कर्म — योगी गुरु जी के प्रश्नोत्तर
इस पृष्ठ पर “कर्म” विषय से जुड़े 241 प्रश्न हैं, जो जिज्ञासुओं ने सत्संग में योगी गुरु जी से पूछे। किसी प्रश्न पर क्लिक करके योगी गुरु जी का पूरा उत्तर उनके अपने शब्दों में पढ़ें, वीडियो के साथ।
- मैं आपके बताए सत्कर्म ईमानदारी से कर रहा हूं, पर मन काम-भोग के लिए परेशान करता है। शरीर से कर्म नहीं कर रहा, पर मन उधर रहता है। क्या करूं? (P1-0002)
- मैं पढ़ाई करना चाहता हूं, लेकिन मुझसे पढ़ाई नहीं हो पा रही। मैं निष्काम कर्म करना चाहता हूं, परिणाम की चिंता नहीं है; बस आगे कभी ग्लानि न हो। (P1-0007)
- गुरु जी, कभी-कभी अंदर से ऐसी तीव्र भावना (लहर) उठती है कि हमें वहां (कुटिया) जाना ही चाहिए — मैं बड़ा काम छोड़कर ऑटो किराए पर लेकर यहां आया। क्या यह हमारे पहले के कोई कर्म हैं? (P1-0010)
- गुरु जी, जरूरत में जीने के भाव में लगातार कैसे बना रहूं? कभी-कभी भाव छोड़कर कर्म में लिप्त हो जाता हूं और बेईमानी हो जाती है। मार्गदर्शन करें। (P1-0080)
- निंदा करने वालों के बीच कैसे बचे रहें, जबकि कर्म-धर्म उन्हीं के साथ निभाना है? (P1-0114)
- आगे के कर्म तो (राग-द्वेष न बनाने से) नहीं बनेंगे, लेकिन पिछले कर्म कैसे कटेंगे? क्या उसके लिए सत्कर्म करना पड़ेगा? (P1-0173)
- कर्म क्या होता है? (P2-0041)
- गुरु जी, प्रारब्ध कर्म, संचित कर्म और क्रियमाण कर्म कैसे काम करते हैं? (P2-0055)
- गुरुदेव, मां के साक्षात्कार के लिए क्या मुझे अलग से पूजा-पाठ, कर्मकांड, साधना आदि करने होंगे, जैसे आपने किए? या केवल आपके बताए मार्ग पर चलते रहने से ही मुक्ति हो जाएगी? (P2-0078)
- कर्मों का ऐसा प्रभाव है कि लगता है सब कुछ शुरुआत से ही करना पड़ेगा। (P2-0145)
- अगर मैं जहां हूं अपने चुनाव से हूं, तो लोग हाय-तौबा क्यों मचाते हैं कि मेरे कर्म फूटे, मेरे कर्म मुझे कहां ले आए? (P2-0174)
- ज्ञान होने तक तो ये घाव बार-बार हरे हो जाते हैं; याद आते ही मन घृणा से भर जाता है और न चाहते हुए भी उनके लिए बद्दुआएं निकल जाती हैं। फिर डर लगता है कि इस द्वेष से मैंने फिर कर्म-बंधन बांध लिया। अगर ज्ञान से पहले शरीर छूट गया, तो क्या इस द्वेष के कारण मैं फिर उन्हीं के इर्द-गिर्द, उनके परिवार में पैदा हो जाऊंगा — वही चक्र, जिसे मैं तोड़ना चाहता हूं? (P2-0184)
- तो ज्ञान से पहले, जब भी ऐसी यादें सताएं, क्या मुझे यह समझ लेना चाहिए कि यह मेरे ही कर्मों का परिणाम था — उन्होंने जैसा बर्ताव किया, ठीक किया; गलती मेरी थी कि मैंने उनसे उम्मीद रखी? (P2-0185)
- तो जब भी मेरी मनोस्थिति ऐसी बने कि वे बातें मुझे घायल करें, मुझे इस ज्ञान का सहारा लेना चाहिए कि छटपटाने से फायदा नहीं; कर्म याद नहीं, पर जो फल मिल रहा है उसका जिम्मेदार मैं ही हूं — क्या यही समझ सही है? (P2-0186)
- संसार में संघर्ष-कंपटीशन से पहुंचे; अध्यात्म में कंपटीशन नहीं पर कर्मबंधन उलझे यादें ताजा। ज्ञान ने काबिल बनाया देखने को — मटेरियल अभी भी वर्क करता है, रोष आता है। बारीकी से कैसे चलें कि रोष कम हो? (P3-0026)
- अज्ञान में फोटो पूजा सालों — पाप/कर्म से गुरु मिलेगा? अपराध के बाद गुरु मिलेगा? गुरु क्या करेगा? (P3-0059)
- पड़े रहना क्या साधना है? भगवान हमारे कर्म देख रहे? गलतियां कैसे स्वीकारें? (P3-0066)
- सत्संग में सुना कि हमसे जो गलत कर्म हुए उनका फल अलग मिलेगा और अच्छे कर्मों का अलग — अच्छा कर्म बुरे को काटता नहीं। तो फिर सेवा से मिला आशीर्वाद श्राप को कैसे काटेगा? और यह पूरी तरह खत्म कब होगा? किसी ने बड़ा अभिशाप दिया हो जो हमें पता भी नहीं, तो क्या करें? (P3-0095)
- कर्म योनि और भोग योनि क्या है? मानव शरीर और अन्य जीवों के शरीर में क्या अंतर है? (P3-0098)
- दूसरी योनि में (जैसे जानवर) जो कर्म किया जाता है उसका क्या? और 84 लाख योनियों में घूमकर वापस मनुष्य जन्म किस कर्म की वजह से मिलता है — क्या पूरी 84 लाख योनियां घूमनी पड़ती हैं? (P3-0099)
- एक साधक (एक महीने से आश्रम में): पहले बिजनेस-जॉब की छोटी-छोटी बातों में बहुत व्यस्त रहता, बहुत सोचता था; यहां आकर विचार शांत हो गए, अंदर पवित्रता का एहसास हो रहा है। बेईमानी आदि का खाने-पीने पर कितना असर पड़ता है? आपने तीन गुण बताए — वे कर्म से होते हैं या खाने से? (P3-0105)
- एक साधक ने अनुभव बताया: दीपावली पर पूजा के लिए रखी नए नोटों की गड्डी सत्संग सुनकर निकाली और एक जरूरतमंद को नया नोट दिया, तो देने और लेने दोनों में भाव बहुत पवित्र हुए। फिर प्रश्न — घर या आश्रम में जाकर दान लिखवा आते हैं, तो वह सत्कर्म में आता है या किस कर्म में? (हमारा किराने का बिजनेस है, ज्यादातर ऐसी जगह अनाज भेज देते हैं।) (P3-0107)
- आप जो ईमानदारी, सत्कर्म और 'कुछ नहीं चाहिए' की बात बोल रहे हैं — इसके लिए भी तो कुछ चाहिए; ईमानदारी और अच्छा कर्म भी कुछ चाहिए इसलिए कर रहे हैं? निष्काम भाव से करें तो क्या फर्क पड़ता है? (P3-0109)
- कर्म का राजा आत्मा है या बुद्धि? हम जो भी कर रहे हैं उसके पीछे कौन है? (P3-0115)
- अगर मैं अपने दोस्तों-रिश्तेदारों में किसी की मदद करता हूं जिसे उसके कर्म की वजह से तकलीफ हो रही है, तो कर्म तो उसे सजा देता रहेगा — क्या कर्म मेरी तरफ भी देखेगा कि मैं (उसकी सजा में दखल देकर) गलत कर रहा हूं? (P3-0135)
