शरीर — योगी गुरु जी के प्रश्नोत्तर
इस पृष्ठ पर “शरीर” विषय से जुड़े 219 प्रश्न हैं, जो जिज्ञासुओं ने सत्संग में योगी गुरु जी से पूछे। किसी प्रश्न पर क्लिक करके योगी गुरु जी का पूरा उत्तर उनके अपने शब्दों में पढ़ें, वीडियो के साथ।
- मैं आपके बताए सत्कर्म ईमानदारी से कर रहा हूं, पर मन काम-भोग के लिए परेशान करता है। शरीर से कर्म नहीं कर रहा, पर मन उधर रहता है। क्या करूं? (P1-0002)
- गुरु जी, डर किसे होता है — मन को या शरीर को? (P1-0067)
- गुरु जी, मैं शरीर को सुंदर बनाकर और ज्ञान के द्वारा मान-सम्मान, प्रभाव और नाम पाने की इच्छा में लिप्त हो गया हूं। छोड़ने का संकल्प लेता हूं, फिर वहीं चला जाता हूं, और करने के बाद दुख होता है। (P1-0071)
- लेकिन गुरु जी, जब तक शरीर रहेगा, कुछ न कुछ जरूरत तो रहेगी। (P1-0141)
- अभी विपरीत लिंग के शरीर के प्रति कुछ आकर्षण है। वह कैसे जाएगा? (P1-0145)
- क्या परम ज्ञान के दौरान पूरे शरीर में संवेदनाएं होती रहती हैं? (P2-0012)
- ‘निकल लो’ का क्या मतलब है? क्या उम्र पूरी होने से पहले (शरीर छोड़कर) निकलना है? (P2-0100)
- गुरु जी, जीवन में सब अच्छा लगता है, फिर भी आत्मज्ञान की प्यास है। दो बच्चों की जिम्मेदारी भी है, पर आपके साथ हर पल शरीर सहित रहना चाहती हूं। क्या करूं? (P2-0119)
- गुरु जी, प्रणाम। अपने शरीर का मोह कब खत्म होता है? (P2-0138)
- गुरु जी, मुझे एक अनुभव हुआ कि मैं द्रष्टा हूं और बाकी सब दृश्य है, मेरे अलावा कोई नहीं है। बहुत पीड़ा हो रही थी; मैं अपने शरीर को मरा हुआ महसूस कर रहा था। उस अनुभव ने मेरे भीतर मानवता, दया, करुणा को खत्म कर दिया। मार्गदर्शन कीजिए कि वह क्या था। (P2-0150)
- ज्ञान होने तक तो ये घाव बार-बार हरे हो जाते हैं; याद आते ही मन घृणा से भर जाता है और न चाहते हुए भी उनके लिए बद्दुआएं निकल जाती हैं। फिर डर लगता है कि इस द्वेष से मैंने फिर कर्म-बंधन बांध लिया। अगर ज्ञान से पहले शरीर छूट गया, तो क्या इस द्वेष के कारण मैं फिर उन्हीं के इर्द-गिर्द, उनके परिवार में पैदा हो जाऊंगा — वही चक्र, जिसे मैं तोड़ना चाहता हूं? (P2-0184)
- शरीर/मान-सम्मान में फंसकर आत्मिक कल्याण क्यों नहीं सोचते? (P3-0078)
- कर्म योनि और भोग योनि क्या है? मानव शरीर और अन्य जीवों के शरीर में क्या अंतर है? (P3-0098)
- (लाइव) आप तीन-चार घंटों तक कैसे बैठ सकते हो, शरीर कैसे साथ देता है? मेरा शरीर 30-40 मिनट स्थिर बैठने पर ही जवाब देने लगता है, एक-एक अंग दुखने लगता है। कोई उपाय बताइए। (P3-0140)
- (लाइव) ध्यान में सूक्ष्म शरीर का पता चलता है, यह पता चला कि मैं शरीर नहीं हूं। अब आत्म साक्षात्कार के लिए क्या करूं, गुरु जी? (P3-0142)
- (लाइव) क्या गुरु के शरीर त्यागने के बाद भी गुरु के वचनों पर चलने से नया साधक आत्मज्ञान को प्राप्त हो सकता है? (P3-0147)
- (वही साधक) आपने बताया कि धारणा को भी तोड़ना है, ध्यान से भी मुक्त होना है — धारणा, ध्यान, फिर समाधि, फिर तुम, फिर ब्रह्म। तो समाधि वाली स्थिति में कैसे पहुंचा जा सकता है, वो कब आती है? कितने दिन बाद आती है, कितनी देर रहती है? आत्मज्ञान का अनुभव और समाधि का अनुभव — दोनों अलग होते हैं या एक ही? और समाधि में शरीर का भान रहता है या नहीं? (P3-0191)
- (कुटिया में साधक) गुरु जी, आप परसों बोल रहे थे कि जब ये शरीर छोड़ के जाओगे तो कहां जाओगे, वो सोचो। मान लो मैं समझ लूं कि मैं परमात्मा के पास जाना चाहता हूं? (P3-0192)
- (लाइव) गुरु जी प्रणाम। क्या इस समय आत्मा अलग कार्य कर रही है और शरीर अलग कार्य कर रहा है? क्या ये दो चीजें अलग हैं? (P4-0007)
- (लाइव) गुरु जी प्रणाम। आत्मज्ञान होने पर क्या इस शरीर को और (अंदर की) आत्मा को अलग-अलग देख सकते हैं? (P4-0028)
- (लाइव) गुरुदेव, मुझे लगता है मेरा मन, माइंड और शरीर पर कोई नियंत्रण नहीं है। जिस चीज को भूलना चाहता हूं, वही चीज बार-बार याद आती है और बेचैन करती है, जबकि मैं किसी के साथ कोई पाप कर्म भी नहीं करता। (P4-0048)
- (कुटिया में साधक, उज्जैन से) मैं 2017 में घर से एक साल के लिए निकल गया था। ओशो की विधियां (डायनामिक मेडिटेशन आदि) बहुत ऊर्जा देती थीं, उसमें मैं घबरा गया, एकांत में डर भी लगता था, फिर वापस संसार में लौटा — ना संसार का रहा, ना सन्यास का। बेचैनी, चिंता, तनाव, अनिद्रा, फिर सिगरेट-शराब भी लगी; डॉक्टर की दवाइयों के बाद मेरा दिमाग सुन्न हो गया। बहुत प्रयास किए, कई जगह पूछा। अब दिमाग सुन्न पड़ा है, कोई भावना ही नहीं उठती, शरीर में ताकत भी नहीं बची — अब क्या करूं? (P4-0079)
- (लाइव) गुरु जी प्रणाम। भ्रमण आत्मज्ञान के बाद किया जाता है या पहले? और भ्रमण के दौरान 'कुछ नहीं चाहिए' का भाव बनाए रखें, पर भूख-प्यास लगे तो क्या तब भी यह 'कुछ नहीं चाहिए' होगा — क्योंकि वह अभी भी जीव है और शरीर से अपने आप को समझता है? (P4-0108)
- (वही साधक, पेंशनर) मैंने निरंतर नाम जाप भी किया, 18–20 घंटे सीताराम जपता था, फिर भी विचार नहीं बदले। फिर किसी के सत्संग से सांस पर ध्यान करना सीखा — वो कुछ समय के लिए काम करता है, शरीर के विकार भी सुधरते हैं, लेकिन परमानेंट नहीं। और आत्मिक चिंतन में आंख बंद करके क्या करना है? (P4-0134)
- (लाइव) गुरु जी नमन। आत्मा शरीर में रहती है या शरीर आत्मा के अंदर? (P4-0149)
- (कुटिया में साधिका) योगी जी, आप कहते हो कि सारी समस्या उम्मीद पर टिकी है, उम्मीद छोड़ दो। लेकिन मुझे तो किसी से कोई उम्मीद दिखाई ही नहीं देती, बचपन से मैंने अपने बलबूते पे किया है। मेरा भय यह है कि कभी शरीर में कोई बड़ी बीमारी आ जाए, बुद्धि काम ना करे, या प्रारब्ध इतना तगड़ा हो कि मेरी यात्रा ही ना हो पाए। तो मेरी सूक्ष्म से सूक्ष्म उम्मीद मुझे कैसे पता चले? मुझे तुरंत वाला मार्ग बता दो (वाल्मीकि की तरह बैठ जाऊं), ताकि जब तक मैं स्वस्थ हूं, समय बर्बाद ना हो। (P4-0155)
