परिवार और गृहस्थ जीवन — योगी गुरु जी के प्रश्नोत्तर
इस पृष्ठ पर “परिवार और गृहस्थ जीवन” विषय से जुड़े 337 प्रश्न हैं, जो जिज्ञासुओं ने सत्संग में योगी गुरु जी से पूछे। किसी प्रश्न पर क्लिक करके योगी गुरु जी का पूरा उत्तर उनके अपने शब्दों में पढ़ें, वीडियो के साथ।
- सत्संग सुनने के बाद समझदारी तो बहुत बढ़ गई, लेकिन समाज और परिवार से कनेक्ट होना मुश्किल हो रहा है। (P1-0004)
- गुरु जी, मेरे माता-पिता शैतानी स्वभाव के हैं, बेईमानी और मतलब वाले हैं; मेरा दम घुटता है। (P1-0034)
- मैं कुछ दिनों से आपकी बातें सुन रहा हूं और बच्चों व पत्नी को बताता हूं, तो वे मुझे पागल और पुराने विचारों का कहते हैं। (P1-0054)
- परिवार में रहकर आत्मचिंतन कैसे करें? (P1-0076)
- गुरु जी, मेरा अपनी पत्नी से झगड़ा हो जाता है। मैं ज्यादा करना भी नहीं चाहता, फिर भी झगड़ा हो जाता है और बाद में अफसोस होता है। मार्ग दिखाएं। (P1-0093)
- गुरुदेव, मैं जरूरत में जीता हूं। पर पिताजी के पास पैसा है फिर भी वे पैसे के लिए लालायित रहते हैं, और पत्नी की जरूरत तो पूरी कर लेता हूं पर उसकी इच्छाएं पूरी नहीं कर पाता। क्या करूं? (P1-0105)
- मैं अपने दो बच्चों को अकेले संभालती हूं; परिवार वाले कोई साथ नहीं देते। क्या करूं? (P1-0109)
- अगर मेरी पत्नी नहीं सुधरी तो मैं क्या करूं? (P1-0121)
- गुरुदेव, आप घर क्यों छुड़वा रहे हैं? परिवार वाले कहां जाएंगे? क्या अपनी जिम्मेदारी से भागना चाहिए? (P1-0125)
- गुरु जी, एक साल पहले मेरे पति की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई। मेरे दो बच्चे हैं (17 और 20 साल के)। गांव बिहार में है, मैं महाराष्ट्र में अकेले बच्चों के साथ रहती हूं और बहुत घुटन होती है। (P1-0133)
- गुरु जी, यह तो विरोधाभासी हो जाएगा — क्या कोई संत घर-परिवार में रहकर भी सिद्धि प्राप्त कर सकता है? (P1-0150)
- भारतीय माता-पिता का भी एक मुख्य वाक्य होता है — ‘लोग क्या कहेंगे’। इस पर क्या कहेंगे? (P1-0169)
- यह देश पहले अंग्रेजों का गुलाम रहा; वह दासता मुझमें इतनी है कि घर में भी सोचता रहता हूं कि सामने वाला क्या सोच रहा है। पति-पत्नी आपस में सोचते हैं कि यह मेरे बारे में क्या सोच रही थी, मेरा फोन तो नहीं देख लिया, नोटिफिकेशन तो नहीं पढ़ लिया। मैं इतना संकीर्ण हो गया हूं कि अपनी जिंदगी खुलकर भी नहीं जी पा रहा। (P1-0170)
- (गाड़ी के उदाहरण के संदर्भ में) गृहस्थी में या संसार में रहते हुए मैं कैसे महसूस करूं कि मैं फंसा हूं और मुझे गुरु की मदद चाहिए? (P1-0196)
- गुरु जी, कोई नाम लेकर बता रहा है कि आपके परिवार पर टोना-टोटका हुआ है। ऐसी चीजें होती हैं या नहीं? (P2-0011)
- क्या आपने गृहस्थ आश्रम का अनुभव किया है? (P2-0035)
- तो क्या गृहस्थ आश्रम में अपने परिवार के प्रति हमारी संपूर्ण जिम्मेदारी है? (P2-0038)
- अगर मैं ‘कुछ नहीं चाहिए’ के भाव में रहूं, तो क्या ऐसा संभव है कि पहले मेरे माता-पिता का कल्याण हो, मेरा बाद में? (P2-0052)
- क्या साक्षी भाव ही मोक्ष का द्वार है? और रास्ता क्या है? क्या गृहस्थ के लिए साक्षी भाव संभव है? (P2-0053)
- जब हमने अपनी मर्जी से शादी की है, तो मृत्यु तक अपने परिवार को न छोड़ना हमारी जिम्मेदारी है ना? (P2-0057)
- गुरु जी, अगर हम बच्चों से उम्मीद न रखें, तो वे हमसे उम्मीद क्यों रखेंगे? (P2-0103)
- गुरु जी, जीवन में सब अच्छा लगता है, फिर भी आत्मज्ञान की प्यास है। दो बच्चों की जिम्मेदारी भी है, पर आपके साथ हर पल शरीर सहित रहना चाहती हूं। क्या करूं? (P2-0119)
- अब तक भौतिक चीजें (किसी की ड्रेस, गाड़ी, घर) मुझे प्रभावित करती थीं, क्योंकि मुझमें कमी थी; अब मैं समझ गई कि उनसे फर्क नहीं पड़ना चाहिए, मेरे पास जो है वह पर्याप्त है। अब मुझे संतों का, मानवता वाले सज्जन लोगों का तेज आकर्षित करता है — जैसे बच्चे विवेकानंद जी की फोटो और उनका स्लोगन लगाकर रखते हैं। ऐसे चित्र और आदर्श मेरे व्यक्तित्व को बदलने में कितना काम करते हैं? (P2-0162)
- योगी जी, कई गर्भवती माताएं भी ऐसी फोटो सामने लगा लेती हैं और कहा जाता है कि जैसी फोटो देखोगी, वैसा बच्चा होगा, बार-बार याद करने से बच्चे में वे गुण आ जाते हैं। क्या वह काम नहीं करता? (P2-0163)
- कई गृहस्थ माताएं-बहनें हैं जिनके बच्चे और पति उन्हें पूरी आजादी देते हैं, काम के लिए नौकर भी रख देते हैं, कि आप पूरी तरह अध्यात्म में रहो; फिर भी वे आधा समय वैराग्य और भगवान की बातें करती हैं और आधा समय घर के हर काम में दखल देती हैं — बहू क्या कर रही है, रसोई में तेल-घी ज्यादा क्यों। घर वाले भी दुखी हो जाते हैं। ऐसा व्यक्ति अगर मेरे परिवार में हो, तो हम उसके लिए क्या कर सकते हैं? (P2-0170)
- लोग, खासकर जवानी बीतने के बाद, कहते हैं — काश मेरे पिता ने, या पति-पत्नी ने ऐसा कर दिया होता, तो आज मैं कहीं और होता। क्या यह दोष देना फालतू है, और सब इस जीवात्मा का ही चुनाव होता है? (P2-0175)
- गृहस्थ मान लेते हैं कि मैं फंस गया — घर वालों ने शादी कर दी, अब बच्चे हो गए, किसके सहारे छोड़कर जाऊं; बच्चे बड़े हो जाएं तो कहते हैं अभी तो इनकी शादी हुई है। बाहर से बहुत दुखी, मजबूर दिखते हैं — मैं बैल बन गया, सबके लिए किया, अपने लिए वक्त ही नहीं निकाला। उनका असली चेहरा कौन सा है? (P2-0177)
- आपने कहा कि उपयोग तुमने किया है — पर अगर किसी की बचपन में शादी हो गई, तो उसे याद ही नहीं कि उसने कब उपयोग किया? (P2-0178)
- ज्ञान होने तक तो ये घाव बार-बार हरे हो जाते हैं; याद आते ही मन घृणा से भर जाता है और न चाहते हुए भी उनके लिए बद्दुआएं निकल जाती हैं। फिर डर लगता है कि इस द्वेष से मैंने फिर कर्म-बंधन बांध लिया। अगर ज्ञान से पहले शरीर छूट गया, तो क्या इस द्वेष के कारण मैं फिर उन्हीं के इर्द-गिर्द, उनके परिवार में पैदा हो जाऊंगा — वही चक्र, जिसे मैं तोड़ना चाहता हूं? (P2-0184)
- गैर-जिम्मेदार व्यक्ति परिवार की जिम्मेदारी पर कहता है — मैं इतना ही कर पा रहा हूं, इस स्तर का काम मैं नहीं करूंगा, मेरी भी सेल्फ-रिस्पेक्ट है, मुझे टॉर्चर मत करो; यह मेरी आत्मरक्षा है। क्या यह आत्मरक्षा है? (P2-0188)
- धार्मिक भी और गृहस्थी भी अच्छे से निभाना चाहने वाला व्यक्ति कई बार धर्मसंकट में फंस जाता है — वह ऐसा निर्णय चाहता है जो सबके हित में हो, जिसमें उसका निजी स्वार्थ न हो, वह निर्लेप भी रहे और कर्तव्य भी निभ जाए; पर तय नहीं कर पाता कि क्या सही है। अच्छे सलाहकार भी आजकल मिलते नहीं — या चापलूसी करते हैं। ऐसे व्यक्ति को निर्णय कैसे लेना चाहिए? (P2-0189)
- कोई संन्यासी हो या गृहस्थ में रहकर धार्मिक जीवन जी रहा हो — वह किस बात से अपनी जांच करे कि मैं कहीं पहुंच भी पा रहा हूं या नहीं? (P2-0192)
- गृहस्थ जीवन में डर और असुरक्षा सताती रहती है — कल मेरा क्या होगा। जवानी में दौड़कर पैसे, घर, बैंक बैलेंस, जानकारियां और सोशल सर्कल इकट्ठे किए ताकि सुरक्षित महसूस हो, फिर भी एकांत या दुख में लगता है कोई किसी का नहीं। आपकी व्यक्तित्व में जो निश्चितता-स्थिरता आई है, वह मैं अपने अंदर कैसे लाऊं? अपूर्णता से पूर्णता की तरफ जल्दी कैसे बढ़ूं? अध्यात्म में बाहर जैसी प्रगति नहीं दिखती, तो डर लगता है कहीं मैं नई दुनिया तो नहीं बसा ली — मार्गदर्शन करें। (P2-0199)
- गृहस्थ मुखिया को दिन में वैराग्य की लहर आती है — कोलू का बैल बन गया, भागने का मन; फिर जिम्मेदारी और रोटी-छत की चिंता से लहर ठंडी पड़ जाती है। वैराग्य की गर्मी बनाए रखते हुए जिम्मेवारियां निभाते हुए अध्यात्म में रोज कदम कैसे बढ़ाएं? (P3-0002)
- गृहस्थ में काम-धंधा भी देखना होता है; आजकल किताबें-पत्रिकाएं-सोशल मीडिया में नकली-असली का भ्रम बहुत है। प्रयाग में नागा साधु पैसे मांगते देखे, आईटीन बाबा आदि — फक्कड़-दिगंबर पहचान नहीं आती। गुरु की खोज और शास्त्र कैसे चुनूं कि वैराग्य धूमिल न हो, कोई बेवकूफ न बना दे, और नब्बे साल घूमते रहकर भी न पहुंचूं जैसी हालत न हो? गृहस्थ में वैराग्य की प्रचंडता कैसे बनी रहे? (P3-0003)
- पार्टनर या परिवार वाले अध्यात्म में रुचि नहीं रखते; लालच-कहानी-जबरदस्ती से पढ़ाने का प्रयास करते हैं। सीमा दीदी जैसी भाव से सेवा करती हैं पर अध्यात्म से मतलब नहीं। क्या हमें उन्हें खींचना चाहिए या अपनी ऊर्जा बचाकर अपनी यात्रा पर फोकस करें? (P3-0006)
- लाइव पर गृहस्थ सुन रहे हैं जिनके पार्टनर को इंटरेस्ट नहीं; लालच देकर सुनाने की कोशिश करते हैं। पार्टनर के साथ कितनी मेहनत करें? (P3-0009)
- कृपा किसको, किस पर करनी है? परिवार-समाज में ईमानदारी से सब देकर भी जब टूटता हूं तो करुणानिधि से कृपा मांगता हूं; भाव कुछ दिन ठहरता है फिर वैराग्य ढीला पड़ जाता है और वही रूटीन। भाव स्थिर रखने के लिए कृपा उन पर बरसे या मुझे खुद पर कृपा करनी है? (P3-0020)
- भिखारी बच्चों / गोद में बच्चा लेकर मांगने वालों को दें? पेन बेचने वाली चाल? (P3-0034)
- अटैचमेंट तोड़ना दर्दनाक लगता है — परिवार छोड़ो कैसे? उपलब्धि के लिए अटैचमेंट कितना टूटे? (P3-0040)
- मां-बाप बच्चों को आध्यात्मिक शिक्षा कैसे दें? मैरिज से पहले तैयारी? (P3-0042)
- समझ आती है पर दृढ़ता/स्ट्रॉन्ग पावर नहीं — परिवार बैकग्राउंड आध्यात्मिक नहीं। क्या करें? गिरने का डर? (P3-0049)