- (लाइव) क्या मंदिर जाना, घर पर पूजा करना या हनुमान चालीसा पढ़ना — ये सब कर्म करने से जीवन में कुछ घटित होगा? (P3-0137)
- (लाइव) अभी आपने कहा कि अच्छे कर्मों का फल भी भोगने आना पड़ेगा, मगर उसके पहले आत्मज्ञान हो जाएगा। तो क्या आत्मज्ञान के बाद भी फिर जन्म लेकर भोगना पड़ेगा? कृपया समझा दीजिए। (P3-0145)
- गुरु जी, क्या हमारे लड़के (संतान) भी हमारे कर्म के फल हैं? (P3-0146)
- जब सब तुम में ही है तो क्या चाहिए? अगर मैं सीधा अपने आप में आ सकता हूं तो इतनी विधियां क्यों? और एक व्यक्ति रोज दो घंटे ध्यान-पूजा-पाठ करता है, दूसरा ईमानदारी से कर्म करते हुए वे दो घंटे जरूरतमंद की सेवा में लगाता है — दोनों ईमानदार हैं, तो पहले कौन पहुंचेगा? (P3-0153)
- (कुटिया में साधक) मुझे लगता है जीवन की यात्रा अनंत से अनंत है और जीरो उसका सेंटर पॉइंट है (जिसे शांति या समाधि कहते हैं)। अच्छे कर्म करने वाला प्लस साइड — अच्छी जगह, अच्छी विचारधारा के लोगों में — जन्म लेता है; बुरे कर्म वाला माइनस साइड — दूसरी योनियों या वैसी विचारधारा के लोगों में — जाता है; ऐसे ही सर्कल घूमता रहता है। यह सर्कल टूटे कैसे? मुक्त हो गए तो फिर हम कहां होंगे — आत्मा कहीं तो होल्ड करेगी? और धरती पर 9-10 हजार करोड़ लोग जन्म ले चुके, अभी 900 करोड़ जिंदा हैं — बाकी की आत्माएं कहां गईं? (P3-0195)
- (लाइव) प्रणाम योगी जी। आपने कहा कि मानसिक कर्म — जैसा सोचो — उसका फल नहीं (लगता), जब तक एक्शन में ना करें। किंतु ऐसा व्यक्ति, जो मन में गलत सोच रहा है, निर्विकार और ईमानदार थोड़े होगा? मानसिक बुरा सोचने वाला अपने आप को रोम-रोम से ईमानदार थोड़े बोल पाएगा? यह समझाएं। (P4-0006)
- (लाइव) योगी जी, आपने कहा कि मन में गलत सोच रहे हो तो कोई बात नहीं, बस कर्म में मत लाना। जब से यह अपनाया है, पहले से ज्यादा घृणित और कामी (विचारों वाला) हो गया हूं; मुझे ऐसे विचार आते हैं कि बोल नहीं पा रहा हूं। (P4-0012)
- (लाइव) गुरु जी प्रणाम। अपने कर्तव्य का कर्म ईमानदारी रखते हुए करने में (अगर) किसी को तकलीफ या घुटन हो, तो मुझे क्या करना है? क्या उस समय मुझे अपने तरीके — ईमानदारी — छोड़नी होगी, या कोई और तरीका अपनाऊं? (P4-0022)
- (लाइव) योगी जी प्रणाम। आपने होटल का काम छोड़ने को कहा है; लेकिन जब तक मैं उस मांस-मदिरा के बीच हूं, क्या मैं उसे सेवा मानकर कर सकता हूं, या वह हर हाल में मेरा पतन ही करेगा? क्या कर्म को बदलने से पहले भाव को बदलकर उस नरक में काम करता रहूं? या फिर भागना ही एक रास्ता है? (P4-0043)
- (लाइव) गुरुदेव, मुझे लगता है मेरा मन, माइंड और शरीर पर कोई नियंत्रण नहीं है। जिस चीज को भूलना चाहता हूं, वही चीज बार-बार याद आती है और बेचैन करती है, जबकि मैं किसी के साथ कोई पाप कर्म भी नहीं करता। (P4-0048)
- (लाइव) महात्मा जी प्रणाम। अगर रोग आए, तो चुपचाप अपना कर्म समझकर सह लेना चाहिए, या रोग के इलाज के लिए दूसरों से हाथ जोड़ना चाहिए? (और एक साधक का प्रश्न) परमात्मा के शरणागत होने के बाद क्या रोग परमात्मा पर ही छोड़ देना चाहिए? (P4-0056)
- (लाइव) गुरु जी, आपके अनुसार यदि कृष्ण के माता-पिता को उनका कर्म फल कंस के द्वारा मिला, तो फिर कंस को (उसका) कर्म फल क्यों मिलेगा? (P4-0071)
- (लाइव) प्रणाम योगी जी। हर समय वर्तमान में रहने के लिए किसी ना किसी आलंबन की आवश्यकता होती है। आपके अनुसार हर पल जागरूकता कैसे बनी रहे, जिसमें गलत कर्म ना हो? (P4-0072)
- (लाइव) गुरु जी नमन। कैसे पता करें कि कौन सा कर्म ठीक है और कौन सा गलत? किसी को कुछ सही लगता है तो किसी को कुछ और। (P4-0138)
- (लाइव) गुरु जी नमन। गीता में योगीराज श्री कृष्ण निष्काम कर्म कहते हैं — वो क्या है? (P4-0146)
- (वही साधिका) आपको लोगों से हेल्प मिली — तो क्या दूसरों से लेने पर हमारे पिछले पुण्य कर्मों का 'एटीएम' क्षीण नहीं हो जाता? और अगर सही काम में लगाते हुए भी मन में लगे कि यह गलत है, तो? (P4-0191)
- कर्म सेटलमेंट नहीं भी हुआ तो क्या आत्मज्ञान हो सकता है? पेंडिंग कर्म बाद में? (P5-0041)
- परिस्थितियां कर्म कराती हैं; योग्यता बढ़ाने में प्रयास — क्या यह कर्ता भाव है? कर्ता भाव क्या है? (P5-0091)
- आत्मज्ञान के बाद भी कर्म/पाप-पुण्य भोग बाकी रहता है क्या? ईमानदारी क्या है कैसे करें? साधना कैसे करें? योग्यता से अधिक का मतलब? (P5-0117)
- बुरे कर्म का दंड मिटाया नहीं जा सकता — अच्छे कर्म से? बुरे विचार क्यों न दबाएं? (P5-0125)
- संत नाम-दान देते हैं, गीता/आप कर्म कहते हो — माला-चैटिंग क्या करूं? (P5-0141)
- सामने वाले के प्रति आसक्ति से कैसे निकलें? कर्म भाव कौन देखता है? (P5-0145)
- बदलाव कैसे हो — समय और कर्म का संबंध? (P5-0180)
- यहां व्यवस्था मिली फिर भी रुक नहीं पा रहा — कमी क्या है? पिछले जन्मों के कर्म या अभी कुछ खराब? (P5-0187)
- इस शरीर में कर्म करके अगली योनि में परिणाम मिलता है? (P6-0005)
- घंटों ध्यान बैठने से आचरण बदलेगा? कर्म तो कर ही रहे हैं। (P6-0023)
