा यह प्रश्न आता है कि मैं कौन हूं। मुझे लगने लगा है कि मैं चुनी हुई आत्मा हूं, और जिन्हें परमात्मा चुनता है उनका जन्म टॉक्सिक परिवार में होता है। क्या यह सही है? (P9-0060)
  72. गुरु जी, अगर कोई निर्देशों के द्वारा हिंसा करता है, तो यहां के सिस्टम के अनुसार उसे सजा मिलती है। उसके बाद परमात्मा के द्वारा भी उसे सजा मिलती है क्या? (P9-0132)
  73. परमात्मा दृश्य, शब्द, रस, गंध और स्पर्श से परे है। जिन्हें उसका अनुभव हुआ, वह कैसे हुआ? (P9-0164)
  74. जिन गुरु ने आरंभ में ध्यान का मार्गदर्शन दिया था, उन्होंने कहा था कि न आत्मा का ध्यान करना है, न परमात्मा का ध्यान करना है। यह बात क्लियर नहीं हुई। ऋषिकेश, गंगोत्री, फिर कोरोना, वेदांत श्रवण के बीच साधना बिगड़ गई। पहले तीन-तीन घंटे एक आसन में बैठ लेता था, पद्मासन भी सिद्ध हो गया, फिर मन डिस्टर्ब हो गया। ना आत्मा का ध्यान, ना परमात्मा का ध्यान, इसका क्या अर्थ है? और आसन सिद्ध करने से क्या होता है? (P9-0180)
  75. ईश्वर को आप किस रूप में देखते हैं? क्या वह शुद्ध चेतन है, परमात्मा? (P10-0031)
  76. योगी जी, आत्म साक्षात्कार होने के बाद क्या परमात्मा के ज्ञान के लिए और भक्ति करनी होती है? (P10-0089)
  77. योगी जी, मैंने संत रामपाल जी महाराज से दीक्षा ली है। वे कहते हैं कि आत्म साक्षात्कार से बात नहीं बनती, परमात्मा का ज्ञान भी होना चाहिए। (P10-0099)
  78. गुरुदेव, आत्मा को तत्व क्यों कहा गया है? (P10-0171)
  79. गुरु जी, आत्मा जीव भाव में आ गई है; जैसे-जैसे बाहर से छूटेंगे, अपनी तरफ आ रहे हैं। तो ये कल्पनाएं हमको कौन ले जा रहा है? जीव ले जा रहा है? (P10-0192)
  80. गुरु जी, आत्मा की झलक हमको कब मिलेगी? (P10-0194)
  81. गुरु जी, ऐसा कौन सा कर्म करें जिसमें आत्मा स्थिर हो जाए? (P10-0196)
  82. (कुटिया में साधिका) मैंने आपकी वीडियो में सुना था कि ब्रह्म परमात्मा की यात्रा करेगा। तो क्या आत्मा ब्रह्म है? (P11-0001)
  83. हमारे अंदर ही परमात्मा है, आत्मा भी है और मन भी। अगर हम अपनी आत्मा को समझ गए, तो मन तो हट ही जाएगा; फिर हम और परमात्मा एक ही हो जाएंगे — क्या यह सही बात है? (P11-0006)
  84. मैं परमात्मा से एक होना चाहता हूं। विचार, अपेक्षा और वासना में क्या अंतर है, और एकांत में साधना करते हुए इनका कैसे उपयोग करूं? (P11-0040)
  85. जीव, आत्मा और परमात्मा — ये तीन अलग-अलग क्या हैं? समझाइए। (P11-0149)
  86. क्या आत्मा का भी कोई रूप होता है? (P11-0173)
  87. आपके ज्ञान से मैं समझ सका कि हमारा आना क्यों हुआ और हमें जाना कहां है। पर यह भी समझ रहा हूं कि भगवान और परमात्मा को हमसे कुछ लेना-देना नहीं, उन्हें हमारी कोई परवाह नहीं। फिर आप हमारी परवाह क्यों करते हैं? (P12-0014)
  88. आप हम आत्माओं को मूल तक भेजना चाहते हैं — आप कौन हैं, यह मैं समझ नहीं पाया। आप भगवान हो, परमात्मा हो या उससे भी ऊंचे? जब मैं इस पर गहरा चिंतन करता हूं तो आंखों से आंसू निकलते हैं। (P12-0047)
  89. शरीर की मृत्यु के बाद आत्मा कहां और कैसे रहेगी? (P13-0052)
