मन — योगी गुरु जी के प्रश्नोत्तर
इस पृष्ठ पर “मन” विषय से जुड़े 288 प्रश्न हैं, जो जिज्ञासुओं ने सत्संग में योगी गुरु जी से पूछे। किसी प्रश्न पर क्लिक करके योगी गुरु जी का पूरा उत्तर उनके अपने शब्दों में पढ़ें, वीडियो के साथ।
- मैं आपके बताए सत्कर्म ईमानदारी से कर रहा हूं, पर मन काम-भोग के लिए परेशान करता है। शरीर से कर्म नहीं कर रहा, पर मन उधर रहता है। क्या करूं? (P1-0002)
- मन बहुत परेशान करता है। (P1-0026)
- संत जी, मेरे मन के विकार नष्ट नहीं हो रहे, मैं परेशान हो गया हूं। मन निर्मल हो जाए, इसके लिए क्या करूं? (P1-0030)
- गुरु जी, डर किसे होता है — मन को या शरीर को? (P1-0067)
- मैं पढ़ने बैठता हूं और हॉर्न की आवाज आ जाए या कोई खांस दे, तो पढ़ाई से मन हट जाता है और गुस्सा आ जाता है। उपाय बताएं। (P1-0068)
- गुरु जी, मन में बुराई आ रही है — लालच, काम-वासना। क्या करूं? (P1-0072)
- मन की इच्छाओं का त्याग करने की कोशिश तो करता हूं, लेकिन बार-बार नाकाम होता हूं। क्या करूं? (P1-0123)
- गुरु जी, मन की इच्छाओं का त्याग कैसे करें? बार-बार भूल जाता हूं। (P1-0129)
- आंख बंद करके जब ऊर्जा को महसूस करता हूं और मन-बुद्धि शांत हो जाती है, तो सोचता हूं कि वही मैं हूं। लेकिन फिर (उठते ही) वहीं (संसार में) चला जाता हूं। इसका क्या मतलब? (P1-0148)
- क्या मन के विलुप्त होने पर (मन के न होने पर) ही ज्ञान घटित होगा? (P1-0156)
- जब घर में कमरे के अंदर रहता हूं तो कुछ नहीं चाहिए, चुपचाप बैठा रहता हूं। लेकिन बाहर घूमता हूं तो कोई दृश्य, कोई वस्तु दिखाई देती है और मन वहां चला जाता है। (P1-0157)
- मुझे आलस बहुत आता है, कुछ काम करने का मन नहीं करता। (P1-0159)
- गुरु जी, मैं सद्गुरु के कहे अनुसार दिन में 14–20 माला जप करता हूं, लेकिन मन अभी भी अशांत है। (P1-0182)
- मैं इतना मूर्ख हूं कि सत्संग से सब कुछ पता चला, अध्यात्म में अच्छा-खासा लग भी गया, लेकिन साल भर से मन वापस संसार में लग गया। अब लगता है संतों की कृपा के बिना मैं अध्यात्म में नहीं चल सकता। (P2-0009)
- गुरु जी, खुद की ताकत और मन की शक्ति कैसे बढ़ाएं, जिससे कोई और हम पर प्रभाव न डाल पाए और डर भी न हो? (P2-0064)
- कई बार मन बहुत गलत सोचता है, जबकि दिमाग को पता होता है (कि यह गलत है)। ऐसा क्यों होता है? (P2-0096)
- जीवन में मुझे यह होश हमेशा बना रहे कि मुझे (भवसागर से) निकलना है — यह कैसे संभव है? कभी विचार पॉजिटिव आते हैं, कभी मन मलिन रहता है और मैं फिर खो जाता हूं। (P2-0117)
- गुरु जी, प्रणाम। आपके सत्संग से ईमानदारी और सत्कर्म ने जीवन बदल दिया, पर मन में विचार बना रहता है कि पहले जो पाप हो गए, उनका क्या? (P2-0158)
- ज्ञान होने तक तो ये घाव बार-बार हरे हो जाते हैं; याद आते ही मन घृणा से भर जाता है और न चाहते हुए भी उनके लिए बद्दुआएं निकल जाती हैं। फिर डर लगता है कि इस द्वेष से मैंने फिर कर्म-बंधन बांध लिया। अगर ज्ञान से पहले शरीर छूट गया, तो क्या इस द्वेष के कारण मैं फिर उन्हीं के इर्द-गिर्द, उनके परिवार में पैदा हो जाऊंगा — वही चक्र, जिसे मैं तोड़ना चाहता हूं? (P2-0184)
- गृहस्थ मुखिया को दिन में वैराग्य की लहर आती है — कोलू का बैल बन गया, भागने का मन; फिर जिम्मेदारी और रोटी-छत की चिंता से लहर ठंडी पड़ जाती है। वैराग्य की गर्मी बनाए रखते हुए जिम्मेवारियां निभाते हुए अध्यात्म में रोज कदम कैसे बढ़ाएं? (P3-0002)
- इतनी उदासी में मन बैक जाए तो गुरु/ऊर्जा रोक सकती? ज्यादातर क्या करते हैं? (P3-0045)
- दुकान वाली बात तो ठीक, पर हम गृहस्थ में परिवारजनों के बीच रहते हैं, जहां तन-मन-धन तीनों तरह से लेनदेन चलता ही है। अगर हम उन्हें धन से सपोर्ट करते हैं तो उम्मीद रहती है कि वे लौटाएं, पर मांगते नहीं बनता और घुटन होती है। ऐसे हिसाब-किताब से कैसे निकलें? (P3-0086)
- गुरु जी, दो-तीन महीने साधना से लग रहा है कि मैं काम-क्रोध से दूर जा रहा हूं; अकेले में लगता है मैं कंट्रोल कर सकता हूं, लेकिन जैसे ही उस परिस्थिति के बीच आते हैं, कंट्रोल नहीं रहता, हम उसके वश में चले जाते हैं — अपने आप कुछ घटित हो जाता है। उस समय क्या करें? मन (माइंड) को कैसे कंट्रोल करें, और काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह से कैसे छूटें? (P3-0152)
- (लाइव) प्रणाम योगी जी। आपने कहा कि मानसिक कर्म — जैसा सोचो — उसका फल नहीं (लगता), जब तक एक्शन में ना करें। किंतु ऐसा व्यक्ति, जो मन में गलत सोच रहा है, निर्विकार और ईमानदार थोड़े होगा? मानसिक बुरा सोचने वाला अपने आप को रोम-रोम से ईमानदार थोड़े बोल पाएगा? यह समझाएं। (P4-0006)
- (लाइव, फिनलैंड से) जब हम किसी से बात करते हैं, तो मन ही मन उसके बारे में निर्णय बनाने लगते हैं कि यह ऐसा है, वह वैसा है। इस आदत से मैं बाहर कैसे निकलूं? (P4-0011)
- (लाइव) योगी जी, आपने कहा कि मन में गलत सोच रहे हो तो कोई बात नहीं, बस कर्म में मत लाना। जब से यह अपनाया है, पहले से ज्यादा घृणित और कामी (विचारों वाला) हो गया हूं; मुझे ऐसे विचार आते हैं कि बोल नहीं पा रहा हूं। (P4-0012)
- (लाइव) प्रणाम योगी जी। परम सत्य या निर्वाण की प्रकृति — परम ज्ञान, मोक्ष या निर्वाण के बाद की अवस्था — को शब्दों में बांधना असंभव माना गया है; इसे हमेशा ‘नेति नेति’ (यह नहीं, यह नहीं) कहकर ही समझाया जाता है, क्योंकि हमारा मन केवल सीमित चीजें ही समझ सकता है। क्या यह सत्य है? (P4-0023)
- (लाइव) प्रणाम योगी जी। मैं नवंबर 2024 से आपका सत्संग सुन रहा हूं और आपके ज्ञान पर चल रहा हूं; बहुत कुछ समझ में भी आ रहा है। पर अब घर पर मन नहीं लग रहा, सारा दिन उदासी में बीतता है। मार्गदर्शन दीजिए। (P4-0033)
- (लाइव) प्रणाम योगी जी। अच्छी पढ़ाई कैसे करूं? जब मैं पढ़ाई करने बैठता हूं, तो मन डिस्टर्ब रहता है, भटकता रहता है। (P4-0038)
- (लाइव) प्रणाम योगी जी। जीवन में क्या करना है, मुझे कुछ दिखाई नहीं दे रहा; पढ़ाई करूं तो मन भटकता है। कैसे अपना मार्ग चुनूं, क्या करूं, कैसे करूं — कुछ समझ में नहीं आ रहा। मार्गदर्शन दें। (P4-0045)
- (लाइव) गुरुदेव, मुझे लगता है मेरा मन, माइंड और शरीर पर कोई नियंत्रण नहीं है। जिस चीज को भूलना चाहता हूं, वही चीज बार-बार याद आती है और बेचैन करती है, जबकि मैं किसी के साथ कोई पाप कर्म भी नहीं करता। (P4-0048)
- (कुटिया में, एक शिक्षक साधक) आप (किसी शहर में) तीन दिन — रोज दो घंटा — सत्संग के लिए आ सकते हैं? (गोयल जी ने 6 लाख देकर सत्संग कराया था।) मन तो है कि मैं भी करवाऊं, लेकिन इतनी ताकत नहीं — 1 लाख पगार है, पर साथ में 10 लाख का कर्जा है। और हम (घर-परिवार से) अलग में हैं, इसलिए भगवान का भाग निकालना समझ में आता है। (P4-0067)