- (वही साधिका) जब हमने जांच लिया कि इनके मार्गदर्शन से मेरी यात्रा हो सकती है, और सरेंडर करके अनुसरण करने लगे — तब अनुसरण करते-करते अगर हमारे साथ कोई अनहोनी हो जाए, शरीर छूट जाए, तो क्या होगा? (P4-0157)
- (वही साधिका) मैंने गुरु जी से यह कहलवा लिया कि मेरे शरीर की सेवा की जिम्मेदारी भी वे लेंगे — मुझे तो पता भी नहीं था कि मैं ऐसा कर रही हूं। इससे मेरा कौन सा स्तर पता चलता है? और (बीमारी-मौत में) मेरा कौन करेगा? (P4-0164)
- (वही साधिका) सचेत रहने के लिए भी समझ विकसित करनी पड़ेगी — समझ ऐसे बोलने से नहीं बढ़ती। आज पता चला कि मेरा शरीर-भाव इतना गहरा है; अब शरीर-भाव से बाहर आने के लिए कैसा चिंतन करें? (P4-0170)
- (वही साधिका) आप (शरीर की सेवा का) सवाल मल-मूत्र और लकवे जैसी बीमारी तक क्यों ले गए? हर बुखार-खांसी में तो ऐसा नहीं होता। (P4-0181)
- (वही साधिका) जो गुरु भाई गुरु जी के शरीर के ज्यादा करीब रहते हैं, उन्हें अलग से कुछ मिलता है — तो क्या उनका अनुसरण करके हम जल्दी चल सकते हैं? (P4-0182)
- (कुटिया में आई एक साधिका, जो चार साल से इस रास्ते पर है) मैंने पढ़ा कि आत्मा को ना जाना जा सकता, ना देखा-सुना जा सकता, तो उसके बारे में बात करना व्यर्थ है; बात तो इस अहम की करनी है जो 'मैं' और 'मेरा' कहता है। जब तक यह शरीर है, अहम भी साथ है — तो इस अहम से कैसे बाहर निकलें? (P4-0188)
- (वही साधिका) मेरे एक मित्र कहते थे कि पत्नी के बिना नहीं रह सकते; पत्नी अचानक मर गई, और शव के पास ही वो पूछ रहे थे कि अब मेरी दूसरी शादी कैसे होगी। (क्या वो आत्मा यह सुनकर मुक्ति की तरफ बढ़ेगी?) और क्या पुनर्जन्म, सूक्ष्म शरीर वगैरह होता है? आचार्य प्रशांत जी कहते हैं कि शरीर मिट्टी से पैदा होकर मिट्टी में मिल जाता है, इसके बाद कुछ नहीं। (P4-0195)
- (संदर्भ: राजा भर्तृहरि की कथा) शरीर से छोड़ दिया पर मानसिक आसक्ति कैसे छूटे? त्याग क्या होता है? (P5-0028)
- मोक्ष क्या है? प्रतिक्रिया देने से राग-द्वेष कैसे? आत्मज्ञान के बाद शरीर-आत्मा? (P5-0043)
- शरीर की सेवा-इलाज (धाम पर ठीक होना) आत्मिक मार्ग में कहां फिट बैठता है? तंत्र-मंत्र से इलाज? (P5-0070)
- जब शरीर मरता है तब मनुष्य की क्या स्थिति होनी चाहिए? मन क्या है? (P5-0115)
- शरीर आराम मांगता है — सेवा में कैसे लगें? (P5-0137)
- ध्यान के लिए शरीर की पवित्रता जरूरी है? (P5-0151)
- ध्यान में सूक्ष्म शरीर बाहर निकलता है, दिल की धड़कन बढ़ती है, ऊंचाई से डर लगता है, आंखें खुल जाती हैं — मिटने का भय है। क्या करें? (P5-0156)
- वासना में मानसिक पाप और शरीर को नुकसान — क्या पाप लगता है? अपने शरीर को नुकसान देना पाप क्यों? (P5-0168)
- मरने के बाद मनुष्य शरीर दोबारा मिलता है? (P5-0173)
- स्त्री शरीर में सत्संग मार्ग पर चलना चाहे और शादी न करना चाहे तो अपराध/पाप तो नहीं? (P5-0185)
- आत्म चिंतन में शरीर में बहुत पीड़ा होती है — क्या करें? (P5-0200)
- अंगदान / शरीर दान / रक्तदान ठीक है? (P6-0004)
- इस शरीर में कर्म करके अगली योनि में परिणाम मिलता है? (P6-0005)
- पिछले शरीर का दर्द रह गया; बेसिक नेचर पुराना — कैसे काम करें? (P6-0022)
- शरीर की तीन अवस्थाएं बताई जाती हैं, जागृत, स्वप्न और सुषुप्ति। इस समय हम जागृत अवस्था में हैं, ऐसा कहा जाता है। जब स्वप्न में होते हैं तो उसे सच मान लेते हैं, पता ही नहीं रहता कि स्वप्न चल रहा है, जागृत की तरह लगता है। स्वप्न टूटते ही लगता है कि वह कुछ और था और अब कुछ और है। उसको अनुभव करने वाला कौन है? कई जगह जाकर सुना कि आत्मा है। अगर आत्मा का अनुभव एक बार हो गया, उस बिंदु को छू लिया, तो फिर दूसरों के दर जाने की क्या जरूरत? इससे तो लगता है कि आत्मा है ही नहीं। क्या हम रोबोट की तरह हैं, जिसमें मेमोरी फिट कर दी गई है, इनपुट डाल दिया गया है, और टेक्नोलॉजी से ऊपर का अनावश्यक ज्ञान दिया जा रहा है? इसे उदाहरण से स्पष्ट करें, ताकि सरलता से समझ आए और जीवन भर उस पर चला जा सके। स्वप्न तो ऐसे भी आते हैं जो इस जन्म की कामना नहीं लगते, ऐसे दृश्य, लोग और रूप जिनकी कल्पना भी नहीं हो सकती। (P6-0039)
- जब एक मिनट के लिए चुपचाप बैठ जाता हूं और शरीर से कोई कर्म नहीं कर रहा, तब भी विचार अपने आप अतीत में चले जाते हैं या भविष्य की कल्पना में। किसी ने गुस्सा दिलाया या चोट पहुंचाने की कोशिश की, एक मिनट में वह अतीत हो गया, और विचार अपने आप बनते चले जाते हैं। मैं कुछ नहीं कर रहा, मन क्रिया कर रहा है। अगर मैं कहूं कि मैं इसका दृष्टा हूं, तो यह भी धोखा लगता है, क्योंकि प्रश्न भी मन उठा रहा है और उत्तर भी मन दे रहा है। मन निमित्त है, तो प्रश्न कौन उठा रहा है? कई बार साइलेंट में बैठने पर अनुभव सा होने लगता है, फिर लगता है यह भी धोखा है, मन बार बार धोखा देता है। सृष्टि में आने के बाद से हम अपने आप को भूल गए, ऐसा लगता है। बोलने को शब्द नहीं मिलते। क्या शब्दों का सहारा लिया जाए, और बोला क्या जाए? (P6-0040)
- जीवात्मा का नाम इसलिए पड़ गया कि आत्मा ने जीव शरीर ग्रहण किया। कोई हृदय चक्र को आत्मा का निवास कहता है, कोई और जगह ध्यान करवाता है, कोई कपाल में बताता है। एक योगी का प्रैक्टिकल यह था कि आत्मा का शरीर में निवास स्थान नहीं है, सूरज की किरण की तरह केवल एक किरण पड़ रही है और शरीर क्रिया कर रहा है, आत्मा शरीर में है ही नहीं। इतनी बातें सुनकर उथल पुथल मचती है। असल में आत्मा कहां है? जब नाम ही नहीं दिया जा सकता तो मान लो क्यों कहा जाता है? मानना और जानना में मैं किस प्रक्रिया में हूं? मानने की अवधि कितनी है, और मांग के हिसाब से समय कितना लगता है? (P6-0041)