  90. गुरु जी, क्या आपकी आत्मा रूपी बूंद परमात्मा रूपी सागर में गिरकर एकाकार हो गई है? क्या अब आपका निजी कुछ नहीं बचा, क्या अब आप अपने को अस्तित्व से अलग महसूस नहीं करते? जैसे हम अलग महसूस करते हैं — क्यों? (P13-0054)
  91. महाराज जी, मैंने आपका एक वीडियो देखा था जिसमें आपने कहा था कि राजा को पकड़ लो — सहस्रार चक्र को — और सबको छोड़ दो। मुझे लगा कि 'मैं' से बंधन है और 'मैं' से ही मुक्ति है। जब अपने 'मैं' को हटा देते हैं और परमात्मा का भाव आ जाता है, तो शुरू-शुरू में थोड़ा अनकंफर्टेबल फील होता है। जब उस तत्व पर, उस परमात्मा वाले में पहुंच जाते हैं, तो क्या उसके बाद नाम जप, मंत्र जप या किसी चीज की जरूरत होती है? (P13-0057)
  92. हम जैसे नवयुवक अभी शुरुआत में हैं; घर वालों की इच्छा है, शादी की बात चल रही है, उसमें टकराव आ जाता है। हम परमात्मा को पाना चाहते हैं — तो शादी करें या न करें? यही कंफ्यूजन है; अगर इसे छोड़ दिया और वो न मिला तो? (P13-0058)
  93. मैंने कुंभ में कई महात्माओं के दर्शन किए, पर जो शांति होती है, वो अभी तक नहीं मिल पाई। जब मैं उस परमात्मा को कोई नाम देता हूं या कोई मंत्र देता हूं, तो मैं उसी में फंस जाता हूं — फिर सोचता हूं, नाम क्यों दिया, जरूरत ही क्या है? (P13-0059)
  94. गुरु जी, कहा जाता है 'आत्मा सो परमात्मा' — आत्मा और परमात्मा को एक मान बैठे हैं। मेरी समझ से ये अलग-अलग हैं: परमात्मा स्वयंभू है, उसे आधार की जरूरत नहीं; आत्मा उसी से है, निर्मल है, पर इच्छा आते ही आत्मा जीवात्मा हो जाती है, और जितनी इच्छाएं बढ़ती हैं, उतनी भटकती जाती है। समाज को प्रत्यक्ष ज्ञान के हिसाब से इस पर समझाइए — आत्मा, परमात्मा और जीव। (P13-0072)
  95. गुरु जी, आत्मा बंधन में है, लेनदेन में है — तो क्या बंधन में रहते हुए समर्पण हो सकता है, या बंधन खत्म होने के बाद समर्पण होगा? कृपया मार्गदर्शन करें। (P13-0138)
  96. महाराज, आप कह रहे हो कि इसी में ढूंढ लो परमात्मा को, पर हमें तो उसकी जरूरत ही नहीं लगती — हम तो पैसे, गाड़ियां, बंगले ढूंढेंगे। और शरीर व आजीविका चलाने के लिए संसार में दूसरों से व्यवहार भी तो करना है। तो परमात्मा को क्यों ढूंढें? (P13-0163)
  97. गुरु जी, परमात्मा को देखना है या जानना है? (P13-0175)
  98. गुरु जी, परमात्मा का ज्ञान कैसे प्राप्त करें? (P13-0178)
  99. गुरु जी, आपकी वीडियो में आप कहते हैं कोई ईश्वर, परमात्मा, आत्मा कुछ नहीं है; कभी कहते हैं ईश्वर ही सब है, उस तक ही पहुंचना है। तो फिर सत्य क्या है? सारा कंफ्यूजन हो जाता है। (P14-0008)
  100. गुरु जी, आजकल हर एक के पास मोबाइल है; रील देखना, टीवी-फिल्म देखना — इसमें मन बहुत सुख महसूस करता है। मगर अगर आत्मा में परमानंद है, तो मन उसे क्यों नहीं महसूस कर पाता? (P14-0009)
  101. गुरु जी, इस जगत में चतुर और बेईमान लोग भी अपने लक्ष्य में सफल हो जाते हैं और वर्षों तक दुनिया को लूट लेते हैं। क्या यह भी परमात्मा की वजह से होता है? (P14-0018)
  102. गुरु जी, क्या आत्मा ही चेतना है, और चेतना ही अनाहद नाद है? लोग कहते हैं चेतना को ऊपर उठाओ — इसका मतलब क्या है? (P14-0023)
  103. गुरु जी, ध्यान में बैठे हुए क्या परमात्मा की इच्छा भी खत्म करनी है? परमात्मा का ध्यान कैसे करें? (P14-0038)