- (लाइव) नर्मदे हर गुरु जी। मेरे पति शांत हो चुके हैं (गुजर चुके हैं)। मैं बहुत टूट चुकी हूं, मेरे चार बच्चे हैं, मेरा किसी काम में मन नहीं लगता है। मेरा मार्गदर्शन करें। (P4-0099)
- (लाइव) प्रणाम योगी जी। विद्यार्थी को पढ़ने में मन नहीं लग रहा हो तो उसे कैसे ठीक करें? (P4-0125)
- (कुटिया में एक युवा साधक) गुरु जी, मैं चीजें ठीक से समझ नहीं पाया। पहली बार वीडियो देखते ही भाव आया था कि यही गुरु है; नर्मदा पर भाव बना कि गुरु जी गले लगाएं और आपने गले लगाया। फिर घर गया तो घुटन-परेशानी रही, वापस आया, पर इस बार मन में संदेह था कि गुरु जी रखेंगे या नहीं, और कई गलतियां हुईं। मैं अब ठीक से पकड़ नहीं पा रहा — मदद कीजिए कि मैं अपने आप को इनसे निकाल पाऊं। (P4-0173)
- (वही साधिका) आपको लोगों से हेल्प मिली — तो क्या दूसरों से लेने पर हमारे पिछले पुण्य कर्मों का 'एटीएम' क्षीण नहीं हो जाता? और अगर सही काम में लगाते हुए भी मन में लगे कि यह गलत है, तो? (P4-0191)
- (वही साधिका) आप जब खोज करते थे, तो आत्म-चिंतन से करते थे या किताबों से? और गिरना-उठना मन की स्थिति से पता चलता है? (P5-0002)
- (वही साधिका) ऐसी जगह रहने का मन करता है, पर ये भी रहता है कि अपनी जगह हो। क्या यहां रह सकते हैं? और दूसरों के यहां जाओ तो कुछ बंधन होते हैं, उनके नियम के अनुसार चलना पड़ता है। (P5-0011)
- (कुटिया में एक युवक) किताबों में पढ़ते हैं कि दूसरों के अनुभव से सीख लो; गीता में श्री कृष्ण ने बताया कि ये काम करो, ये मत करो — पर सुनकर, ज्ञान और समझ होते हुए भी मन नहीं मानता, कहता है एक बार करके देखते हैं। आपने भी कहा था कि आप हर जगह गए, यह देखने के लिए कि वहां कुछ नहीं है। तो जब कृष्ण ने कह दिया कि भगवान बाहर नहीं है, फिर भी मन मानता नहीं — मन को कैसे मनाऊं? किसकी बात सही मानूं? (P5-0016)
- (संदर्भ: गुजरात में एक युवक) मन में उल्टे-सीधे गंदे विचार आते हैं; नॉनवेज खाता हूँ — छोड़ दूँ या खाऊँ? हर बात अपनी पर्सनल क्यों? (P5-0025)
- मन समोसा खाने को कहे तो क्या करें? मन को कैसे कंट्रोल करें? (P5-0033)
- असली सवाल क्या होता है? मौन में बैठूं तो मन में क्या रखूं? (P5-0062)
- जब घुटन-बेचैनी हो और कुछ करने का मन न हो — रुकना है; पर काम करना ही पड़ता है तो क्या? (P5-0085)
- ईमानदारी से चल रहे हैं पर अड़चनें आती हैं, मन अशांत — क्या करें? निगेटिव थॉट्स आते रहते हैं। (P5-0099)
- जब शरीर मरता है तब मनुष्य की क्या स्थिति होनी चाहिए? मन क्या है? (P5-0115)
- मन पर नियंत्रण कैसे हो? (P5-0118)
- मन कंट्रोल नहीं कर सकते कहते हो, फिर बेईमानी छोड़ो-सत्कर्म करो मन पवित्र होगा — कौन पवित्र? (P5-0122)
- कार्य शुरू करने का भय कैसे दूर करें? मन साधना में लगता है पर पारिवारिक कर्तव्य रुकावट — क्या करें? (P5-0129)
- अचेतन मन क्या है कैसे साफ करें? साधना क्या है? (P5-0148)
- मन को एकाग्र कैसे करें? (P5-0155)
- अध्यात्म की तरफ इतने कम लोग क्यों हैं? मन की कामना कैसे समाप्त करें? (P5-0183)
- मन की परिभाषाएं अलग-अलग — राग-द्वेष पिंडों में कैसे अलर्ट रहें? (P6-0035)
- जब एक मिनट के लिए चुपचाप बैठ जाता हूं और शरीर से कोई कर्म नहीं कर रहा, तब भी विचार अपने आप अतीत में चले जाते हैं या भविष्य की कल्पना में। किसी ने गुस्सा दिलाया या चोट पहुंचाने की कोशिश की, एक मिनट में वह अतीत हो गया, और विचार अपने आप बनते चले जाते हैं। मैं कुछ नहीं कर रहा, मन क्रिया कर रहा है। अगर मैं कहूं कि मैं इसका दृष्टा हूं, तो यह भी धोखा लगता है, क्योंकि प्रश्न भी मन उठा रहा है और उत्तर भी मन दे रहा है। मन निमित्त है, तो प्रश्न कौन उठा रहा है? कई बार साइलेंट में बैठने पर अनुभव सा होने लगता है, फिर लगता है यह भी धोखा है, मन बार बार धोखा देता है। सृष्टि में आने के बाद से हम अपने आप को भूल गए, ऐसा लगता है। बोलने को शब्द नहीं मिलते। क्या शब्दों का सहारा लिया जाए, और बोला क्या जाए? (P6-0040)
- निर्विकार बहुत ऊंची अवस्था है। विकार है, तो कभी निर्विकार भी रहे होंगे, तभी विकार हटाने का प्रयास है। स्वप्न की बात हो चुकी। उसके बाद कारण अवस्था आती है, जिसमें शरीर को विश्राम मिलता है और मन को विश्राम मिलता है। वह अवस्था क्या है? उसमें जाकर इंसान सब कुछ भूल जाता है, ऐसा लगता है। हम भी उतनी ही जानकारी तक जाकर खड़े हो जाते हैं, जैसे रोबोट मेमोरी के बिंदु तक छूकर लौट आता है। कहने को जागृत है, पर जागृत भी धोखा लगता है। मैं प्रकृति का ही हिस्सा हूं, फिर अपने को और प्रकृति को अलग क्यों समझें? फूल का एक पत्ता समझ में आ जाए तो फूल समझ में आ जाए, पर इसी को समझ नहीं पा रहे। समझ शरीर के माध्यम से ही हुई, जहां जहां गए ज्ञान होता गया, अपनाते गए, सानिध्य में काम किया, समझ भीतर विकसित होती गई। फिर भी कारण अवस्था का उत्तर नहीं मिला, जब ऐसा हो जाता है कि कुछ रहा ही नहीं। क्या कारण से मुक्त होना निर्विकार है? (P6-0044)
- समाज में अलग अलग स्तर पर जो बताया जा रहा है, क्या वह केवल बॉर्डर तक पहुंचाने की कोशिश है, और बॉर्डर पर जो अवस्था घटेगी उस दिन सब छूट जाएगा? कौन सा मार्ग लूं, यह कैसे देखूं? एक समय ऐसा भी आता है जब मन में बहुत दुविधाएं उठती हैं और प्रश्न बहुत से उठने लगते हैं। उस समय क्या किया जाए? (P6-0047)
- आपने एक संकल्प कहा है कि निर्विकार होना है। निर्विकार कैसे होऊंगा, और विकार बन कैसे रहे हैं? बेईमानी छोड़ दूं तो आगे बनना बंद होगा, पर पिछला जो जमा किया है वह कैसे खटेगा? बेईमानी से श्राप मिला, तो सत्कर्म और जरूरतमंद की सेवा से क्या मिलेगा? प्रतिदिन जो विकार हो रहे हैं, उन पर हर क्षण कैसे ध्यान रखूं? प्रश्न पर प्रश्न मन उठाता रहता है, उन्हें ज्यादा नहीं उठने देना है या नहीं? (P6-0048)
- भरोसे की जो बात कही, उसी भरोसे पर अब तक चलते आए हैं। आप भरोसे और विश्वास की बात नहीं करते, और स्वप्न आता है या नहीं, इसका सीधा उत्तर भी नहीं देते। मन भविष्य के जो प्रश्न उठा रहा है, जो वास्तविक नहीं, उन्हें हटा दें? आत्मज्ञान के बाद स्वप्न आते हैं या नहीं, इस उत्तर से लाभ या हानि कुछ नहीं, केवल मन की संतुष्टि है। ऐसे प्रश्न पूछना बंद कैसे समझें? पेड़ यहां क्यों है, यह कौन बताएगा? (P6-0051)
- मन और चित्त क्या है? (P6-0053)