- किसी के सानिध्य में मानकर जानकारी मिली, फिर कुछ समय बाद लगा कि यह धोखा है, अभी अधूरा है, कहीं और सुनने से लगा कि पूरा होना बाकी है। फूल में खुशबू के साथ रस और ऊर्जा भी है, यह पहले नहीं जाना था। शरीर जल जाए तो ऊर्जा वहीं की वहीं रहती है। पहले भान था कि आत्मा शरीर के अंदर है, मैं आत्मा हूं। विवेक बढ़ने पर लगा कि अपने आप को आत्मा मान लेना भी धोखा है, क्योंकि किसी के कहने से माना है, प्रत्यक्ष नहीं हुआ। बोध कैसे होगा, कोई बताता नहीं। सन् दो हजार पांच से अलग अलग महात्माओं, साधुओं और संतों के पास रहा, गृहस्थ में रहा। उन्हें पूरा ज्ञान नहीं, ऐसा वे नहीं कहते। किसी और का ज्ञान सुनकर भीतर थोड़ा विवेक जागता है, जैसे नर्सरी से एलकेजी या फर्स्ट में आ गए, फिर लगता है अभी और बाकी है। कुछ समय तृप्ति रहती है, खिलौने जैसी, फिर खिलौना लगने लगता है। ऐसे निमित्त और अधूरे लगने वाले ज्ञान को कैसे देखें? (P6-0042)
- निर्विकार बहुत ऊंची अवस्था है। विकार है, तो कभी निर्विकार भी रहे होंगे, तभी विकार हटाने का प्रयास है। स्वप्न की बात हो चुकी। उसके बाद कारण अवस्था आती है, जिसमें शरीर को विश्राम मिलता है और मन को विश्राम मिलता है। वह अवस्था क्या है? उसमें जाकर इंसान सब कुछ भूल जाता है, ऐसा लगता है। हम भी उतनी ही जानकारी तक जाकर खड़े हो जाते हैं, जैसे रोबोट मेमोरी के बिंदु तक छूकर लौट आता है। कहने को जागृत है, पर जागृत भी धोखा लगता है। मैं प्रकृति का ही हिस्सा हूं, फिर अपने को और प्रकृति को अलग क्यों समझें? फूल का एक पत्ता समझ में आ जाए तो फूल समझ में आ जाए, पर इसी को समझ नहीं पा रहे। समझ शरीर के माध्यम से ही हुई, जहां जहां गए ज्ञान होता गया, अपनाते गए, सानिध्य में काम किया, समझ भीतर विकसित होती गई। फिर भी कारण अवस्था का उत्तर नहीं मिला, जब ऐसा हो जाता है कि कुछ रहा ही नहीं। क्या कारण से मुक्त होना निर्विकार है? (P6-0044)
- निर्विकार के इन साधनों में ब्रह्मचर्य का भी कुछ महत्व है या नहीं? भीतर विकार चलते रहें तो क्या अपने प्रति ईमानदार कहा जा सकता है? ईमानदारी अपना लेने के बाद भी पिछला विकार बहुत जमा है, उसे खत्म करने का क्या उपाय है? कर्म तो शरीर रहते होता ही रहेगा। अपने तरीके से चाहिए, यही चाहना भी बेईमानी है या नहीं? (P6-0049)
- प्रश्न पूछते पूछते जब उत्तर मिल चुके तो ध्यान एक पत्ते पर चला गया। हाथ पत्ता छूने लगा। लगा कि प्रकृति ने यह उदाहरण खुद खड़ा कर दिया, नहीं तो यह समझ पैदा ही नहीं होती। उस समय विचार नहीं उठा, आंख ने देखा और हाथ उधर चला गया। प्रतिदिन खाना खाते समय भी हाथ का निवाला अपने आप मुंह तक चला जाता है, शरीर से अपने आप। क्या बिना विचार के यह क्रिया हो जाती है? (P6-0052)
- नमन योगी जी। मैं अपनी स्थिति का जायजा कैसे लूं? अगर गहराई से जानना हो और जीवंत गुरु न मिले तो क्या करूं? महिलाएं ऐसा भ्रमण कैसे करेंगी? अगर मैं अपनी स्थिति घर पर ही जांचना चाहूं और कोई ऐसा गुरु न हो कि आज पहले अपने आप को समझूं, तो थोड़ा भी कैसे समझूं? क्या स्त्री शरीर या डर निकलने में बाधा बनता है? (P6-0055)
- गुरु जी प्रणाम। गड धरत बाटी से। आपका सत्संग बराबर सुनता हूं और आदत में सुधार भी हो रहा है। अब हमारा शरीर और मन सुस्त होने लगा है। यह किस तरह का लक्षण है? (P6-0057)
- मेरे अंदर अब संकल्प नहीं चलता। जहां होती हूं, वहीं उपस्थित होती हूं। यह कौन सी स्थिति है, आगे कितना बढ़ना है, और बैठते समय क्या करना चाहिए? तीन दिन तक आंख का दृश्य रहा, रीढ़ की हड्डी से रोशनी ऊपर चढ़ी, सहस्रार पर शिव दिखे, फिर आज्ञा चक्र से देवी-देवता निकलते रहे, और शरीर में ऊर्जा घूमती है। इनका क्या अर्थ है? क्या फिर से विराट स्वरूप वाली पुरानी स्थिति में लौटना चाहिए? (P6-0078)
- अगर एक व्यक्ति केवल फोटो लगाकर माला जपे और दूसरा काम में हाथ बंटाए, तो प्रसन्नता किस पर होगी? शरीर मिल जाने से ही क्या मनुष्य हो गए? मानव और जानवर में क्या अंतर है, और बेईमानी से फंसे हुए को छुटकारा कैसे मिलता है? (P6-0079)
- हरियाणा से आई बहन साधना में लगातार बैठने से पैर और शरीर के दर्द में बहुत परेशान थी। कहा गया था, या तो बैठो या चली जाओ, उसके बाद दर्द चला गया। साधना में दर्द और पीड़ा को कैसे देखें? गुरु कठोर क्यों होता है? शरीर, धन और समझ की ताकत को संचित करें या कहां लगाएं? (P6-0101)
- यू ट्यूब पर देखा था कि फोन पर भी शरीर की बीमारी का इलाज करते थे। वह इलाज अब क्यों छोड़ दिया? (P6-0104)
- क्या मन ऐसा है जैसे पिक्चर हॉल में पर्दा दिखाई देता है? क्या मन द्वारा जीवात्मा इस संसार और शरीर को व्यक्त करती है? अंग सुन्न या पैरालाइज होने पर चेतना रहती है या मन वहां नहीं जाता, और शरीर का भान कैसे होता है? (P6-0126)
- मन और दिमाग, या ब्रेन, में क्या फर्क है? हमें बताया गया कि ब्रेन से हम शरीर को फील करते हैं और ब्रेन में सिग्नल जाते हैं। क्या मन केवल शरीर की जरूरत बताता है या स्मृति का भी सहायक है? क्या मन नौकर है या सहायक? शरीर के इशारों के साथ साधक को क्या करना चाहिए? (P6-0129)
- जब से हम जीवात्मा बने हैं, तब से मन हमारे साथ है। मन इस शरीर में रहा है, चाहे हम इंसान में रहे हों या किसी दूसरे जीव-जानवर में। क्या मन जन्म-जन्म से हमारे साथ है? (P6-0136)
- बार बार तबीयत खराब होती है। शरीर स्वस्थ रहे, उसके लिए क्या करना चाहिए? (P6-0177)