- जब एक मिनट के लिए चुपचाप बैठ जाता हूं और शरीर से कोई कर्म नहीं कर रहा, तब भी विचार अपने आप अतीत में चले जाते हैं या भविष्य की कल्पना में। किसी ने गुस्सा दिलाया या चोट पहुंचाने की कोशिश की, एक मिनट में वह अतीत हो गया, और विचार अपने आप बनते चले जाते हैं। मैं कुछ नहीं कर रहा, मन क्रिया कर रहा है। अगर मैं कहूं कि मैं इसका दृष्टा हूं, तो यह भी धोखा लगता है, क्योंकि प्रश्न भी मन उठा रहा है और उत्तर भी मन दे रहा है। मन निमित्त है, तो प्रश्न कौन उठा रहा है? कई बार साइलेंट में बैठने पर अनुभव सा होने लगता है, फिर लगता है यह भी धोखा है, मन बार बार धोखा देता है। सृष्टि में आने के बाद से हम अपने आप को भूल गए, ऐसा लगता है। बोलने को शब्द नहीं मिलते। क्या शब्दों का सहारा लिया जाए, और बोला क्या जाए? (P6-0040)
- निर्विकार के इन साधनों में ब्रह्मचर्य का भी कुछ महत्व है या नहीं? भीतर विकार चलते रहें तो क्या अपने प्रति ईमानदार कहा जा सकता है? ईमानदारी अपना लेने के बाद भी पिछला विकार बहुत जमा है, उसे खत्म करने का क्या उपाय है? कर्म तो शरीर रहते होता ही रहेगा। अपने तरीके से चाहिए, यही चाहना भी बेईमानी है या नहीं? (P6-0049)
- आपने कहा कि आत्मचिंतन उसी चीज का होता है जो चाहिए। मैं करियर भी बनाना चाहता हूं, तो दोनों ओर देखना पड़ेगा। एक समय पर एक ही काम होता है। बैलेंस कैसे करूं? कर्म के साथ फोकस कहां रहे? (P6-0069)
- जो परिवार छोड़कर केवल ध्यान लगाता है, आकाशवृत्ति से रहता है, धन नहीं जोड़ता, उसे गाली और मार भी मिलती है। उसका क्या होता है? कृष्ण ने अर्जुन को आत्मभाव में टिकने के लिए भी कहा था, तो कर्म का सिद्धांत क्यों बताया? अर्जुन आत्म तत्व में कैसे स्थिर हुए? और क्या मैं शुद्ध आत्मा हूं कहना भी एक विधि है, जिससे कल्याण नहीं होता? (P6-0077)
- कल्पनाओं से बाहर कर्म में हम क्यों नहीं आते? (P6-0121)
- क्या मन कर्म से बनता है, और उसके असर में दिक्कतें होती हैं? आंख, पलक, बीज और मकान की तरह क्या सब पहले से तैयार है? क्या सृष्टि की हर घटना पूर्व निश्चित है? मैं निश्चित करके आया, फिर योजना बदल गई और बेईमानी में फंस गया। यह फिक्स मैं ही कर रहा हूं क्या? फिक्स है तो फिर करना क्या है? (P6-0131)
- आपने कहा सब प्लान है। लेकिन प्लानिंग तो कर्म हो सकती है, फल नहीं। हम परीक्षा के लिए पढ़ सकते हैं। पास और फेल थोड़े ही हमारे हाथ में है? (P6-0140)
- गीता में निष्काम कर्म की शिक्षा है, शास्त्रों में लिखा तो ठीक है, पर हम अपने तरीके से ग्रहण कर रहे हैं। शास्त्र पढ़ें या क्या करें? गुरु के पास अपना पढ़ा हुआ ज्ञान लेकर जाएँ तो क्या होता है? (P6-0155)
- प्रशांत गुप्ता कहते हैं, मैं कर्म तो करता हूँ पर अपने को करता मान लेता हूँ। ऑफिस का काम करता हूँ, पैसा नहीं मिलता या कम मिलता है, तो नाखुश रहता हूँ। इससे बाहर कैसे आऊँ? (P6-0186)
- मनुष्य अपने कर्मों से कैसे मुक्त हो सकता है? (P7-0036)
- कर्म का सिद्धांत क्या है? (P7-0061)
- अच्छा कर्म करना है, ऐसा कहा गया। कर्म भी अच्छा और बुरा होता है, ये बात समझ में आ रही है। लेकिन धर्म और अधर्म क्या होता है? रास्ते में किसी को खाना दे दिया, तो धर्म लग रहा है। अनदेखा कर दिया, तो अधर्म। अगर उसे अच्छा या बुरा मान लिया, तो अटैचमेंट हो जाएगा, फिर मोह हो जाएगा। क्या उसे अपना कर्तव्य मानकर करना चाहिए, न अच्छा मानें न बुरा, ताकि फंसें नहीं? भाव ये है कि अच्छा-अच्छा कहते हुए मैं भोग में न फंस जाऊं। मुझे मुक्ति का मार्ग चाहिए, बंधन नहीं। मैं मानवता और कर्तव्य से काम करूं, पर अच्छा कहकर वहीं न अटक जाऊं। (P7-0080)
- इस मानव शरीर में आए हैं, तो कुछ न कुछ कर्म करना ही है। वो मजबूरी नहीं, जरूरत है। कर्म करते हुए अपनी समझ से देखना है कि समाज के लिए, हमारे लिए, और परिवार के लिए क्या हित है, वही करना है। इस जीवन को लगाना कहां है, और सदुपयोग कैसे हो? (P7-0081)
- देवेंद्र सिंह का प्रश्न है। ऐसा कौन सा कर्म करूं, जिससे अपने आप से मिलन हो जाए? मुझको मुझसे मिलने के लिए क्या करूं? मार्गदर्शन कीजिए। (P7-0088)
- भाग्य क्या है? भाग्य में जो लिखा है वह कैसे मिलता है, प्रारब्ध से या कर्म से? भाग्य कौन तय करता है? (P7-0091)
- गुरु जी, हमें यह पता होते हुए भी कि जो कर्म कर रहे हैं वह हमारे कल्याण के लिए नहीं है, फिर भी हम अपने मन पर पूरी तरह नियंत्रण नहीं कर पाते। हमें क्या करना चाहिए? (P7-0130)
- हम दुष्कर्म और अंदर आने वाले विचारों से निकलना चाहते हैं, पर पैर-पैर पर गिरते हैं। ग्रंथों में पढ़ा है कि गुरु हमारे किए हुए सारे कर्म काट देगा और हमें सच्चे मार्ग पर चलाएगा। हमसे बन नहीं पा रहा, इसीलिए गुरु की जरूरत है। हम क्या करें, जब हमसे हो ही नहीं रहा? गुरु किसे मानें, शरीर को या शब्द को? और जब गलत काम होने लगता है, तो क्या वहां गुरु अपनी पावर से हमें हटा लेगा? रस में ऐसे लिप्त हो जाते हैं कि लगता है बुद्धि काम ही नहीं करती। (P7-0142)
- एक साधक दो-तीन महीने पहले वीडियो देखकर आया। पहले और लोगों के प्रवचन जंच नहीं रहे थे। आपका वीडियो पहले अटपटा लगा, फटे वस्त्र में बैठे किसी को सवाल पूछते देखा, आगे निकल गया, फिर लौटकर पूरा सुना तो लगा यही आत्मकल्याण का रास्ता है। पत्नी रोकती थी, बच्चों की शादी के बाद साथ चलने की बात हुई। दादी की गति देखकर लगा कि बच्चों के लिए कमाते रहने के बाद भी वही गति हो सकती है। संसार सबको लात मारता है, फिर भी लोग संसार के लिए पागल हैं। वह पूछता है, संसार में रहते हुए कर्म कैसे करें कि जीवन आत्मकल्याण की ओर जाए? (P7-0191)
- डॉक्टर बसीर अहमद पूछते हैं, कर्म अच्छे से करना है, मूल मंत्र क्या है? (P7-0197)