  104. गुरु जी, परमात्मा को पाने की राह में निकलें तो जो घर-गृहस्थी खड़ी कर दी है, उसे छोड़ के निकलना चाहिए, जंगलों में जाना चाहिए, या उसे साथ रख के चलना चाहिए? (P14-0048)
  105. गुरु जी, परमात्मा ने ये पूरा ब्रह्मांड रचा है। मुझे लगा कि जब हम में समझ आ जाती है, हम काबिल हो जाते हैं, तो वो हमारे अंदर पैदा होता है — जैसे गर्भवती स्त्री की डिलीवरी — क्या ऐसा कुछ है? (P14-0056)
  106. गुरु जी, मैं बहुत बेचैन हो रहा हूं कि मैं परमात्मा को पाने के लिए कुछ कर नहीं पा रहा हूं। अपनी नजरों से दिखता है कि कहीं ना कहीं बेईमानी करते भी हैं, तो कर्म तो बिगड़ रहा है ना? (P14-0058)
  107. गुरु जी, जो नया आया है, सत्संग भी नहीं जानता, वो पूछता है परमात्मा को कैसे प्राप्त करूं, और आत्मज्ञानी सीधा बोल देता है 'जो प्राप्त है उसको छोड़ दो' — वो तकलीफ में आ जाता है। थोड़ा विस्तार से समझाइए ना? (P14-0065)
  108. गुरु जी, आत्मा और परमात्मा में क्या अंतर है? (P14-0125)
  109. गुरु जी, आत्मा तो हर जीव में होती है — आत्मा क्या है? (P14-0140)
  110. मनुष्य की मृत्यु होने के बाद उस आत्मा का क्या होता है? (P14-0141)
  111. आत्मा मरने के बाद दूसरे जीव में चली जाती है, तो जनसंख्या जहाँ पहले कम थी अब ज्यादा हो गई — ये नई आत्माएँ कहाँ से आती हैं? (P14-0142)
  112. नशे में मुझे जिंदगी के बहुत रहस्य पता पड़े; अब मैं वो नहीं करता। होश में रहते हुए ऐसी क्या साधना करूँ जिससे आत्मा से मिलूँ? (P14-0162)
  113. यजुर्वेद में लिखा है कि परमात्मा सारे पाप नाश कर देता है — अपना किया, पितरों का किया, जाने-अनजाने में हुआ — तो आप कहते हैं भोगना पड़ेगा, इसका भाव क्या है? (P14-0179)
  114. आत्मा को जानने की जिज्ञासा है — क्या यह जिज्ञासा ही आत्मा तक पहुँचाने का रास्ता है या कुछ और? (P14-0181)
  115. गुरु जी, परमात्मा की याद तो हर वक्त बनी रहती है पर नाम जप नहीं कर पा रहा — ज्ञान मार्ग बताएँ। (P14-0185)
  116. आत्मा को जानना ही मोक्ष है क्या? (P15-0003)
  117. जब अक्षर नहीं था तब कौन सा ज्ञान था? प्रकृति माया, योग माया, आत्मज्ञान और परमात्मा क्या है — चारों का विश्लेषण करें। (P15-0034)
  118. हम शरीर नहीं हैं, आत्मा हैं — कैसे जानें? (P15-0072)
  119. परमात्मा को प्रेम करने का अधिकारी वही होता है जिसने इंसान को प्रेम किया हो? (P15-0078)
  120. आत्मा और चेतना में क्या अंतर है? (P15-0081)
  121. आत्मा परमात्मा में मिल जाए तब सुख है, या आत्मा परमात्मा की सेवा करे? (P15-0082)
  122. मन और आत्मा एक ही होते हैं क्या? (P15-0087)
  123. गीता में श्री कृष्ण कहते हैं आत्मा स्थिर है, कहीं आती-जाती नहीं; तो शरीर में आवागमन कौन करता है? जीवात्मा में ऐसा क्या रह जाता है जो आवागमन करता रहता है? (P15-0090)
  124. बुद्धि की परम स्थिति चैतन्यता है, उसके बाद आत्मा शुरू होती है — क्या ऐसा है? (P15-0092)
  125. अगर आत्मा भगवान है तो फिर शरीर क्या है? (P15-0110)
  126. क्या आत्मा को सुख और दुख होते हैं? (P15-0112)
  127. अन्य सभी जीवों में आत्मा होती है या नहीं होती है? (P15-0133)