- योगी जी नमन। पंजाब से एक बहन है, छह महीने पहले शादी हुई। डेढ़ साल पहले भाई को वीडियो मिली, उनकी रुचि थी, बहन का यह मार्ग नहीं था। कुटिया आने से पहले बहन कहती थी कि मैं बहुत बातें करती हूं, मैं यहां रह नहीं पाऊंगी। फिर भी नियम ऐसे सहज स्वीकार हो गए कि नियम लगे ही नहीं। बैठने का कोई काम नहीं, फिर भी पूरे समय सहज बैठी रहती है, किसी को देखती नहीं। भाई की ओवरथिंकिंग छूट गई, बहन वीडियो कम सुनती है, और दोनों निरंतर नियम में हैं। जिज्ञासा यह है कि एक जीवात्मा अपनी यात्रा के लिए इतनी उत्सुक कैसे हो जाती है? किस मोड़ से अपने आप को निकालना चाहती है? प्रत्यक्ष ज्ञान निमित्त बना, शादी हुई, और ऐसी जगह आना जैसे यह बहुत आवश्यक हो। यह संभव कैसे हो पाया? क्या वह कोरे कागज की तरह समझ रही है? और जो पहले कुछ पढ़कर या कोई प्रक्रिया करके आता है, उसका मन तुलना में लग जाता है, यहां ऐसा क्यों नहीं, वैसा क्यों नहीं, कुछ हो नहीं रहा, इतने दिन हो गए, तो क्या पिछला छोड़कर यहीं समझना चाहिए? (P6-0054)
- गुरु जी प्रणाम। गड धरत बाटी से। आपका सत्संग बराबर सुनता हूं और आदत में सुधार भी हो रहा है। अब हमारा शरीर और मन सुस्त होने लगा है। यह किस तरह का लक्षण है? (P6-0057)
- एक संसारी को फिलहाल एक ही कारण नजर आ रहा है कि मैं इसी से दुखी हूं, प्रपंच नजर नहीं आता। जैसे पड़ोसी पसंद नहीं और मन में आता है कि यह मर जाए, आज यह मर जाए, कल वो मर जाए। उस कारण तक चला भी जाऊं तो अपने स्वभाव को कैसे सुधारूं? वह भाव गंदी आदत लगता ही नहीं, मैं यही जानना चाहता हूं। अगर अपनी स्थिति बुरी लगती ही नहीं तो कैसे चेक करूं? परिवार से जानकारी मिली कि उनसे रंजिश है, दुश्मनी है, उन्होंने हमारे किसी को मारा, मैंने खुद नहीं देखा, फिर भी भाव बन गया कि यह मर जाना चाहिए, मैं ही उड़ा दूं, जबकि वो भी योजना बना रहे होंगे। गली में रेड़ी वाले का रेट ना भाए तो बद्दुआ, गाली और अपमान तक निकल आता है। मैं खुद परेशान हूं और वो अड़चन भी डाल रहे हैं। ऐसे में अपनी स्थिति कैसे जानूं, यह भाव क्यों उठ रहा है, और मैं इसमें क्यों लिप्त हो रहा हूं? (P6-0061)
- आत्मज्ञान हो जाए, इसके पीछे यदि मन में यह मनसा पल रही हो कि मुझे मान और प्रतिष्ठा मिलेगी, तो क्या आत्मज्ञान होगा? (P6-0086)
- इस बेचैन मन को कैसे कंट्रोल किया जाए? (P6-0124)
- क्या मन ऐसा है जैसे पिक्चर हॉल में पर्दा दिखाई देता है? क्या मन द्वारा जीवात्मा इस संसार और शरीर को व्यक्त करती है? अंग सुन्न या पैरालाइज होने पर चेतना रहती है या मन वहां नहीं जाता, और शरीर का भान कैसे होता है? (P6-0126)
- मन संदेशवाहक है और अंग मेरे सहायक हैं, तो मैं कौन हूं? मैं इस मैं के रोले में कई रूपों में शिफ्ट हो गया हूं। आत्मा को कैसे फील करूं? क्या आत्मज्ञान में आत्मा अलग दिखेगी, तीसरा नेत्र खुलेगा, या मैं वही रहूंगा? आत्मज्ञान के बाद बाहर के झगड़ों में उलझना चाहिए या नहीं? (P6-0127)
- मन और दिमाग, या ब्रेन, में क्या फर्क है? हमें बताया गया कि ब्रेन से हम शरीर को फील करते हैं और ब्रेन में सिग्नल जाते हैं। क्या मन केवल शरीर की जरूरत बताता है या स्मृति का भी सहायक है? क्या मन नौकर है या सहायक? शरीर के इशारों के साथ साधक को क्या करना चाहिए? (P6-0129)
- क्या मन कर्म से बनता है, और उसके असर में दिक्कतें होती हैं? आंख, पलक, बीज और मकान की तरह क्या सब पहले से तैयार है? क्या सृष्टि की हर घटना पूर्व निश्चित है? मैं निश्चित करके आया, फिर योजना बदल गई और बेईमानी में फंस गया। यह फिक्स मैं ही कर रहा हूं क्या? फिक्स है तो फिर करना क्या है? (P6-0131)
- जब से हम जीवात्मा बने हैं, तब से मन हमारे साथ है। मन इस शरीर में रहा है, चाहे हम इंसान में रहे हों या किसी दूसरे जीव-जानवर में। क्या मन जन्म-जन्म से हमारे साथ है? (P6-0136)
- एक दिन मुझे अच्छा लगता है और दूसरे दिन बुरा लगता है। क्या यह केवल मन की वजह से होता है, या इसमें मेरा भी योगदान रहता है? (P6-0138)
- जीवन में ईमानदारी और सत्कर्म हो रहा है। मन निर्मल कैसे हो? इस पर प्रकाश डालें। (P6-0179)
- जे के डाका पूछते हैं, अफीम छोड़नी है। मन कमजोर है। कैसे छोड़ूँ? मार्गदर्शन करें। (P6-0190)
- विनायक पूछते हैं, आत्मज्ञान किसे होता है? मन को, वृत्ति को, चित्त को, या बुद्धि को? समझ की जरूरत किसको है, बुद्धि को या आत्मा को? (P7-0004)
- प्रशांत गुप्ता पूछते हैं, चेतना, मन, बुद्धि और आत्मा में क्या अंतर है? क्या चित्त ही आत्मा है? (P7-0009)
- सत्य पूछते हैं, गुरु जी, जड़ और चेतन क्या है? शरीर, मन, बुद्धि, चित्त जड़ हैं या चेतन? (P7-0107)
- गुरु जी, हमें यह पता होते हुए भी कि जो कर्म कर रहे हैं वह हमारे कल्याण के लिए नहीं है, फिर भी हम अपने मन पर पूरी तरह नियंत्रण नहीं कर पाते। हमें क्या करना चाहिए? (P7-0130)
- सुनते सुनते लगभग एक साल से प्रेरणा हुई, तभी आ पाया। परिवार के दलदल में ऐसा फँसा हूँ कि चार महीने से आना हो नहीं पा रहा था। एक बार गौतम बुद्ध की तरह बिना बताए चल जाने का मन हुआ, पर आपके वचनों से बिना बताए जाना उचित नहीं लगा। दो बच्चों की शादी करनी है, इसलिए बताकर आया। बड़ा बेटा सपोर्ट कर रहा है, बाकी पत्नी और बच्चे सब खींच रहे हैं। निकलना बहुत कठिन लग रहा था। अब क्या करूँ? (P7-0139)
- मैं इस कुटिया को अपनी मानता हूं। छोटी-छोटी बिगड़ने वाली चीजें, जो औरों को नहीं दिखतीं, उन पर ध्यान रखता हूं। पहले लगता था लोग मेरे तरीके से नहीं कर रहे, गलत लगता था। अब समझ आया कि सबकी समझ अपनी है। खाना बनाने में मन लगता है। सारा छोड़ दूं तो कमजोरी आ जाएगी, इसलिए अपना काम भी करता रहता हूं। बोलचाल में गलती हो जाती है। यह कुटिया किसकी है, और यहां कैसे रहें? (P7-0161)
- संयम का मतलब क्या है? लोग कहते हैं संयम रखो। क्या यह शरीर से संबंधित है, या धैर्य है? संयम मानसिक है, या शरीर और मन दोनों से? एक बार अहंकार आहत हो जाए, तो हम जैसे लोग पीछे हट जाते हैं। उस वक्त संयम कैसे रखें? (P7-0162)
- मन बिना कारण उदास क्यों होता है? (P7-0183)
- आजकल कहीं मन नहीं लगता। क्या करें? (P8-0047)
- गुरु जी, आपने कहा था कि हम सोचते हैं। क्या हम चेतन मन की मदद से सोचते हैं? (P8-0052)
- अचेतन मन में जो डर के विचार हैं, उनसे कैसे ठीक हों? और यह डर के विचार उसमें कैसे बैठे? (P8-0053)
- मन को पवित्र कैसे बनाएं? (P8-0065)
- एक प्रश्न मेरा क्लियर नहीं हुआ। मैंने पूछा था कि हम चेतन मन के माध्यम से सोचते हैं। क्या यही बात है? (P8-0068)
- मन क्या है? (P8-0070)
- शिष्य का गुरु के प्रति जितना समर्पण होता है, क्या गुरु का समय और ध्यान भी उसके प्रति उतना अधिक हो जाता है? ऐसे में अन्य साधक, जो गुरु के प्रति कम लगाव रखते हैं, उनके मन में ऐसी भावना पैदा हो जाती है। (P8-0091)
- आदमी जरूरत में सोचता है, यह बात समझ में आई। लेकिन वह कौन सा उपकरण है जिसके माध्यम से वह सोच रहा है? मैं उस उपकरण का नाम चाहता हूं। क्या वह चेतन मन है? (P8-0092)
- क्या मैं सही हूं कि मन के दो हिस्से हैं, अचेतन मन और चेतन मन, चेतन मन में बुद्धि होती है, और जीवात्मा बुद्धि की मदद से सोचता है? चेतन मन और बुद्धि का इस्तेमाल बता सकते हो? (P8-0126)