- मेरा मुंबई में छोटा व्यापार है। कभी सामान कम दाम में लेकर ज्यादा दाम में बेचता हूं। आप कहते हैं ईमानदारी से कर्म करो। तो क्या कम में खरीदकर ज्यादा में बेचना बेईमानी है? (P8-0015)
- मुझे दिव्यता का बोध नहीं है, तो मैं सही कर्म कैसे करूंगा? समाज बहुत दबाता है, दबाव बनाता है, मानसिक परेशानी बन जाती है। (P8-0021)
- मेरे द्वारा जो भी कुछ होता है, वह पिछला कर्म है अथवा उसका कर्ता मैं स्वयं हूं? इससे बहुत संशय है, क्योंकि मेरा भाव सदैव ईमानदारी करने में रहता है। फिर भी यदि गलत हो जाए तो दोष किसे? (P8-0034)
- कुछ लोगों के साथ ऐसी घटनाएं होती हैं कि उनकी जान पर बन आती है, फिर भी वह बच जाते हैं। क्या उनके कर्म या दुआएं उन्हें बचा लेती हैं? (P8-0055)
- मनुष्य जन्म किन कारणों से मिलता है? कर्म से मिलता है या कृपा से? (P8-0067)
- मैंने सब बुरे कर्म छोड़े हैं, लेकिन स्वप्न में पतन होता है, गलत आचरण होता है। मार्गदर्शन कर दीजिए। (P8-0069)
- हम जो कर्म करते हैं, वह ईमानदारी से करते हैं, यह देखना है? (P8-0108)
- हम जो कर्म कर रहे हैं, पूरी तरह ईमानदारी से कर रहे हैं, यह देखना है? (P8-0147)
- पुराने कर्मबंधन कैसे खत्म करें, जल्दी से, और आगे न बंधें? विस्तार से बता दो, ताकि समझ आए। (P8-0152)
- पिछले कर्म जो गलत हो गए, वे कैसे समाप्त होंगे? (P8-0159)
- कर्म प्रधान विश्व करि राखा, जो जस करहि सो तस फल चाखा। इसका मतलब सुना दीजिए। (P8-0168)
- ध्यान करता हूं, लेकिन ध्यान में जी नहीं लगता। पूजा-भक्ति में भी जी नहीं लगता। अच्छा कर्म करने में जी लगता है। तो इससे क्या आत्मज्ञान हो जाएगा? (P8-0186)
- शरीर को कर्मों का भोग आता है। उसे भोगना चाहिए क्या, या नहीं भोगना चाहिए? (P8-0192)
- अभी मैं तामसी में हूं। कर्म तामसी, राजसी और सात्विक होते हैं। क्या हम छलांग मारकर सीधे सात्विक में लग सकते हैं? (P9-0001)
- काफी साल से साधना में हूं। मेरे मार्ग में मेरी मां मेरे साथ सौतेला व्यवहार करती है। गुरु जी, अगर यह मेरा कर्म है, तो मुझे इस बंधन से छुटकारा कैसे मिलेगा? (P9-0012)
- आपने कल के सत्संग में बताया था कि बाप का गलत कर्म बच्चे भोगते हैं। इसे थोड़ा विस्तार से बताइए। (P9-0013)
- पाप और पुण्य क्या है? अच्छा और बुरा कर्म क्या है? (P9-0049)
- बाबा जी, आपके सारे कर्म करने का मूल केंद्र और समझ क्या है? विस्तार से बताइए। (P9-0076)
- विचारशील कर्म सही है। कितनी हद तक विचार करें, और कितनी हद तक कर्म करें? विस्तार से समझाइए। (P9-0086)
- वाक् सिद्धि होने पर पूरे जगत में सुख-शांति बनी रहे, ऐसा कोई कह दे, तो जानना चाहिए क्या? फिर कर्म? (P9-0117)
- गुरु जी, कर्म के सिद्धांत को थोड़ा सा विस्तार रूप देकर समझाइए। सुबह कह दिया था, कल बताएंगे। (P9-0125)
- आपके बताए मार्ग पर चलने के बाद भी बेचैनी और घुटन बनी रहे, तो क्या इसे कर्मों का परिणाम समझकर भोगते रहें? (P9-0142)
- अपने अंदर ऐसा क्या देखूं कि जिस तरह मैं कर्म कर रहा हूं, उससे मेरा आत्मकल्याण हो रहा है? (P9-0181)
- गुरु जी, कर्म क्या है, और यह हमारे भाग्य को कैसे बदलता है? (P9-0193)
- गुरु जी, क्या नाम जप करते हुए कर्म करने से अपने आप मान की इच्छा नहीं आएगी? (P10-0080)
- गुरु जी, मेरा भाव है कि दृश्यमान जगत मशीन की भांति काम करता है, हमारे कर्मों का फल हम तक पहुंचता है और मैं इसमें फंसा हुआ हूं। अब मैं यह समझना चाहता हूं कि जिनके साथ मैं कर्म कर रहा हूं, क्या वे भी फंसे हुए हैं? (P10-0091)
- क्या उचित कर्म ही हमारा गुरु नहीं है? (P10-0119)
- क्या आप राम के भरोसे जीते हैं या कर्म के भरोसे? (P10-0161)
- क्या बचपन के गलत कर्म का प्रभाव पड़ता है? (P10-0165)
- गुरु जी, ऐसा कौन सा कर्म करें जिसमें आत्मा स्थिर हो जाए? (P10-0196)
- हमारी जो प्रतिक्रियाएं मन में चलती हैं — कुछ नेगेटिव, कुछ बेकार — जिन्हें हम एक्शन में नहीं लेते, क्या उनसे भी कर्म बनते हैं? (P11-0011)
- कोई साधक पहले सब कुछ ठीक से समझकर यहां आया, फिर भी बाद में भ्रमित क्यों होता है? क्या उसके पाप कर्म हैं, या वह अभी कुछ गलत कर रहा है? (P11-0020)
- मान लीजिए हम न्यूट्रल हो गए, प्रतिक्रिया देना बंद कर दिया; फिर भी कर्म तो करना है, और कर्म करेंगे तो प्रतिक्रियाएं तो आएंगी। और जो चीज बार-बार की है, दिमाग उसी लूप में स्पीड से रिपीट करता है। क्या करें? (P11-0022)
- इस जन्म में चाहे जितना भी बुरा कर्म हुआ हो, क्या मेरा कल्याण संभव है? (P11-0032)
- निष्काम कर्म आनंद में ले जाता है, या गुरु आनंद में ले जाते हैं? (P11-0033)
- दुकानदार मेरे ₹50 देना भूल गया; मैंने मांगे फिर भी नहीं दिए, वह कहता है दे दिए। क्या कर्म-बंधन हो गया? (P11-0039)
- अगर किसी ने ऐसे कर्म किए हों जिनकी सजा से वह बच गया और अब उसे याद भी नहीं था, पर एकांत में बैठकर सब याद आ रहे हैं — तो वह उन कर्मों से कैसे बचे? क्या सत्कर्म करे? (P11-0054)
- लगता है मेरे कर्मों का कोई पश्चाताप बाकी है; क्या ऐसा कोई साधन है कि सारी सजा एक बार में काट लूं? (P11-0083)
- मन, वाणी और कर्म के शुद्धिकरण का क्या मतलब है? (P11-0117)
- मैं विकलांग हूं, मेरी माताजी मेरी सेवा करती हैं। मेरा कर्मबंधन कैसे मिटेगा? (P11-0147)
- एक जन्म से दूसरे जन्म तक कर्म का सिद्धांत कैसे काम करता है? (P11-0159)
- यदि जन्म किसी कर्म के परिणाम से हुआ है, तो जन्म के पहले कर्म कैसे हुआ? (P11-0165)