  128. गुरु जी, मुझे आत्मज्ञान और परमात्मा से मिलने की बहुत जल्दी है, क्या करूं? (P15-0134)
  129. जीवात्मा और परमात्मा के बारे में बताइए। (P15-0142)
  130. गुरु जी, मन अपने और आत्मा के लिए कब और कैसे काम करता है? (P15-0152)
  131. गुरु जी, क्या समाज के कल्याण में आत्मा का कल्याण छिपा है, या पहले आत्म-कल्याण आता है, फिर बाद में समाज, राष्ट्र और विश्व कल्याण? (P15-0153)
  132. गुरु जी, आत्मा का मिलना और परमात्मा का मिलना एक ही बात है या अलग-अलग? दोनों में अंतर क्या है? (P15-0161)
  133. गुरु जी, क्या पेड़-पौधों में भी आत्मा होती है? (P16-0046)
  134. क्या एक बार मोक्ष प्राप्त करने के बाद, सृष्टि के प्रलय के बाद जब परमात्मा अपना विस्तार फिर से करेंगे, तो क्या हम अपने स्वरूप में फिर से आ जाएंगे? (P16-0053)
  135. गुरु जी, मैंने अनेक संत-महात्माओं को यह कहते सुना है कि परमात्मा मन और बुद्धि से परे की वस्तु है — मन और बुद्धि से उसे पकड़ा या समझा नहीं जा सकता। क्या यह सच है? (P16-0123)
  136. तो आपके कहने का मतलब यह है कि मन और बुद्धि के द्वारा केवल स्वयं तक, आत्मा तक पहुंचा जा सकता है, और आत्मा से परमात्मा की यात्रा के लिए बुद्धि की आवश्यकता नहीं है? क्या वहां भी कोई आंतरिक समझ काम करती है? (P16-0124)
  137. गुरु जी, इस जवाब से मैं पूरा संतुष्ट नहीं हुआ। मुझे लगता है आप बुद्धि को नकार रहे हैं। यह मैं मान गया कि वह पांचों इंद्रियों से परे है, लेकिन यह समझने के लिए भी तो बुद्धि आवश्यक है ना? अगर आत्मा से परमात्मा की यात्रा करने वाला मंद बुद्धि होगा, तो उसकी यात्रा शुरू ही नहीं होगी। तो क्या इसमें बुद्धि का रोल ही नहीं है? (P16-0125)
  138. क्या प्रकृति और परमात्मा एक ही हैं या अलग-अलग? (P16-0131)
  139. क्या परमात्मा के अंदर वासना पैदा हुई, तभी पृथ्वी का निर्माण हुआ? इसलिए तो हमारे अंदर भी वासना है? (P16-0132)
  140. (लाइव) गुरुजी, क्या आत्मा हमारे शरीर के अंदर उपस्थित है, या यह सिर्फ बताने के लिए कहा जाता है? (P16-0193)
  141. (लाइव) प्रभु जी, मेरा प्रश्न है — सर्वव्यापक वही परमात्मा है, तो फिर क्या आने-जाने का परिश्रम करना जरूरी है? (P16-0198)
  142. (लाइव) योगी जी, अपनी आत्मा अर्थात स्वयं का दर्शन कैसे करें? (P16-0200)
  143. (लाइव) गुरुजी, अगर परमात्मा तक जाना है तो परमात्मा खुद क्यों नहीं मिला लेता अपने में? यह खेल क्यों रचा है कि हम कर्म करके तब उस तक जाएं? (P17-0001)
  144. गुरु जी, शास्त्रों में तीन अवस्थाएं बताई गई हैं — जीव, शिव और पीव। शिव को ब्रह्म अवस्था पर बताया गया और उसके बाद पीव की सर्वोच्च अवस्था। कई लोग ब्रह्म तक ही सीमित कर लेते हैं कि हमारे तो फाइनल परमात्मा हो गए — तो ब्रह्मज्ञानी पूर्ण स्थिति कैसे है? (P17-0027)
  145. गुरु जी, मुझे संसार का कुछ नहीं चाहिए, बस परमात्मा चाहिए, उसके साथ रहना है — यह भाव कैसा है? (P17-0093)
  146. गुरु जी, क्या परमात्मा को कुछ करके पाया जा सकता है? उसे पाने का सही तरीका क्या है? (P17-0094)
  147. गुरु जी, मूल से मेरा हटना कैसे हुआ — हम परमात्मा से अलग होकर इस दुनिया में कैसे आए? (P17-0145)