- ईमानदारी गहराई से? बच्चे की गाली पर क्या? (P3-0055)
- आध्यात्मिक मार्ग पर कैसे जियें? शादी से पहले क्या बताएं? (P3-0073)
- अविवाहित युवक — मां-बाप सक्षम/स्वस्थ, बहनों की शादी; आध्यात्म में पूरी तरह जा सकता है या दायित्व पहले? (P3-0077)
- परिवार पहचान पर दर्द — अपना-पराया क्या? मार्गदर्शन? (P3-0081)
- बच्चों/दूसरों पर ज्ञान-फैसला थोपें? अपना-पराया खुलकर? (P3-0084)
- दुकान वाली बात तो ठीक, पर हम गृहस्थ में परिवारजनों के बीच रहते हैं, जहां तन-मन-धन तीनों तरह से लेनदेन चलता ही है। अगर हम उन्हें धन से सपोर्ट करते हैं तो उम्मीद रहती है कि वे लौटाएं, पर मांगते नहीं बनता और घुटन होती है। ऐसे हिसाब-किताब से कैसे निकलें? (P3-0086)
- गृहस्थी में बैलेंस कैसे बनाएं — संन्यासी वाली सीधी बात पर हम एकदम नहीं आ सकते। क्या रिश्तों की बुनियाद में मुझे यह देखना पड़ेगा कि वहां मेरी जिम्मेदारी है या वह व्यक्ति मेरा पैसा यूज़ करके कुछ और कर रहा है? अगर जिम्मेदारी बनती है तो क्या पैसा न देखकर, अपने से बचाकर भी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए? (उदाहरण: किसी का टिकट कराया — क्या उससे स्तर उठता है?) (P3-0088)
- एक माता जी: मैं कई बार सोचकर पछताती हूं कि यह सब — सही-गलत क्या है, मैं कहां हूं — हमें हमारे परिवार ने क्यों नहीं बताया? किसी को कुछ पता हो तो बताना तो चाहिए। (P3-0097)
- (लाइव) गुरु जी, हमारे परिवार में तो कोई नहीं समझता कि आध्यात्मिक क्या होता है। (P3-0118)
- (लाइव) गुरु जी, यह मार्ग तो बहुत पीड़ादायक है, सबकी हिम्मत नहीं होती इस पर चलने की। मैं भी सत्य को खोजना चाहता हूं, लेकिन जब मैं अध्यात्म की बात करता हूं तो पूरा परिवार और समाज मेरे विरुद्ध खड़ा हो जाता है। (P3-0122)
- परिवार कहता है — हमने तुम्हारे लिए किया, तुमने माल खाया है तो भरपाई करो। इस हिसाब का क्या करें? भरपाई करने का सही तरीका क्या है? (P3-0132)
- गुरु जी, जरूरत में शादी भी की, बच्चे भी पैदा किए, लेकिन अब सत्कर्म और ईमान के मार्ग पर चल रहे हैं। हम सबको साथ लेकर चलने की पूरी भावना रखते हैं, लेकिन सामने वाला चलने को ही तैयार नहीं — वह कहता है हम तो लिप्त हैं। तब क्या करें? (P3-0133)
- गुरुदेव, मां-बाप की करोड़ों की स्टेट बच्चों को मिलती है — उसका क्या? और समझ तो अभी आई है, बदलाव अभी कर रहे हैं, पर परिवार ने पहले के हिसाब से इच्छाएं पाल ली हैं और कहते हैं ऐसा तो हो ही नहीं सकता — तो क्या करें? (P3-0134)
- (लाइव) गुरु जी, अगर माता-पिता में कमी या दोष दिखाई दे और यह महसूस हो, तो क्या करें? (P3-0163)
- (कुटिया में, तीसरी बार आए साधक) यहां के सिवा वहां कुछ नहीं है; मजबूरी में घर जा रहा हूं क्योंकि परिवार है, लड़का 12 साल का है — आपने बताया कि बच्चों की शादी तक जवाबदारी निभानी है। पर वहां अपने जैसे लोग और माहौल नहीं मिलता, जाने में बहुत तकलीफ होती है; यह मजबूरी बिल्कुल अच्छी नहीं लगती, वहां के लोगों के साथ रहने में बहुत दिक्कत होती है। (P3-0177)
- (कुटिया में, 62 वर्षीय साधक) 30-40 साल पूजा-पाठ किया — रोज हनुमान चालीसा, दुर्गा सप्तशती, काली स्तोत्र, चारों धाम घूमा — पर कुछ नहीं मिला। तांत्रिक लाखों रुपए खा गए, कोई झगड़े नहीं सुलझा पाया; 15-20 लाख का कर्जा है, केस चल रहे हैं, बहुओं वाले झगड़ों से घर बिखर गया। हमने जीवन में किसी का बुरा नहीं किया, किसी को परेशान नहीं किया — फिर हमारे साथ ऐसा क्यों हुआ? पत्नी ने ही धक्का देकर यहां भेजा है। (P3-0178)
- (वही साधक) मेरी पत्नी अनपढ़ है, कुछ समझती नहीं; लोग उसका अपमान करते हैं कि अनपढ़ है। (P3-0179)
- (कुटिया में साधक) आप आत्मज्ञान, आत्मचिंतन, आत्मबोध, आत्मा और जीव की बात करते हैं — ये ज्यादा समझ में नहीं आते। आत्मा हम तो हैं, यह समझ में आता है, लेकिन ये आत्मा कहां पर है? इन्हें थोड़ा क्लियर कर दीजिए। क्या मैं ही सब कुछ हूं? और क्या हमें फिर से बच्चे जैसा (सारी जानकारी से खाली) हो जाना है? (P3-0184)
- (वही साधिका) जातिवाद जैसी जानकारियां समाज के लेवल पर ठीक है, लेकिन मैं इंटरनल जर्नी — अंदरूनी, मानसिक यात्रा — की बात कर रही हूं। मेरी अंदरूनी कामनाएं ही तो बाहरी रूप लेती हैं। जैसे मेरी जीभ का आकर्षण या देखने का आकर्षण — उसकी किसी ने जानकारी नहीं दी, वो अंदरूनी है। एक ही घर में पले बच्चों में भी किसी को घर का स्वाद, घर के लोग पसंद नहीं आते, पड़ोस की चीजें आकर्षित करती हैं — तो वह आकर्षण तो मेरे भीतर ही हुआ ना? क्या बाहर वाली जानकारियां ही मेरी इच्छा पैदा करती हैं? (P3-0188)
- (लाइव) गुरु जी प्रणाम। मेरे घर में चोरी की कमाई और मांस-मदिरा का माहौल है। मैं खुद मेहनत की कमाई खाता हूं और इन सबसे दूर रहता हूं, पर रहना उसी घर में पड़ता है। क्या ऐसे माहौल में मेरी और मेरी पत्नी की भक्ति बच पाएगी? (P3-0198)
- (लाइव) प्रणाम योगी जी। मैं शेयरिंग स्टूडेंट अपार्टमेंट में रहती हूं। दूसरे देशों के बच्चे मांस खाते हैं और शराब पीते हैं। मैं ना तो उन्हें रोकती हूं, और ना ही जब वे ये खाना बनाते हैं तो उनके साथ बाहर जाती हूं। क्या मैं सही हूं? (P4-0026)
- (लाइव) योगी जी, क्या आत्मज्ञान के लिए परिवार को छोड़ना जरूरी है? (P4-0057)
- (कुटिया में साधक) मैं एक मां को गले लगा रहा हूं, एक पत्नी को गले लगा रहा हूं — दोनों में भाव का अंतर रहता है। तो ये भाव कैसे प्रकट होता है? (P4-0065)
- (कुटिया में, एक शिक्षक साधक) आप (किसी शहर में) तीन दिन — रोज दो घंटा — सत्संग के लिए आ सकते हैं? (गोयल जी ने 6 लाख देकर सत्संग कराया था।) मन तो है कि मैं भी करवाऊं, लेकिन इतनी ताकत नहीं — 1 लाख पगार है, पर साथ में 10 लाख का कर्जा है। और हम (घर-परिवार से) अलग में हैं, इसलिए भगवान का भाग निकालना समझ में आता है। (P4-0067)
- (लाइव) गुरु जी, आपके अनुसार यदि कृष्ण के माता-पिता को उनका कर्म फल कंस के द्वारा मिला, तो फिर कंस को (उसका) कर्म फल क्यों मिलेगा? (P4-0071)
- (कुटिया में साधक) योगी जी, हमने इतनी भारी जानकारियां इकट्ठी कर ली हैं और उसी से हम परेशान हैं। तो क्या एक अबोध बच्चे को हम भारी जानकारी ना दें — ये एक्सपेरिमेंट करें कि इसको कोई जानकारी मत दो — तो क्या हमारी अपेक्षा उस बच्चे की यात्रा जल्दी होगी? (P4-0095)
- (लाइव) नर्मदे हर गुरु जी। मेरे पति शांत हो चुके हैं (गुजर चुके हैं)। मैं बहुत टूट चुकी हूं, मेरे चार बच्चे हैं, मेरा किसी काम में मन नहीं लगता है। मेरा मार्गदर्शन करें। (P4-0099)
- (लाइव) प्रणाम गुरु जी। समर्थ परिवार में जिज्ञासु का माता-पिता के प्रति क्या कर्तव्य होना चाहिए? (P4-0114)
- (कुटिया में साधक, पेंशनर) मैं जहां रहता था वहां धन से सेवा करता था — खाने-पीने के अलावा बाकी पैसे मैं रखता नहीं था, सेवा-सत्संग में लगा देता था। परिवार से विवाद हुआ तो निकल गया, आठ महीने बागेश्वर में रहा, वहीं आपका वीडियो मिला और तुरंत सब समझ में आ गया। अब यहां आ गया तो मेरा पैसा किसी काम में नहीं आ रहा; परिवार वाले उसे खा जाएंगे। मैं चाहता हूं कि वह पैसा यहां सेवा में लगा दूं — किसको, कैसे दूं? (P4-0132)
- (लाइव) गुरु जी प्रणाम। मेरी पहली पत्नी के साथ 11 वर्ष से कोर्ट में तलाक का केस चल रहा है। आज मैं एक अन्य महिला के साथ प्रेम संबंध में रह रहा हूं — तो क्या यह गलत है? (P4-0137)
- (लाइव) गुरु जी नमन। मैं गृहस्थी में हूं और (इससे) निकलना चाहती हूं, तो क्या करूं? (P4-0147)
- (लाइव) योगी जी प्रणाम। आपके मिलने से पहले ही मैं आपके जैसे गुरु खोज रही थी। जब आप मिल गए तो मैं पूरी तरीके से उसमें जी नहीं पा रही हूं, क्योंकि गृहस्थी में हूं, छोटे बच्चे हैं, उनका भी ध्यान रखना होता है। कैसे मैनेज करूं? (P4-0150)
- (कुटिया में साधिका ने बुल्ले शाह की कहानी सुनाई — गुरु के आदेश से शादी में गया, गुरु भाई से बात नहीं की, गुरु ने आश्रम में आने से मना कर दिया, और 12 साल बाद किन्नर बनकर नाचते हुए गुरु को रिझाया।) बुल्ले शाह की गलती तो बस इतनी थी कि बात नहीं की — फिर गुरु को उसे वापस अपनाने में 12 साल क्यों लगे? (P4-0163)
- (वही साधिका, अपने दो बच्चों के बारे में) आपने विवाह नहीं किया — ये दोनों भी कहते हैं विवाह नहीं करेंगे। किसको विवाह करना चाहिए, किसको नहीं? और कैसे पता चले कि जरूरत है या नहीं? (P4-0192)
- (वही साधिका) मेरी शादी बचपन में 14-15 साल में हो गई, दो बच्चे हो गए। अध्यात्म में आने के बाद मेरी कोई ख्वाहिश, इच्छा नहीं बची — पति के साथ हूं, पर वो अब भी फिजिकल प्यार चाहते हैं, और मेरा माइंडसेट अध्यात्म में हो गया है, मेरी बॉडी उस चीज को एग्री नहीं करती। तो क्या मेरी जिम्मेदारी बनती है? उनके लिए क्या करूं? (P4-0193)
- (कुटिया में एक और साधिका, जिनका भी बाल विवाह हुआ; पति बहुत परिवार-प्रेमी हैं, अब फिजिकल रिलेशन भी नहीं चाहते, पर कहते हैं कहीं भी जाओ, बस वापस घर आ जाना) — उन्हें क्या कहूं? (P4-0194)
- (वही साधिका) मेरे एक मित्र कहते थे कि पत्नी के बिना नहीं रह सकते; पत्नी अचानक मर गई, और शव के पास ही वो पूछ रहे थे कि अब मेरी दूसरी शादी कैसे होगी। (क्या वो आत्मा यह सुनकर मुक्ति की तरफ बढ़ेगी?) और क्या पुनर्जन्म, सूक्ष्म शरीर वगैरह होता है? आचार्य प्रशांत जी कहते हैं कि शरीर मिट्टी से पैदा होकर मिट्टी में मिल जाता है, इसके बाद कुछ नहीं। (P4-0195)