- बलदेव राम पूछते हैं, मेरे अंदर दुखी कौन है? मैं, मेरा शरीर, या जीव? (P6-0185)
- क्या सूक्ष्म शरीर होता है? स्वप्न में जाते हैं तो कुछ हो जाता है, और स्थूल शरीर पर भी उसका प्रभाव आता है। यह कैसे है? (P7-0005)
- व्यवहार में बाहर की चीजों से संबंध कैसे बनता है? श्मशान में लाश जलती देखकर नमकीन कैसे खाई जाती है? भोजन का संबंध शरीर के लिए है या अपने लिए? जरूरत में जीने पर संबंध होते हुए भी संबंध क्यों नहीं रहता? (P7-0016)
- इस मानव शरीर में आए हैं, तो कुछ न कुछ कर्म करना ही है। वो मजबूरी नहीं, जरूरत है। कर्म करते हुए अपनी समझ से देखना है कि समाज के लिए, हमारे लिए, और परिवार के लिए क्या हित है, वही करना है। इस जीवन को लगाना कहां है, और सदुपयोग कैसे हो? (P7-0081)
- दो दिन ऐसे किया तो कैसे चलेगा, भोजन कम है, चक्कर आते हैं। घर पर मंगलवार का व्रत रहता था, आज नहीं लिया। शरीर को सहने के लिए थोड़ा काढ़ा ले लें, सुबह वाला काढ़ा पी लें, तो क्या ठीक है? गर्मी में काढ़ा बनाने से मना था, फिर भी क्यों बनाया गया, और सबने क्यों पिया? (P7-0086)
- शरीर को कैसे स्वस्थ रखें, ताकि जहां धन नहीं, शारीरिक बल चाहिए, वहां सेवा कर सकें? दिनचर्या और खानपान कैसा हो? जोड़ों का दर्द उम्र के साथ हो रहा है। और कहीं सहयोग दें तो क्या देखें? पारदर्शिता कहां हो? (P7-0093)
- सत्य पूछते हैं, गुरु जी, जड़ और चेतन क्या है? शरीर, मन, बुद्धि, चित्त जड़ हैं या चेतन? (P7-0107)
- क्या हम वास्तव में जीवित मनुष्य हैं, या हम केवल उस मानसिक पशु के खोल में कैद हैं, जो विवेक से शून्य हो चुका है, और जिसे अब एक शरीर से दूसरे शरीर में जाने का इंतजार है? यदि मुनि भी भ्रष्ट हो जाए, तो मुक्ति का हिसाब कौन करेगा? (P7-0127)
- हम दुष्कर्म और अंदर आने वाले विचारों से निकलना चाहते हैं, पर पैर-पैर पर गिरते हैं। ग्रंथों में पढ़ा है कि गुरु हमारे किए हुए सारे कर्म काट देगा और हमें सच्चे मार्ग पर चलाएगा। हमसे बन नहीं पा रहा, इसीलिए गुरु की जरूरत है। हम क्या करें, जब हमसे हो ही नहीं रहा? गुरु किसे मानें, शरीर को या शब्द को? और जब गलत काम होने लगता है, तो क्या वहां गुरु अपनी पावर से हमें हटा लेगा? रस में ऐसे लिप्त हो जाते हैं कि लगता है बुद्धि काम ही नहीं करती। (P7-0142)
- संयम का मतलब क्या है? लोग कहते हैं संयम रखो। क्या यह शरीर से संबंधित है, या धैर्य है? संयम मानसिक है, या शरीर और मन दोनों से? एक बार अहंकार आहत हो जाए, तो हम जैसे लोग पीछे हट जाते हैं। उस वक्त संयम कैसे रखें? (P7-0162)
- मैं स्थूल शरीर और अंतःकरण से शांतिपूर्वक ढंग से एक घंटा भी नहीं बैठ पाता। क्या करूं? (P8-0009)
- शरीर टूट रहा है। बेचैनी होती है। सोचता हूं इलाज करा के वापस आ जाऊं। क्या नियम छोड़कर जाऊं? (P8-0045)
- यह बात मनुष्य शरीर के लिए है या औरों के लिए भी? क्या अगला शरीर भी मनुष्य का ही मिलेगा, या दूसरा शरीर मिलेगा? (P8-0094)
- शरीर के शुद्धिकरण के लिए क्या-क्या तरीका है? (P8-0141)
- शरीर को कर्मों का भोग आता है। उसे भोगना चाहिए क्या, या नहीं भोगना चाहिए? (P8-0192)
- शरीर भाव से कैसे मुक्त हों? (P9-0005)
- गुरुदेव, फकीर का शरीर में रहना मुश्किल हो जाता है। आत्मज्ञान के बाद कुछ भी नहीं रहता। आप कैसे रहते हो? (P9-0064)
- यदि व्यक्ति भोग, भोजन, बेईमानी और दुष्कर्म में ही अपना जीवन खत्म कर दे, तो क्या अगला शरीर उसे पशु का मिलेगा? (P9-0074)
- कुछ गुरु सत्संग के समय बीच में चाय, कॉफी या दूध लेते हैं। आप सात घंटे के सत्संग में भी पानी तक लेने को समय की बर्बादी समझते हैं। क्या आत्मज्ञान के बाद भी शरीर को इतना कष्ट देना चाहिए? (P9-0158)
- साधक और जिज्ञासु एक बार में साधना में नहीं बैठते। जब बैठते हैं तो शरीर खुजलाने लगता है, रीढ़ और कमर दुखने लगती है, और कहते हैं कि मैं विचलित हो रहा हूं, घुटन हो रही है, बेचैनी हो रही है, समझ नहीं आ रहा। जब प्रपंच और रसपान में रहते हैं तब कोई दिक्कत नहीं होती। यह क्या हाल है? (P10-0006)
- महाराज जी, प्रेम चाहिए। प्रेम सदा के लिए इस शरीर में नहीं मिलता। शरीर छोड़ने के बाद आदमी कहां जाता है? (P10-0050)
- गुरुदेव, मैं एक महीने से नियमित साधना और ध्यान कर रहा हूं। इस दौरान मेरी रीढ़ की हड्डी में बिजली जैसी गर्माहट और शरीर में चींटियां चलने का निरंतर अनुभव हो रहा है। कृपया मार्गदर्शन करें। (P10-0190)
- अगर मैं (पुरुष) होती, तो कब का घर छोड़ के भाग जाती। (महिला शरीर में समाज का डर लगता है।) (P11-0005)
- मेरा शरीर विकलांग है, इसलिए (कुटिया) आ नहीं सकती, पर आने का बहुत भाव है। कृपा कर दीजिए। (P11-0037)
- "मन मरा ना माया मरी, मर-मर गया शरीर; आशा तृष्णा ना मरी, कह गए दास कबीर" — आप अपने वक्तव्य में समझाएं। (P11-0078)
- उस स्थिति में क्या अपना और शरीर का पता रहता है? (P11-0108)
- इस शरीर से अलग कैसे हो सकते हैं? (P11-0156)
- सत्संग से इतना समझ आ रहा है कि मैं शरीर और मन नहीं हूं — शरीर माता-पिता और पोषण से बना, मन बाहरी जानकारियों से। फिर इनके बिना भी क्या मैं कुछ हूं? इस पर अब जिज्ञासा टिक रही है। (P11-0158)
- जिंदगी में हमें जो भी मिलता है — इंसान से लेकर कोई भी जीव — क्या वह लेनदेन के कारण है? और क्या आध्यात्मिक ज्ञान के बाद मनुष्य अपनी मर्जी से शरीर त्याग सकता है? (P11-0164)
- घर से निकलने के बाद शरीर से तो भाग लेते हैं, पर गृहस्थ के 20-50 साल का राग-द्वेष, यादें साथ चलती रहती हैं। वैराग्य कैसे हो? (P11-0167)
- सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर क्या होता है? (P12-0001)