  148. गुरु जी, "कुछ नहीं" की स्थिति में पहुंचने पर परमात्मा कैसे दिखता है — वह हमसे पीछे क्यों रह गया? (P18-0027)
  149. गुरु जी, क्या आपने घर-परिवार छोड़ दिया? परमात्मा की खोज और सामने वाले व्यक्ति में आप किसे प्राथमिकता देते थे? (P18-0038)
  150. गुरु जी, आत्मा प्रकाश रूप में हमेशा के लिए कब होती है? (P18-0084)
  151. गुरु जी, आत्मा शरीर के अंदर है या बाहर? क्या आत्मा ही परमात्मा है? (P18-0093)
  152. गुरु जी, आत्मा, जीव और कर्म का संबंध कैसे है? (P18-0098)
  153. गुरु जी, आत्मा कहां से आई? (P18-0106)
  154. गुरु जी, जब आत्मा इच्छा-अपेक्षा में जीव बनी और उसे पता है कि मूल तक पहुंचना है, तो फिर भी वह अपने आप को बचाकर क्यों रखना चाहती है — अपना नाश क्यों नहीं करना चाहती? (P18-0121)
  155. गुरु जी, आत्मा का स्वाभाविक गुण लेने का है या देने का? अध्यात्म से जुड़ने से पहले लेने की भावना ज्यादा थी, जुड़ने के बाद देने की भावना क्यों आने लगती है? (P18-0180)
  156. गुरु जी, जब आत्मा का कोई स्वभाव ही नहीं, तो वह अपने मूल (आनंद) की ओर जाना क्यों चाहती है? (P18-0181)
  157. गुरु जी, अगर परमात्मा ने दुनिया बनाई तो सुख की दुनिया क्यों नहीं बनाई? यहां इतना दुख क्यों है? (P18-0187)
  158. गुरु जी, आत्मा जिस घर, कुल, जगह में आई, वहां के दायित्व और संबंध तो प्राकृतिक मिले — फिर कहते हैं संसार हमने बनाया, यह कैसे? (P18-0189)
  159. गुरु जी, लोग कहते हैं सब परमात्मा कर देंगे, कृपा कर देंगे — तो फिर हम अज्ञानी क्यों हैं? क्या परमात्मा किसी एक पर ही कृपा करता है? (P18-0192)
  160. गुरु जी, राजसी-तामसी लोग जो खुशी अनुभव करते हैं (गाड़ी, मोबाइल, बंगला लेकर), वह किसे होती है — आत्मा को या जीव को? जीव और आत्मा दो हैं या एक? (P18-0194)
  161. गुरु जी, संत-महात्माओं की वाणियों में परमात्मा की महिमा गाई गई है, बाइबल कहती है "इन द बिगिनिंग वाज द वर्ड" — क्या किसी ने बताया कि परमात्मा कैसा है? (P18-0200)
  162. गुरु जी, ब्रह्म मुहूर्त में उठकर बैठने से क्या परमात्मा मिलता है? (P19-0005)
  163. गुरु जी, ऋग्वेद आदि में जठराग्नि, ओम से सृष्टि जैसे परमात्मा के अलग-अलग तत्वों और अस्तित्वों की चर्चा होती है — इनमें क्या समझें? (P19-0007)
  164. गुरु जी, सुना है परमात्मा फ्रीडम और भय से मुक्त होने से मिलता है — तो आपकी कुटिया में नियम, बंधन और भय क्यों? (P19-0026)
  165. गुरु जी, जब परमात्मा की ओर दृष्टि जाती है कि हमें मुक्त होना है, तो वहां भी तो मन ही लेकर जाता है? और परमात्मा में मन उतनी ही देर लगता है जितनी देर संसार में, फिर हट जाता है — क्यों? (P19-0030)
  166. गुरु जी, आत्मज्ञान के बाद कोई कर्म बंधन में नहीं बंधता — तो जो पहला शरीर निर्विकार होकर परमात्मा के सामने खड़ा था, वह फिर कर्म बंधन में कैसे बंध गया? (P19-0032)
  167. गुरु जी, जिसे हम जड़ कहते हैं — पत्थर, गेहूं, बोतल में बंद पानी — क्या उसमें भी चेतनता है? "कण-कण में परमात्मा" का क्या अर्थ है? (P19-0033)
  168. गुरु जी, कुछ वीडियो में दिखाते हैं कि शरीर से आत्मा धुएं की तरह निकलती दिखती है, किसी ने आत्मा का वजन 21 ग्राम बताया — क्या आत्मा देखी जा सकती है? (P19-0034)