- बुद्धि और चेतन मन में क्या फर्क होता है? क्या चेतन मन की मदद से सोचते हैं, या बुद्धि की मदद से? (P8-0145)
- बुद्धि और चेतन मन में क्या फर्क है? विज्ञान बुद्धि को चेतन मन का हिस्सा मानता है। दोनों का क्या उपयोग है? मुझे लगता है बुद्धि और चेतन मन एक ही हैं। (P8-0150)
- ध्यान करने का मन होता है, पर एक अजीब सा भय बना रहता है, लगता है कोई है, सर्प है। क्या करें? (P8-0156)
- ध्यान करने का मन होता है। एक अजीब भाव रहता है। कहते हैं करो, लेकिन चुनाव करते समय कर्ता फिर खड़ा हो जाता है। कर्ता का भाव कैसे न रहे? (P8-0165)
- बुद्धि से तो आत्मा सोचती है। मन सोचने में कैसे लिप्त होता है? इसे प्रत्यक्ष समझाइए। (P8-0172)
- मेरे मन में हमेशा यह प्रश्न आता है कि मैं कौन हूं। मुझे लगने लगा है कि मैं चुनी हुई आत्मा हूं, और जिन्हें परमात्मा चुनता है उनका जन्म टॉक्सिक परिवार में होता है। क्या यह सही है? (P9-0060)
- मैं अपने चारों ओर देखता हूं कि लोग दिन भर गंदी-गंदी बातें करते हैं। बचपन से इनका सामना कर रहा हूं। अब इन लोगों से कैसे बचूं? मन में कचरा आने लगता है। (P9-0071)
- महाराज जी, मैं देख पाया कि मैं विचार था ही नहीं। मन में समा गया, खाली, मैं सब अच्छे से देख पा रहा था। वह क्या है? (P9-0143)
- गुरु जी, घर वाले मुझे बहुत चाहते हैं, लेकिन मेरा उनसे कोई लगाव नहीं। बार-बार जिम्मेदारी छोड़कर आत्मज्ञान की खोज में भागने का मन करता है। फिर रुक जाता हूं कि घर वालों को क्यों दुख दूं। सही-गलत समझ में नहीं आता। क्या करूं? (P9-0165)
- जिन गुरु ने आरंभ में ध्यान का मार्गदर्शन दिया था, उन्होंने कहा था कि न आत्मा का ध्यान करना है, न परमात्मा का ध्यान करना है। यह बात क्लियर नहीं हुई। ऋषिकेश, गंगोत्री, फिर कोरोना, वेदांत श्रवण के बीच साधना बिगड़ गई। पहले तीन-तीन घंटे एक आसन में बैठ लेता था, पद्मासन भी सिद्ध हो गया, फिर मन डिस्टर्ब हो गया। ना आत्मा का ध्यान, ना परमात्मा का ध्यान, इसका क्या अर्थ है? और आसन सिद्ध करने से क्या होता है? (P9-0180)
- नेपाल में मेरा चित्त बहुत जाता है, पर मन इधर ही है, क्योंकि यहां बैठने से आत्मसमझ बढ़ रही है। नेपाल की याद आती है। वहां जाकर मुक्त होकर इधर आकर बैठूं, या वहीं रहकर रोज उसका सामना करूं, कौन अच्छा है? दोनों तरफ खिंचाव है, विचार बहुत आते हैं, तबीयत भी खराब होती है, फिर भी लगता है समझ बढ़ रही है। (P9-0183)
- आपके व्यक्तित्व के बारे में मैं बोल नहीं सकती। विवेकानंद जी के व्यक्तित्व के लिए मेरे मन में बहुत प्रेम था। इतनी मुसीबतें, चौबीस-अट्ठाईस घंटे की यात्रा, एक सीट पर बैठे रहना, ये बातें लिखी कैसे जाएं? जो बाहर से देखेगा उसे लगेगा एयर कंडीशन कार से आराम से आ गए। (P9-0186)
- प्रयास तो कर रहे हैं, लेकिन कुछ हो ही नहीं रहा है। मन अशांत है। योगी जी, क्या करें? (P9-0196)
- साक्षी की स्थिति सदा नहीं रहती। कभी-कभी आती है, कभी नहीं। मन चाहता है सब ओर भागना। उसे बार-बार थामने से साधना में भी ऊब पैदा होती है। यह क्या है? कैसे छुटकारा हो? एक तरफ ध्यान नहीं हो पा रहा हूं। क्या करूं? (P10-0012)
- क्या ऐसा नहीं है कि मन का धागा ढीला है, और जब उसे सीधा करो, सुलझाओ, तो उसमें मौन उतरता है? वह मौन भीड़ में भी कैसे साधे? (P10-0015)
- मुझे आप जैसा मेहनती बनना है। ध्यान इधर-उधर जाएगा। क्या मन एक समय सिर्फ एक काम कर सकता है? मन पांच इंद्रियों से जुड़ा है, इसलिए क्या धारणा भी एक साथ कई हो सकती है? (P10-0029)
- आपका वीडियो देखता हूं, सत्संग सुनता हूं, और ज्ञानियों की वाणी, संतों के वचन, इन सबसे मन अच्छा हो जाता है, शांत हो जाता है। (P10-0042)
- गुरु जी, जब एकांत में बैठता हूं तो मन एक क्षण में अंधकार में चला जाता है, अंतःकरण में चला जाता है। क्या करें? कृपया मार्गदर्शन करें। (P10-0054)
- अगर मन में परेशान ना हो, तो क्या करें? (P10-0065)
- मेरा मन पढ़ाई में लगता था। अब कुछ दिन से इधर-उधर से डिस्टर्ब हो गया हूं और पढ़ाई से मन हट गया है। अब परेशान हो गया हूं। गुरु जी, कुछ करें। (P10-0073)
- गुरु जी, मैं जब भी कोई डिसीजन लेता हूं तो मन में हमेशा द्वंद्व चलता रहता है। आपकी तरह बिना द्वंद्व के हर डिसीजन फाइनल कैसे करूं? (P10-0114)
- आत्मिक चिंतन कैसे करें? मन में संसार घूमता रहता है। (P10-0115)
- (मन के) बेकार खर-पतवार को कैसे काट के निकालें? (P10-0148)
- (एक साधक की ओर से) सत्संग समझ में आ जाने के बाद अब घर पर मन नहीं लगता। क्या करें? (P10-0168)
- गुरु जी, मैं आत्म कल्याण के लिए घर से निकल नहीं पा रहा हूं। मुझे अपने मन से डर लग रहा है कि मुझसे कोई गलत काम ना हो जाए। मार्गदर्शन करिए। (P10-0184)
- (कुटिया में साधक) कल मेरे मन में भाव आ रहा था कि मैं (नर्मदा) परिक्रमा कर लूं। पर लगता है यह जगह, आपका सान्निध्य छूट जाएगा। (P10-0187)
- मैं समझ गई हूं, फिर मेरा वैसा ही रहने का मन करता है, वैसे ही लोग और वैसा ही माहौल चाहिए। जब वह नहीं मिलता, तो मैं बहुत परेशान और बेचैन हो जाती हूं। (P11-0003)
- हमारे अंदर ही परमात्मा है, आत्मा भी है और मन भी। अगर हम अपनी आत्मा को समझ गए, तो मन तो हट ही जाएगा; फिर हम और परमात्मा एक ही हो जाएंगे — क्या यह सही बात है? (P11-0006)
- हमारी जो प्रतिक्रियाएं मन में चलती हैं — कुछ नेगेटिव, कुछ बेकार — जिन्हें हम एक्शन में नहीं लेते, क्या उनसे भी कर्म बनते हैं? (P11-0011)
- अगर कोई हमारे अगेंस्ट कुछ कर रहा है, तो मुझे एक्शन तो लेना पड़ता है; फिर मन की प्रक्रिया बहुत स्पीड पकड़ लेती है। क्या करें? (P11-0012)
- घर पे मन नहीं लगता, यहां (कुटिया) आने का मन करता है; और यहां आकर फिर भागने का मन करता है। (P11-0017)
- मैं आपको सुन रहा हूं, पर 100% वर्तमान में नहीं हूं; आपके शब्दों को दिमाग अपने हिसाब से प्रोसेस करता रहता है। जब शांत होने की कोशिश करता हूं तो एकदम जीरो हो जाता हूं, फिर काम करने में दिक्कत होती है। मन हमेशा प्रतिक्रिया मोड में ही क्यों रहता है? (P11-0027)
- सोचता कौन है — मन या हम? आंतरिक बात कौन करता है? (P11-0029)
- कभी-कभी साधना में मन निराश होता है; तब अंदर से आवाज आती है, "चिंता मत करो, मैं यहां हूं।" इसे मैं ब्रह्म का संकेत मानता हूं। सही मार्ग दिखाइए। (P11-0074)
- "मन मरा ना माया मरी, मर-मर गया शरीर; आशा तृष्णा ना मरी, कह गए दास कबीर" — आप अपने वक्तव्य में समझाएं। (P11-0078)
- मेरा मन अचानक बहुत उद्विग्न हो जाता है, घुटन या पश्चाताप में चला जाता है, जबकि कोई घटना याद भी नहीं। क्या उस घुटन से भागूं नहीं, उसी में रहूं? (P11-0082)