- यदि मैं योग निद्रा द्वारा शरीर को नींद में जाते हुए दृष्टा भाव से देख पाऊं, तो क्या आत्मज्ञान हो जाएगा? (P12-0015)
- जिससे हम मुक्त होने वाले होते हैं, क्या वह अंत में पीड़ा देता है — चाहे कोई वस्तु हो, व्यक्ति हो, मन हो या शरीर? क्या यह बात ठीक है या मेरा भ्रम है? (P12-0035)
- आपकी वाणी से मुझे बहुत ऊर्जा मिलती है। मैं इसी तरह निकल जाना चाहती हूं; ऐसा लगता है कि जगत से कुछ नहीं चाहिए, फिर भी कभी-कभी शरीर का मोह आ जाता है। यह कब खत्म होगा? (P12-0063)
- शरीर भाव से बाहर कैसे निकलें? दर्द तो शरीर में ही होता है, और ऐसा कोई शरीर मैंने आज तक नहीं देखा जो बिना चेतना के हो। (P12-0073)
- शरीर में दर्द कौन-से कर्मों का परिणाम है, और अंतःकरण में पीड़ा किस प्रकार के कर्मों का परिणाम है? (P12-0086)
- सेवा से समय मिलने पर अपने स्वरूप में ध्यान करना हो, तो शरीर में किस स्थान पर ध्यान करना चाहिए — हृदय, आज्ञा चक्र, सहस्रार आदि? (P12-0087)
- आपने बताया कि मन शरीर के लिए कार्य करता है। इस मन का प्रयोग हम अच्छे से कैसे कर सकते हैं? (P12-0088)
- पुराने संस्कार मुझे खींचते हैं, एक झटके में इतनी तगड़ी याद आती है कि लगता है ज्ञान धरा का धरा रह गया; अहंकार पर चोट लगती है तो लगता है यहां से भाग जाऊं। मैं शरीर से तो नहीं जाऊंगी, लेकिन उस मानसिक पीड़ा के समय मैं कौन सा मंत्र या बात याद रखूं कि मुझे निकलना है? और ये चीजें कितने दिन तक काम करती हैं? (P12-0131)
- शरीर को तो मैं रोक लूंगी कि नहीं जाऊंगी — सुबह तेज याद आई, शाम तक ढल गई, क्या पता रात को सपने में आ जाए। तो क्या आपका बस यही कहना है कि तुम कहीं हिलो मत; खाली साधना-स्थली में बैठे भी रहोगे तो भी वो कम हो रहा है? क्या अपने आप को रोक रखना भी साधना है? (P12-0132)
- गुरु जी, जैसा आप बोलते हैं कि शरीर छूटेगा तब पता चलेगा — मुझे तो कभी-कभी मौत का इंतजार हो जाता है कि जिस दिन मौत आएगी उस दिन पता तो चलेगा कि सच में सब कुछ होता है या हम ऐसे ही (जी रहे हैं)। (P12-0170)
- क्या कृष्ण भगवान हैं? क्योंकि वह तो मानव थे, मानव शरीर में। (P13-0027)
- गुरु जी, आपने कहा कि गुरु शरीर नहीं है, गुरु ज्ञान है। मेरे जीवन में कई संत-महापुरुष आए; आपसे पहले संत हरपाल सिंह जी को भी सुनता हूं, वे भी बिल्कुल आप जैसा बोलते हैं। तो मैं यह समझता हूं कि मेरा गुरु दो शरीरों में मुझे ज्ञान दे रहा है — कभी भटकता हूं तो आप पकड़ लेते हो, कभी वे। (P13-0041)
- शरीर की मृत्यु के बाद आत्मा कहां और कैसे रहेगी? (P13-0052)
- महाराज, आप कह रहे हो कि इसी में ढूंढ लो परमात्मा को, पर हमें तो उसकी जरूरत ही नहीं लगती — हम तो पैसे, गाड़ियां, बंगले ढूंढेंगे। और शरीर व आजीविका चलाने के लिए संसार में दूसरों से व्यवहार भी तो करना है। तो परमात्मा को क्यों ढूंढें? (P13-0163)
- गुरु जी, कुछ साधु खड़े-खड़े तपते हैं, उनके शरीर में कीड़े पड़ जाते हैं — वो किस भाव से तपते हैं? (P14-0034)
- गुरु जी, बाहर के पिंडों से मुक्त होने पर आत्मज्ञान होगा, और अपने शरीर से आसक्ति हटने पर ब्रह्मज्ञान — ये सही समझा? (P14-0041)
- गुरु जी, ध्यान कौन करता है — मन, शरीर या जीव? (P14-0088)
- गुरु जी, मेरा ज्ञान तो नकारात्मक है — नेति-नेति द्वारा यही ज्ञान होता है कि शरीर, मन, बुद्धि, अहंकार मैं नहीं; कोई आकार, गुण, इच्छा स्थाई नहीं; कर्ता भ्रम है, माया मात्र है। (P14-0104)
- गुरु जी, प्रपंच में, संसार-गृहस्थ में रहकर परमार्थ प्राप्ति आसान नहीं लगती। मेरे प्रयास तप-योग द्वारा चालू हैं, लेकिन गलत आदतों से शरीर खराब हुआ है, अब साथ नहीं देता — मजबूत कैसे करें? (P14-0112)
- "कुछ नहीं चाहिए" का मतलब क्या है? जो भी चाहिए बस शरीर के लिए चाहिए, तो शरीर के साथ क्या करें? (P14-0144)
- गुरुदेव, आपको ठंड महसूस नहीं होती? आपने शरीर को ऐसा कैसे बनाया है? (P14-0145)
- आप शरीर को स्वच्छ रखने की बात कर रहे थे — आप कैसे गंदे होते हो जब आप शरीर ही नहीं हो? (P14-0153)
- आजकल कुछ ड्रग्स भी आते हैं जो शरीर को भूल जाने में मदद करते हैं? (P14-0159)
- निर्दोष लोगों को कैसे न्याय मिले? उम्मीद छोड़ता हूँ तो शरीर असमर्थ हो जाता है। (P15-0033)
- उम्र के साथ शरीर और बुद्धि भी कमजोर हो जाती है, फिर कोई व्यक्ति आत्मनिर्भर कैसे रह सकता है? (P15-0035)
- शरीर में अगर आंतरिक विकार हो जाएँ तो क्या वो ठीक हो जाते हैं? (P15-0038)
- हम शरीर नहीं हैं, आत्मा हैं — कैसे जानें? (P15-0072)
- गीता में श्री कृष्ण कहते हैं आत्मा स्थिर है, कहीं आती-जाती नहीं; तो शरीर में आवागमन कौन करता है? जीवात्मा में ऐसा क्या रह जाता है जो आवागमन करता रहता है? (P15-0090)
- अगर आत्मा भगवान है तो फिर शरीर क्या है? (P15-0110)
- मेरे भगवान, मैं मन को शरीर रूपी रथ का घोड़ा मानता था, लेकिन आपने बताया कि घोड़ा मन नहीं है, मैं हूं — मिला-जुला के सब कुछ आप ही हो? (P15-0120)
- मन के इस जाल में से कैसे बाहर निकलना है? शरीर को जो आदतें लग गई हैं? (P15-0143)
- गुरु जी, क्या जीवन के सभी रस खत्म होने पर शरीर का भी त्याग करना पड़ता है? हमने कई सत्संग में सुना है कि अंत में शरीर का होना भी बंधन है। (P15-0147)
- मन और शरीर की गति एक जैसी नहीं है, फिर भी दोनों के बीच समन्वय कैसे बनेगा? (P15-0149)
- मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार — ये अंतःकरण में, शरीर में कहां रहते हैं? कोई कहता है यह शरीर ही मन है — क्या यह सही है? (P15-0150)
- गुरु जी, यह तो समझ में आ गया कि बेईमानी बंधन है, और इसी शरीर में बेईमानी का कर्मफल भोगना पड़ता है। तो अगर 40 वर्ष तक बेईमानी की है, तो क्या फल भोगने में भी उतना ही समय लगेगा? (P15-0167)