  169. गुरु जी, "सातवें आसमान पर खुदा है" — इसका क्या मतलब है? और अगर परमात्मा सर्वव्यापी है तो दिखता क्यों नहीं, खोजने को क्यों कहते हैं? (P19-0047)
  170. गुरु जी, भगवान और परमात्मा में क्या अंतर है? (P19-0084)
  171. गुरु जी, आप खुद को मतलबी कहते हो, फिर साधकों के लिए इतना क्यों करते हो? और क्या आप पक्का कह सकते हो कि साधना से परमात्मा मिलेगा? (P19-0108)
  172. गुरु जी, अगर आत्मा अजन्मा है तो उसका नाम आत्मा कैसे पड़ा? (P19-0111)
  173. गुरु जी, परमात्मा की खोज कैसे की जा सकती है, और उसे खोजें भी तो कहां? (P19-0125)
  174. गुरु जी, जीव और आत्मा अलग हैं या एक ही? (P19-0153)
  175. गुरु जी, प्रारब्ध प्रबल होता है या कर्म? क्या कर्म से परमात्मा को पाया जा सकता है? (P19-0169)
  176. गुरु जी, परमात्मा को पाने के लिए क्या करें, और द्वंद्व से मुक्त होने का उपाय क्या है? (P19-0192)
  177. गुरु जी, क्या शास्त्रों में परमात्मा का वर्णन है? (P20-0010)
  178. गुरु जी, क्या परमात्मा को पाना मतलब मन को सही तरीके से सुलझा लेना है? (P20-0090)
  179. "ऐसा क्या करूं जो तेरी सेवा हो पाए?" — परमात्मा की सेवा कैसे होती है? (P20-0137)
  180. परमात्मा से आत्मा के अलग होने से लेकर वापस जाने तक की पूरी यात्रा क्या है? (P21-0014)
  181. आप कहते हैं ज्ञान आत्मा के अंदर ही है, जैसे जमीन के अंदर पानी — तो वह ज्ञान अपने आप कैसे प्रकट होता है? (P21-0032)
  182. गुरु जी, आपने कहा था कि इस मार्ग पर एक प्रतिशत ही पहुंच पाते हैं, और यह भी कि बुद्ध के बारे में पहले से पता था कि वे बुद्ध होंगे — तो क्या परमात्मा ही वह एक प्रतिशत लोग भेजता है? फिर सत्कर्म क्या है? (P21-0064)
  183. गुरु जी, आत्मज्ञान तक पहुंचने के बाद क्या मैं उसे (परमात्मा को) जान सकता हूं, या वह मुझे जानने का रास्ता देगा? (P21-0109)
  184. गुरु जी, कृपया जीव और आत्मा में फर्क बताएं। (P21-0143)
  185. गुरु जी, आत्मा से कैसे मिलें, अंदरूनी स्थिति को कैसे बदलें, बाहरी भौतिक चीजों से कैसे मुक्त हों और आत्मा का अनुभव कैसे करें? (P21-0144)
  186. गुरु जी, आत्मा — जिसे "सो" कहते हैं — वो क्या है, उसे कैसे समझें? (P21-0157)
  187. गुरु जी, नकली-असली, "मैं आत्मा हूं" — ये ढंग से समझ में नहीं आया; थोड़ा उदाहरण के साथ समझाइए। (P21-0158)
  188. गुरु जी, देहांत होने के बाद आत्मा रहती है या नहीं — या देह के साथ वो भी मरती है? (P21-0165)
  189. गुरु जी, मेरे इस शरीर से जो अच्छे-बुरे कर्म हो गए हैं, इन कर्मों का आत्मा के साथ कोई संबंध है? आत्मा तो ना मरने वाली है, परमात्मा का अंश है — तो क्या ये कर्म अगले जन्म में आत्मा के साथ जाते हैं? और चलाने वाला तो परमात्मा ही है ना? (P21-0198)
  190. गुरु जी, अगर जीव चला गया तो शरीर काम नहीं करेगा — तो वो जीव ही "मैं" है? जीव और आत्मा में क्या संबंध है? (P21-0200)
  191. गुरु जी, शरीर को मरने के बाद जला देते हैं, आत्मा तो निरंतर है। बचपन से हमें डराया गया कि यमराज ले जाएगा — तो यमराज किसको ले जाता है? मुझे लगा कि वो हमारे कर्मों को ले जाता है, भगवान के सामने बताता है, और उसी से अगला जन्म होता है — क्या ये सही है? (P22-0005)