- नींद क्या है? इसमें जीव और मन की क्या अवस्था रहती है? और स्वप्न क्या है? (P11-0098)
- मन, वाणी और कर्म के शुद्धिकरण का क्या मतलब है? (P11-0117)
- सत्संग से इतना समझ आ रहा है कि मैं शरीर और मन नहीं हूं — शरीर माता-पिता और पोषण से बना, मन बाहरी जानकारियों से। फिर इनके बिना भी क्या मैं कुछ हूं? इस पर अब जिज्ञासा टिक रही है। (P11-0158)
- सही मन से भगवान से मांगने पर हर चीज मिलती है, यह होते देखा है। तो जो मिला है, उसे कैसे बचाकर रखें? (P11-0177)
- पहले मेरा भजन में अच्छा मन लगता था, अब भोग में मन बार-बार परास्त कर देता है; शुरू में जो वैराग्य हुआ था, वह ठंडा पड़ गया। मार्गदर्शन दीजिए। (P11-0197)
- क्या आर्थिक दान के बिना आपके यहां रहना संभव है? क्या श्रमदान करके भी रह सकते हैं? मैं सरकारी नौकरी में हूं, पर नौकरी में मन नहीं लगता। (P12-0022)
- ध्यान करते समय मन बोलता है कि यह सब करने से क्या फायदा? यह बात सुनकर भी हम ध्यान कैसे कर सकते हैं? (P12-0032)
- जिससे हम मुक्त होने वाले होते हैं, क्या वह अंत में पीड़ा देता है — चाहे कोई वस्तु हो, व्यक्ति हो, मन हो या शरीर? क्या यह बात ठीक है या मेरा भ्रम है? (P12-0035)
- आपने बताया कि मन शरीर के लिए कार्य करता है। इस मन का प्रयोग हम अच्छे से कैसे कर सकते हैं? (P12-0088)
- मेरे समाज में कोई किसी गरीब को परेशान करता है या दुख देता है, तो मेरा मन दुखी क्यों होता है? (P12-0098)
- गुरुदेव, मन और हृदय में क्या भेद है? (P12-0173)
- गुरु जी, लोग टेंशन भी देते हैं, बातें मारते हैं, मन को दुखी करते हैं। मैं अकेली रहती हूं, तो सामाजिक नहीं बन सकती। (P13-0005)
- गुरु जी, कई बार विचार आता है कि कोई बात नहीं, धीरे-धीरे पार उतर जाएंगे। पूरी ईमानदारी से जीवन जीने में घर-परिवार का भरण-पोषण भी मुश्किल से होगा, दुनियावी तकलीफें सहनी पड़ेंगी, तो मन पीछे हो जाता है कि एक-दो-चार जन्म और लग जाएंगे; ज्ञान तो आ ही गया, ईमानदारी-सत्कर्म-सत्संग पर चलते रहेंगे, धीरे-धीरे कल्याण हो जाएगा। (P13-0042)
- मन में बेचैनी होती है; लगता है कभी वहां घूम आऊं, कभी वहां। तो क्या हम अपने कर्म से भाग रहे हैं? (P13-0046)
- इच्छा उठते ही मन उसी को पूरा सत्य और संसार क्यों मान लेता है, जबकि विवेक भीतर मौजूद है? उस क्षण विवेक को जागृत कैसे करें? (P13-0050)
- मेरा ओवरऑल प्रश्न यह है कि मन, वचन और कर्म — तीनों से जो भी कर्म मेरे द्वारा हो रहा है, उसमें एक साधक के रूप में टोटल मिलाकर क्या भाव रखूं? क्या उसे साक्षी भाव से चेक करूं? और राग-द्वेष छोड़ने के अलावा अपने आप को क्या टारगेट दूं? (P13-0075)
- कड़ी मेहनत के बाद पैसा कमाते हैं पर अपने लिए या किसी अच्छे कार्य में खर्च नहीं कर पाते। ऐसा क्यों होता है और अपने मन को कैसे बदलें? (P13-0116)
- गुरुदेव, मेरे पिताजी 2 महीने पहले गुजर गए, लेकिन मुझे आज भी बहुत तकलीफ हो रही है, कहीं मन नहीं लगता है। क्या करूं? मार्ग प्रदर्शित करें। (P13-0130)
- गुरु जी, मैं शांत होना चाहती हूं — मन से भी और इच्छाओं से भी। (P13-0134)
- कुछ साल पहले मैंने एक वीडियो में एक प्रयोग देखा था कि हर चीज का उल्टा करो — हंसने वाली बात पर हंसो मत, दर्द वाली घटना में शांत रहो। मैंने ऐसा किया; मेरी मां का हॉस्पिटल में इलाज चल रहा था तब भी मेरे चेहरे पर भाव नहीं आ रहा था, जबकि मन में आ रहा था। इस प्रयोग से आखिर हुआ क्या — इसका कोई लाभ था या नुकसान? (P13-0148)
- गुरु जी, चेतना, मन और बुद्धि में क्या अंतर है? विस्तार से समझाइए। (P13-0176)
- गुरु जी, जैसे कबीर जी ने कहा — जन्म-जन्म की मन को मैल लगी है, काला हो गया मन। साधना से यही निकलेगी ना? इस जन्म की तो इतनी ज्यादा नहीं हो सकती। (P13-0198)
- गुरु जी, आजकल हर एक के पास मोबाइल है; रील देखना, टीवी-फिल्म देखना — इसमें मन बहुत सुख महसूस करता है। मगर अगर आत्मा में परमानंद है, तो मन उसे क्यों नहीं महसूस कर पाता? (P14-0009)
- गुरु जी, ध्यान में निर्विचार होना — क्या ये सही है? कभी बैठते हैं तो कोई विचार नहीं, बड़ा गजब का आनंद होता है, उठने का भी मन नहीं करता। (P14-0042)
- गुरु जी, "निर्मल मन जन सो मोहि पावा, मोहि कपट छल छिद्र न भावा" — इसका थोड़ा विश्लेषण कीजिए। (P14-0078)
- गुरु जी, अब तो बस अपने में टिक जाना है, पर इच्छा तो अभी भी आती-जाती दिखती है — आज सुबह आपको ठंडा शर्बत पिलाने की बात मन में आ गई। (P14-0087)
- गुरु जी, ध्यान कौन करता है — मन, शरीर या जीव? (P14-0088)
- गुरु जी, मेरा ज्ञान तो नकारात्मक है — नेति-नेति द्वारा यही ज्ञान होता है कि शरीर, मन, बुद्धि, अहंकार मैं नहीं; कोई आकार, गुण, इच्छा स्थाई नहीं; कर्ता भ्रम है, माया मात्र है। (P14-0104)
- गुरु जी, कभी-कभी मन में वैराग्य का भाव आता है। (P14-0108)
- गुरु जी, मन का समाधान क्या है? (P14-0118)
- ये सब स्वप्न है, मन में संसार है, कुछ नहीं है — फिर भी हम उसी के जाल में फँसे हैं? (P14-0137)
- मेरा मन हमेशा संकल्प-विकल्प में रहता है, बहुत प्रयास करता हूँ लेकिन खत्म नहीं होते। (P14-0163)
- अपने आप को कैसे खोजें? मन में हर पल बेचैनी बनी रहती है, कैसे दूर हो? (P14-0194)
- प्रभु जी, जब आप सत्संग नहीं करते, शांत रहते हो, तब आपके मन की स्थिति क्या होती है? (P15-0015)
- मन की सकारात्मक ऊर्जा को जागृत और जागरूक कर नियमित कैसे रखें? (P15-0043)
- आप कहते हैं मन कुछ नहीं है, और गीता में कृष्ण भगवान कहते हैं अर्जुन मन मुझमें लगा — इसका मतलब क्या? (P15-0052)
- मन को कैसे वश में करें? बहुत भटकाव है। (P15-0053)
- मैंने संन्यास लिया, पर उसके बाद अंदर उदासीपन आ गया, वहाँ रुक नहीं सका; अब गुरु के दूसरे आश्रमों में जाने का मन ही नहीं करता। (P15-0063)
- मन और आत्मा एक ही होते हैं क्या? (P15-0087)
- बचपन से मन में बैठा दिया गया कि दो गुरु नहीं कर सकते, एक ही गुरु से नाम लिया तो उसे बदल नहीं सकते। (P15-0099)
- मेरे भगवान, मैं मन को शरीर रूपी रथ का घोड़ा मानता था, लेकिन आपने बताया कि घोड़ा मन नहीं है, मैं हूं — मिला-जुला के सब कुछ आप ही हो? (P15-0120)
- गुरु जी, जैसे मैं मन के द्वारा कंप्यूटर में सही फाइल खुलवाऊं — सही जगह क्लिक हो — उसके लिए क्या साधना या क्या विधि है? (P15-0122)
- गुरुदेव, हमारे एक मित्र ने बिल्कुल उम्मीद छोड़ दी है, पर इनका मन बहुत भागता है — पता नहीं मन भागता है कि ये स्वयं भागते हैं? (P15-0135)
- गुरुदेव भगवान, विचार जो चलते हैं वह अलग है, और जो मन बताता है वह अलग है? (P15-0139)
- मन के इस जाल में से कैसे बाहर निकलना है? शरीर को जो आदतें लग गई हैं? (P15-0143)
- महाराज जी, कहते हैं कि जिस इंद्रिय के साथ मन होता है तभी वह काम करती है — क्या यह सही है? (P15-0144)