- भगवान, जब सत्संग सुनते हैं तब अपने आप में रहते हैं; जैसे ही सुनना बंद करते हैं, शरीर भाव में आ जाते हैं। क्या करें कि सदैव अपने आप में बने रहें? और एक तरफ खुशी, फिर रोना क्यों आता है? (P15-0172)
- गुरुदेव, अब तो कमर अकड़ गई, बैठा भी नहीं जाएगा — यह शरीर बोल रहा है कि मन? और जैसे अभी इतने प्रश्न चल रहे थे, मुझे बाथरूम आ रही थी, मन बोल रहा था कि बाथरूम करके आओ, पर अंदर से आवाज आई कि नहीं, प्रश्नोत्तर चल रहे हैं, ये जरूरी है। (P15-0187)
- शरीर में दर्द उठता है तो हमें क्यों दर्द होता है? (P15-0193)
- शरीर के सुख-दुख से ऊपर जाने की क्रिया क्या है? (P15-0194)
- गुरुदेव, सबकी शरीर की स्थिति अलग-अलग है, सबकी मनोदशा अलग है — फिर आप कैसे कह सकते हैं कि एक रोटी पे सबका शरीर एक जैसा होगा? (P15-0195)
- गुरु जी, मुझे लगता है कि मुझे आत्मज्ञान हो गया है, पर मेरा शरीर-मन यह मानने को तैयार नहीं है। क्या करूं? मार्गदर्शन कीजिए। (P16-0081)
- आरुणि की कहानी में गुरु ने उसे बांध लगाने भेजा, वह पूरी रात खुद को पानी के आगे रखकर पड़ा रहा, शरीर नीला पड़ गया, और उसके बाद उसे आत्मज्ञान हुआ। उसे आत्मज्ञान नहीं था, लेकिन गुरु वाक्य ने उसकी पात्रता को जगाया। तो उसे ज्ञान क्यों हुआ? (P16-0102)
- गुरुदेव, मानव जीवन की कीमत क्या है, उपयोगिता क्या है? मतलब जो शरीर हमें मिला है, इस शरीर की उपयोगिता क्या है? (P16-0121)
- हर जीव अपने प्राण क्यों बचाना चाहता है? बहुत लोग 100 वर्ष के ऊपर चले जाते हैं; एक बूढ़ी अम्मा कह रही थीं कि अब तो सिर्फ मौत का इंतजार है, बस शरीर जल्दी छूटे और दर्द ना हो — फिर भी मौत का डर है। एक चींटी को भी मारूं तो वह भी प्राणों की रक्षा करती है। आखिर यह डर किस चीज का है? (P16-0135)
- पांच तत्वों से जो यह शरीर बना है, उठते-बैठते हम सारी चीजों का उपभोग कर रहे हैं — पानी पी रहे हैं, अग्नि से खाना बना रहे हैं। तो क्या इनका भी कोई ऋण हमारे ऊपर चढ़ रहा है? मां का दूध, गाय-भैंस का दूध — इनके बगैर हमारा जीवन नहीं चलता, तो इनका ऋण है? (P16-0155)
- (लाइव) जब हम शरीर छोड़कर कहीं भी जाएं, ऐसी शुद्ध अवस्था कैसे प्राप्त कर सकते हैं? (P16-0168)
- (लाइव) गुरु जी, लाइव आकर बात करने से आपके शरीर को कितनी तकलीफ होती है? (P16-0171)
- आजकल के प्रेमी-प्रेमिका भी यही बोलते हैं कि मुझे तेरे शरीर से कोई मतलब नहीं, मैं बस तुझसे प्यार करता हूं — शब्द वही के वही हैं, भाव एकदम से पकड़ में नहीं आता। यूथ इससे बहुत जूझ रहा है, तो कैसे पहचानें? (P16-0176)
- योगी जी, अगर तुलसीदास जी को आत्मीय लगाव था, तो क्या उन्हें यह नहीं सोचना चाहिए था कि मैं जिस जीवात्मा से प्रेम करता हूं उसका अब क्या होगा? वे साथ रहकर भी तो पक्का कर सकते थे कि तुझे भ्रम है, मैं तेरे शरीर के लिए नहीं आया। (P16-0178)
- (लाइव) गुरुजी, क्या आत्मा हमारे शरीर के अंदर उपस्थित है, या यह सिर्फ बताने के लिए कहा जाता है? (P16-0193)
- योगी जी, आप कहते हो दो ही रास्ते हैं — शरीर के लिए जी लो, जिसकी जरूरतें बहुत जल्दी पूरी हो सकती हैं, या आत्म-कल्याण। तो इस दूसरे रास्ते की तरफ हम पूरे वेग के साथ क्यों नहीं बढ़ पाते? (P17-0011)
- आपने बताया कि कुटिया से पहले लोग आपको लाखों देना चाहते थे पर आपने नहीं लिया। मैंने तो पैसे को इतनी वैल्यू दी क्योंकि वो शरीर को सुख-सुविधा देता है और मेरा मान बढ़ाता है — पेट भर जाए तो बचे में मान खड़ा कर लूं। और आप 15-16 साल की उम्र में घर से निकले, एक कपड़े में फक्कड़ संन्यासी की तरह रहे, आपका कोई गुरु भी नहीं रहा। तो मैं ये बात अपने स्वभाव में लाना चाहूं तो शुरुआत कैसे करूं — क्या मैं भी सब कुछ छोड़ के एक कपड़े में रहूं? (P17-0022)
- आपका भाव रहता था कि मैं जो भी कर रहा हूं — खाना, सोना, रोना, बात करना — मैं अपने लक्ष्य की तरफ ही पहुंच रहा हूं। तो अगर हम पथिक भी अपनी पूरी दिनचर्या में, ईमानदारी और सत्कर्म करते हुए, ये भाव रखें कि जो कुछ मेरे शरीर से, मन से, कल्पना में, डर में हो रहा है, उसका निचोड़ यही है कि मैं अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ रहा हूं, कि मेरा गुरु देख रहा है — तो ये मेरे लिए कितना कारगर होगा? (P17-0023)
- गुरु जी, इस शरीर को छोड़ने के बाद की यात्रा के बारे में कुछ बता सकते हैं? (P17-0037)
- गुरु जी, सबको अलग-अलग धन, शरीर, रूप और बुद्धि का स्तर क्यों मिला है? (P17-0066)
- गुरु जी, आईने में अपना चेहरा तो शरीर का दर्शन है — असली आत्मदर्शन कैसे हो, उसका सरल मार्ग बताइए। इसमें गुरु की क्या भूमिका है? (P17-0105)
- गुरु जी, आप कहते हैं इस शरीर को साधो — इसका क्या मतलब है? (P17-0155)
- गुरु जी, क्या आत्मज्ञान होने के बाद शरीर के कष्ट का अनुभव होता है? (P18-0076)
- गुरु जी, आत्मा शरीर के अंदर है या बाहर? क्या आत्मा ही परमात्मा है? (P18-0093)
- गुरु जी, हमारे शरीर में और दुनिया में रोज करोड़ों जन्म-मृत्यु हो रहे हैं, पर हमें फिक्र सिर्फ अपने लोगों की होती है — ऐसा क्यों? अपने बेटे के लिए सब लगा देते हैं, पड़ोसी के बेटे के लिए नहीं। (P18-0143)
- गुरु जी, शरीर में भोग-भोजन दोनों हो रहे हैं, हम क्या छोड़ सकते हैं, कहां भागेंगे — तो क्या यही स्वीकार भाव रखना है कि जो हो रहा है उसे देखना है? कृपया प्रकाश डालें। (P18-0151)
- गुरु जी, जो शरीर से, बुद्धि से या पैसे से बलवान है, उससे हमें भय क्यों लगता है? (P18-0158)
- गुरु जी, विचार सूक्ष्म हो जाने से क्या होता है? और आत्मज्ञान के बाद शरीर, मन और अंतःकरण में कैसे परिवर्तन आते हैं? (P18-0169)