  192. महात्मा जी, मैं जब भी परमात्मा का नाम जप करता हूं या ध्यान में होता हूं तो मुझे अपने गुरु के प्रति बुरे विचार आते हैं; ऐसा बार-बार होता है। ऐसा क्यों होता है? मैं इससे मुक्त होना चाहता हूं। (P22-0021)
  193. गुरु जी, भगवान तक तो समझ में आया — पर "भगवान परमात्मा की यात्रा करता है" इसका क्या अर्थ है? (P22-0139)
  194. गुरु जी, मेरा अनुभव है कि परमात्मा, परम शक्ति — कोई भी नाम दें — किसी की प्रार्थना या विश को इंकार नहीं करता, जो मांगो दे देता है। तो हम उससे क्या मांगें? (P22-0142)
  195. गुरु जी, परमात्मा है कहां? (P22-0149)
  196. गुरु जी, आत्मा ही लेती है तो जानने वाला ही आत्मा है? क्या आत्मा अलग है और जानने वाला अलग है? (P22-0162)
  197. गुरु जी, धरती पर आत्मज्ञानी बड़ा है या परमात्मा? (P22-0178)
  198. गुरु जी, नारायण को हम परमात्मा कह सकते हैं, और राम और कृष्ण परमात्मा का अवतार नहीं हैं? (P23-0024)
  199. गुरु जी, क्या बिना संन्यास के भी आत्मा का परमात्मा से मिलन हो सकता है? अगर हो सकता है तो कैसे? कृपया विस्तार से बताएं। (P23-0029)
  200. गुरु जी, एक चीज और समझ में नहीं आ रही — कहते हैं परमात्मा ने, खुदा ने आपको बिल्कुल फ्री हैंड छोड़ दिया, जो करना चाहो करो, सही करो या गलत; लेकिन दूसरे हाथ में पकड़ भी रखा है — ऐसा कानून बनाया है जो सीबीआई से भी ज्यादा पावरफुल है, थोड़ी सी गलती की तो सजा मिलेगी। यह कैसे? (P23-0079)
  201. गुरु जी, क्या आत्मा होती है? गौतम बुद्ध कहते हैं आत्मा नहीं होती, आदि गुरु शंकराचार्य कहते हैं कि आत्मा और चेतना एक ही है, जैन भी कहते हैं कि आत्मा और चेतना एक ही है। (P23-0090)
  202. गुरुदेव, यह आत्म तत्व — क्या इसका संख्यात्मक दृष्टिकोण भी है? आत्मा एक है या अनेक? ब्रह्म एक है, परमात्मा एक है, तो आत्मा? (P23-0096)
  203. गुरुदेव, शरीर, मन और बुद्धि की बात हुई — कुछ लोग इसके पार भाव की बात कहते हैं, कुछ उसे आत्मा का अभिन्न स्वभाव भी बोलते हैं। क्या भाव भी मन-बुद्धि के इसी कार्यक्रम से जुड़ी हुई चीज है? (P23-0101)
  204. गुरु जी, क्या यह सच है कि परमात्मा कुछ आत्माओं को चुनते हैं? और ऐसी चुनी हुई आत्माओं का जीवन बहुत कठिन होता है, उन्हें घर वाले भी पसंद नहीं करते। (P23-0156)
  205. गुरु जी, हमें आत्मज्ञान के जो रास्ते पता थे — ध्यान, नाम जाप और मंत्र जाप — आपने उन्हें गलत बता दिया, इससे प्रॉब्लम और बड़ी हो गई है, कोई रास्ता नहीं बचा। क्या अब परमात्मा को खोजना छोड़ दूं? (P23-0173)
  206. गुरु जी, सब कुछ परमात्मा ही है, तो क्या परमात्मा निराकार ब्रह्म है? (P23-0190)
  207. गुरु जी, फिर कर्म लागू किसके हुए — उस आत्मा के? (P24-0008)
  208. गुरु जी, शरीर में मन और आत्मा दोनों रहते हैं — क्या मन और शरीर का नाश हो जाएगा? (P24-0014)
  209. गुरु जी, गीता में लिखा है कि जिसने अपनी आत्मा को जान लिया, फिर उसे कुछ जानने की जरूरत नहीं है — क्या यह सही है? तो आत्मा को कैसे जानें? (P24-0036)
  210. गुरु जी, ये जो विवाह का सिस्टम है, क्या परमात्मा ने खुद बताया था या आदमियों ने इसका इन्वेंशन किया? (P24-0049)