- (वही साधिका) मां बताती हैं कि बचपन में मैं विषखोपड़ा उठाकर मुंह में डाल रही थी — अब नहीं डालूंगी, क्योंकि समझ मिल गई। बच्चे के अंदर भूख तो नेचुरल थी... (इससे क्या समझें?) (P5-0004)
- (कुटिया में एक युवक) आपने कहा था कि शादी जरूरत हो तो करो — मैं खुद को चेक कर रहा हूं। हर एक महीने या 40 दिन में एक बार काम-वासना बहुत तंग करती है, बाकी 39 दिन कुछ नहीं रहता। इसका मतलब मुझे जरूरत है या नहीं, कैसे समझूं? और उससे मुक्त होने के लिए कोई गलत रास्ता न चुन लूं, इसकी जानकारी कैसे हो? (P5-0005)
- (कुटिया में एक साधिका, जो प्रोफेसर रही हैं, युवक के प्रश्न पर) — हो सकता है शादी न करने वाले भी वो काम कर लेते हों; पर जरूरी तो नहीं हर कोई कर रहा होगा, अपवाद भी तो होता है। कोई कहता है 80% हो रहा है, कोई कहता है 1% — इसमें सही क्या है? (P5-0006)
- (वही साधिका) बहुत से थॉट्स आते हैं — कुछ बनना है, कुछ करना है — तो फैमिली का थॉट आता है कि इन्हें छोड़कर जाएंगे तो पीछे इनका ध्यान कौन रखेगा; बाहर निकल भी जाते हैं तो लगता है वहां ठीक नहीं चल रहा, और टारगेट रुक-रुक जाता है। मदर का केयर करना मेरी प्रायोरिटी है, पर फिर आवाज आती है कि आत्मा की भूख का क्या हुआ। जिम्मेदारी लेना चाहते हैं पर हैंड-ओवर नहीं की जा रही, और जो (परिवार का) शिप चला रहा है वो अच्छे से नहीं चला रहा — तो क्या किया जाए? (P5-0009)
- (वही साधिका) जैसे आप यहां हरियाली में रह रहे हैं, मेरा भी दिल करता है कि मेरा अपना आश्रम हो, नदी किनारे — पर एक लेडी होकर, अकेली लड़की अगर आपकी तरह घूमना चालू करूं, तो दस सवाल उठेंगे कि तुमने शादी क्यों नहीं की, ऐसे ही घूमते रहोगे? (P5-0010)
- परिवार में रहकर पहले ईमानदार कैसे बनूं? ईमानदारी का परिणाम नुकसान भी हो सकता है तो क्या करें? (P5-0059)
- (गुरुद्वारा सेवक) अरदास में बीमारी-शादी आदि के लिए प्रार्थना करनी पड़ती है — ड्यूटी है। क्या करें? (P5-0084)
- साधना के लिए घर छोड़ने वाले के माता-पिता की सहायता कैसे होती है? (P5-0107)
- परिवार/लोग विवश-परेशान करें तो क्या? बंधन कैसे बनता है? उकसाने पर क्रोध क्यों? (P5-0121)
- बच्चों के भविष्य के लिए पैसा कमाना चाहिए? बच्चों के बारे में सोचना सही? (P5-0126)
- ज्ञान/भगवत् प्राप्ति पर आवागमन मिटे, संसार चले — आत्मा कहां? मुक्ति किसकी जब आत्मा स्वतंत्र? माता-पत्नी झगड़कर अलग — क्या करें? (P5-0131)
- भोग की इच्छा भी है और भोग से मुक्ति की भी — कौन सा रास्ता? शादी करूं या नहीं? (P5-0140)
- सांसारिक कार्य होते आत्मज्ञान हो सकता है? गृहस्थ में आगे बढ़ रहे हैं कैसे जांचें? आपकी साधना चल रही? खाली समय में क्या सोचें? लेनदेन कितना बाकी? (P5-0147)
- क्या किस्मत में बच्चों का सुख नहीं लिखा? गलत शब्द सुनकर जल्दी आवेश कैसे बचे? (P5-0160)
- आत्मज्ञान की राह पर मित्र-परिवार-समाज छूटने लगता है — समाज में कैसे रहें? (P5-0169)
- स्त्री शरीर में सत्संग मार्ग पर चलना चाहे और शादी न करना चाहे तो अपराध/पाप तो नहीं? (P5-0185)
- पत्नी मेरे ऊपर निर्भर है — आध्यात्म में कैसे आगे बढ़ूं? (P5-0192)
- बच्चे की हर इच्छा पूरी कर दूं ताकि फ्री हो जाए — सही है? (P5-0197)
- मुसलमान से द्वेष होता है; रिश्तेदार ने मुसलमान से शादी की — क्या करें? (P6-0008)
- बच्चे-मकान-गाड़ी सुप्रीम करने के बाद भी sufficiency का प्रश्न क्यों? (P6-0031)
- किसी के सानिध्य में मानकर जानकारी मिली, फिर कुछ समय बाद लगा कि यह धोखा है, अभी अधूरा है, कहीं और सुनने से लगा कि पूरा होना बाकी है। फूल में खुशबू के साथ रस और ऊर्जा भी है, यह पहले नहीं जाना था। शरीर जल जाए तो ऊर्जा वहीं की वहीं रहती है। पहले भान था कि आत्मा शरीर के अंदर है, मैं आत्मा हूं। विवेक बढ़ने पर लगा कि अपने आप को आत्मा मान लेना भी धोखा है, क्योंकि किसी के कहने से माना है, प्रत्यक्ष नहीं हुआ। बोध कैसे होगा, कोई बताता नहीं। सन् दो हजार पांच से अलग अलग महात्माओं, साधुओं और संतों के पास रहा, गृहस्थ में रहा। उन्हें पूरा ज्ञान नहीं, ऐसा वे नहीं कहते। किसी और का ज्ञान सुनकर भीतर थोड़ा विवेक जागता है, जैसे नर्सरी से एलकेजी या फर्स्ट में आ गए, फिर लगता है अभी और बाकी है। कुछ समय तृप्ति रहती है, खिलौने जैसी, फिर खिलौना लगने लगता है। ऐसे निमित्त और अधूरे लगने वाले ज्ञान को कैसे देखें? (P6-0042)
- योगी जी नमन। पंजाब से एक बहन है, छह महीने पहले शादी हुई। डेढ़ साल पहले भाई को वीडियो मिली, उनकी रुचि थी, बहन का यह मार्ग नहीं था। कुटिया आने से पहले बहन कहती थी कि मैं बहुत बातें करती हूं, मैं यहां रह नहीं पाऊंगी। फिर भी नियम ऐसे सहज स्वीकार हो गए कि नियम लगे ही नहीं। बैठने का कोई काम नहीं, फिर भी पूरे समय सहज बैठी रहती है, किसी को देखती नहीं। भाई की ओवरथिंकिंग छूट गई, बहन वीडियो कम सुनती है, और दोनों निरंतर नियम में हैं। जिज्ञासा यह है कि एक जीवात्मा अपनी यात्रा के लिए इतनी उत्सुक कैसे हो जाती है? किस मोड़ से अपने आप को निकालना चाहती है? प्रत्यक्ष ज्ञान निमित्त बना, शादी हुई, और ऐसी जगह आना जैसे यह बहुत आवश्यक हो। यह संभव कैसे हो पाया? क्या वह कोरे कागज की तरह समझ रही है? और जो पहले कुछ पढ़कर या कोई प्रक्रिया करके आता है, उसका मन तुलना में लग जाता है, यहां ऐसा क्यों नहीं, वैसा क्यों नहीं, कुछ हो नहीं रहा, इतने दिन हो गए, तो क्या पिछला छोड़कर यहीं समझना चाहिए? (P6-0054)
- योगी जी नमन। जब मैं सत्संग सुनता हूं तो मेरी पत्नी मेरे पास आकर बच्चों को आवाज देती है, तो मुझे गुस्सा आ जाता है। मैं उससे कैसे बचूं? (P6-0056)
- एक संसारी को फिलहाल एक ही कारण नजर आ रहा है कि मैं इसी से दुखी हूं, प्रपंच नजर नहीं आता। जैसे पड़ोसी पसंद नहीं और मन में आता है कि यह मर जाए, आज यह मर जाए, कल वो मर जाए। उस कारण तक चला भी जाऊं तो अपने स्वभाव को कैसे सुधारूं? वह भाव गंदी आदत लगता ही नहीं, मैं यही जानना चाहता हूं। अगर अपनी स्थिति बुरी लगती ही नहीं तो कैसे चेक करूं? परिवार से जानकारी मिली कि उनसे रंजिश है, दुश्मनी है, उन्होंने हमारे किसी को मारा, मैंने खुद नहीं देखा, फिर भी भाव बन गया कि यह मर जाना चाहिए, मैं ही उड़ा दूं, जबकि वो भी योजना बना रहे होंगे। गली में रेड़ी वाले का रेट ना भाए तो बद्दुआ, गाली और अपमान तक निकल आता है। मैं खुद परेशान हूं और वो अड़चन भी डाल रहे हैं। ऐसे में अपनी स्थिति कैसे जानूं, यह भाव क्यों उठ रहा है, और मैं इसमें क्यों लिप्त हो रहा हूं? (P6-0061)
- जो गृहस्थ में रहता है और यहां एक-एक महीने के लिए आता है, क्या उसका भी बारह साल में कल्याण हो जाएगा? क्या यह पक्का है? (P6-0063)
- पुरानी बातें अब घुटन देती हैं। घर में झगड़े होते थे। इस मार्ग पर चल रही हूं, तो वही बातें सताती हैं, पहले नहीं सताती थीं। शादी हमारी आपस की मर्जी से हुई थी, घर वालों को पसंद नहीं थी, रोज झगड़ा होता था। अब घर में अच्छा नहीं लगता। स्कूटर आते ही लगने लगता है कि कहीं चली जाऊं। इन पुरानी बातों से कैसे छूटूं? (P6-0072)
- भोपाल से इंदौर जनरल टिकट पर आया। बोगी भरी थी और इम्प्लांट की वजह से नीचे नहीं बैठ सकता था, इसलिए स्लीपर में जगह देखकर बैठ गया। क्या यह बेईमानी हुई? दुकान पर तंबाकू बेचता हूं, खुद नहीं खाता, क्योंकि उसे गलत मानता हूं। ग्राहक दूसरी दुकान चले जाएंगे तो क्या करूं? शादी नहीं की, बच्चे नहीं हैं। घर वाले उम्र और गर्मी कहकर रोकते हैं। आध्यात्म में बीस-पच्चीस साल हो गए, स्वामी राम के सत्संग में भी रहा, फिर भी वह जगह नहीं छूटती। दुकान का सामान पिछले साल भी पड़ा था। बात करने से मना है, जरूरत में बोल सकता हूं क्या? दुकान पर मच्छर आते हैं, अहिंसा नहीं रहती। कमाई के लिए दुकान जरूरी लगती है। हैंडीकैप की पेंशन एक हजार मिलती है। दो महीने से ज्यादा बाहर रहूं तो रद्द करने की बात होती है। गायों को खाना देता हूं तो पड़ोसी परेशान होते हैं। मुझे क्या करना चाहिए? (P6-0074)
- जो परिवार छोड़कर केवल ध्यान लगाता है, आकाशवृत्ति से रहता है, धन नहीं जोड़ता, उसे गाली और मार भी मिलती है। उसका क्या होता है? कृष्ण ने अर्जुन को आत्मभाव में टिकने के लिए भी कहा था, तो कर्म का सिद्धांत क्यों बताया? अर्जुन आत्म तत्व में कैसे स्थिर हुए? और क्या मैं शुद्ध आत्मा हूं कहना भी एक विधि है, जिससे कल्याण नहीं होता? (P6-0077)
- सीता माता की तरह बार-बार परीक्षा ली जाए और समाज कभी पवित्र न माने, तो क्या करना चाहिए? बेटा, पत्नी या पिता, किसी को कभी पूरा नहीं भरा जा सकता। क्या शुरुआत ही न करके निकल जाना ठीक है? (P6-0082)
- सात्विक, राजसी और तामसी, तीनों गुणों में रहते हुए हर जगह युद्ध क्यों बना रहता है? परिवार में रोज इल्जाम लगते हों, तो साधक को क्या करना चाहिए? (P6-0083)
- क्या हमारे हाथ में सच में पावर है? परिवार में अपने को मालिक कहते हैं, पर बात नहीं मानी जाती और अपने ही पैसे पर गुलाम हो जाते हैं। क्या यही गुलामी है, और फिर क्या करना चाहिए? (P6-0085)
- मेरे बच्चे ही मेरे लिए रुकावट बन रहे हैं। क्या करूं? (P6-0089)