- गुरु जी, कहते हैं शरीर जड़ है — फिर इसी शरीर के द्वारा साध्य तक कैसे पहुंचा जा सकता है? (P19-0031)
- गुरु जी, आत्मज्ञान के बाद कोई कर्म बंधन में नहीं बंधता — तो जो पहला शरीर निर्विकार होकर परमात्मा के सामने खड़ा था, वह फिर कर्म बंधन में कैसे बंध गया? (P19-0032)
- गुरु जी, कुछ वीडियो में दिखाते हैं कि शरीर से आत्मा धुएं की तरह निकलती दिखती है, किसी ने आत्मा का वजन 21 ग्राम बताया — क्या आत्मा देखी जा सकती है? (P19-0034)
- गुरु जी, कबीर साहब ने कहा "मन मरा ना माया मरी, मर मर गया शरीर; आशा तृष्णा ना मरी" — यानी मन नहीं मरेगा तब तक विकार नहीं जाएंगे। आप कहते हैं मन है — तो क्या ज्ञान के बाद मन कमजोर हो जाता है? (P19-0038)
- गुरु जी, आपने कहा "गुरु शब्द है" — इसे खोलकर समझाएं। जिनके गुरु का शरीर नहीं रहा या जो गुरु से मिल नहीं पा रहे, वे क्या करें? (P19-0044)
- गुरु जी, मेरे पास ना शरीर की ताकत ना पैसा — निकलना चाहूं कैसे? (P19-0079)
- गुरु जी, अब मुक्ति-मोक्ष दे दो — जवानी में ऊर्जा गंवा दी, शरीर की ताकत नहीं। (P19-0081)
- गुरु जी, आपने कहा आत्मज्ञान के बाद ही असली यात्रा शुरू होती है। तो अगर आत्मज्ञान के बाद शरीर छूट गया, तो क्या उस यात्रा के लिए दूसरा जन्म होगा? (P19-0100)
- गुरु जी, आपका शरीर टिकेगा तो और लोगों का भला होगा। फिर आप समय पर खाना-पानी क्यों नहीं लेते? (P19-0115)
- गुरु जी, शरीर अपने आप चल रहा है यह समझ आया, पर शरीर और चलाने वाले को अलग नहीं देख पाता — क्या करूं? (P20-0009)
- गुरु जी, बहुत गुरु कहते हैं भीतर जाओ — भीतर जाने का असली अर्थ क्या है? ध्यान शरीर के भीतर लगाना है या बाहर? (P20-0044)
- आप अपने शरीर का ख्याल क्यों नहीं रखते — 13 साल में शरीर की ऐसी हालत क्यों? (P20-0138)
- आप कहते हैं इस दुनिया में दोबारा नहीं आना — पर इस दुनिया में आने के लिए शरीर क्यों लेना पड़ता है? (P21-0035)
- गुरु जी, कृपया कोई ऐसा तरीका बताइए कि शरीर भाव और जीव भाव से परे होकर आपकी तरह अभय जीवन जिया जाए। (P21-0065)
- गुरु जी, अगला शरीर हमारे अभी के कर्मों पर निर्भर होता है, और कहते हैं हम पशु-पक्षी जैसी बहुत सी योनियों से होकर मानव शरीर तक आए — तो पशु से मानव शरीर तक आने के लिए क्या लगता है? (P21-0133)
- गुरु जी, मेरे दो प्रश्न हैं — पहला, अहंकार और शरीर ही मेरी पहचान है, तो अपनी असली पहचान समझने का मकसद क्या है? दूसरा, यहां जितने लोग जमा हैं ज्यादातर बुजुर्ग हैं; सबने आज तक घर-परिवार चलाया, पर परिवार के सदस्य अपनी मनमानी करके चले गए — तो ऐसे लोगों को पालने का क्या मतलब? (P21-0190)
- गुरु जी, मेरे इस शरीर से जो अच्छे-बुरे कर्म हो गए हैं, इन कर्मों का आत्मा के साथ कोई संबंध है? आत्मा तो ना मरने वाली है, परमात्मा का अंश है — तो क्या ये कर्म अगले जन्म में आत्मा के साथ जाते हैं? और चलाने वाला तो परमात्मा ही है ना? (P21-0198)
- गुरु जी, अगर जीव चला गया तो शरीर काम नहीं करेगा — तो वो जीव ही "मैं" है? जीव और आत्मा में क्या संबंध है? (P21-0200)
- गुरु जी, इससे ऐसा प्रतीत होता है कि जो जीव शरीर को चला रहा है उसी को निकाल दें, तो शरीर बेकार हो जाएगा, कुछ कर्म नहीं करेगा? (P22-0001)
- गुरु जी, शरीर को मरने के बाद जला देते हैं, आत्मा तो निरंतर है। बचपन से हमें डराया गया कि यमराज ले जाएगा — तो यमराज किसको ले जाता है? मुझे लगा कि वो हमारे कर्मों को ले जाता है, भगवान के सामने बताता है, और उसी से अगला जन्म होता है — क्या ये सही है? (P22-0005)
- गुरु जी, शरीर धारण करने से तो हम लोगों का अच्छा-भला भी कर सकते हैं ना — जैसे आप जो ज्ञान बांट रहे हैं, उससे सबका भला होगा? (P22-0006)
- गुरु जी, इच्छाएं भी कई स्तर पर आती हैं — जैसे शरीर से जनित इच्छा, शरीर में कहीं दर्द है तो उसकी दवा चाहिए — इसे कैसे समझें? (P22-0029)
- गुरु जी, किसी को जीवन भर का दर्द हो तो वह क्या करे? क्या साधना से शरीर-जनित दुख का अंत हो सकता है? (P22-0030)
- गुरु जी, हम यहां आसन में बैठे हुए हैं, आप आनंद की बातें कर रहे हैं, लेकिन शरीर और इंद्रियों द्वारा दर्द की संवेदना पहुंच रही है — इस अवस्था में इसे कैसे भुलाया जा सकता है? (P22-0035)
- गुरु जी, समझ के स्तर से क्या शरीर का दर्द ओवरलुक हो पाता है? जैसे आज पूरे दो घंटे सत्संग में बैठकर सुनते रहे तो दर्द की उपेक्षा हो गई। मानसिक सहन तो समझ में आता है — विचारों और इच्छाओं की उपेक्षा कर सकते हैं — पर शारीरिक सहन में समस्या है। (P22-0048)
- गुरु जी, भाव बहुत ज्यादा हो तो क्या भगवान ऐसे शरीर में, साकार रूप में आ जाते हैं? (P22-0138)
- गुरु जी, यह समझ कि "शरीर है और मैं हूं" टिकी क्यों नहीं रहती, फिसल क्यों जाती है? (P22-0143)
- प्रणाम गुरु जी, उपनिषद के हिसाब से अपने शरीर के प्रति मनुष्य का कर्तव्य क्या है? (P23-0014)
- गुरु जी, शरीर के नौ दरवाजे कौन से हैं? विस्तार से बताइए। (P23-0038)
- गुरुदेव, शरीर, मन और बुद्धि की बात हुई — कुछ लोग इसके पार भाव की बात कहते हैं, कुछ उसे आत्मा का अभिन्न स्वभाव भी बोलते हैं। क्या भाव भी मन-बुद्धि के इसी कार्यक्रम से जुड़ी हुई चीज है? (P23-0101)
- गुरु जी, एक भाषा में कहा जाए तो मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, काम, क्रोध, लोभ — ये सब शरीर में हैं? कुछ लोग अंतःकरण चतुष्टय बताते हैं — मन, बुद्धि, चित्त और आखिर में अहंकार — कि अहंकार नष्ट किए बिना सर्वेश्वर तक नहीं पहुंचोगे। (P23-0103)
- प्रभु जी, मानव शरीर तीन प्रकार का होता है — स्थूल, सूक्ष्म और कारण। इसको कैसे समझें? कृपा करके समझाइए। (P23-0106)