- महात्मा कहते हैं कि पत्नी-बच्चे पिछले जन्म के कर्मों के अनुसार मिलते हैं, जिम्मेदारी पूरी करते हुए नाम जप करते रहो। आपका मार्गदर्शन? (P11-0191)
- सारे संसारी कर्म अपने आप छूट रहे हैं, एकांत में बैठी रहती हूं, रिश्ते-नाते सब पास नहीं, सारी व्यवस्था अपने आप होती जा रही है। क्या जो घट रहा है, सही है? (P11-0193)
- क्या माता-पिता के कर्म का फल उनके परिवार पर भी असर डालता है? (P12-0025)
- संचित कर्म जल्दी कैसे खत्म करें? (P12-0030)
- प्रकृति कब हमें कर्म करने का मौका देती है और कब हमसे कर्म करने का मौका छीन लेती है? (P12-0033)
- आत्मज्ञान पाने का सबसे आसान तरीका क्या है, जो रास्ते में भटके बिना आत्मज्ञान तक ले जाए — अच्छे कर्म और ईमानदारी, या आध्यात्मिक चिंतन? (P12-0051)
- शुभ कर्मों से शुभ कर्म बनता है और अशुभ से अशुभ; तो ईमानदारी-सत्कर्म से मुक्ति कैसे होगी? इससे भी तो प्रारब्ध बनेगा — क्या यह भी बंधन नहीं हो जाएगा? (P12-0078)
- क्या हमारे कर्मों के आधार पर ही हमारे आगे के कर्म निर्धारित होते हैं? (P12-0081)
- क्या व्यक्ति जन्म से ही बंधनों में पैदा होता है, या बाद में अपने कर्म में फंस जाता है? (P12-0083)
- शरीर में दर्द कौन-से कर्मों का परिणाम है, और अंतःकरण में पीड़ा किस प्रकार के कर्मों का परिणाम है? (P12-0086)
- हमारा जन्म पिछले बंधनों को काटने के लिए हुआ — तो पहले कर्म हुआ या पहले जन्म हुआ? (P12-0096)
- सारे दिन विचार और भाव चलते रहते हैं, और मैं अपने भाव के अनुसार उन्हें बल देती रहती हूं कि मेरी जिंदगी में ऐसा होना चाहिए। फिर जब वो परिणाम रूप में आता है तो मैं डगमगा जाती हूं, कर्म में भी डगमगा जाती हूं। तो मैं भाव में अपने आप को कैसे चेक करूं और उस भाव को कैसे दृढ़ करूं कि फिर वहां न हिलूं? (P12-0120)
- अगर मैंने कोई डिमांड की, वो सिचुएशन बनी, और मैंने उसका सदुपयोग नहीं किया — तो मैं तो गिरूंगी ही, लेकिन उस कर्म में लगे कितने लोग तो उठ जाएंगे ना? और अगर मैं वो भोजन ना खाऊं, नकार दूं या फेंक दूं, तो भी वो खराब तो नहीं हुआ, कोई ना कोई उसे खा ही लेगा? (P12-0121)
- बहुत से साधक कहते हैं कि जब हम आपके सामने बैठते हैं या आपको सुनते हैं तो एनर्जेटिक फील करते हैं, और आपसे दूर जाते हैं तो फिर लो हो जाते हैं, डांवाडोल की स्थिति आ जाती है। तो क्या ये आपका असर है, या मेरे कर्मों के फल पर उस समय तक के लिए जैसे कोई शेड लग गई — ये क्या जादू है? (P12-0122)
- मेरा आत्मचिंतन चल रहा है कि आज जो मुझे याद आ रहा है — किसी की याद, कोई स्वाद — उसका मतलब मैं उसे पहले जी चुकी हूं, और वो मेरा संस्कार बन गया। आप कहते हो उसे डिलीट करने की जरूरत नहीं, बस उसे कर्म में मत लाओ। तो यह किस तरह से काम करता है? (P12-0129)
- हम बोलते हैं कि हमारे कर्म निर्धारित होते हैं — जो भगवान ने लिखा है वही होगा, हमारे हाथ में कुछ नहीं, चाहे दुख हो या सुख। तो क्या कर्म पहले से ही निर्धारित होते हैं? (P12-0148)
- जल्दी कर्म को कैसे काटें, ताकि संसार से जल्दी चले जाएं? (P13-0009)
- व्यक्ति अपने ऊपर विश्वास करे, या कर्म पर, जो वह कर रहा है? (P13-0043)
- मन में बेचैनी होती है; लगता है कभी वहां घूम आऊं, कभी वहां। तो क्या हम अपने कर्म से भाग रहे हैं? (P13-0046)
- योगी जी, आपके प्रत्यक्ष ज्ञान में कोई माला, जाप, शास्त्र या बाहरी कर्मकांड नहीं है; आत्मचिंतन ही अहम है — देखो कि तुम राग में फंसे हो या द्वेष में। जब लगातार आत्मचिंतन करते हैं, तो कुछ समय के लिए एक भाव आता है कि अब मुझे कुछ नहीं चाहिए, न किसी से राग है, न द्वेष। यह भाव निरंतर या ज्यादा समय तक कैसे ठहरे, उस भाव में पूरा कैसे जिऊं? यह भाव बहुत थोड़ी देर के लिए आता है, इसकी अवधि कैसे बढ़ाऊं? (P13-0070)
- योगी जी, कर्म के प्रति मेरा कितना दायित्व होना चाहिए — मतलब कितना अधिकार होना चाहिए? (P13-0073)
- खाना खाने में, नहाने में, घर के रोजमर्रा के काम करने में — एक-एक छोटे कर्म पर मेरा क्या भाव होना चाहिए, ताकि मैं बहिर्मुखता से अंतर्मुखता की तरफ आऊं? और घर वालों के बीच बैठी हूं, तब क्या भाव बनाऊं? (P13-0074)
- मेरा ओवरऑल प्रश्न यह है कि मन, वचन और कर्म — तीनों से जो भी कर्म मेरे द्वारा हो रहा है, उसमें एक साधक के रूप में टोटल मिलाकर क्या भाव रखूं? क्या उसे साक्षी भाव से चेक करूं? और राग-द्वेष छोड़ने के अलावा अपने आप को क्या टारगेट दूं? (P13-0075)
- गुरु जी, जब से समझ का स्तर बढ़ा है, मैं उन लोगों से दूर हो गया हूं जो मुझे मानसिक रूप से तोड़ते हैं, लेकिन वे फिर भी परेशान कर रहे हैं। क्या यह हमारा कर्म है? हिसाब कैसे पूरा करें? (P13-0103)
- गुरु जी, कर्म करते वक्त संकल्प लेते हैं कि इतने समय में कार्य को समाप्त करना है, फिर टेंशन क्यों होता है? (P13-0106)
- जब हम ईमानदारी या सेवा करते हैं तो हर बार संशय आता है कि इस कर्म को करना चाहिए या नहीं, यह मेरे अधिकार में है या नहीं। कौन से कर्म छोड़ने हैं और कौन से कर्म करने हैं? (P13-0115)
- हम जो प्लानिंग से कर्म करते हैं, वह हमारे आत्मिक कल्याण में सहायक है या नहीं? जैसे ऑफिस में काम खत्म हो जाए तो मैं खोजता हूं कि और क्या काम हो सकता है। (P13-0117)
- गुरु जी, कर्म करते वक्त फेल होने का भय क्यों रहता है? इसका मूल कारण क्या है? (P13-0128)
- गुरु जी, निष्काम कर्म कैसे करें? (P13-0174)