- महाराज जी, कृपा करके बताइए कि कोई आत्मज्ञानी महात्मा अपने मन को किस प्रकार देखते हैं? (P15-0146)
- मन और शरीर की गति एक जैसी नहीं है, फिर भी दोनों के बीच समन्वय कैसे बनेगा? (P15-0149)
- मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार — ये अंतःकरण में, शरीर में कहां रहते हैं? कोई कहता है यह शरीर ही मन है — क्या यह सही है? (P15-0150)
- गुरु जी, मन अपने और आत्मा के लिए कब और कैसे काम करता है? (P15-0152)
- गुरु जी, इस मन की कुछ आदतें होती हैं; इसको अच्छी आदतें कैसे लगाएं? और ये आदतें क्या पूर्व जन्म के संस्कार से हैं? (P15-0158)
- गुरु जी, अवचेतन मन में कैसे प्रवेश करें? (P15-0170)
- गुरुदेव, इतने असंख्य प्रश्न कहां से आते हैं — मन के द्वारा कि अपने आप? (P15-0181)
- गुरुदेव, अब तो कमर अकड़ गई, बैठा भी नहीं जाएगा — यह शरीर बोल रहा है कि मन? और जैसे अभी इतने प्रश्न चल रहे थे, मुझे बाथरूम आ रही थी, मन बोल रहा था कि बाथरूम करके आओ, पर अंदर से आवाज आई कि नहीं, प्रश्नोत्तर चल रहे हैं, ये जरूरी है। (P15-0187)
- जहां भी सत्संग में गए, यही बताया गया कि मन तुमको चला रहा है। क्या सच में मन हमें चलाता है? (P15-0191)
- गुरु जी, मेरा मन काम में नहीं लगता — सिलाई करने में, खाना बनाने में। मंत्र जाप करती हूं, ध्यान करती हूं; जिन गुरु जी ने मंत्र दिया उन्होंने कहा था सब ठीक होगा, लेकिन कुछ नहीं हुआ। क्या करूं? (P16-0012)
- गुरु जी, मेरा पढ़ाई में मन नहीं लगता। मैं क्या करूं? (P16-0024)
- मुझे आत्मज्ञान हो गया है, अब आध्यात्मिक ज्ञान बांटने की इच्छा है, लेकिन मां-पिता सभी खिलाफ हैं। मेरा ना नौकरी में मन है, ना किसी चीज में। (P16-0025)
- गुरु जी, मैं मन से टूट गई हूं। क्या करूं? (P16-0036)
- गुरु जी, किसी जरूरतमंद को देखकर मन दुखी हो जाता है, पर किसी की खुशियों में मन कोई प्रतिक्रिया नहीं देता। क्या मुझ में कोई दोष तो नहीं है? (P16-0067)
- गुरु जी, मुझे लगता है कि मुझे आत्मज्ञान हो गया है, पर मेरा शरीर-मन यह मानने को तैयार नहीं है। क्या करूं? मार्गदर्शन कीजिए। (P16-0081)
- गुरु जी, मैंने अनेक संत-महात्माओं को यह कहते सुना है कि परमात्मा मन और बुद्धि से परे की वस्तु है — मन और बुद्धि से उसे पकड़ा या समझा नहीं जा सकता। क्या यह सच है? (P16-0123)
- तो आपके कहने का मतलब यह है कि मन और बुद्धि के द्वारा केवल स्वयं तक, आत्मा तक पहुंचा जा सकता है, और आत्मा से परमात्मा की यात्रा के लिए बुद्धि की आवश्यकता नहीं है? क्या वहां भी कोई आंतरिक समझ काम करती है? (P16-0124)
- मन और बुद्धि से परे कैसे जाएं? और गुरु जी, मन सीधे आ जाता है या मन से पहले विचार आता है? विचार से पहले क्या आता है? (P16-0127)
- (लाइव) मुझे जीने का मन नहीं करता, और मौत भी नहीं आती। क्या करूं? (P16-0162)
- (लाइव) भगवान के नाम जप में मन क्यों नहीं लगता? (P16-0173)
- (लाइव) गुरुजी, क्या मन की वासना को पूरा करना भी बेईमानी है? (P17-0008)
- आपका भाव रहता था कि मैं जो भी कर रहा हूं — खाना, सोना, रोना, बात करना — मैं अपने लक्ष्य की तरफ ही पहुंच रहा हूं। तो अगर हम पथिक भी अपनी पूरी दिनचर्या में, ईमानदारी और सत्कर्म करते हुए, ये भाव रखें कि जो कुछ मेरे शरीर से, मन से, कल्पना में, डर में हो रहा है, उसका निचोड़ यही है कि मैं अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ रहा हूं, कि मेरा गुरु देख रहा है — तो ये मेरे लिए कितना कारगर होगा? (P17-0023)
- गुरु जी, अंतःकरण — जिसे मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार कहते हैं — ये किस तरीके से काम करते हैं? और "मन को मार गगन चढ़ जाई, मानसरोवर पैठ नहाई" — तो क्या मन को मारना पड़ता है? (P17-0041)
- गुरु जी, हमने कबीर पंथ में पढ़ा कि मन को बुरा बना रखा है — मन को ज्योति निरंजन, काल कहा जाता है, और "अपना रूप पहचान" जीव को कहा जाता है। आप कहते हैं मन सबसे सहायक है — ये कैसे? (P17-0047)
- गुरु जी, कहा जाता है कि मन ही काल है — इस पर क्या कहेंगे? (P17-0050)
- गुरु जी, जो हमारी इंद्रियों के जरिए अनुभव अंदर जा रहा है, वो चित्त में स्टोर होता है — अचेतन मन — और सोते समय या कुछ भी करते समय वहां से चीजें निकल-निकलकर सामने आती हैं, दिमाग में घूमती रहती हैं। इसका क्या करें? (P17-0054)
- गुरु जी, तन, मन और चेतना में क्या फर्क है? (P17-0055)
- गुरुदेव, मुझे क्रोध बहुत आता है — लगता है खून कर दूं। समाज में कोई गलत होता है तो मुझे मारने का मन करता है। क्रोध से बाहर कैसे निकलें, क्रोध को कैसे समझें? (P17-0061)
- गुरु जी, हमारा भी भक्ति करने का बहुत मन होता है, लेकिन परिवार है — क्या करें? (P17-0108)
- गुरु जी, पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश — ये पांच स्थूल तत्व, और मन, बुद्धि, अहंकार — कोई कहता है ये आठों निकृष्ट हैं। क्या भगवान ने निकृष्ट चीजें बनाईं? (P17-0109)
- गुरु जी, अब तक माला-जप, ध्यान सब किया, ऋषिकेश, बनारस, अयोध्या, द्वारका, उज्जैन सब तीर्थ और आश्रम घूमे, पर मन नहीं लगा। अब क्या करना है? (P17-0110)
- गुरु जी, हमसे वैसी तत्परता और तीव्रता क्यों नहीं बनती? अगर अभी भी मौका मिले तो मन कुछ बदलना ही चाहता है। (P17-0153)
- गुरु जी, क्या केवल पापी मन वाली बुद्धि को ही डर लगता है, और जिसके मन में राम और सत्य स्थित हैं उसे कोई भय नहीं लगता? (P17-0169)
- गुरु जी, सत्य वचन सुनकर अगर पीड़ा हो, तो क्या समझ लेना चाहिए कि हमारा मन ही पापी है? (P17-0172)
- गुरु जी, उस समय (आत्मज्ञान की) मन-स्थिति, भाव-स्थिति क्या होती है? (P18-0012)
- गुरु जी, माया का प्रसार समुद्र जैसा है, समाज रुकने नहीं देता, साधना पर चलते ही विघ्न आते हैं और मन बहाने बना देता है। वह कृपा कैसे प्राप्त हो कि व्यक्ति एकनिष्ठ होकर साधन पथ पर चल पाए और पार हो जाए? (P18-0019)
- गुरु जी, साधन पथ में बार-बार अवरोध आता है — गिरते-पड़ते फिर वहीं आ जाते हैं, मन में बड़ी तड़प है। इस अवरोध को कैसे मिटाएं? (P18-0020)
- गुरु जी, "मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः" — मन ही बंधन और मोक्ष का कारण है। मन पर इंद्रियजीत कैसे हों — क्या प्रैक्टिस से अनुशासन बने कि मन बाधक न बने? (P18-0029)
- गुरु जी, कहा जाता है कि नाम जप से मन पर ठहराव आता है — क्या नाम जप से विचार रुक जाते हैं और पिछले कर्म कटते हैं? (P18-0047)
- गुरु जी, कोई नियम लिया है, 10 में से 8 बार हो पाता है, 2 बार चूक जाते हैं तो मन में ग्लानि होती है; कभी लगता है नियम में ही फंस रहे हैं, कोई नियम न रखें — क्या करें? (P18-0057)