- गुरु जी, आप कहते हैं कुछ नहीं चाहिए में आ जाएं — तो जीवन कैसे कटेगा? आम तौर पर तो शरीर और मन की जरूरत पूरी करते-करते जीवन कट जाता है, बड़े दुख मिलते हैं। (P23-0118)
- गुरु जी, कुटिया में काम करते-करते शरीर एकदम थक गया और बीमार हो गया, तो रात को मैंने निर्णय कर लिया कि काम बीच में छोड़कर घर चली जाऊं ताकि आप मुझे बीमार देखकर और परेशान न हों; सुबह थोड़ा ठीक लगा तो निर्णय किया कि मैदान छोड़कर नहीं जाना। उस समय मेरी जीवात्मा का क्या हाल था — मैंने किसको महत्व दिया? (P23-0123)
- गुरु जी, शरीर इतनी पीड़ा दे रहा है कि खाया-पिया भी नहीं जा रहा और काम भी अलग-अलग तरह का बहुत है, जो टाला भी नहीं जा सकता। मुझे लग रहा है कि शायद यह मेरा आखिरी कवच है जो टूटना बाकी है। अगर मैं मैदान छोड़कर घर जाकर ठीक हो जाऊं, फिर दोबारा लग जाऊं तो? (P23-0125)
- गुरु जी, शारीरिक, आर्थिक और मानसिक — तीनों पीड़ा हमारे पास रहती हैं। शरीर ठीक हो तो पैसे से पीड़ित होते हैं, शरीर और पैसा दोनों सही हों तो भी मानसिक पीड़ा तो रहती है। इन तीनों के बारे में बताइए। (P23-0168)
- गुरु जी, शंकराचार्य जी ने कहा है कि मनुष्य शरीर, उसमें भी नर शरीर श्रेष्ठ है। इसे श्रेष्ठ क्यों कहा गया? (P23-0193)
- गुरु जी, अगर सिर्फ मनुष्य शरीर से ही परोपकार होता है, तो क्या हाथी वगैरह एक-दूसरे की रक्षा करके, अपने बच्चों को संस्कार देकर, या वानर आदि शोर मचाकर हिरणों को शिकार से बचाकर परोपकार नहीं करते? क्या ममता के बिना परोपकार संभव है? (P23-0195)
- गुरु जी, बोलने वाला तो वह एक ही है, वह शरीर के माध्यम से बोल रहा है — फिर द्वंद कहां है? (P24-0004)
- गुरु जी, शरीर में मन और आत्मा दोनों रहते हैं — क्या मन और शरीर का नाश हो जाएगा? (P24-0014)
- गुरु जी, अपने शरीर की ऊर्जा कैसे बढ़ाएं? (P24-0017)
- योगी जी, 25 साल में तो मैंने गुड़गांव में अपना घर बना दिया था। हमारे नौजवान ऐसे होने चाहिए — शरीर से स्वस्थ लगते हैं, लेकिन अपना दिमाग नहीं खोलते, समझते भी नहीं। तो दुख होता है, क्या करें? क्या फिर इनको समझाना ही छोड़ दें? (P24-0103)
- गुरु जी, क्या इसी शरीर में भी उपलब्धि हो सकती है? (P24-0108)
- गुरु जी, आपने कल बोला था कि यहां से छोड़ोगे तो अगला वही मिलेगा। अगर मैं वापस उन्हीं लोगों के बीच जाकर उनमें लग गई और शरीर छूट गया, तो अगला जन्म कहां होगा? (P24-0119)
- गुरु जी, मैं हमेशा यही बोलती हूं कि मुझे अब शरीर नहीं चाहिए, मुझे मुक्ति चाहिए। तो क्या ऐसा कहने से दोबारा शरीर नहीं मिलेगा? (P24-0120)
- गुरु जी, हम शरीर में अटके हुए हैं — इससे निकलने का उपाय क्या है? (P24-0137)
- गुरु जी, ये चीजें बुढ़ापे में ही नहीं, जवानी में भी दिख जाती हैं — शरीर में ताकत है तो पता चलने के बाद भी हम अनदेखा करके, दबा के जी रहे हैं। तो फिर बुढ़ापे में क्या होगा, क्या मानसिक यात्रा होगी? (P24-0189)
- गुरु जी, कारण शरीर, सूक्ष्म शरीर और स्थूल शरीर क्या है? (P25-0043)
- गुरु जी, बात समझ में तो आ गई, पर व्यवहार में एकदम नहीं आती। मान लो मैंने सोच लिया कि मुझे कुछ नहीं चाहिए, लेकिन शरीर को भूख लगेगी, भोग की और काम की भी इच्छा होगी — तो क्या करें? (P25-0054)
- गुरुदेव, हमें धन का बल और शरीर का बल नहीं चाहिए। हम बस आपके साथ अपनी समझ का बल बढ़ाना चाहते हैं, क्योंकि यही सर्वश्रेष्ठ है। (P25-0077)
- गुरु जी, शरीर तो साधन मात्र है — तो इसे कौन चलाता है? हम ध्यान में बैठने जाते हैं तो कौन बैठा हुआ है? (P25-0078)
- गुरु जी, अगर शरीर को कोई नई आदत लगानी हो, जैसे ब्रह्म मुहूर्त में 4 बजे उठने की — बहुत कोशिश की, पर पुराने संस्कार आ जाते हैं, उठ नहीं पाते। मार्गदर्शन करें। (P25-0105)
- गुरु जी, मैं समझती हूं कि मेरा शरीर है, इसलिए मुझे भूख लगी। तो ये भूख किसको लग रही है — शरीर को या जीवात्मा को? (P25-0117)
- गुरु जी, कर्म का जो सिद्धांत है, जो लेन-देन हो रहा है — आत्मज्ञानी जब देखता है कि शरीर भोग रहा है, तो वो कर्म किसका रहता है, उसका या शरीर का? कर्म तो उसका ही है ना? (P25-0152)
- गुरु जी, शरीर की पीड़ा सहते हुए "कुछ नहीं चाहिए" कैसे हो? वो तो पहले से पीड़ा में है, तो मन शांत होगा नहीं। (P25-0153)
- गुरु जी, सुना है कि ज्यादातर लोगों का आत्मज्ञान का फल और शरीर छोड़ने का फल एक ही रहता है, बहुत कम लोग आत्मज्ञान के बाद शरीर को रख पाते हैं। तो जब मैं आत्मज्ञान की स्थिति में पहुंचूंगा, तो क्या उसके लिए कोई अलग विधान या क्रिया करनी पड़ेगी कि शरीर छूट ना जाए? (P25-0166)
- गुरुदेव, आप जीवित गुरु की बात कहते हैं, पर मेरे दीक्षा गुरु तो मेरी 8-10 वर्ष की उम्र में ही शरीर रूपी चोला छोड़कर चले गए। तो मुझे अब आध्यात्मिक मार्गदर्शन किससे प्राप्त करना चाहिए? (P25-0183)
- गुरुदेव, मैं अपनी सामर्थ्य से इस मार्ग पर हूं, परंतु फिर भी यदि मैं निकल लिया (शरीर छूट गया) और आत्मज्ञान नहीं हुआ, तो क्या होगा? (P26-0017)
- गुरु जी, जब साधक सत्संग में बैठते हैं तो अपने शरीर पर कैसे नियंत्रण रखें? सत्संग चलते समय शरीर में हलचल होती है — कहीं पैर दुखता है, कहीं खुजलाहट होती है — जिससे बाजू वाले भी डिस्टर्ब होते हैं। (P26-0028)
- गुरु जी, मैं यह समझ चुका हूं कि मैं शरीर नहीं हूं, फिर भी आसक्ति इतनी मजबूत है कि जैसे ही हम आत्म-कल्याण के लिए आगे बढ़ते हैं, वापस आने की तीव्रता बढ़ जाती है। ऐसा क्यों? (P26-0054)
- गुरु जी, सूक्ष्म शरीर, स्थूल शरीर और कारण शरीर की आध्यात्मिक मार्ग में आगे बढ़ने में क्या भूमिका है? (P26-0082)