- गुरु जी, कर्म क्या है? और क्या निष्काम कर्म ही ब्रह्म की तरफ चलना है? (P14-0017)
- गुरु जी, क्या कर्म का फल मिलता है? अगर मिलता है, तो बेईमान लोग इतने फूलते-फलते कैसे हैं? (P14-0024)
- गुरु जी, मैं बहुत बेचैन हो रहा हूं कि मैं परमात्मा को पाने के लिए कुछ कर नहीं पा रहा हूं। अपनी नजरों से दिखता है कि कहीं ना कहीं बेईमानी करते भी हैं, तो कर्म तो बिगड़ रहा है ना? (P14-0058)
- गुरु जी, हर कर्म बंधन देता है, प्रारब्ध को गढ़ता है — ईमानदारी से किया कर्म भी? (P14-0059)
- गुरु जी, इंसान को जो भी अवस्था, सुख-दुख, जैसा घर मिलता है, वह सब पिछले कर्मों से होता है — क्या उसे बदला जा सकता है? कोई हर समय मानसिक पीड़ा में रहता हो तो? (P14-0068)
- गुरु जी, मोह-माया ही सभी कर्म-बंधनों की जड़ है; जिस क्षण प्राणी इससे परे हो गया, कोई कर्म उसे बांध नहीं सकता — मोह-माया क्या है? (P14-0090)
- गुरु जी, कर्म-बंधनों से मुक्त कैसे हों? (P14-0102)
- संचित कर्म की वजह से इस जन्म में तकलीफ हो तो कैसे समझा जाए? (P14-0158)
- कर्म-बंधन का प्रभाव कैसे छोड़ें? (P14-0177)
- कर्म और भाग्य क्या है? मार्गदर्शन करें। (P14-0178)
- गुरु जी, जप से कुछ असर नहीं होता, इसका मतलब मेन चीज़ कर्म से होती है? (P15-0020)
- प्रत्यक्ष ज्ञान होने पर क्या सभी कर्म समाप्त हो जाते हैं? (P15-0024)
- क्या पाप कर्म से पुण्य कर्मों का नाश होता है? (P15-0040)
- सत्कर्म और निष्काम कर्म में क्या फर्क है? (P15-0067)
- अगर कोई बच्चा जन्म से ही अंधा या लंगड़ा पैदा हुआ है, उसने तो कोई कर्म नहीं किया, फिर ये परिणाम क्यों मिला? (P15-0074)
- गुरुदेव, मैं अच्छे कर्म कर रहा हूं, सत्कर्म कर रहा हूं, फिर भी कोई मेरा शोषण कर रहा है और मुझे दिखाई दे रहा है — ऐसे समय में मैं क्या करूं? (P15-0123)
- गुरु जी, यह तो समझ में आ गया कि बेईमानी बंधन है, और इसी शरीर में बेईमानी का कर्मफल भोगना पड़ता है। तो अगर 40 वर्ष तक बेईमानी की है, तो क्या फल भोगने में भी उतना ही समय लगेगा? (P15-0167)
- बाबा जी, अगर इस जन्म में कोई पाप हुआ हो तो उसका कर्मफल कर्म-विधान से इसी जन्म में चुकाना पड़ता है; फिर क्या अगले जन्म में पीछे के बुरे कर्म का प्रभाव पड़ता है? (P16-0008)
- गुरुदेव, मेडिटेशन और सत्कर्म भी कर्म ही है ना — तो क्या इससे कर्म-बंधन बंधता है? (P16-0028)
- गुरुदेव, क्या ईश्वर की पूजा आदि ना करते हुए सिर्फ निष्काम कर्म से उस तक पहुंचा जा सकता है? (P16-0052)
- कर्म भी ऐसे किए हैं... (P16-0107)
- मैं बेईमान होके ही जी रहा था, अब थोड़ा-थोड़ा ईमानदारी में आ रहा हूं। कई बार कुछ कर्म करने के बाद समझ आती है कि ऐसे नहीं, ऐसे करना चाहिए। (P16-0110)
- यह भी आपसे ही सीखा है कि हर कर्म का फल मुझे भोगना है। (P16-0114)
- तो फिर मानव बनता कब है? मानव का चोला तो मिल गया — अगर मैं इस चोले में रहकर अच्छे कर्म करूं तो क्या होगा? मैं मानव कब कहलाऊंगी? (P16-0134)
- अगर किसी मानव के अंदर तामसिक और राजसिक ऊर्जा जन्म-जन्मांतर के कर्मों से पहले से इकट्ठी होकर आ रही है, तो क्या उसे खत्म किया जा सकता है? (P16-0145)
- आदमी के कर्म और पूजा-पाठ में क्या अंतर है? कर्म सर्वोपरि है या पूजा-पाठ? (P16-0158)
- (लाइव) गुरुजी, अगर परमात्मा तक जाना है तो परमात्मा खुद क्यों नहीं मिला लेता अपने में? यह खेल क्यों रचा है कि हम कर्म करके तब उस तक जाएं? (P17-0001)
- योगी जी, आप कहते हैं ईमानदारी से जिएं ताकि नए बंधन न बंधें, और सत्कर्म करें ताकि पिछले कर्मों से उभरने में मदद मिले। लेकिन सत्कर्म भी हम अपने ही दिमाग से समझ लेते हैं — चींटियों को दाना डाल दिया, दरवाजे पर कोई आया तो भोजन करा दिया। तो सत्कर्म और क्या-क्या हो सकते हैं? (P17-0019)
- तो क्या आज से मैं जो भी कर्म करूं, उसके पीछे यही भाव बनाऊं कि इस कर्म का जो परिणाम मिलेगा, उसमें मुझे अपने लिए कुछ नहीं चाहिए? (P17-0024)
- गुरु जी, क्या जरूरत में जीने से भोगने की इच्छा समाप्त हो जाएगी — और नया नहीं बनेगा, पुराना छूट जाएगा? क्या ईमानदारी से कर्म करने पर कर्ज चुकता होता रहता है? (P17-0182)
- गुरु जी, अगर हम यहां से छूटने के लिए सत्कर्म कर रहे हैं, तो उसे निष्काम कर्म कैसे कहें? (P17-0198)
- गुरु जी, कहा जाता है कि नाम जप से मन पर ठहराव आता है — क्या नाम जप से विचार रुक जाते हैं और पिछले कर्म कटते हैं? (P18-0047)
- गुरु जी, क्या नाम जप से कर्म जल्दी भोगने को मिलता है? (P18-0050)
- गुरु जी, क्या अगले कर्म और पिछले कर्म होते हैं? और क्या ईमानदारी और नाम जप से प्रेम में रोमांचित होने से पिछले कर्म भस्म हो जाते हैं? (P18-0071)
- गुरु जी, भगवान कृष्ण गीता में जब यज्ञ की बात करते हैं, तो उसका क्या तात्पर्य है — क्या वे कर्मकांड वाले यज्ञ की बात कर रहे हैं? इसका आध्यात्मिक सत्य क्या है? (P18-0090)
- गुरु जी, आत्मा, जीव और कर्म का संबंध कैसे है? (P18-0098)
- गुरु जी, क्या प्रार्थना में ताकत होती है? कर्म करते हुए अच्छे मन से की हुई प्रार्थना फलित होती है? (P18-0101)
- गुरु जी, मैं अपने घर में काम करने वाले या कर्मचारी को तय पैसे देकर पूरी सच्चाई से व्यवहार करता हूं, लेकिन मुझे पता है कि उसकी क्षमता इससे ज्यादा है; उसे आगे बढ़ाऊं तो वह मेरे पास काम नहीं करेगा। क्या उसे वहीं तक सीमित रखना ईमानदारी है? (P18-0134)