- गुरु जी, मन भटकता रहता है — क्या कल्पना करना और फिर उस कल्पना को बार-बार देखकर सही निर्णय लेना ही ध्यान है? (P18-0087)
- गुरु जी, ध्यान करते वक्त मन में परेशानी और घबराहट होती है — मन इतने विचार क्यों देता है, और स्थिरता कैसे बने? (P18-0094)
- गुरु जी, क्या प्रार्थना में ताकत होती है? कर्म करते हुए अच्छे मन से की हुई प्रार्थना फलित होती है? (P18-0101)
- गुरु जी, मन अशांत है, सिर्फ गलत विचार आते हैं — क्या करें? (P18-0103)
- गुरु जी, मैं मन के विचारों से परेशान हूं, मुझे मन से मुक्ति चाहिए। (P18-0107)
- गुरु जी, कभी सामने वाले के मन में यह होता है कि "मुझसे छोटा मुझे ज्ञान दे?" — और अगर हमारे आसपास सब अपने ही ऐसे हों, तो क्या करें? (P18-0119)
- गुरु जी, आपकी और हमारी मनःस्थिति अब बहुत अलग है — जैसे नदी को क्या पता सूखा कैसा लगता है। क्या आप कभी हमारी जैसी स्थिति में थे, और क्या वह याद है? क्या आप हमारी स्थिति को महसूस कर सकते हैं? (P18-0128)
- गुरु जी, जागृत अवस्था में इच्छा नहीं होती, लेकिन मन सपने में अपनी इच्छा पूरी करता है, दृश्य बनाता है — इसे नियंत्रण में कैसे लाएं? (P18-0163)
- गुरु जी, विचार सूक्ष्म हो जाने से क्या होता है? और आत्मज्ञान के बाद शरीर, मन और अंतःकरण में कैसे परिवर्तन आते हैं? (P18-0169)
- गुरु जी, चित्त कभी राग में जाता है कभी द्वेष में, और मन बिना हमारे चाहे रेंडम कहीं भी घूमता है, ऑटोमेटिक विचार आते हैं — इसे कैसे संभालें? क्या विचारों को रोकना है? (P18-0171)
- गुरु जी, आप आत्मज्ञान को उदाहरणों से समझाते हैं, पर उदाहरण भी संसार से, मन की स्मृति से आते हैं, वे तो सिर्फ तर्क और विचार हैं, सत्य नहीं — फिर उनसे आत्मज्ञान कैसे? (P19-0021)
- गुरु जी, मैं कामनाओं को छोड़ने की कोशिश कर रहा हूं, लेकिन पूरा छोड़ नहीं पा रहा — मार्ग दिखाइए। मन मुझे यहां-वहां ले जाता है। (P19-0028)
- गुरु जी, मन का स्थान कहां है? कोई हृदय में बताता है, कोई मन को जड़ कहता है, कोई ज्योति स्वरूप। (P19-0029)
- गुरु जी, जब परमात्मा की ओर दृष्टि जाती है कि हमें मुक्त होना है, तो वहां भी तो मन ही लेकर जाता है? और परमात्मा में मन उतनी ही देर लगता है जितनी देर संसार में, फिर हट जाता है — क्यों? (P19-0030)
- गुरु जी, कबीर साहब ने कहा "मन मरा ना माया मरी, मर मर गया शरीर; आशा तृष्णा ना मरी" — यानी मन नहीं मरेगा तब तक विकार नहीं जाएंगे। आप कहते हैं मन है — तो क्या ज्ञान के बाद मन कमजोर हो जाता है? (P19-0038)
- गुरु जी, मन को कैसे समझाएं? (P19-0076)
- गुरु जी, मैंने "ठीक" शब्द का प्रयोग शुरू कर दिया है, लेकिन मन में फिर भी अच्छा-बुरा का भाव आ जाता है, और सामने वाला भी अच्छा सुनने की उम्मीद करता है। क्या करूं? (P19-0128)
- गुरु जी, ध्यान में मन प्रभु की तरफ नहीं लगता, दैनिक कार्यों की तरफ चला जाता है; घर-परिवार में रहते हुए गहरा ध्यान कैसे करें? (P19-0178)
- गुरु जी, वासना मन से क्यों नहीं जाती, समय-समय पर उठ आती है? (P19-0183)
- गुरु जी, रात को स्वप्न में कामवासना आ जाती है, फिर मन खराब होकर संसार में चला जाता है — इसका समाधान क्या है? (P20-0013)
- गुरु जी, क्या भगवान को पाने के लिए वेद-पुराण-शास्त्र पढ़ना जरूरी है? पढ़ने में मन नहीं लगता, सत्संग सुनने में आनंद आता है। (P20-0038)
- गुरु जी, मन कहता है सब कुछ चाहिए और आप कहते हैं कुछ नहीं चाहिए में टिक जाऊं — यह कैसे संभव है? (P20-0054)
- गुरु जी, क्या परमात्मा को पाना मतलब मन को सही तरीके से सुलझा लेना है? (P20-0090)
- गुरु जी, अवचेतन मन को खाली कैसे करें? (P20-0099)
- मेरी ईमानदारी की कमाई 10 लाख है, उसमें से 5 लाख ज्ञान प्रसारण में लगाना चाहूं तो मन डरता है — कल अस्पताल की जरूरत पड़ी तो? इस डर से कैसे निकलें? (P20-0114)
- गुरु जी, कई साल पहले मुझसे गलती हुई — एक गुरु ने सरेंडर करने को कहा, मैंने नहीं किया, वे चले गए; अब भी मन में घुटन है, क्या करूं? (P20-0141)
- मैंने गुरु के मन को कितना दर्द दिया होगा — क्या ज्ञानी को हमारी गलती से दर्द होता है? (P20-0142)
- गुरु जी, ठीक शब्द अपनाने से लोग धीरे-धीरे दूर हो गए, अब अकेलापन सताता है। मन करता है अपने मार्ग के सत्संगियों के साथ बैठकर बातें करूं, जबकि पहुंचा तो कोई भी नहीं है — क्या यह ठीक है? (P21-0059)
- गुरु जी, कई बार लगता है बस अपने मन की बात करने के लिए कोई चाहिए जो मुझे समझ ले — किसी से जम ही नहीं रही, लोग कहते हैं सारे संसार में तुझे ही कोई नहीं समझ रहा तो शायद तेरे में ही प्रॉब्लम है। क्या करूं? (P21-0060)
- गुरु जी, आज बारिश हो रही थी तो मन ने आने से रोक दिया, जबकि आप भी 12 साल पैरों में छाले लेकर चलते रहे — मन ऐसा क्यों रोक देता है? (P21-0072)
- गुरु जी, बात सब समझ आती है, लेकिन मन फिर उसी तरफ चला जाता है — क्या करें? (P21-0083)
- गुरु जी, आपने कहा शब्द पकड़ो, शब्द वहां तक ले जाएगा — पर शब्द जहां से आएगा वहीं तक ले जाएगा ना? शब्द बुद्धि के तल से, मन के तल से निकल रहा है, तो क्या वह उस निराकार तक ले जाएगा जहां कोई शब्द है ही नहीं? (P21-0085)
- महाराज, बीवी कहती है रोज मंदिर जाओ, पूजा-पाठ करो — वो धक्का देकर भेजती है, पर मेरा मन जाने का नहीं करता। क्या मंदिर न जाने से पाप लगेगा? (P21-0087)
- गुरु जी, मन बहुत चंचल रहता है, इधर-उधर भागता है — उसे कंट्रोल कैसे करें? (P21-0125)
- गुरु जी, जब हम बैठते हैं, अपने में होने का प्रयास करते हैं, तो मन में अलग-अलग विचार चलने लगते हैं — क्या करें? (P21-0136)
- गुरु जी, मेरा मन और बुद्धि जो बताएंगे, उसी हिसाब से तो हम करते हैं — तो करने वाला मन-बुद्धि है ना? (P21-0199)
- गुरु जी, कभी-कभी मन में बहुत लड़ाई — इंटरनल वॉर — होती है; जाना इस तरफ है पर उस तरफ खींचता है, इतना कन्फ्यूजन होता है कि समझ नहीं आता क्या करूं, तो मैं बहुत चिल्लाती हूं; कभी-कभी गुरु से भी गुस्सा आता है। फिर थोड़ी देर बाद अपने को ऑब्जर्व करती हूं तो समाधान मिल जाता है — यह क्या है? (P22-0046)
- गुरु जी, कभी दिमाग में कोई विचार चलता है तो मन उसके साथ एक हो जाता है, फिर उस विचार पर डिसीजन लेने में कन्फ्यूजन आता है — हम सिलेक्शन नहीं कर पाते कि सही क्या है, गलत क्या है। (P22-0067)
- गुरु जी, अगर ऑनलाइन किसी की कॉल आई, सेवा भाव भी है, लेकिन मन में शंका है और जांच-परख नहीं पा रहे — तो क्या मना कर दें? मना कर दिया और वह सच में जरूरतमंद हुआ तो भी पछतावा होगा। (P22-0086)
- गुरु जी, मेरी कमजोरी खाना है। मैं हेल्दी खाती हूं — रोज मूंग दाल खिचड़ी, सुबह दही और फल — लेकिन कभी-कभी समोसा, मिठाई जैसा कुछ खाने का बहुत मन करता है और मैं खा लेती हूं; एक महीना ठीक रहता है, फिर वही। इसे कैसे रेगुलेट करूं? (P22-0099)