- मेरे बच्चे कहते हैं कि हमें छोड़कर मत जाओ। तब क्या करूं? (P6-0097)
- गृहस्थ और सामाजिक रहते हुए क्या आत्मज्ञान संभव है? आसान है या कठिन? (P6-0099)
- नागपुर से आई मां कहती हैं, धन, गहना और बेटा-बेटी से लगाव छूट गया लगता है। पति की जंजीर थी, उसे छोड़कर आई हूं। मौन मिल गया, काम भी छोड़ दिया। परिवार वापस बुलाता है। इक्कीस दिन का टारगेट है। क्या मैं मुक्त हो गई? जाऊं या यहीं रहूं? आखिरी इच्छा और बेड़ी का क्या संबंध है? गुरु क्यों चाहिए? (P6-0105)
- साधना में पहले लगा कि कोई बहुत ऊपर ले जा रहा है। फिर दो दिन एक साया दिखा। फिर ईसा मसीह स्पष्ट दिखे और देर तक प्रकाश देते रहे। असीम शांति हुई। सनातन, कुरान और गुरु ग्रंथ साहिब पढ़े हैं, ईसाई धर्म इस जन्म में नहीं पढ़ा। ईसा मसीह कैसे दर्शन दे गए? परिवार का कोई आ जाए तो क्या करूं? (P6-0106)
- बिना गुरु के नाम जप सफल होगा कि नहीं? गुरु किया नहीं है, तो पहले यह समझना है कि गुरु आखिर है कौन। मैं गृहस्थ जीवन में हूँ। क्या स्त्री को गुरु दीक्षा और मंत्र की जरूरत है? गुरु किए बिना मंत्र कौन सा लूँ? कृष्ण को जगतगुरु मानती हूँ। क्या ऐसा भी है कि जब कुछ नहीं चाहिए, तभी गुरु मिलता है? (P6-0147)
- गृहस्थ में रहकर विषय और विकारों से कैसे बचें? विकार क्या है? (P6-0150)
- रिश्तेदार हमेशा हमारे परिवार की बर्बादी की सोचते हैं। मैं तेईस साल का हूँ। उनकी नकारात्मकता से कैसे बचकर रहूँ? क्या योग और ध्यान काफी है? (P6-0159)
- प्रियंका गुप्ता पूछती हैं, गृहस्थ जीवन में साधना कैसे करें, अपने को कैसे सुधारें? (P6-0161)
- राजेंद्र सिंह पूछते हैं, स्त्री गृहस्थ में रहकर बिना गुरु किए क्या स्त्रियों को मुक्त होने की आज्ञा नहीं है? (P6-0181)
- माता-पिता, पत्नी और पुत्र के प्रति जो भाव है, उसे प्रेम कहें या मोह? प्रेम किसको देखता है? (P7-0017)
- बच्चों को कैसा संस्कार देना चाहिए? (P7-0059)
- क्या गृह त्याग से ही मोक्ष मिलेगा, या गृहस्थ में भी मिल सकता है? (P7-0065)
- समाज और परिवार के लिए व्यक्ति सब कुछ करता है। खाना हो तो पहले परिवार खाए, कपड़ा हो तो पहले परिवार पहने, और फिर भी सहना उसे खुद पड़ता है। उस समय गुस्सा आता है, उसे पीना और कंट्रोल करना पड़ता है। क्या ये गुस्सा हमारा स्वभाव है? गुस्सा क्यों आता है, जब हम कुछ कर रहे होते हैं और परिणाम नहीं आ रहा? परिवार को सौ प्रतिशत देते हैं, हमसे अच्छा खाने और पहनने को देते हैं, पर कहते हैं वो काम मत करना जो बहुत दुखाता है। तब गुस्सा होता है, नाराजगी होती है। कितनी बार कोई ये सहेगा? एक दिन टूट जाएगा, रोते हुए कहेगा, जैसे जीना है जियो। न अलग हो सकता है, न हिला सकता है। अगर समझाने के बाद भी कोई छत से कूदने की बात करता है, जानकर खतरा मोल लेता है, तो उस स्थिति में क्या करना चाहिए? (P7-0078)
- इस मानव शरीर में आए हैं, तो कुछ न कुछ कर्म करना ही है। वो मजबूरी नहीं, जरूरत है। कर्म करते हुए अपनी समझ से देखना है कि समाज के लिए, हमारे लिए, और परिवार के लिए क्या हित है, वही करना है। इस जीवन को लगाना कहां है, और सदुपयोग कैसे हो? (P7-0081)
- त्याग की क्षमता हर इंसान में नहीं होती। कोई इतना फंसा होता है कि उसे लगता है अब जीने का फायदा नहीं, और वो अपने आप को सही जगह इस्तेमाल होने के लिए तैयार ही नहीं कर पाता। समाज भी दबाव डालता है कि कुछ भी हो, वो तुम्हारा भाई है, मां-बाप हैं, चाचा हैं, परिवार है। मां-बाप और भाई भी गलत हो सकते हैं। जरूरत पड़े तो माफी मांग लेते हैं, वरना कहते हैं पुरानी बात छोड़ो। व्यक्ति उस दबाव को नहीं झेल पाता। भीड़ में जहां धोखा मिला, वहीं चला गया। अपनी जिंदगी का फैसला नहीं किया, अपने आप से प्यार नहीं किया। परिवार को कर्तव्य कहकर संभालें, तो जब परिवार ही गलत चल रहा हो, तब क्या करें? (P7-0082)
- अपनी जिंदगी की क्लैरिटी क्यों नहीं हो पा रही? अंदर गुणों की ताकत नहीं है, शारीरिक बल नहीं है, अधूरापन है, कमियां हैं। जिन पर काम नहीं करना चाहता, उन्हें ढक रहा हूं। भाई कवर कर ले, इधर से कुछ मिल जाए। जहां कमी है, वहां पचहत्तर बार नमस्ते करूंगा, घरवालों की चापलूसी करनी पड़ती है। आज परिवार के साथ, कल पति-पत्नी के साथ, फिर बच्चों के साथ, दादा-दादी बनने तक वही कमजोरी रह जाएगी। जन्म-जन्म डर-डर कर क्यों जी रहे हैं? मैं आपसे डर रही हूं, आप मुझसे डर रहे हो, बात ही नहीं हो रही। कोई किसी को डरा क्यों रहा है? (P7-0083)
- अगर गुरु गलत हो, जैसे राजा बल के गुरु गलत थे, तो क्या करें? और अगर कोई भी, परिवार का हो या रिश्तेदार, भटकाने वाला या गिराने वाला काम करा रहा हो, तो क्या करें? (P7-0089)
- घर गृहस्थी में रहते हुए साधना कैसे हो सकती है? साधना का मतलब अपने आप को सुधारना है क्या? शेड्यूल इतना व्यस्त है कि अपने लिए थोड़ा समय नहीं निकलता। अभी रिटायर हुई हूं, पहले टीचर थी। (P7-0094)
- आत्मिक कल्याण की जिज्ञासा प्रबल नहीं थी, शादी परिवार वालों ने कर दी। क्या यह जबरदस्ती नहीं थी? (P7-0096)
- हम दोनों सेंट्रल गवर्नमेंट से रिटायर हैं, दोनों सक्षम हैं। अब क्या करें? परिवार के लिए कितना ईंट पत्थर जोड़ें? पति कहते हैं कहीं अच्छा कार्य में लगा न दूं, सब लुटा दूंगी। कोई भी गेरुआ वस्त्र पहन के आ जाए तो देने का डर है। गेरुआ वाले को कैसे समझें, जरूरत कैसे देखें? (P7-0097)
- पत्नी घर के कामधंधे में लगी रहती हैं। मैं कहता हूं अब छोड़ दो, मैं चुपचाप पुस्तक पढ़ना चाहता हूं, अध्यात्म में लगना चाहता हूं, पर काम नहीं छूट रहा। सुबह सबको उठा देती हैं, पांच बजे जगाकर कपड़े धोने में लगा देती हैं। कई बार कहा, दो तीन घंटे पुस्तक पढ़ो या वीडियो सुनो, नहीं सुनतीं। रिटायर हो गए, फिर भी काम करवाती हैं। बाहर गईं तो काम वाली से काम करवा लेना कह जाती हैं। क्या यह ठीक है? (P7-0100)
- बच्चों और बहुओं में तालमेल और शांति के लिए क्या करना चाहिए? बहू कह चुकी है कि पापा जी, इंदौर प्रोग्राम में जाने दो। घर में अभी फंक्शन भी है। (P7-0101)
- गृहस्थ आश्रम में जो भी मिलता है वह अपोजिट क्यों मिलता है? थोड़ा अंतर तो होना चाहिए, पर इतना अंतर क्यों मिला? मैं बचपन से गुरु के घर जाने वाली थी। इन्होंने साफ कह दिया था कि हम खाते पीते प्राणी हैं, और मैं लहसुन प्याज न खाने वालों में से थी। गुरु को छोड़ना नहीं चाहती थी, क्योंकि छोड़ती तो विवाह के लिए कहीं और जाना पड़ता। बड़ों की सहमति से, गुरु के कारण, इन्हीं से किया। अब रोती क्यों हूं? (P7-0103)
- विवेक राठौड़ पूछते हैं, गुरु जी, मैं शिक्षक हूं। तीन चार बार समझाता हूं, फिर भी कुछ बच्चे नहीं समझते। स्कूल में समय सीमित है, जिसमें बच्चों को समझाना होता है। ऐसे में क्या करूं? सरकार और सब रिजल्ट चाहते हैं, सबको सौ प्रतिशत चाहिए। (P7-0109)
- सुनते सुनते लगभग एक साल से प्रेरणा हुई, तभी आ पाया। परिवार के दलदल में ऐसा फँसा हूँ कि चार महीने से आना हो नहीं पा रहा था। एक बार गौतम बुद्ध की तरह बिना बताए चल जाने का मन हुआ, पर आपके वचनों से बिना बताए जाना उचित नहीं लगा। दो बच्चों की शादी करनी है, इसलिए बताकर आया। बड़ा बेटा सपोर्ट कर रहा है, बाकी पत्नी और बच्चे सब खींच रहे हैं। निकलना बहुत कठिन लग रहा था। अब क्या करूँ? (P7-0139)
- ईमानदारी की बात तब कठिन हो जाती है, जब स्थिति आती है। मान लो एक सरकारी विभाग है। सिस्टम चलाने के लिए कहीं ना कहीं बेईमानी में शामिल होना पड़ जाता है। परिवार भी चलाना है, आदमी उसी नौकरी पर निर्भर है। सरकार तो तय तनख्वाह दे रही है, पर आदमी सिस्टम के बीच में पिस जाता है। तब क्या करे? (P7-0148)
- कीटनाशक दवाओं से कीट मारे जाते हैं, और वही अन्न हम भी खाते हैं, उनका परिवार भी उसी पर चलता है। कीट मारने का दोष हमें भी लगता है क्या? (P7-0150)
- मैं कौन हूं, इसकी उपलब्धि कैसे हो? बहुत बार बताया गया है, पर हो नहीं पा रहा। मैंने अपनी तरफ से छोड़ दिया है, पर उधर से नहीं छोड़ रहे। शादी-विवाह का चक्कर है, वे खींच रहे हैं। मेरी तरफ से आसक्ति नहीं है। (P7-0158)
- एक साधक दो-तीन महीने पहले वीडियो देखकर आया। पहले और लोगों के प्रवचन जंच नहीं रहे थे। आपका वीडियो पहले अटपटा लगा, फटे वस्त्र में बैठे किसी को सवाल पूछते देखा, आगे निकल गया, फिर लौटकर पूरा सुना तो लगा यही आत्मकल्याण का रास्ता है। पत्नी रोकती थी, बच्चों की शादी के बाद साथ चलने की बात हुई। दादी की गति देखकर लगा कि बच्चों के लिए कमाते रहने के बाद भी वही गति हो सकती है। संसार सबको लात मारता है, फिर भी लोग संसार के लिए पागल हैं। वह पूछता है, संसार में रहते हुए कर्म कैसे करें कि जीवन आत्मकल्याण की ओर जाए? (P7-0191)
- एक साधिका कहती है कि चालाकियां इस तरीके से खत्म नहीं होतीं। यहां आने के लिए जुगाड़ किया, कई लोगों से झूठ बोला, सिर्फ पति से सच बोला कि मैं जा रही हूं। पूछती है, उस झूठ से किसी की हानि तो नहीं हुई? (P7-0193)
- कुंडली शक्ति योगी पूछते हैं, मेरा निकलना पूर्ण रूप से गृहस्थ आश्रम से जीते जी कैसे होगा? मार्गदर्शन करें। (P8-0001)
- परिवार भी छूट जाएगा फिर तो? (P8-0006)
- बहुत दिन से आना है, पर पत्नी एक महीने के लिए भी, एक हफ्ते के लिए भी नहीं निकलने दे रही। पत्नी है या बंधन? कैसे निकलूं? (P8-0011)