- गुरु जी, क्या बेईमानी पिछले कई जन्मों के कर्मों-संस्कारों के साथ आती है, कि प्रारब्ध भुगतते समय हम बेहोशी में कुछ भी कर बैठते हैं? (P19-0017)
- गुरु जी, कर्मों की सजा कैसे मिलती है? क्या मृत्यु के बाद ही फैसला होता है कि कौन सी योनि मिलेगी? (P19-0018)
- गुरु जी, आत्मज्ञान के बाद कोई कर्म बंधन में नहीं बंधता — तो जो पहला शरीर निर्विकार होकर परमात्मा के सामने खड़ा था, वह फिर कर्म बंधन में कैसे बंध गया? (P19-0032)
- गुरु जी, किए हुए बुरे कर्मों को भुगतते हुए दुख कैसे भोगें? (P19-0040)
- गुरु जी, गीता पूरी पढ़ी — कृष्ण ने अर्जुन से आखिर में निष्काम कर्म करने को कहा, पर वह जीवन में समझ नहीं आया। निष्काम कर्म क्या है? (P19-0096)
- गुरु जी, कर्म के बारे में पढ़ा था कि विकर्म और अकर्म भी होते हैं। ये क्या हैं? (P19-0101)
- गुरु जी, आपको इतनी मेहनत और पीड़ा के बाद ज्ञान मिला और हमें सहज में मिल रहा है — क्या आपके कर्म हमसे बुरे थे? (P19-0165)
- गुरु जी, प्रारब्ध प्रबल होता है या कर्म? क्या कर्म से परमात्मा को पाया जा सकता है? (P19-0169)
- गुरु जी, कर्म खत्म होने के बाद साधना का क्रम क्या होता है? (P19-0170)
- गुरु जी, नवजात शिशु की चार दिन में मृत्यु हो जाए तो उसका कौन सा कर्म है? (P20-0032)
- गुरु जी, पूर्व जन्म के कर्म कैसे कटते हैं? (P20-0033)
- गुरु जी, जिसका कर्म सही है वह गाली क्यों सुने — सामने वाले को गलत सिद्ध क्यों न करे? (P20-0035)
- गुरु जी, पश्चिम केवल कर्म करके अमीर है पर वहां परिवार और शांति नहीं, और यहां केवल नाम-जप में गरीबी आ रही है — बीच का रास्ता क्या है? (P20-0049)
- गुरु जी, मैं कोई गलत काम नहीं करता, बस एक कर्म गलत होता है — उससे छुटकारा कैसे पाऊं? (P20-0065)
- गुरु जी, क्या पत्थर, पशु और वनस्पति भी कर्म भोगते हैं — किसी को पूजा जाता है, किसी को पीसा जाता है? (P20-0095)
- एक संसारी डेली रूटीन में अपने को देख भी नहीं पाता — उसे कर्म करते हुए "हर वक्त परीक्षा है" कैसे समझना चाहिए? (P20-0110)
- जब तक स्व नहीं मिलता, जरूरत में किया कर्म भी कर्म ही है, और स्व में गति है तो जहां दृष्टि डालेगा वहां कर्ता पद आ जाएगा — क्या कर्ता भाव बंद हो सकता है? (P21-0022)
- गुरु जी, कर्म तो मुझे देश-काल-परिस्थिति में अपनी जरूरत के लिए या किसी और के लिए करना ही पड़ेगा — तो मैं क्या करूं कि कर्ता का भाव और मेरा का भाव न बंधे? (P21-0054)
- गुरु जी, कर्मों का विधान क्या है? शास्त्र तीन कर्म बताते हैं — क्रियमाण, प्रारब्ध और संचित। (P21-0074)
- गुरु जी, देर से समझ आया कि यह कर्म भूमि है और पिता-पुत्र, भाई-बहन, रिश्तेदार — हम सब एक-दूसरे का उपयोग कर रहे हैं; मैं उपयोग कर रहा हूं तो मेरा भी उपयोग होना है। क्या यही हमारा संबंध है? (P21-0110)
- गुरु जी, कहते हैं नकारात्मक ऊर्जा और सकारात्मक ऊर्जा होती है, पर मैं सोचता हूं ऊर्जा तो सिर्फ ऊर्जा है, सात्विक — और जो ऊर्जा मुझे मिली है उसका आधार मेरे कर्म हैं। क्या ऐसा समझूं? (P21-0111)
- गुरु जी, संसार में किसी पद पर रहते हुए कर्मचारियों से काम लेना पड़ता है, समझाना-कहना पड़ता है — इसमें राग-द्वेष बनता है और वहां से बददुआ भी आती है; इसके लिए मार्गदर्शन करें। (P21-0112)
- गुरु जी, अगला शरीर हमारे अभी के कर्मों पर निर्भर होता है, और कहते हैं हम पशु-पक्षी जैसी बहुत सी योनियों से होकर मानव शरीर तक आए — तो पशु से मानव शरीर तक आने के लिए क्या लगता है? (P21-0133)
- गुरु जी, हमारी बीमारी, डिप्रेशन — क्या ये हमारे किसी दुख या कर्म के कारण होते हैं? (P21-0140)
- गुरु जी, शंकराचार्य जी ने कहा है कि सद्गुरु के वचनों का श्रवण और मनन करने से बुरे कर्मों का नाश हो जाता है — क्या ऐसा है? (P21-0162)
- गुरु जी, मुझे भवानी पर बहुत श्रद्धा थी। जब मेरे जीवन में, मेरी बेटी और मेरी नानी के साथ इतना उतार-चढ़ाव हुआ, तो मैंने भगवान को दोषी माना। बाद में लगा कि शायद मेरे कर्मों का फल है, शायद उसके भविष्य में कुछ अच्छा लिखा होगा — ऐसे अपने आप को समाधान दे रही हूं, लेकिन वो पहले जैसी भक्ति नहीं आ रही। क्या भगवान पर मेरा दोष देना ठीक है, और पहले जैसी भक्ति फिर कैसे उत्पन्न करूं? (P21-0178)
- गुरु जी, कर्म सिद्धांत और ज्ञान मार्ग — ये दोनों कैसे जुड़ते हैं, और कैसे हम आत्मज्ञान की तरफ चलें? (P21-0181)
- गुरु जी, मेरे इस शरीर से जो अच्छे-बुरे कर्म हो गए हैं, इन कर्मों का आत्मा के साथ कोई संबंध है? आत्मा तो ना मरने वाली है, परमात्मा का अंश है — तो क्या ये कर्म अगले जन्म में आत्मा के साथ जाते हैं? और चलाने वाला तो परमात्मा ही है ना? (P21-0198)
- गुरु जी, इससे ऐसा प्रतीत होता है कि जो जीव शरीर को चला रहा है उसी को निकाल दें, तो शरीर बेकार हो जाएगा, कुछ कर्म नहीं करेगा? (P22-0001)
- गुरु जी, शरीर को मरने के बाद जला देते हैं, आत्मा तो निरंतर है। बचपन से हमें डराया गया कि यमराज ले जाएगा — तो यमराज किसको ले जाता है? मुझे लगा कि वो हमारे कर्मों को ले जाता है, भगवान के सामने बताता है, और उसी से अगला जन्म होता है — क्या ये सही है? (P22-0005)
- गुरु जी, एक जन्म के किए गए कर्म की सजा दूसरे जन्म में क्यों मिलती है? (P22-0025)
- गुरु जी, क्या अपना कर्म अपने बच्चों को भोगना पड़ता है? (P22-0108)