  211. गुरु महाराज, परमात्मा-भगवान, जिससे हमारा मिलना होगा — वह रूप है? (P24-0116)
  212. गुरु जी, आत्मा का मूल क्या है? (P25-0014)
  213. गुरु जी, क्या ईमानदारी और सत्कर्म से हम मोक्ष, परमात्मा तक अवश्य पहुंच जाएंगे, या साधना में चलते-चलते धीरे-धीरे पता चलेगा? कृपया विस्तार से समझाएं। (P25-0031)
  214. गुरु जी, अभी कुछ अनुभव तो है नहीं और आपने बोला कि ईमानदारी और सत्कर्म के रास्ते से चलो — तो उसमें प्रभु या परमात्मा को बीच में लाने की जरूरत है क्या? (P25-0032)
  215. गुरु जी, पृथ्वी पर मनुष्य ही एकमात्र जीव है जो आत्मा-परमात्मा के चक्कर में फंसा हुआ है। यदि एक व्यक्ति पूरी जिंदगी सही कर्म करते हुए बिता दे, तो क्या उसे किसी परमात्मा को जानने की जरूरत है? (P25-0034)
  216. गुरु जी, गलत काम करना तो दूर, सोचने से ही आत्मा तुरंत मना करती है और दुखी भी होती है, लेकिन हम लोभ-मोह के कारण आत्मा को इग्नोर कर देते हैं और गलत कर्म कर देते हैं। तो क्या उसका शारीरिक फल बाद में मिलता है? (P25-0103)
  217. गुरु जी, परमात्मा हमारी मदद क्यों नहीं करते? क्या वो हमें आत्मज्ञानी बना सकते हैं? (P25-0109)
  218. गुरु जी, जब बर्फ दोबारा पानी बन गई — आत्मा अपने सेंटर पॉइंट पर आ गई — तो अब उसकी यात्रा परमात्मा की तरफ होगी, या दोबारा इधर आने की भी संभावना हो सकती है? (P25-0121)
  219. गुरु जी, अगर आत्मा अपने मूल में आ गई, तो परमात्मा — जो इस आत्मा का भी मेन स्रोत है — वहां की यात्रा उसे करनी पड़ेगी या स्वतः हो जाएगी? (P25-0122)
  220. गुरु जी, कल आपने "मैं आत्मा" और "आत्मा" बोला था — इसमें अंतर बताइए। दर्द किसको होता है? (P25-0124)
  221. कुछ दिनों से मेरे अंदर आत्मज्ञान प्राप्त करने का एक भाव उत्पन्न हुआ है। सवाल ये है कि यह भाव मेरा है या परमात्मा की कृपा है? (P25-0182)
  222. आत्मा का स्वभाव अकर्ता, साक्षी, दृष्टा है — तो फिर चिंतन की क्या आवश्यकता है? (P25-0190)
  223. कोई भी अनुभव और आत्मानुभूति — क्या दोनों से परे उठना है? (P25-0192)
  224. क्या बिना गुरु के परमात्मा मिल सकते हैं? बताएं गुरु जी। (P26-0005)
  225. एक वीडियो में आपने कहा है कि परमात्मा को पाने के लिए गुरु की आवश्यकता नहीं होती है — इसे समझाइए। (P26-0008)
  226. सद्गुरु, जब तक आत्मा परमात्मा की तरफ नहीं चलती तब तक द्वैत है। तो द्वैत में एक मैं और एक आत्मा — यह है या कुछ और? कृपया बताएं। (P26-0030)
  227. गुरु जी, मुझे खुशी हुई कि आपको परमात्मा प्राप्ति हुई। क्या आपने इसके लिए जी-जान लगा दिया था? (P26-0035)
  228. गुरु जी, आत्मा एक है या अनेक? (P26-0045)
  229. गुरु जी, परमात्मा को कैसे जानें? (P26-0069)
  230. गुरु जी, बचपन से सुनते चले आ रहे हैं कि प्रभु या परमात्मा की इच्छा के बिना पत्ता भी नहीं हिलता, अर्थात जो हो रहा है सब भगवान की इच्छा से हो रहा है। क्या यह सही है? (P26-0070)
  231. गुरु जी, मन और आत्मा में क्या फर्क है? (P26-0094)
  232. गुरु जी, आत्मा अलग और कर्ता कोई और — यह कैसे है? (P26-0111)
  233. गुरु जी, आत्मा संसार में क्यों आई? क्या बिना परमात्मा की इच्छा से ऐसा हुआ है? (P26-0114)