- एक साधक पूछता है, पिछले सत्संग सुनकर लगता है कहीं मैं भगोड़ा तो नहीं हूं। माता-पिता अस्सी के ऊपर हैं, पैतृक संपत्ति अभी अपने जिम्मे रखी है, हमें कुछ नहीं दिया। चार भाई हैं, दो बड़े भाइयों को कुछ नहीं दिया, छोटे भाइयों को दिया है। मेरे दो बेटे और एक बेटी हैं, सबसे छोटा पच्चीस पार कर गया, पढ़े-लिखे हैं, बड़े बेटे की नौकरी और शादी हो गई, दो की शादी बाकी है। पत्नी, छोटा बेटा और बेटी कहते हैं जब तक शादी ना हो जाए तब तक मत जाओ। नौ साल कमाई मां को दी। क्या मैं भगोड़ा हूं? (P8-0014)
- जैसे पति से सच बोला और बाकी से झूठ। अगर झूठ बोलने से दस को फायदा होता है, जान भी बचती है, तो क्या झूठ बोला जा सकता है? (P8-0016)
- बाबूलाल को घर-परिवार की याद आ रही है। विचार तो चलते रहते हैं। कुछ यादें खींचती हैं, प्रभावित करती हैं। जब उन विचारों के साथ होता हूं तो बहुत भारी दुख होता है। क्या करूं? (P8-0018)
- श्री कृष्ण जी ने जब शादी की, तो आपने क्यों नहीं की? भगवान राम की तरह होना चाहिए था? (P8-0048)
- पति और पत्नी का रिश्ता कैसा होना चाहिए? (P8-0075)
- परमात्मा सबको आसानी से नहीं मिलता, जैसे हम अपने माता-पिता से आसानी से मिल जाते हैं। ऐसा क्यों? (P8-0118)
- मेरे भाई गुजर गए। दो बच्चे हैं। मैं छोटा भाई हूं। क्या शादी कर सकता हूं? भाई के साथ धोखा तो नहीं होगा? शादी करना सही है या गलत? (P8-0133)
- अगर दोनों की हां है, तो शादी करना अच्छा है? (P8-0137)
- आपने कल के सत्संग में बताया था कि बाप का गलत कर्म बच्चे भोगते हैं। इसे थोड़ा विस्तार से बताइए। (P9-0013)
- क्या शादी करना जरूरी है? (P9-0023)
- एक परिवार में पिता बेईमान है। वह सिर्फ पैसों से प्यार करता है, और पावर से घर वालों को अपने तरीके से चलाता है। घर में सब कुछ उसकी मर्जी से होना चाहिए। ऐसे पिता के सामने क्या करें? (P9-0026)
- उसी घर में पत्नी भी रिश्ते के कहने की वजह से अप्रत्यक्ष रूप से पिता को कंट्रोल करती है। बच्चे सिर्फ डर से जीते हैं। उन बच्चों में मैं एक बच्चा हूं, सत्संग सुनता हूं, और उन्हें यह पसंद नहीं। वह बच्चा क्या करे? (P9-0030)
- शादी के समय भट्ट जी हमसे वचन लेते हैं कि मैं अपनी पत्नी या अपने पति का साथ दूंगा, उसके साथ खड़ा रहूंगा। कुछ घटनाओं की वजह से रिश्ता टूट जाता है। तो क्या हम एक-दूसरे के साथ बेईमानी कर रहे हैं? (P9-0034)
- मेरे मन में हमेशा यह प्रश्न आता है कि मैं कौन हूं। मुझे लगने लगा है कि मैं चुनी हुई आत्मा हूं, और जिन्हें परमात्मा चुनता है उनका जन्म टॉक्सिक परिवार में होता है। क्या यह सही है? (P9-0060)
- गुरुदेव, गृहस्थ में रहते हुए साधना कैसे की जाए? ध्यान और साधना कैसे करें? (P9-0130)
- निकलने के प्रयास से पहले जो वादे हमने अपने परिवार से किए थे, उन्हें निभाना जरूरी समझते हैं। तो इस बंधन से कैसे निकलें? (P9-0138)
- क्या कर्तव्य से हम बंधे हैं? कर्तव्य जैसा कुछ होता है? माता-पिता के प्रति हमारा क्या कर्तव्य है? और पढ़ाई के समय जो वादे किए थे, जिनकी अब जरूरत नहीं रही, अगर मैं उन्हें पूरा न करूं, जबकि योग्यता है कि कर सकता हूं, तो कैसे निकलूं? (P9-0155)
- गुरुदेव, आप कहते हो सामर्थ्यवान बनो। मैं अब छियालीस वर्ष की हूं, गृहिणी हूं, तीन बच्चे हैं। कैसे बनूं सामर्थ्यवान? ईमानदारी और सत्कर्म तो किए, लेकिन आत्मज्ञान के पीछे भागते हुए कुछ नहीं मिला। (P9-0156)
- अगर पत्नी पति पर भरोसा नहीं करती, बच्चे को पिता न मानने के लिए कहती है, और उसके माता-पिता का अपमान करती है, तो क्या पति को रिश्ता छोड़ देना चाहिए या जिम्मेदारियां निभाते रहें? (P9-0159)
- महाराज, जब से भक्ति मार्ग पर पड़ा हूं, तब से मैं अपने परिवार के साथ बैठ नहीं पाता। अंदर से काटने लगता है। क्या यह ऊर्जा का टकराव है? (P9-0162)
- महाराज जी, जब से ज्ञान समझा हूं तब से अंदर तकलीफ और दर्द तेज हो रहा है। संसार में जो मदद करता है वह फिर वसूलने लगता है। ऐसा क्यों है? परिवार में भी ऐसा ही होता है? (P9-0171)
- गुरु जी, क्या ज्यादा रिश्ते और बड़ा परिवार बंधन का कारण बनते हैं? (P9-0190)
- एक ने लिखा है कि ईमानदार होना दुनिया का सबसे कठिन काम है। गृहस्थ में तो और मुश्किल लगता है। ईमानदार बनते समय नीचे की सारी चीजें हिलेंगी, एक बार झटका लगेगा, दाल-रोटी और सूखी रोटी तक आना पड़ सकता है। आप योगी और तपस्वी हो, गृहस्थ नहीं बसाया। फिर भी आप कहते हो ईमानदारी सबसे सरल है? (P9-0192)
- गुरु जी, मेरी उम्र 22 साल हो गई है। अभी तक शादी नहीं हो पाई है। जल्दी शादी के उपाय बताएं। हम बहुत परेशान हैं। (P10-0048)
- गुरु जी, मैं फंसी हुई हूं। मेरे मां-बाप बच्चों में भेदभाव करते हैं और मुझे बलि का बकरा बना के रखते हैं। (P10-0123)
- गुरु जी, माता, बहन, पत्नी, पराई स्त्री, पिता और दोस्त के साथ कैसा व्यवहार करें और कैसा भाव होना चाहिए? (P10-0175)
- योगी जी, आपका ज्ञान समझती हूं और उस पर चलने की कोशिश भी करती हूं, पर जो संकल्प करती हूं उस पर टिके रहना मुश्किल होता है। कभी-कभी परिस्थिति ऐसी बनती है कि गृहस्थी के हिसाब से रहना पड़ता है। ऐसे में क्या करें? (P10-0181)
- गुरुदेव, क्या मैं अपने कल्याण के लिए बूढ़े मां-बाप को त्याग दूं? मैंने शादी भी नहीं की। आप मेरा मार्गदर्शन करें। (P10-0199)
- घर में जब कुछ बातें ऐसी हो जाती हैं, तो मुझे बोलना पड़ता है, और मैं सटीक बोलती हूं, बिना लाग-लपेट के। अगर कोई हमारे बच्चों को फंसा रहा है तो बोलना फर्ज बनता है। पर सामने वाले को और बच्चों को भी बुरा लग जाता है कि तुम इतना खराब बोल देती हो, और मैं बुरी बन जाती हूं। (P11-0008)
- कितने उम्र तक के बच्चे यहां (कुटिया में) आ सकते हैं? मेरे बच्चे 13-14 साल के हैं, उनकी छुट्टियां हैं। (P11-0025)
- अगर घर-परिवार छोड़कर यहां आ जाएं, तो कितने साल में (आत्मज्ञान) होगा ही होगा? (P11-0051)
- बच्चों को स्कूल में ही आध्यात्मिक शिक्षा दी जाए, या मां-बाप छुट्टियों में उन्हें ऐसी जगह लाएं, तो उनमें दूसरों को समझने की शक्ति आएगी। ऐसा क्यों नहीं होता? (P11-0073)
- घर-परिवार या ग्रुप में किसी को बार-बार बोलते हैं, वह समझता नहीं, और उसे हटा भी नहीं सकते। बहुत गुस्सा आता है। क्या करें? (P11-0086)
- अगर सभी बच्चों को आत्मज्ञान में लगा दिया जाए, तो क्या देश की टेक्नोलॉजी पीछे नहीं चली जाएगी? (P11-0095)
- कहानी है कि किसी ने जीवन भर जो भी किया, पर अंतिम क्षण में (बच्चे "नारायण" का नाम लेते हुए) भाव आ गया तो उसे वही गति मिल गई। क्या पूरी जिंदगी कुछ भी करके अंतिम क्षण के भाव से वह प्राप्त हो जाता है? (P11-0097)
- मेरे पति की सारी धोखेबाजी सामने आ रही है। साथ हूं, पर वे सुधरते नहीं। मार्गदर्शन दीजिए। (P11-0104)
- मुझे लगता है हर रिश्ता स्वार्थ पर टिका है। क्या माता-पिता का रिश्ता भी? वे औलाद से बहुत अपेक्षा करते हैं — यह स्वार्थ है या प्यार? (P11-0106)
- (एक साधक) धन की कमी नहीं, पर पत्नी नहीं रही, बच्चे विदेश में हैं, घर भूत बंगला लगता है। अध्यात्म में भी भ्रम ही भ्रम दिखता है; जिसके पास गया, उसने लूट लिया। और बच्चे कहते हैं धन भी मत खर्च करो। जीने का आधार ही नहीं है, क्या करूं? (P11-0139)
- (वही साधक) आज धन-वैभव खूब है, फिर भी घुटन क्यों है? और मेरे बच्चे मेरी इज्जत क्यों नहीं करते? (P11-0152)
- सत्संग से इतना समझ आ रहा है कि मैं शरीर और मन नहीं हूं — शरीर माता-पिता और पोषण से बना, मन बाहरी जानकारियों से। फिर इनके बिना भी क्या मैं कुछ हूं? इस पर अब जिज्ञासा टिक रही है। (P11-0158)
- घर से निकलने के बाद शरीर से तो भाग लेते हैं, पर गृहस्थ के 20-50 साल का राग-द्वेष, यादें साथ चलती रहती हैं। वैराग्य कैसे हो? (P11-0167)
- घर जाऊंगा तो संसार में ब्याह-शादी, किसी के मरण में जाना पड़ेगा — कैसे करें? (P11-0182)
- अध्यात्म की ओर आना चाहता हूं, लेकिन 40 साल की उम्र में परिवार की जिम्मेदारी पूरी करना जरूरी समझता हूं; बच्चों को छोड़ नहीं सकता। क्या करूं? (P11-0184)
- महात्मा कहते हैं कि पत्नी-बच्चे पिछले जन्म के कर्मों के अनुसार मिलते हैं, जिम्मेदारी पूरी करते हुए नाम जप करते रहो। आपका मार्गदर्शन? (P11-0191)
- जैसे कोई ऑलराउंडर शिक्षक दूसरी क्लास वाले बच्चे को तीसरी की ही मदद कर सकता है, सीधे तेरहवीं की नहीं — वैसे ही गुरु भी हमारी क्षमता अनुसार ही हमें आगे ले जाता है। तो मैं अपनी क्षमता कैसे बढ़ा सकती हूं? (P12-0005)
- आश्रम में रहने वालों की तो आप सेवा कराकर समझ खोल देते हैं; पर गृहस्थ तो निरंतर उसी दलदल और माहौल में रहते हैं, जल्दी आ भी नहीं पाते। वे बहुत ईमानदार रहने की कोशिश करते हैं, फिर भी गिर जाते हैं। लोग गुरु की फोटो टांग लेते हैं, पूजा-पाठ करते हैं कि गुरु जी पास हैं — तो वे कैसे समझें कि गिर रहे हैं या उनसे कमी हो रही है, और कैसे सुलझें? (P12-0008)
- क्या बच्चे आत्मज्ञान की अवस्था में रहते हैं? (P12-0013)
- क्या माता-पिता के कर्म का फल उनके परिवार पर भी असर डालता है? (P12-0025)
- यदि परिवार में एक व्यक्ति घुटन में है, तो उसकी घुटन का सामना परिवार के सभी सदस्यों को क्यों करना पड़ता है? (P12-0099)