- गुरु जी, आपने भोजन का पहला कौर उठाते ही याद आने पर हाथ धोकर पहले पिल्लों को खिचड़ी दी — वह कर्म था या सेवा? और लोग यह भी सिखाते हैं कि खाते समय उठना नहीं चाहिए। (P22-0115)
- गुरु जी, अक्सर लोग कहते हैं कि भगवान की कृपा से, या दर्शन करने की वजह से मेरा ये काम हो गया — सच में ईश्वर की कृपा से होता है या अपने कर्म से? (P22-0156)
- गुरु जी, आप कहते हैं "कर्म प्रधान विश्व करि राखा, जो जस करहि सो तस फल चाखा" और "होइहि सोइ जो राम रचि राखा" — क्या इन दोनों में विरोधाभास है? (P22-0157)
- गुरु जी, आत्मज्ञानी क्यों चाहते हैं कि सभी सुधर जाएं, जबकि भगवान नहीं चाहते कि सभी सुधरें — क्योंकि फिर उनके कर्मों का दंड कैसे मिलेगा? (P22-0183)
- तो इसका मतलब महाराज जी, फिर उसके दो पक्ष हो गए — एक तो उन्होंने कर्म को छोड़ दिया, और दूसरा जप को अपनाया? यानी पहले वाले को पूरी तरह करके, उसे अपना आधार बनाकर, तब वे दूसरे वाले की तरफ गए? (P23-0002)
- गुरु जी, कर्म का सिद्धांत क्या होता है — पिछला कैसे खत्म होता है और अगला कब बनता है? (P23-0015)
- गुरु जी, खत्म क्यों करना है अपने आपको? इस जन्म में आया हूं, तो कर्म के बिना तो रह नहीं सकते। (P23-0044)
- गुरु जी, कर्मों की बेईमानियां तो समझ में आईं कि कर्मों में कहां-कहां बेईमानियां होती हैं, कैसे होती हैं; पर हमारी जो पांच इंद्रियां हैं, उनसे हम जो बेईमानियां करते हैं वे कौन-कौन सी होती हैं? जरा उस पर विस्तार से बताइए। (P23-0047)
- गुरु जी, कलयुग का सबसे बुरा कर्म क्या है और सबसे पुण्य कर्म क्या है? (P23-0175)
- गुरु जी, आपने कहा कि ईमानदारी आगे का कर्म-बंधन नहीं बंधने देगी और सत्कर्म पिछले किए हुए कर्म को खत्म कर देगा। लेकिन कर्म अच्छा हो या बुरा, फलित होता ही है — तो क्या सत्कर्म भी फलित होगा? (P23-0185)
- गुरु जी, जब सब एक ही है, जैसे बल्ब की रोशनी सब जगह एक जैसी है, तो सब अलग-अलग कर्म क्यों भोग रहे हैं? (P24-0007)
- गुरु जी, फिर कर्म लागू किसके हुए — उस आत्मा के? (P24-0008)
- गुरु जी, क्या प्रारब्ध को पूरा भोगना पड़ता है, या कर्मफल भोगे बिना नष्ट भी हो जाते हैं? क्या ईश्वर भक्ति, नाम जप से प्रारब्ध के बुरे कर्मफल को बदला या नष्ट किया जा सकता है? (P24-0034)
- गुरु जी, जितने बुरे कर्म हमने पिछले जन्म में किए हैं, उन्हें सही करने के लिए ईमानदारी-सत्कर्म करें — तो क्या उन्हें भोगना भी पड़ेगा? (P24-0054)
- गुरु जी, आपने बताया था कि कर्म के पहले और कर्म के बाद जो भाव होता है, उससे निर्णय होता है। अब एक भाव उठा कि इस क्रिया को इस तरह करेंगे, पर स्थिति-परिस्थिति के हिसाब से वो क्रिया वैसी नहीं हो पा रही। तो क्या हम भाव में गिर गए? (P24-0185)
- गुरु जी, तो हमारे हाथ में सिर्फ कर्म को सचेतता से करना है — और अगला भाव भी हमारे हाथ में है कि नहीं? (P24-0186)
- गुरु जी, पृथ्वी पर मनुष्य ही एकमात्र जीव है जो आत्मा-परमात्मा के चक्कर में फंसा हुआ है। यदि एक व्यक्ति पूरी जिंदगी सही कर्म करते हुए बिता दे, तो क्या उसे किसी परमात्मा को जानने की जरूरत है? (P25-0034)
- गुरु जी, कर्म का सिद्धांत भी विस्तार से समझाने की कृपा करें। (P25-0047)
- गुरु जी, अगर पिछले जन्मों से यह जीवन ऐसा है, तो सबसे पहले जो इंसान आया उसका तो कोई पिछला कर्म था ही नहीं — फिर उसको क्यों भोगना पड़ा या जन्म लेना पड़ा? (P25-0060)
- गुरु जी, जो कर्म हम करते हैं उसका उसी समय भी तो प्रभाव होता है? जैसे मैं झूठ बोल रहा हूं तो उस समय भी अंदर जो ग्लानि है, दुख है, उसे भोग ही रहा हूं। (P25-0061)
- गुरु जी, एक तरफ आप कहते हैं कि कर्मों का बंधन है, जो किया उसे भोगना पड़ेगा; दूसरी तरफ कहते हैं कि उम्मीद से मुक्त हो जाओ तो अभी मुक्त हो सकते हो। तो वह बंधन कहां जाएगा? ये दोनों बातें विरोधी नहीं हैं? (P25-0062)
- गुरु जी, गलत काम करना तो दूर, सोचने से ही आत्मा तुरंत मना करती है और दुखी भी होती है, लेकिन हम लोभ-मोह के कारण आत्मा को इग्नोर कर देते हैं और गलत कर्म कर देते हैं। तो क्या उसका शारीरिक फल बाद में मिलता है? (P25-0103)
- गुरु जी, खराब कर्म करेंगे तो ध्यान लगेगा ही नहीं ना? बेईमानी में ध्यान नहीं लगता? (P25-0114)
- गुरु जी, आत्मज्ञानी पुरुष को भी पिछले किए कर्म का फल तो भोगना ही पड़ेगा — तो भोगते समय क्या उसे शारीरिक पीड़ा होती है? (P25-0150)
- गुरु जी, कर्म का जो सिद्धांत है, जो लेन-देन हो रहा है — आत्मज्ञानी जब देखता है कि शरीर भोग रहा है, तो वो कर्म किसका रहता है, उसका या शरीर का? कर्म तो उसका ही है ना? (P25-0152)
- गुरु जी, दुष्कर्म का फल कभी तुरंत मिलता है, कभी बाद में। अगर हम किसी को दुख दे रहे हैं, सता रहे हैं या उसके साथ बेईमानी कर रहे हैं, तो क्या अपना कर्म तो बना ही रहे हैं, साथ में उसका पाप कर्म भी अपने सिर पर ले रहे हैं? (P25-0155)
- गुरु जी, किसी ने जरूरत के भाव में आकर हमसे कुछ लिया और उसका गलत इस्तेमाल किया, तो क्या उससे हमारा कर्म खराब होगा? (P25-0169)
- क्या ज्यादा कपड़े रखने से पाप लग रहा है? क्या उसका कर्म भोगना पड़ेगा? (P25-0172)
- गुरु जी, ज्ञान, कर्म, भक्ति योग में बेस्ट कौन सा है? (P26-0066)
- गुरु जी, बुरे कर्मों का फल तो किसी भी साधक या मनुष्य के लिए भोगना जरूरी है, वरना प्राप्ति में दूरी हो सकती है? सोच यह भी रहती है कि माला जपेंगे, पूजा-पाठ करेंगे तो जो जोर का पड़ने वाला है वह धीमा पड़ेगा। (P26-0075)