- गुरु जी, साधु बनने की शुरुआत में चार चीजें मुख्य बताई जाती हैं — आसन, बासन, सोटा और कमंडल; डंडे को 'कोतवाल' भी कहते हैं, कहते हैं इसे हमेशा हाथ में रखना जरूरी है, इससे पहचान होती है। लेकिन फंसाव भी हो जाता है कि मन कमंडल में ही बस जाता है कि कहीं कोई ले न जाए — क्या इसीलिए आपने सब कुछ खत्म कर दिया? (P22-0120)
- गुरु जी, आप कहते हैं ईमानदारी और सत्कर्म करो; लोग कोशिश कर रहे हैं पर पूरी तरह नहीं आ पाए। जो चीज हमें सिखाई जाती है, मन उसे ना करके दूसरी तरफ जाता है — जैसे बच्चे को बोल दिया कि वहां नहीं जाना है तो उसे वहां का पता ही दे दिया। तो क्या समाज इस कारण खराब हो रहा है कि उसे अच्छा बनाने की कोशिश की गई? (P22-0127)
- गुरु जी, थोड़ा और समझाइए — ये पांच इंद्रियों का सब बाहरी है: खाना बन रहा है तो स्मेल आ रही है, देखने से (जैसे आम का उदाहरण), सुनने से भी मन में वैसा दिखने लगता है। मैं पहले सोच रही थी कि सब मन से हो रहा है। ये समझ में आने के बाद हमें क्या करना है? (P22-0141)
- गुरु जी, पहले भाव बनता है कि एकांत में जाएं, वहां हम अपनी साधना अच्छी तरह से कर पाएंगे; लेकिन जब एकांत मिलता है, सानिध्य मिलता है, तो वहां व्याकुलता होती है, भागने का मन होता है। ऐसा क्यों? हम एकांत को बर्दाश्त क्यों नहीं कर पाते? (P23-0046)
- गुरु जी, विकारों से बचें कैसे? जैसे किसी का ड्रिंक करने का मन हो रहा है, स्मोक करने का मन हो रहा है — यह एक विकार है, अब वह उसके दिमाग में आया तो उससे वह कैसे बचेगा? इसके लिए तो सेल्फ कॉन्फिडेंस, विल पावर होना जरूरी है? (P23-0063)
- गुरु जी, यह उम्मीद रहती कहां पर है — मेरे मन में या मेरी बुद्धि में? (P23-0100)
- गुरुदेव, शरीर, मन और बुद्धि की बात हुई — कुछ लोग इसके पार भाव की बात कहते हैं, कुछ उसे आत्मा का अभिन्न स्वभाव भी बोलते हैं। क्या भाव भी मन-बुद्धि के इसी कार्यक्रम से जुड़ी हुई चीज है? (P23-0101)
- गुरु जी, एक भाषा में कहा जाए तो मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, काम, क्रोध, लोभ — ये सब शरीर में हैं? कुछ लोग अंतःकरण चतुष्टय बताते हैं — मन, बुद्धि, चित्त और आखिर में अहंकार — कि अहंकार नष्ट किए बिना सर्वेश्वर तक नहीं पहुंचोगे। (P23-0103)
- गुरु जी, आप कहते हैं कुछ नहीं चाहिए में आ जाएं — तो जीवन कैसे कटेगा? आम तौर पर तो शरीर और मन की जरूरत पूरी करते-करते जीवन कट जाता है, बड़े दुख मिलते हैं। (P23-0118)
- गुरुदेव, तीन साल से नॉनवेज छोड़ा हुआ है, लेकिन दोस्त बोलते हैं कि होटल में नॉनवेज अच्छा मिलता है, तो मन में आता है एक बार खा लूं, फिर छोड़ दूं। क्या करूं, मार्गदर्शन करें। (P23-0153)
- गुरु जी, मन को कैसे स्थिर किया जाता है? (P23-0171)
- गुरु जी, काम और राम दोनों में मन भागता है, उसका क्या करें? और राम में मन कैसे लगाएं? (P23-0177)
- गुरु जी, 20 साल किताबें पढ़ते-पढ़ते और भटकते-भटकते मैंने मान लिया कि मैं स्वयं ब्रह्म हूं; पर मन में यही रहता है कि ऐसा क्या रह गया, क्या छूट रहा है कि जो मैं हूं वह नहीं हो पा रहा? (P24-0013)
- गुरु जी, शरीर में मन और आत्मा दोनों रहते हैं — क्या मन और शरीर का नाश हो जाएगा? (P24-0014)
- गुरु जी, मन की इच्छा फलीभूत नहीं होती तो दुख होता है। (P24-0046)
- गुरु जी, जब से पति गए हैं, मन बहुत पीछे जाता है, उनकी बहुत याद आती है। क्या करूं? (P24-0133)
- गुरु जी, हम कुत्तों के लिए बिस्किट या टोस्ट एक जगह डाल आते हैं, और एक-दो दिन बाद जाते हैं तो वैसा का वैसा पड़ा मिलता है। मन में आता है कि किसी ने खाया ही नहीं। क्या इसका मतलब प्रकृति हमें सत्कर्म का मौका नहीं दे रही? (P24-0157)
- गुरु जी, नॉनवेज की दुकानें या खुले में बिकता मांस देखकर अंदर से बहुत अलग सा भाव आता है, घृणा सी होती है, मन खराब होता है। ऐसा क्यों होता है और क्या करें? (P24-0159)
- गुरु जी, आपकी यात्रा में कई बार ऐसा समय आया होगा जब मन ने या पूर्व के संस्कारों ने जोर मारकर आपको रोकना चाहा होगा। तब आपने किसका सहारा लिया या क्या प्रयोग किया? (P24-0173)
- गुरु जी, अंदर की यात्रा तो मुझे अब क्लियर है कि क्या करना है, पर बाहर की उलझनें — कुछ सालों से कर्ज की परेशानी है, मेहनत भी कर रहा हूं, फिर भी मन बहुत परेशान रहता है। क्या करूं? (P24-0179)
- गुरु जी, मन की स्थिति हमेशा एक जैसी क्यों नहीं रहती? (P25-0020)
- महाराज जी, यदि अपने ही माता-पिता या परिवार के लोग अज्ञान और अहंकार के वश केवल अपना नियंत्रण चलाना चाहें और हमारे सच्चे प्रेम व दर्द को ना समझें, तो क्या मन में बिना किसी द्वेष के उनसे दूरी बनाकर रहना सही है? (P25-0022)
- गुरु जी, मन क्यों भटकता रहता है? (P25-0050)
- गुरु जी, मन विचारों में चला जाता है। इससे निकलने का प्रयास कैसे करें? (P25-0065)
- गुरु जी, मन के नेगेटिव विचारों से मुक्ति कैसे पाऊं? (P25-0066)
- गुरु जी, मन को पूरी तरह नियंत्रण कैसे करें? (P25-0071)
- गुरु जी, पढ़ाई करने के लिए सबसे अच्छा समय कौन सा है, जब मन पढ़ाई में सबसे ज्यादा फोकस हो? (P25-0106)
- गुरु जी, इस पर थोड़ा बताइए — ये मन कैसे काम करता है? बाहर से जब मन को नहीं मिलता, तब क्या होता है? (P25-0115)
- गुरु जी, जो चीजें मेरी इंद्रियों ने देखीं, चखीं, सुनीं, वो मेरे अंदर संग्रहित हो गईं, और वो जरूरत में काम करती हैं। तो जो मन है, क्या वही हमारे विचारों को चलाता है? (P25-0116)
- गुरु जी, शरीर की पीड़ा सहते हुए "कुछ नहीं चाहिए" कैसे हो? वो तो पहले से पीड़ा में है, तो मन शांत होगा नहीं। (P25-0153)
- गुरु जी, अगर कोई अपमान कर जाए तो क्या करना चाहिए? मन में यह आता है कि कोई अपमान करता है तो कोई लेन-देन हो रहा होगा, तो सह लें? (P25-0157)
- जब मन विरक्त हो गया और मैं सबसे हट गया हूं, तो प्रश्न यह खड़ा होता है कि मेरी उपलब्धि क्यों नहीं? मैं उस परमानंद में क्यों नहीं, आत्म-साक्षात्कार क्यों नहीं? (P25-0191)
- माला फेरते समय मन को वश में कैसे करें? (P26-0029)
- गुरु जी, अगर मैं कम भोजन लूंगा तो मेरा मन तो भोजन में लगा रहेगा, तो चिंतन भोजन का होगा। कृपया मार्गदर्शन करें। (P26-0056)
- गुरु जी, चेतन और अचेतन मन की स्थिति के बारे में विस्तार से बताइए। (P26-0068)
- गुरु जी, मैं अपने पिताजी को कोई बात समझाना चाहता हूं, लेकिन मन में यह है कि बात रखूंगा तो वे नाराज हो जाएंगे। क्या करूं? (P26-0087)
- गुरु जी, मन और आत्मा में क्या फर्क है? (P26-0094)
- गुरु जी, आजकल की भागदौड़ और जिम्मेदारियों से मन विकल हो जाता है। क्या लंबे समय के बाद संन्यास से भी मन ऊब जाता है? (P26-0104)