- मैं गृहस्थ हूं; बरसों से सत्संग सुनता हूं — रोज चार-पांच घंटे रामकृष्ण परमहंस जी को और एक घंटा आपको — इतना ज्ञान भर गया है, पर भीतर की अनुभूति के लिए एकांत चाहिए, जो घर-गृहस्थी में हो ही नहीं पाता। एकांत के लिए जाना चाहता हूं तो पत्नी और परिवार रोक लेते हैं, उन्हें डर रहता है कि कहीं गृहस्थी ना छोड़ दूं। क्या करूं? (P12-0104)
- पत्नी को हर वक्त डर रहता है कि पति झोला उठाकर चल ना दे। यह भी तो एक प्राणी को कष्ट देना हुआ; क्या ऐसे कोई मोक्ष या मुक्ति पा सकता है? (P12-0107)
- घर-परिवार में बचपन से मां-बाप डालते हैं कि तूने फर्स्ट आना है, मेरी नाक की लाज रखनी है — अपनी अधूरी इच्छाएं बच्चों से पूरी करवाना चाहते हैं। तो अगर मैं गार्डियन के लिए ये प्रश्न रखूं — क्या वो अपने बच्चों से ऐसी इच्छा ना रखें? फिर वो क्या करें? (P12-0127)
- माफ कीजिए, जैसे सांसारिक जीवन में बच्चों के लिए या अपने लिए हम महत्वाकांक्षा रखते हैं — तो क्या वो हमारी आध्यात्मिक उन्नति के लिए बाधक है? (P12-0150)
- गुरु जी, परिवार, संबंध और साथी अपनी ओर खींचते हैं। (P13-0019)
- (एक बुजुर्ग माता जी के परिवार ने पूछा) माता जी ने 40 साल से भी ऊपर नाम रटा, माला फेरी, फिर भी कहती हैं मेरी भक्ति पूरी नहीं हुई। क्या नाम लेने से पार उतर जाएंगी? (P13-0033)
- गुरु जी, कई बार विचार आता है कि कोई बात नहीं, धीरे-धीरे पार उतर जाएंगे। पूरी ईमानदारी से जीवन जीने में घर-परिवार का भरण-पोषण भी मुश्किल से होगा, दुनियावी तकलीफें सहनी पड़ेंगी, तो मन पीछे हो जाता है कि एक-दो-चार जन्म और लग जाएंगे; ज्ञान तो आ ही गया, ईमानदारी-सत्कर्म-सत्संग पर चलते रहेंगे, धीरे-धीरे कल्याण हो जाएगा। (P13-0042)
- गृहस्थ महिला के लिए मार्गदर्शन करें — बच्चे की जिम्मेदारी के चलते अपने लिए प्रयास पीछे रह जाता है, फिर अफसोस होता है। (P13-0047)
- हम जैसे नवयुवक अभी शुरुआत में हैं; घर वालों की इच्छा है, शादी की बात चल रही है, उसमें टकराव आ जाता है। हम परमात्मा को पाना चाहते हैं — तो शादी करें या न करें? यही कंफ्यूजन है; अगर इसे छोड़ दिया और वो न मिला तो? (P13-0058)
- (एक साधक, परिवार के साथ) गुरु जी, मैं सत्संग भी समझता हूं, और गुटखा का सेवन भी करता हूं — यही चूक हो रही है। (पत्नी:) हम दो-तीन साल से बोल रहे थे पर बात नहीं सुनते थे; ज्यादा बोला तो गुस्सा करते थे, इसलिए छह महीने से यह टॉपिक ही बंद कर दिया। (P13-0068)
- कई साधु खाए-पिए बिना रह लेते हैं और साधना करते रहते हैं, जबकि गृहस्थों के लिए एक दिन भी बिना खाए मुश्किल हो जाता है — उनमें कौन सी शक्ति है? (P13-0082)
- गुरु जी, कभी-कभी घर-परिवार में रहने पर बंधन लगता है। (P13-0139)
- गुरु जी, मुझे जानवर पालने की इच्छा थी। मैंने एक बिल्ली पाली; फिर उसने बच्चे दिए, पांच-छह हो गए, सारे खानदान ने मुझ पर थोप दिया कि इनका क्या करेगा। मैं उन्हें फेंक भी नहीं सकता था, खिला भी नहीं पा रहा था, और फिर मैं उन्हीं बिल्लियों से चिढ़ने लगा। (P13-0152)
- महाराज जी, मैं सबके प्रति पॉजिटिव रहती हूं, परंतु परिवार में कुछ लोग मेरे प्रति नेगेटिव क्यों हैं, जबकि मैं निष्काम भाव से सेवा करती हूं? (P13-0165)
- गुरु जी, जिससे हमारा कोई संबंध नहीं, उसकी सेवा या मदद करते हैं और उससे कुछ नहीं चाहिए, तो वो भी प्रेम हुआ। लेकिन जो हमारे रिश्तेदार और परिवार हैं, उनसे तो अपेक्षा रहती है। अनजान आदमी के लिए करना निष्काम सेवा है? (P13-0185)
- गुरु जी, माता-पिता का अपने बच्चों के प्रति जो प्रेम होता है, उसे क्या कहेंगे? और बच्चों के मोह से मुक्त कैसे हों, उनसे भी प्रेम कैसे करें? (P13-0188)
- गुरु जी, परमात्मा को पाने की राह में निकलें तो जो घर-गृहस्थी खड़ी कर दी है, उसे छोड़ के निकलना चाहिए, जंगलों में जाना चाहिए, या उसे साथ रख के चलना चाहिए? (P14-0048)
- गुरु जी, हर पिता बच्चे को पढ़ाता-लिखाता है और सोचता है कि इसे डॉक्टर या इंजीनियर बनाऊंगा, मेरा नाम रोशन करेगा — क्या वह भी बेईमानी कहलाएगी? (P14-0054)
- गुरु जी, मुक्ति भी कुछ होती है? लोग मर जाते हैं तो परिवार वाले उन्हें मुक्त करवाते हैं — ये क्या है? और क्या कोई विशेष मुक्ति होती है? (P14-0061)
- गुरु जी, हम गृहस्थी वाले बिना भटके आपसे जो पा रहे हैं, उसके लिए आपको कोटि-कोटि प्रणाम। (P14-0099)
- गुरु जी, प्रपंच में, संसार-गृहस्थ में रहकर परमार्थ प्राप्ति आसान नहीं लगती। मेरे प्रयास तप-योग द्वारा चालू हैं, लेकिन गलत आदतों से शरीर खराब हुआ है, अब साथ नहीं देता — मजबूत कैसे करें? (P14-0112)
- गुरु जी, सब समझ तो गए, लेकिन ये नौ से छह की जॉब का चक्कर, गृहस्थी की जिम्मेदारी, ये प्रपंच — समझ नहीं आता कि इस तरफ जाएं या अध्यात्म और भगवत प्राप्ति की तरफ। क्या करें? (P14-0119)
- गुरु जी, हम गृहस्थ हैं; पुरानी याद और पुराना धोखा बहुत तकलीफ देता है, कैसे निकलें? (P14-0123)
- गुरु जी, माता-पिता के प्रति सेवा-भाव सांसारिकता में पकड़े रखता है, उनकी सेवा उनकी मनोकामना की पूर्ति है, संसार का ही हिस्सा बना रहता है। क्या संन्यास का रास्ता कोई अदृश्य सत्ता बनाती है? (P14-0124)
- गुरु जी, आप सबको अपने पास क्यों बुला रहे हो? सबका परिवार छुड़ा रहे हो क्या? (P14-0155)
- अगर कोई बच्चा जन्म से ही अंधा या लंगड़ा पैदा हुआ है, उसने तो कोई कर्म नहीं किया, फिर ये परिणाम क्यों मिला? (P15-0074)
- गुरुदेव, फिर कर्तव्य क्या है? जैसे परिवार का कर्तव्य — बेटी है, पत्नी है, माता-पिता हैं — हम कर्तव्य कैसे निभाएं? (P15-0117)
- गुरु जी, पत्नी को दीक्षा क्यों नहीं लेनी चाहिए? (P15-0136)
- गुरु जी, गृहस्थी में रहकर खुद को कैसे मिटाएं? क्या घर की जिम्मेदारियों को छोड़ना उचित है? (P15-0200)
- अगर ससुराल वाले और पति प्रताड़ित करें, तो स्त्री को ससुराल में ही रहना चाहिए या छोड़ देना चाहिए? (P16-0014)
- क्या शादी अज्ञानता में ही होती है? (P16-0065)
- गुरु जी, आत्मज्ञान होने के बाद बच्चों के पालन-पोषण के लिए अगर जॉब करनी पड़ जाए — आपका मार्गदर्शन चाहिए। (P16-0076)
- बहुत सी गृहस्थियों में पति कहता है, "मैं तो तुझसे आत्मीय प्रेम करता हूं, देख कितनी महंगी साड़ी ला दी", पर वह अपनी पूरी जिंदगी एक रस के चक्कर में निचोड़ देता है, और पत्नी इसी में लगी रहती है कि किसी तरह इसकी आदत छूटे। वो भी कहेगा मैं तुझसे आत्मीय प्रेम करता हूं। तो वहां मैं कैसे पता करूंगी कि यह आत्मीय प्रेम है या मेरा शोषण है? (P16-0179)
- तो लास्ट में आपकी क्या सलाह रहेगी — आजकल बच्चे जिसे रिलेशनशिप का नाम देते हैं, पहले दोनों एक-दूसरे से कुछ ले रहे होते हैं, फिर एफआईआर के चक्कर में जिंदगियां बर्बाद हो जाती हैं — अपनी सेफ्टी कैसे करें? (P16-0180)
- गुरु जी, गृहस्थ जीवन में भोजन कैसा रहे? गलत खाने की आदत कैसे छोड़ें? (खाने में बहुत ध्यान जाता है।) (P17-0038)
- गुरु जी, (परिवार में किसी को) पैरालिसिस की बीमारी है — क्या करें? (P17-0060)
- गुरु जी, हमारा भी भक्ति करने का बहुत मन होता है, लेकिन परिवार है — क्या करें? (P17-0108)
- गुरु जी, घर-परिवार से निकल नहीं पा रहा, कुछ ना कुछ बाधा आ ही जाती है — क्या इंसान का समय भी नियति के अधीन है? (P17-0116)
- गुरु जी, हमें लगता है कि घर-परिवार वाले हमारे बिना नहीं रह पाएंगे — क्या यह सही है? (P17-0137)
- गुरु जी, परिवार में बच्चों का पालन-पोषण अच्छे मूल्यों और ईमानदारी के ढंग से कैसे करें? (P17-0179)
- गुरु जी, आज लोग खुलकर कहते हैं कि बेईमानी के बिना चलेगा ही नहीं — बच्चों को अच्छी शिक्षा देनी है तो बेईमानी करनी पड़ेगी। क्या सच में जीवन जीने के लिए बेईमानी जरूरी है? (P18-0002)
- गुरु जी, आज मां-बाप को बच्चों से डरकर बात करनी पड़ती है और वृद्धाश्रम बढ़ते जा रहे हैं — इसका कारण क्या है? (P18-0003)
- गुरु जी, समाज और परिवार के जो दायित्व मिले हैं, उनसे हटना तो आसान है — घर छोड़कर भाग जाओ, एकांत में बैठ जाओ। पर क्या इससे दायित्व से परे हो जाते हैं? (P18-0023)
- गुरु जी, जो गृहस्थ है और समाज में रह रहा है, संन्यासी नहीं — क्या उसके लिए यह मार्ग बहुत कठिन नहीं हो जाता? (P18-0028)
- गुरु जी, अंतर्मन से भाव यही रहता है कि मुझे कुछ नहीं चाहिए, फिर भी परिवार और समाज के दायित्व में वे सब चीजें आकर खड़ी हो जाती हैं और अवरोध उत्पन्न करती हैं — क्या करें? (P18-0030)
- गुरु जी, क्या आपने घर-परिवार छोड़ दिया? परमात्मा की खोज और सामने वाले व्यक्ति में आप किसे प्राथमिकता देते थे? (P18-0038)
- गुरु जी, मेरा बच्चा अकेलेपन से परेशान है — उसे अकेलेपन से कैसे बचाएं? (P18-0074)
- गुरु जी, आप कहते हैं जो पाया है वह छोड़ दो — पर गृहस्थ जीवन में तो सब चाहिए, फिर क्या छोड़ें? और "चाहिए" वाले ध्यान से मुक्त हो गए तो दैनिक कार्य कैसे करेंगे? (P18-0095)
- गुरु जी, जब हम खोजी बनकर आध्यात्मिक मार्ग पर निकल जाते हैं, तो पत्नी-बच्चे जैसे अपने प्रेम वाले लोगों को दर्द होता है — क्या यह स्वार्थ (सेल्फिशनेस) नहीं है? क्या कोई और तरीका है? (P18-0111)
- गुरु जी, अटैचमेंट (लगाव) क्या है? माता-पिता से लगाव तो प्रेम से है, उसमें हमें कुछ नहीं चाहिए — फिर भी लगाव क्यों है, और उसे मिटा भी नहीं सकते? (P18-0131)
- गुरु जी, क्या हम जब भी किसी से बात करते हैं, उसमें लेनदेन होता है? माता-पिता से बात करने में तो हम कुछ नहीं लेते। (P18-0132)
- गुरु जी, गृहस्थी मेंटेन करते हुए साधक साधना कैसे करे? (P18-0136)
- गुरु जी, मेरा सबसे ज्यादा लगाव मां से है, हालांकि माता-पिता का झुकाव छोटे भाई की तरफ है; मैं कहता हूं पूरी संपत्ति उसे दे दो, मुझे नहीं चाहिए, मैं अपना कर्तव्य करूंगा — क्या यह ठीक है? (P18-0144)
- गुरु जी, क्या प्रियजनों (मां-बाप, पत्नी, बच्चों) के साथ भी हमें एक दायरा (सीमा) बनाना चाहिए और उन्हें साफ बता देना चाहिए — जैसे "आपकी इस बात से मुझे ठेस पहुंचती है, आप ऐसा न करें"? (P18-0145)
- गुरु जी, घर वाले शादी के लिए जिद कर रहे हैं, पर मुझे शादी नहीं करनी, खुलकर जिंदगी जीनी है और मुक्ति पानी है — मार्गदर्शन करें। (P18-0162)
- गुरु जी, मैं एक विधवा महिला हूं; अपने बच्चों का पालन-पोषण करते हुए आध्यात्मिक मार्ग पर कैसे आगे बढ़ूं? (P18-0168)
- गुरु जी, जब माता-पिता जीवित थे तो हमारे घर कई साधु-संत आकर रहते थे, अब सालों से कोई नहीं रुकता — मुझे खालीपन लगता है, क्या करूं कि वे फिर आएं? (P19-0035)
- गुरु जी, परिवार/भावनाओं वाले यात्रा कैसे रोकते हैं — कैसे निकलें? (P19-0070)
- गुरु जी, बच्चों/भाई के बच्चों से मोह है — लक्ष्य दिखे वही निकालेगा या और रास्ता है? मोह से कैसे निकलूं? (P19-0071)
- गुरु जी, मेरी पत्नी ने छत के गमलों से भगवान को चढ़ाने के लिए फूल तोड़े, मैंने कहा खिले हुए ज्यादा अच्छे लगते हैं, तो उसे बहुत दुख हुआ। क्या फूल तोड़ने देना चाहिए? (P19-0143)
- गुरु जी, ध्यान में मन प्रभु की तरफ नहीं लगता, दैनिक कार्यों की तरफ चला जाता है; घर-परिवार में रहते हुए गहरा ध्यान कैसे करें? (P19-0178)
- गुरु जी, गृहस्थ लोग अपना आत्म कल्याण कैसे करें? (P19-0184)
- गुरु जी, ईमानदारी के साथ चलते हुए क्या परिवार में आपस में एक-दूसरे के विकार बता सकते हैं? (P19-0195)
- गुरु जी, पश्चिम केवल कर्म करके अमीर है पर वहां परिवार और शांति नहीं, और यहां केवल नाम-जप में गरीबी आ रही है — बीच का रास्ता क्या है? (P20-0049)
- गुरु जी, क्या केवल भजन करने से या ईश्वर के भरोसे बैठे रहने से मैं अपने परिवार का पेट भर सकता हूं? (P20-0052)
- गुरु जी, कोई परिवार और जिम्मेदारी छोड़कर आपके पास आए और घर वाले परेशान हों तो क्या करना चाहिए? (P20-0062)
- गुरु जी, परिवार या स्कूल में कोई बच्चा या सदस्य बार-बार समझाने पर भी न समझे तो क्या करें? (P20-0071)
- गुरु जी, परिवार में साझी जमीन-जायदाद का लेन-देन करना हो तो कैसे करें? (P20-0075)
- गुरु जी, परिवार में कोई बार-बार समझाने पर भी न समझे तो हमारा कर्तव्य क्या है, और कब उसका त्याग कर देना चाहिए? (P20-0076)
- संसारी चाहता है परिवार, नौकरी, सुविधाएं सब वैसे ही रहें और आनंद भी मिल जाए — क्या दोनों का तालमेल हो सकता है? (P20-0112)
- आप कहते हैं किसी से उम्मीद मत रखो — परिवार में रहते हुए बिना उम्मीद के कैसे रहें? (P20-0143)
- बच्चे ने काम मेरे तरीके से नहीं किया तो मैंने डांटा — कैसे पहचानें कि डांट उसके हित में है या अपने तरीके के लिए? (P20-0162)
- बच्चा कुछ पूछे और मां उसे "चुप रहो" कहकर दबा दे — इसका क्या असर होता है? (P20-0163)
- 12-13 साल की बच्चियों को घर में खुलकर बात करने वाला कोई न मिले तो क्या होता है — और हम किसी को बदल नहीं सकते तो क्या करें? (P20-0164)
- हम संस्कार के नाम पर बच्चों पर आवरण चढ़ाते हैं — आवरण से आगे बढ़कर अपने तक कैसे पहुंचें? (P20-0165)
- मेरी भावना होती है कि किसी का नुकसान न हो, पर सामने वाले की अपेक्षा गलत हो जाती है; अपने हिसाब से जीने लगी तो परिवार से कनेक्शन टूट गया और तकलीफ हुई — इसे कैसे समझें? (P20-0173)
- प्रभु ने तो सबके लिए कुछ सोचा होगा कि इच्छा-अपेक्षा में फंसे मेरे बच्चे वापस मेरे पास कब आएंगे? (P21-0010)
- गुरु कैसे खोजें — गृहस्थ के लिए तो घर छोड़कर "गुरु कहां है" पूछते घूमना संभव नहीं? (P21-0029)
- गुरु जी, शहर लौटकर बीवी-बच्चों के बीच व्यवहारिकता में तो करना ही है — तब क्या करें? (P21-0052)
- गुरु जी, डॉक्टर होने के नाते मरीज से तो मैं कह देता हूं कि अपनी तरफ से पूरा प्रयास करूंगा, बाकी ईश्वर कृपा। पर घर में बच्चों का आत्मविश्वास न गिरे इसलिए कहना पड़ता है "सब ठीक होगा, हम संभाल लेंगे" — क्या यह भी धोखा देना है? (P21-0058)
- गुरु जी, जैसे शराबी को शराब की और जुआरी को जुए की ऐसी तड़प होती है कि वो परिवार-संसार किसी की तरफ नहीं देखता — वैसी तड़प हमारे अंदर आत्म-कल्याण के लिए क्यों नहीं बन पाती, जबकि आप इतना अच्छा समझाते हो? (P21-0070)
- गुरु जी, लोभ-मोह कहीं-कहीं बहुत भारी हो जाता है, परिवार में फंसे हैं — यह कैसे छूटेगा? (P21-0082)
- गुरु जी, जरूरतमंद का पता कैसे चले? आज समाज में कोई किसी नाम पर, कोई शादी-ब्याह के नाम पर मांग रहा है — कैसे पता हो कि इसे सच में जरूरत है? (P21-0101)
- गुरु जी, मैं पुलिस विभाग से चार महीने पहले रिटायर हुआ हूं, बच्चे सेट हैं, पारिवारिक जिम्मेदारियों से फ्री हूं — अब मुझे किस तरफ चलना चाहिए? मार्गदर्शन दीजिए। (P21-0104)
- गुरु जी, परिवार (कुटुंब) और आध्यात्म — दोनों को साथ लेकर कैसे चलें? (P21-0129)
- गुरु जी, (इनके) भाई-बहन काम के लिए मां को छोड़कर चले गए, बड़े भाई की शादी हुई पर उसका बोझ भी इन पर है; मां इन्हें नहीं छोड़ रही, इसलिए ये कहीं नहीं जा सकते — पर वहीं बैठकर साधना क्या है, आध्यात्म क्या है, यह समझना चाहते हैं और वह भी नहीं हो रहा। इससे कैसे बाहर आएं? (P21-0134)
- गुरु जी, मेरा परिवार है, विवाह कर लिया है, उनकी जिम्मेदारी है — मैं परिवार और घर में रह के साधना करना चाहता हूं, तो कैसे करूं? (P21-0138)
- गुरु जी, आपने कहा था वस्तुएं बंधन का कारण हैं, फिर आपने अपनी माता जी के लिए सोने की चैन बनवाई — तो क्या हमें भी अपने माता-पिता की इच्छा पूरी करनी चाहिए? (P21-0142)
- गुरु जी, एक प्रोफेसर बहुत सत्कर्म करते थे, 30 साल तक बिस्तर पर पड़े अपने परिवार-जन की सेवा भी की, लेकिन उन्होंने 30 साल तक इतने कष्ट झेले और उनका देहांत हो गया। इससे मुझे लग रहा है कि भगवान है या नहीं? क्या सत्कर्म करने वालों की ये परीक्षा है? मैं बहुत कंफ्यूज हूं। (P21-0164)
- गुरु जी, आप कहते हैं परिवार नहीं समझते; हमारे परिवार में, खासकर महिलाओं के लिए, अभी भी परिस्थिति ऐसी है कि सब छोड़ के जाना वो नहीं मानते — पुरुषों के लिए अलग है। आपका परिवार नहीं है, हमारा परिवार है ना — उसको छोड़ के कैसे चलना है? (P21-0172)
- गुरु जी, मेरे दो प्रश्न हैं — पहला, अहंकार और शरीर ही मेरी पहचान है, तो अपनी असली पहचान समझने का मकसद क्या है? दूसरा, यहां जितने लोग जमा हैं ज्यादातर बुजुर्ग हैं; सबने आज तक घर-परिवार चलाया, पर परिवार के सदस्य अपनी मनमानी करके चले गए — तो ऐसे लोगों को पालने का क्या मतलब? (P21-0190)
- गुरु जी, जैसे माता-पिता से जीव जन्म और गर्भ के साथ जुड़ा होता है और लंबे संसर्ग के कारण उन पर निर्भर रहता है, वैसे ही गुरु के सानिध्य में शिष्य जाता है — जो पहले से तृप्त और सिद्ध है उसके संपर्क में; क्या यह संपर्क भी उसी तरह निरंतर रहना आवश्यक है? (P22-0039)
- गुरु जी, मेरी बेटी ने भगवा कपड़े पहन लिए; मैं उसे समझाकर घर ले आई, पर उसके अंदर कथा-वाचक बनने की इच्छा है, शादी नहीं करनी कहती है। फिर कुंभ में जाकर अखाड़े में उसने फिर कपड़े पहन लिए और अब बनारस चली गई है, घर नहीं आ रही — अब हम क्या करें? (P22-0045)
- गुरु जी, कहते हैं वैराग्य में दमन की प्रधानता है और गृहस्थ लोग विवेक की प्रधानता पर चलते हैं; शंकराचार्य जी कहते हैं इसके बाद भी तितिक्षा चाहिए — प्रकृति द्वारा दिए सुख-दुख को ना चाहते हुए भी सहने का सामर्थ्य। हम अभी दमन पर ज्यादा फोकस कर रहे हैं — जैसे दर्द हो रहा है तो उसे महत्व नहीं देना, इच्छा को मार देना — यह दमन है? (P22-0047)
- महाराज जी, उम्मीद नहीं करनी चाहिए, देने का भाव होना चाहिए — जिस परिवार की जरूरत की पूर्ति भगवान मुझे निमित्त बनाकर मेरे द्वारा करवा रहा है… क्या सच में भगवान मुझे निमित्त बनाकर करवा रहा है? (P22-0063)
- गुरु जी, घर-परिवार और समाज अगर तकलीफ दे तो क्या जरूरी है कि सभी बातों का जवाब दूं? (P22-0075)
- गुरु जी, आपने जीवन जीने के मूल सिद्धांत बताए — ईमानदारी और सत्कर्म, और सत्कर्म में जरूरतमंद की सेवा। लेकिन जरूरतमंद की पहचान कैसे करें? हैदराबाद में एक परिवार ने कहा मालिक ने निकाल दिया, घर जाना है, भूख लगी है — खाना मत खिलाओ, पैसे दे दो। तभी दो लोग आकर बोले इनका रोज का यही काम है, तो हम आगे निकल गए। एक बच्ची ने 5 किलो आटा मांगा तो दुकान वाला बोला यह इसे यहीं बेच आएगी। ऐसे में विश्वास कैसे करें? (P22-0083)
- गुरु जी, मैं दो-तीन ऑथेंटिक एनजीओ से जुड़ी हूं और हर महीने योगदान देती हूं, लेकिन पता नहीं कैसे मेरा नंबर दूसरे एनजीओ के पास चला गया — वहां से कॉल आती हैं कि बच्चे की हालत बहुत खराब है, जो हो सके दे दो। मुंबई, नासिक, उत्तराखंड से कॉल आती हैं, हम हैदराबाद से वहां जा नहीं पाते। अगर पैसे दान कर दिए और वे दुरुपयोग करें तो क्या उसका दोष हमें भी लगेगा? (P22-0085)
- गुरु जी, परिवार में जो बड़ा होता है, वह पत्नी, बच्चे, पोते-पोतियों से प्राणिक रिश्ते से जुड़ा रहता है। बेटा हजार किलोमीटर दूर है, उसकी कोई परेशानी का फोन आता है — मैं जानता हूं मैं वहां कुछ नहीं कर सकता, जो करना है वहां उसी को करना है — फिर भी वह दुख क्यों होता है? (P22-0097)
- गुरु जी, माता-पिता शादी करके खुद परेशान रहते हैं, और बाद में बच्चों की शादी करके उन्हें भी परेशान करते हैं — पता है कि शादी के बाद दुख है, फिर भी जानबूझकर ऐसा क्यों? (P22-0107)
- गुरु जी, क्या अपना कर्म अपने बच्चों को भोगना पड़ता है? (P22-0108)
- गुरु जी, आप कहते हैं ईमानदारी और सत्कर्म करो; लोग कोशिश कर रहे हैं पर पूरी तरह नहीं आ पाए। जो चीज हमें सिखाई जाती है, मन उसे ना करके दूसरी तरफ जाता है — जैसे बच्चे को बोल दिया कि वहां नहीं जाना है तो उसे वहां का पता ही दे दिया। तो क्या समाज इस कारण खराब हो रहा है कि उसे अच्छा बनाने की कोशिश की गई? (P22-0127)
- गुरु जी, लोग गर्लफ्रेंड-बॉयफ्रेंड, शादी, सारे रिलेशन इसलिए बनाते हैं क्योंकि वे अकेले नहीं जी सकते। (P22-0151)
- गुरु जी, आप कहते हैं कि माता-पिता और गुरु का ऋण नहीं होता; लेकिन एक साधक या परिक्रमा करने वाला जब मार्ग में किसी से ठहरने और भोजन की व्यवस्था स्वीकार करता है, तो क्या ये ऋण नहीं है? (P22-0170)
- गुरु जी, यह जो बात कही जा रही है, वह बहुत ही हाई लेवल पर कही जा रही है। जैसे विद्यालय में टीचर बच्चों को बोलता रहे कि सच बोलो, तुम्हारा सब भला हो जाएगा — तो कितने बच्चे सच बोलने वाले होंगे? उनको सच तक पहुंचाने के लिए बहुत कुछ समझाना, एक्टिविटी करवाना पड़ता है, वह एक लंबा प्रोसेस होता है। एक छोटा सा मैसेज देकर छोड़ने से शायद ज्यादा बात बनने वाली नहीं। तो जो यहां आएगा, क्या आप उसकी स्थिति के हिसाब से उसको गाइड करते हैं? (P23-0010)
- गुरु जी, 'कुछ नहीं चाहिए' के भाव में — जैसे कोई मजदूर है, उसकी रोजी-रोटी, आय — उसमें भाव नहीं होना चाहिए? और परिवार में, घर-गृहस्थी में रहते हुए एकदम 'कुछ नहीं चाहिए' की स्थिति तो नहीं हो सकती। (P23-0011)
- प्रणाम प्रभु जी, मैं और मेरी पत्नी आपके यहां आने के लिए मुंबई से निकलेंगे। मेरी पत्नी का सवाल है — पीरियड के समय अपनों की कुटिया में क्या नियम से रहना होगा? (P23-0026)
- गुरुदेव, आपका कथन सही है कि व्यक्ति कामनाओं, मोह और उनके बंधनों में फंसा हुआ है। तो जो व्यक्ति दिन भर ईमानदारी से मजदूरी करके अपने परिवार का पेट भरता है, क्या वह मुक्त है, या कुछ और मार्गदर्शन करें? (P23-0028)
- गुरु जी, परिवार के लोग बेईमानी करें तो उनसे कैसे व्यवहार करें? (P23-0035)
- गुरु जी, गृहस्थ में रहकर मुक्ति पाने के लिए कोई सरल उपाय बताइए। (P23-0052)
- गुरु जी, आपने कहा था कि किसी का साथ दो तो अंत तक निभाओ। शादी में हम साथ-साथ का वचन लेते हैं — तो आध्यात्म में आने के लिए घर वालों को कैसे छोड़ें? (P23-0055)
- गुरु जी, जैसे आपने कहा कि अपनी इच्छा के अनुसार कोई चीज नहीं मिलती तो हमें गुस्सा आता है। अब एक परिवार में जैसे पांच लोग हैं, उसका जो मुखिया होगा वह तो चाहेगा ही कि मेरे हिसाब से काम हो — जरूरी भी है, क्योंकि कुछ काम उसके हिसाब से ही सही होते हैं। नहीं होगा तो उसे गुस्सा आएगा। इस परिस्थिति में क्या करें? (P23-0067)
- गुरु जी, परिवार से निमंत्रण आता है और हम जानते हैं कि वे ईमानदारी से नहीं कमाते — तो उनके यहां भोजन ग्रहण करना चाहिए या नहीं? (P23-0107)
- गुरु जी, आपका कहना है कि जरूरत में जियो। लेकिन किसी परिवार में एक व्यक्ति यह बात समझ जाता है और बाकी सदस्य नहीं समझते, उनकी जरूरत ज्यादा है — मेरी क्षमता भी ज्यादा है, पर मैं जरूरत में रहना चाहता हूं, और परिवार उससे ज्यादा में रहना चाहता है, डिमांड करता है; मैं प्रमुख हूं तो उनकी जरूरत पूरी करना मेरा कर्तव्य बनता है — इसमें संघर्ष बना रहता है। तो उनके साथ कैसे बनाकर चलें? (P23-0112)
- गुरु जी, जैसे बच्चा टॉफी की जिद करता है और मां जानती है कि इससे उसके दांत सड़ेंगे, तो वह उसे धीरे से दूसरे ऑप्शन में लगा देती है — क्या गुरु भी ऐसे नहीं कर सकते? (P23-0128)
- गुरु जी, एक व्यक्ति का माता-पिता के प्रति और गुरु के प्रति क्या कर्तव्य हो? (P23-0134)
- गुरु जी, जब माता-पिता के भीतर संतान के लिए प्रेम न होकर केवल धन का लालच और क्रोध रह जाए, तो अपनी मानसिक शांति के लिए उनसे दूरी बनाना सही है या गलत? (P23-0138)
- गुरु जी, मैं अध्यात्म में लगा हूं और मेरी पत्नी सोशल मीडिया में लगी रहती है, और वो हमसे नाराज रहती है क्योंकि हम गुरु-ज्ञान में लगे हैं। ऐसा क्यों होता है? (P23-0146)
- गुरु जी, अगर सिर्फ मनुष्य शरीर से ही परोपकार होता है, तो क्या हाथी वगैरह एक-दूसरे की रक्षा करके, अपने बच्चों को संस्कार देकर, या वानर आदि शोर मचाकर हिरणों को शिकार से बचाकर परोपकार नहीं करते? क्या ममता के बिना परोपकार संभव है? (P23-0195)
- गुरु जी, गुरु गृहस्थ को बनाएं या विरक्त को? मार्गदर्शन करें। (P24-0035)
- गुरुजी, आत्मज्ञान मतलब क्या? क्या सारी इच्छाओं का अंत ही आत्मज्ञान है — मतलब बीवी-बच्चे सब छोड़ दिए जाएं? (P24-0070)
- योगी जी, मैं हैरान हूं — एक 25 साल का लड़का है, मैकेनिकल इंजीनियरिंग का कोर्स कर रहा है, फिर भी छोटे-मोटे काम में भी उसमें ये जिज्ञासा नहीं है कि ये कैसे होता है, वो कैसे होता है। बच्चे तो अपने खिलौने भी खोल के बैठ जाते हैं — तो वो सीखना क्यों नहीं चाहता? (P24-0102)
- गुरु जी, बच्चे या पत्नी कुछ उल्टा-सीधा बोलते हैं, करते हैं, तो गुस्सा आता है — कृपया मार्गदर्शन करें। (P24-0114)
- गुरु जी, क्या गृहस्थ जीवन में रहते हुए आत्मज्ञान को लक्ष्य बनाया जा सकता है? (P24-0124)
- गुरु जी, जब से पति गए हैं, मन बहुत पीछे जाता है, उनकी बहुत याद आती है। क्या करूं? (P24-0133)
- गुरु जी, बच्चों को अच्छी बातें सिखाते समय बच्चे सीखना नहीं चाहते, टालते रहते हैं, तो क्रोध आता है। क्या करें? (P24-0138)
- गुरु जी, हम रोज बच्चों को बिस्किट देते हैं — यह सत्कर्म है या सेवा? और रास्ते में किसी का एक्सीडेंट हो जाए और हम उसे अस्पताल पहुंचा दें, तो? (P24-0153)
- गुरु जी, गृहस्थ को आत्मज्ञान कैसे होगा? (P25-0006)
- महाराज जी, यदि अपने ही माता-पिता या परिवार के लोग अज्ञान और अहंकार के वश केवल अपना नियंत्रण चलाना चाहें और हमारे सच्चे प्रेम व दर्द को ना समझें, तो क्या मन में बिना किसी द्वेष के उनसे दूरी बनाकर रहना सही है? (P25-0022)
- गुरु जी, आप ऐसी स्थिति में आने के लिए कह रहे हैं जहां आपको कुछ भी नहीं चाहिए, लेकिन परिवार और लोगों के प्रति जिम्मेदारियों के कारण इंसान जिंदगी में उलझ जाता है — तो क्या करें? (P25-0029)
- गुरु जी, मेरे घर वाले कह रहे हैं कि शादी कर लो, अब उम्र हो गई। माता-पिता की उम्र भी 60 के पार हो गई है, घर में खाना बनाने के लिए कोई नहीं है, और मैं इस संसार में सांसारिक जीवन जीना नहीं चाहता। मैं क्या करूं? (P25-0048)
- गुरु जी, मैं खाना बनाकर माता-पिता को खिला रहा हूं, उनकी सेवा भी कर रहा हूं, पर वे कहते हैं कि वंश आगे बढ़ाना है, यह तुम्हारी जिम्मेदारी है, शादी करो। (P25-0052)
- गुरु जी, बच्चा जब पैदा होता है तो अबोध होता है, उसमें कोई वासना नहीं होती। फिर जो वासनाएं आती हैं, क्या वे प्रकृति की हैं — क्या प्रकृति ने हमें ऐसा बनाया कि वासनाएं हों और फिर हम उनसे मुक्त हों? (P25-0053)
- गुरुदेव, पति और बच्चों का मोह कैसे छोड़ें? (P25-0068)
- गुरु जी, समझ से मैं पैसे और बिजनेस से मुक्त हो गया — ना कोई अटैचमेंट है, ना कोई जरूरत। पर शारीरिक संबंधों में, काम वासना में या बच्चों के मोह में यह चीज सिर्फ समझ से पूरी नहीं हो रही। क्या करूं? (P25-0096)
- गुरु जी, काम-धंधे में तो मैं ही जिम्मेवार हूं, पर परिवार में बच्चे, पत्नी, भाई-बंधु भी जीवन को प्रभावित करते हैं। बच्चा ठीक रास्ते पे नहीं चल रहा, मेहनत या पढ़ाई नहीं कर रहा, तो उसे समझाने के लिए गुस्सा भी आता है। तब क्या करें? (P25-0097)
- गुरु जी, मेरे बच्चे हैं — लड़का 14 साल का और लड़की 12 साल की। मैं अपनी धर्मपत्नी को बोल रहा हूं कि इनको या तो (गुरुकुल जैसी) पुरानी पढ़ाई पढ़ाएं, या घर पे रखकर आज वाली पढ़ाई पढ़ाएं — पर ये आज वाली पढ़ाई तो दानव ही बनाती है? (P25-0133)
- गुरु जी, क्या इसका जिम्मेदार वह व्यक्ति खुद है, या समाज — परिवार, गांव, सोसाइटी — का भी इसमें हाथ है? (P25-0141)
- गुरु जी, अगर बेईमानी का पैसा बच्चों के पास जाएगा, तो वो तो सत्कर्म कर ही नहीं पाएंगे, क्योंकि पैसा बेईमानी का है? (P25-0144)
- गुरु जी, मैं आंगनबाड़ी वर्कर हूं। जितने बच्चों की हाजिरी लगाते हैं, वे सब आते नहीं। अगर हाजिरी नहीं लगाऊंगी तो सेंटर बंद हो जाएगा, जिससे मेरा घर चलता है। मैं क्या करूं? (P25-0195)
- गुरु जी, एक लड़का है जो माता-पिता की बात नहीं समझता, उसके लिए क्या करें? (P26-0042)
- गुरु जी, जब परिवार में सबकी गलती हो और मजबूत व्यक्ति कमजोर को डांटे, तो क्या करें? (P26-0060)
- गुरु जी, हमारी माता जी और पत्नी में बहुत झगड़ा होता है, तो सब अलग-अलग चले गए हैं — माता जी अलग, पत्नी अलग। तो हम क्या करें? (P26-0071)
- गुरु जी, यदि अध्यात्म और परिवार में से किसी एक को चुनना हो, तो कैसे चुनें? (P26-0113)